ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कविता एक दो : ज्योत्स्ना शर्मा
01-Jun-2018 01:43 AM 1406     

एक

सृष्टि का आधार बेटियाँ
विधना का उपहार

नेह की निर्मल सी धारा
सींचतीं मन-उपवन सारा
इन्हीं से हरा-भरा जीवन-
स्वर्ग से भी लगता प्यारा

खिलें, ज्यों ख़ुशियों की कलियाँ
महकातीं संसार

यूँ कोमल तितलियों सी हैं
जो बरसें, बदलियों सी हैं
क़यामत हैं अँधेरों की
जो चमकें बिजलियों सी हैं

ये चिठियाँ हैं उजालों की
बाँट रही उजियार

दर्द की मधुर दवाई हैं
लाड़ली, कहें पराई हैं
रीत ये कुल की, सदियों से
निभाती अब तक आई हैं

कल्पनाएँ कल की, अम्बर
छूने को तैयार

भोर की किरण बनेंगी धूप
वीचियाँ रजत चन्द्रिका रूप
मन के रेतीले-तट पर
सीपियाँ मोती भरी, अनूप

मन के मन के जोड़ बनातीं
दमके-दमके हार।

दो

एक सुरमई शाम!

घूम रही है घटा गगन में
ले बूँदों के जाम
जाने कैसा नशा दे गई
एक सुरमई शाम

दर्द भरे से गीत धरा ने
तड़प-तड़प गाए
सागर की चिठिया पहुँचाने
तब बादल आए
व्याकुल मन की बेचैनी को
लेती पुरवा थाम

व्याकुल करते हैं सुधियों में
तरसे-तरसे नैन
बरखा के मिस भेज दिये हैं
प्यार भरे ये बैन
सुख की फ़सल उगाने, करने
दुख का काम तमाम

एक छुअन ने आज जगाए
फिर कितने अरमान
महक-महक मन-धरा सुनाए
नए-नए फ़रमान
झूम-झूम हाथों में थामा
बादल से पैग़ाम

धरा-गगन दीवाने, मौसम
मचला, बौराया
नाच रही है हवा,
लगे यूँ खूब नशा छाया
लिख डाली पाती सड़कों पर
ले काग़ज़ का काम।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^