ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ख़ुश्बू की तरह से मैं फिजा में बिखर गया
01-May-2016 12:00 AM 6419     

रोज़ बढ़ती जा रही इन खाइयों का क्या करें
भीड़ में उगती हुई तन्हाइयों का क्या करें
हुक्मरानी हर तरफ बौनों की, उनका ही हजूम
हम ये अपने कद की इन ऊचाइयों का क्या करें
बौनों के हुजूम में ऊंचा कद रहने वाले युवा ¶ाायर अखिले¶ा तिवारी की किताब "आसमां होने को था' अनेक अर्थों में उल्लेखनीय संग्रह है। इंसान को हम उसकी सोच से पहचान सकते हैं जो इंसान ऐसे खूबसूरत ¶ोर कहता है वो कैसा होगा ये पहचानना कोई मु¶िकल काम नहीं है। अच्छी ¶ाायरी के लिए मेरे हिसाब से इंसान का अच्छा होना लाज़मी है। बुरे लोगों द्वारा की गयी अच्छी बातों में असर नहीं होता।
नदी के ख़्वाब दिखायेगा त¶नगी देगा
खबर न थी वो हमें ऐसी बेबसी देगा
नसीब से मिला है इसे हर रखना
कि तीरगी में यही ज़ख्म रौ¶ानी देगा
तुम अपने हाथ में पत्थर उठाये फिरते रहो
मैं वो ¶ाजर हूँ जो बदले में छाँव ही देगा
पत्थर के बदले छाँव देने वाला यह बेहतरीन ¶ाायर धीर गंभीर व्यक्तित्व का स्वामी है। वह मानता है कि जहाँ गहराई होती है वहां का समंदर ¶ाांत होता है। वह अपने आसपास में जो देखते हैं सोचते हैं उसी को ¶ाायरी में ढाल देते हैं। उनकी ¶ाायरी में ख़्वाब नहीं हकीकत झलकती है।
ख्वाबों की बात हो न ख्यालों की बात हो
मुफलिस की भूख उसके निवालों की बात हो
अब ख़त्म भी हो गुज़रे जमाने का तज़्किरा
इस तीरगी में कुछ तो उजालों की बात हो
जिनको मिले फरेब ही मंजिल के नाम पर
कुछ देर उनके पाँव के छालों की बात हो
बीना जिला सागर मध्यप्रदे¶ा में जन्में अखिले¶ा बीस वर्षों से ¶ाायरी कर रहे हैं। समाज में हो रहे बदलावों पर उनकी नज़र रहती है। उसकी बुराइयों पर वो झल्ला कर विरोध में नारे नहीं लगाते बल्कि अपनी ¶ाायरी से उस पर विजय प्राप्त की बात करते हैं। लोगों से अपनी सोच को बदलने की बात भी वो बहुत विनम्र लेकिन असरदार अंदाज़ में करते हैं।
पानी में जो आया है तो गहरे भी उतर जा
दरिया को खंगाले बिना गौहर न मिलेगा
दर-दर यूँ भटकता है अबस जिसके लिए तू
घर में ही उसे ढूंढ वो बाहर न मिलेगा
ऐसे ही जो हुक्काम के सजदों में बिछेंगे
काँधे पे किसी के भी कोई सर न मिलेगा
महफूज़ तभी तक है रहे छाँव में जब तक
जो धूप पड़ी मोम का पैकर न मिलेगा
वे ग़ज़ल की मर्यादा में रह कर ज़िन्दगी की गुलकारियां अपनी ग़ज़लों में देखना चाहते हैं, उन्हें बहती नदी सी ग़ज़ल पसंद है इसलिए वो भाषाई पत्थर डाल कर उसके प्रवाह को अवरुद्ध करने के हामी नहीं हैं।
खूबसूरत और बिलकुल नए अंदाज़ के कलेवर वाली इस किताब को जयपुर के लोकायत प्रका¶ान, मोती डूंगरी रोड, जयपुर ने प्रका¶िात किया है। किताब की प्राप्ति के लिये अखिले¶ा जी से मो.नं. 9460434278 पर सम्पर्क किया जा सकता है। चलते चलते उनकी एक ग़ज़ल के चन्द अ¶ाआर और पढ़ते चलें -
तू इ¶क में मिटा न कभी दार पर गया
नायब ज़िन्दगी को भी बेकार कर गया

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