ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
खाड़ी के मजदूरों का स्याह पक्ष
01-Jan-2016 12:00 AM 1046     

अपने देश में यह गहरी मान्यता है कि जो परदेश में रहते हैं वे सर्वथा सम्पन्न होते हैं। अतएव परदेशियों को यहाँ तिलस्मी चश्मे से देखा जाता है। युवा बेहतर जीवन और रोजगार की तलाश में विदेश पलायन करना चाहते हैं। युवतियाँ "परदेश जा के परदेशिया, भूल न जाना पिया ...' जैसे गीत गुनगुनाते हुए परदेशी बालम का सपना देखती हैं। किन्तु विलायत जाने वाले सभी लोग खुशनसीब नहीं होते हैं और सबको दौलत, शोहरत और विदेशी मेम का साथ नहीं मिलता है। प्रवासी भारतीयों के बदनसीबी के किस्सों से हम आये दिन अखबारों और अन्य माध्यमों के द्वारा मुखातिब होते रहते हैं। प्रतिष्ठित अखबार "द हिन्दू' के 26 दिसम्बर 2015 का संपादकीय का आलेख इस सच से पर्दा उठाता है : "पश्चिम एशिया में भारतीय मज़दूरों के साथ दुव्र्यवहार की हालिया कहानी का एक विवरण डरावना और इन देशों में प्रवासन करने वाले भारतीयों के दर्दनाक परिस्थितियों का संकेत है। केरल के तीन लोगों ने एक दलाल को यमन में रोजगार दिलाने के लिए पैसे दिए, लेकिन इसके बदले उन्हें सऊदी अरब ले जाया गया। वे सब प्रशिक्षित बिजली मिस्त्री थे, किन्तु उन्हें जबरन एक र्इंट की फैक्ट्री में काम पर लगाया गया। काम करने से मना करने पर उन्हें उनके मालिक के द्वारा डंडे से पीटा जाता था। इस अत्याचार को कैमरे में कैद कर उनके परिवारजनों को भी भेजा गया। वे ऐसे कैद, धोखे और दुव्र्यवहार की पहली कहानी से कोसों दूर थे। अक्टूबर में, तमिलनाडु की एक महिला मज़दूर ने कहा कि उसके मालिक ने उसके हाथ काटने का प्रयास किया था जब वह वहाँ से भागना चाहती थी। सितम्बर माह में एक वीडियो ऑनलाइन हुआ जिसमें भारतीय विनिर्माण मज़दूर के साथ उसके सऊदी अरब के सुपरवाइजर द्वारा दुव्र्यवहार करते देखा गया। जब पत्रकार क़तर में फीफा वि?ा कप 2022 के निर्माण का जायजा ले रहे थे तो उन्होंने भारतीय कामगारों को शोषणयुक्त करार पर अत्यधिक कम मजदूरी पाते हुए फटेहाल बसर करते हुए देखा। पूर्व में विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने संसद में बताया था कि केवल वर्ष 2015 में ही खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों के शोषण की शिकायतों 7,400 से ज़्यादा मामले दर्ज किये गए। पश्चिम एशिया में 60 लाख से अधिक भारतीय कामगार हैं जो इस क्षेत्र के कुल निर्वासित कार्यबल का एक चौथाई हिस्सा हैं। इनमें 28 लाख कामगार संयुक्त अरब अमीरात में, 18 लाख सउदी अरब में और 5-5 लाख से अधिक क़तर, कुवैत और ओमान में हैं। वर्ष 2014 में अमेरिका से वापस स्वदेश भेजे जाने वाली कुल रकम 10 अरब डॉलर की तुलना में खाड़ी के देशों से कुल 32.7 अरब डॉलर रकम स्वदेश भेजा गया। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने यह पाया कि इस क्षेत्र के 6 लाख शोषित कामगारों में ज़्यादातर भारतीय नागरिक हैं। वास्तव में शोषण की शुरुआत भारत में ही भर्ती और प्रवासन के क्रम में शुरू हो जाती है। एक केस केरल के रहने वाले सऊदी अरब के मज़दूरों का था, जिन्हें एक पुलिस अधिकारी ने ही दलाल को सौंप दिया था। विदेश मंत्रालय को इन समस्याओं की जानकारी है और श्रीमती सुषमा स्वराज ऐसे मामलों पर अपनी नाराजगी का इजहार कर चुकी हैं और वे हरदम सहायता और समर्थन के लिए तैयार रहती हैं। फिर भी इस समस्या का कोई अंत नहीं हो पाया है। भर्तियां बड़े पैमाने पर अनियमित तरीके से होती हैं। ज़्यादा मजदूरी का करार भी टूट जाता है और काम मिलने पर सुरक्षा की कोई गारण्टी भी नहीं होती है। ज़्यादातर कामगार गरीबी में जीवन बसर करते हैं और अपने परिवार के लिए बेहतर ज़िन्दगी की आस में अपने अधिकारों पर जोर नहीं दे पाते हैं। ये भारत के असली प्रवासी हैं जो अपने देश में सर्वाधिक पैसा भेजते हैं और सर्वाधिक निवेश करते हैं। भारत को इनकी भलाई सोचनी चाहिए।' खाड़ी देशों से सम्बंधित एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी के देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की देश से सौतेले बर्ताव की शिकायत यूँ ही नहीं है। उनका कहना है कि जहाज़ के किराए का मसला हो या हवाई अड्डे पर जाँच का हर जगह उन्हें परेशानी उठानी पड़ रही है।

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