ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कबिरा खड़ा बाज़ार में
01-Jun-2016 12:00 AM 2397     

मानस में एक चित्र उभरता है, राग-द्वेष से परे, कौन है यह संत जो सबकी खैर की कामना करता है? यह संत और कोई नहीं, मध्यकालीन भारत में व्याप्त अन्धकार को अपने ज्ञान की ज्योति से ज्योतिर्मय करने वाले अग्रदूत, महान भक्त कवि और संत कबीर दास हैं। उनका पूरा जीवन लोक-कल्याण पर आधारित था। अपने आप में कबीर, साधक, भक्त कवि, मत- प्रवर्तक, तथा समाज सुधारक थे। अन्धकार में सोए समाज को झकझोर कर जगाने वाले कबीर के अमृत वचन आज भी उतने ही उपयोगी और प्रभावी हैं।
अपने जीवन काल में कबीर ने अनेकों सामाजिक विसंगतियां देखीं और उन्हें दूर करने के लिए अपने मन की बातों को वाणी दी है। उन्होंने देखा समाज में जन्म के आधार पर ऊंच-नीच की गहरी खाई थी और इसी तरह हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्य की अभेद्य दीवार खड़ी थी। कबीर ने अपनी सहज सरल बोलचाल की भाषा में इन विषमताओं के निराकरण का प्रयास किया है। उनके इसी प्रयास के कारण उन्हें सुधारक कहा गया है। वह एक आदर्¶ा समाज के समर्थक थे जिसमें प्रेम का आधार हो तथा ऊंच-नीच का भेदभाव या धर्म दीवार ना बने।
कबीर ने जन्म पर आधारित भेद को कभी स्वीकार नहीं किया। कबीर की मान्यता थी, पञ्च तत्वों से निर्मित यह मानव ¶ारीर एक बिंदु से बना है। इस ¶ारीर का निर्माता एक ही ब्राहृा रूपी कुम्हार है फिर जन्म के आधार पर भेद भाव क्यों? कबीर ने ब्रााहृण तथा ¶ाूद्रों के बीच के अंतर की कटु आलोचना की है। अपने कथन से वह जातिगत भेद के अंतर को मिटाना चाहते थे। एक स्थान पर वह कहते हैंं-
काहे को कीजै पांडे छोति विचार
छोतहि से उपजा संसारा।
पंडितों की आलोचना करते हुए वह कहते हैं-
पंडित होय के आसन मारै, लंबी माला जपता है,
अन्दर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।
इतना ही नही वह कहते हैं, जाति और वर्ण से परे व्यक्ति ही सच्ची भक्ति के पात्र हो सकते हैं।
कामी, क्रोधी, लालची इनसे भक्ति न होय,
भक्ति करे कोई सुरमा, जाती बरन कुल खोए।
मूलत: कबीर भक्तिकाल के ऐसे कवि थे जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर प्रहार करते रहे। उनके अंतर्मन की आवाज़ ने समाज में व्याप्त विषमताओं को दूर करने को विव¶ा किया। समाज की विसंगतियों में सुधार लाने के लिए कबीर ने कोई भाषण या उपदे¶ा नहीं दिए, अपने मन की बात बोलचाल की भाषा में कही। कबीर का भाषा पर पूरा अधिकार था, वह जिस बात को जिस तरह से कहना चाहते थे, उसे उसी रूप में कहा। उनके व्यंग्य बहुत तीखे हैं, जो सीधे दिल तक पहुंचते हैं, इसके बावजूद उनकी कटूक्तियों में आत्म-प्र¶ांसा, द्वेष या गर्वोक्ति कहीं नहीं थी। कबीर की सधुक्कड़ी भाषा में अरबी, फारसी, पंजाबी, बुन्देलखंडी, ब्राजभाषा, खड़ी बोली के ¶ाब्द समाहित हैं, इसीलिए उनकी जनसामान्य भाषा आम जनता तक आसानी से पहुंच सकी।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  के ¶ाब्दों में "सहज सत्य को सहज ढंग से वर्णन करने में कबीर अपना प्रतिद्वंदी नहीं जानतेे।'
कबीर की पारखी दृष्टि ने समाज से मिथ्याडंबर, हिन्दू-मुसलमान, उच्च एवं निम्न वर्ग के बीच अंतर की खाई को पाटना आव¶यक समझा। अपनी बात समझाने में उन्हें तर्क पर वि·ाास नहीं था, उन्होंने कहा-
कहे कबीर तरक जिनि साधै, तिनकी मति है मोटी।
हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतिपादन में कबीर ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कबीर ने दोनों धर्मों की संस्कृति या भावों में सामंजस्य लाने का प्रयास नहीं किया बल्कि मजहबी नेता जिन बातों को धर्माचार कहते थे, उनकी खिल्ली उड़ाई है। दोनों धर्मावळंबियों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में उन्होंने ना हिन्दू देखे ना मुसलमान, उनके मिथ्याडंबरों पर खुल कर कटाक्ष किए। दोनों धर्मों की कुप्रथाओं पर प्रहार कर के कबीर ने उनके मध्य सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है। हिन्दू भक्तों और मुसलमान फकीरों के बीच का भेद भुला कर, दोनों के साथ सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को ह्मदयंगम किया। दोनों धर्मों के आडंबरों पर चुटकी लेने में वह सिद्धहस्त हैं। पंडित और काजी, अवधु और जोगिया, मुल्ला और मौलवी सब उनके व्यंग्य के पात्र बने हैं।
उनके पदों में सर्व धर्म समन्वय की भावना स्पष्ट है। कबीर के अनुसार सर्व धर्म समन्वय का मूलाधार  प्रेम है। उनकी मान्यता है, भगवद वि·ाास ही समस्त समस्याओं का हल है। यदि दोनों धर्मों के लोग धार्मिक हैं और दोनों धर्म भगवान् में वि·ाास रखते हैं तो भगवान् के प्रति यह वि·ाास धर्मों के बीच वैमनस्य दूर करने में अमोघ औषधि का कार्य करेगा। भगवान् के प्रति नि:स्वार्थ प्रेम और जाति- धर्म से परे मनुष्यों को समान रूप में देखना, प्रेम का आधार है।
मानव मात्र के प्रति प्रेम-भावना के साथ कबीर ने सामाजिक प्राणियों के सदाचारी आचरण और सात्विक जीवन पर भी बल दिया है। सच्चरित्र मनुष्यों से ही समाज का उत्थान संभव है भ्रष्ट मनुष्यों से समाज का पतन होता है। उन्होंने मन और काम भावना पर नियंत्रण आव¶यक माना है। दूसरों के दोषों को देखने से मन में कटुता आती है, अपनी कमियाँ या दोष देखने से प्रेम बढ़ता है।
आज भी समाज में जाति-भेद, धार्मिक वैमनस्य, धर्म के नाम पर पाखण्ड, आडंबर समाज को खोखला कर रहे हैं। अत: कबीर दास अमर वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक और उपयोगी है।

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