ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जीवित रहेगा प्रमथ्यु
01-Sep-2016 12:00 AM 5349     

कभी-कभी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं और अक्सर आते हैं, जब जीवन के किसी मोड़ पर देखी, सुनी या पढ़ी रचना साक्षात् मूर्त हो जाती है। सामयिक और प्रासंगिक हो जाती है। उसके प्रतीक नूतन अर्थ के आलोक में भास्कर हो उठते हैं। जीवन को नई दृष्टि मिलती है, अनुभवों को नया अर्थ मिलता है। धर्मवीर भारती की एक लम्बी कविता "प्रमथ्यु-गाथा" ऐसे ही नये अर्थ प्रकट करती है।
अंग्रेजी के प्रसिध्द कवि शैली की एक अमर कविता है "प्रोमेथियस अनवाउंड"। उसी "प्रोमेथियस" को भारती ने "प्रमथ्यु" नाम दिया है। इस यूनानी पुराण कथा का नायक "प्रमथ्यु" है जो जूपीटर या स्वर्ग के देवता के महलों में बन्दी "अग्नि" को चुराकर पृथ्वी पर ले आता है ताकि पृथ्वी के साधारण जनों के जीवन में समाया अंधकार दूर हो सके।
यह एक जघन्य अपराध था और इसलिए इसकी सजा मिलनी भी अनिवार्य थी। फलत: जूपीटर ने "प्रमथ्यु" को बेडियों में जकड़कर एक विशाल शिला खण्ड से बंधवा दिया और उस बूढ़े गिद्ध को जिसने अग्नि लाने के लिए "प्रमथ्यु" को उत्साहित किया था, इस कार्य पर लगा दिया कि वह "प्रमथ्यु" के कंधे पर बैठ उसका हृदय नौंचता रहे। साथ ही साथ सजा की निरन्तरता बनाए रखने के लिए यह वरदान दे दिया कि हृदयपिण्ड का घाव निरन्तर भरता जाएगा। अर्थात् एक अन्तहीन दण्ड की यन्त्रणा भोगने के लिए उसे शापित भी कर दिया।
यह जन साधारण के लिए एक कौतुक भरा दृश्य था। भीड़ का हुजूम इस लोमहर्षक दृश्य को देखने के लिए उमड़ता रहता था। हृदय पिण्ड के नौंचे जाने और घाव के भरते जाने के करिश्मे को देखकर चकित-विस्मित होता रहता था। तमाशबीनों के झुण्ड के झुण्ड आते और चले जाते, लेकिन उनके मन में "प्रमथ्यु" के प्रति कोई संवेदना नहीं थी। उसकी पीडा के प्रति कोई लगाव नहीं था। वे तमाशबीन थे और तमाशा देखने आते थे।
धर्मवीर भारती ने इसी पुरा-कथा को आजाद भारत के प्रथम दशक के बीत जाने के बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में पुन: रूपायित किया था। संभवत: यह लम्बी कविता सन् 1957-59 के बीच कभी लिखी गई होगी क्योंकि यह कविता उनकी तीसरी काव्य-कृति "सात गीतवर्ष" में संकलित है, जिसका प्रथम संस्करण सन् 1959 में प्रकाशित हुआ था।
आज भारत जिस भ्रष्टाचार, बेईमानी, अहंकार, झूठ और अमानवीयता के अंधकार से आच्छादित है, उसमें प्रकाश की किरण खोजने का प्रयास करने की बात तो अनेक लोग करते हैं लेकिन कोशिश कोई नहीं करता है। ऐसे ही लोगों की ओर संकेत करते हुए भारती जी कहते हैं--
हम सब करिश्मों के प्यासे हैं/चाहता अगर तो हममें से हर एक व्यक्ति/अपने साहस से प्रमथ्यु हो सकता था/लेकिन हम डरते थे/ज्योति चाहते थे/पर दण्ड भोगने से हम डरते थे।
जब तक जन-साधारण के मन से यह डर नहीं निकलता, जब तक वे करिश्मा देखने से विमुख नहीं हो जाते, जब तक वे अपने  विवेक के आधार पर निर्णय करना नहीं सीख जाते, तब तक कोई "प्रमथ्यु" उनका उध्दार नहीं कर पाएगा। वस्तुत: हम सबको प्रमथ्यु बनना होगा।
आजादी के दिनों में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सब कुछ निछावर कर देने वाला जन-साधारण आजादी मिलने के बाद के वर्षों में इतना अनुशासनहीन, आत्मनिष्ठ और स्वार्थी हो गया कि विश्वास नहीं होता। ऐसी ही मन:स्थिति को व्यक्त करने वाली "प्रमथ्यु-गाथा" की ये पंक्तियाँ देखिए--
मूरख नहीं हैं जी/हम क्यों उठाते सिर/हम क्यों ये सब साहस करते व्यर्थ/अग्नि जिसे लाना था ले आया/अग्नि नहीं थी जब/तब हमने नहीं कहा/कि जाओ अग्नि लाओ तुम/और अग्नि जब आई/हमने नहीं कहा कि अग्नि नहीं लेंगे हम।
देश की जनता का मनोबल कैसे धीरे-धीरे टूटता चला गया। सत्ता के दलालों और नेताओं की मिलीभगत ने भ्रष्टाचार का ऐसा मकड़जाल बुन दिया है कि उसमें फंसकर सभी कायरों की तरह हाथ पर हाथ धरकर बैठ गए। "अग्नि" के माध्यम से जन-साधारण की इस काय मन:स्थिति का सुन्दर प्रस्तुतीकरण इन पंक्तियों में है--
माथे से अपने लगा कर प्रमथ्यु ने/फेंक दिया फिर मुझको/इन कायरों के बीच/मुझसे ये/ सुबह-शाम चूल्हा सुलगायेंगे/शय्या गरमायेंगे/सोना गलायेंगे/और जरा सा मौका पाते ही/अपने पड़ोसी का सारा घर फूकेंगे!
हमारा समाज जिस प्रकार के जाति, भाषा एवं प्रादेशिक द्वेष से भर गया है, उसके कारण आपसी सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना को ठेस पहँुची है। घृणा का जहर लगातार फैल रहा है। आपसी समझ का दायरा संकुचित होता जा रहा है लेकिन भारती इन विपरीत परिस्थितियों में भी आशा की ज्योति जलाए रखते हैं। वे "प्रमथ्यु" के मुख से कहलवाते हैं--
कोई तो ऐसा दिन होगा/जब मेरे ये पीडा-सिक्त स्वर/उनके मन को बेध/मूर्छित प्रमथ्यु को जगायेंगे!/उस दिन/हां, उस दिन/अकेला मैं रहँूंगा नहीं/सबके हृदयों में मैं जागँूगा/मैं प्रमथ्यु/कटु मैं नहीं हँूं/घृणा किससे करूँगा मैं?
भारती जी की ये आशावादिता अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं कि किसी न किसी दिन सबके मन में सोया "प्रमथ्यु" जागेगा। व्यक्तिगत प्रतिद्वन्द्विता और अंहमन्यता को त्यागकर जन-साधारण गांधी जी के वैष्णवजन की मूल प्रेरणा-- "पीर पराई" को जानने लगेगा। यह आशामय स्थिति हमारे लिए बड़े काम की है। यह हमारे भविष्य की आधारशिला है।
प्रतीकों की यही विशेषता होती है कि वे कभी भी जड़ नहीं होते। अन्त: सलिला जैसी अदृष्य गतिशीलता बनी रहती है। "प्रमथ्यु गाथा" में द्युपितर; जूपीटर से बना शब्द की निरंकुशता यानि सत्ता की अमानवीयता कुछ ऐसे व्यक्त होती है--
मैंने जो नक्शा बनाया था/मानव अस्तित्व का-/उसमें थी दासता,/विनय थी, कायरता थी/भय था, आतंक था/अंधेरा था/यह जो इस व्यक्ति ने/अंधेरे को देकर चुनौती/ दुस्साहस किया/यह मेरी सत्ता का प्रथम अनादर था।
जब-जब सत्ता के निहित स्वार्थों पर कोई चोट करता है तो पूरी व्यवस्था अपने-अपने राजनैतिक मत-मतान्तरों को त्यागकर एकजुट होकर जन-साधारण की  परिवर्तन की आकांक्षा को, चिनगारी को, बलपूर्वक दबा देती है और पूरा जन-समुदाय एक बार फिर तमाशबीन बनकर खड़ा रह जाता है।
हम हैं तमाशबीन/देख रहे हैं/कैसे जकड़ा हुआ है शिलाओं से/कैसे वह कंधे पर बैठा हुआ गिध्द/नौंच नौंच खाता है उसका हृदय पिण्ड।
समाज की निष्क्रियता, अवसरवादिता और चुनौतियों से भागने की प्रवृत्ति भी इस कविता में मुखर होकर सामने आती है। वे खुद कुछ नहीं करना चाहते बस किसी चमत्कारी मसीहा की तलाश है उन्हें। वे करिश्मों के प्यासे हैं। खुद कुछ करने या निर्णय लेने की क्षमता खो बैैठे  हैं। क्योंकि डरते हैं। दण्ड भोगने से बचते फिरते हैं। उन्हें हमेशा विषपान करने वालेे शिव की तलाश रहती है जो उनके हिस्से का अमृत तो दे दे लेकिन विष स्वयं पी जाए। "प्रमथ्यु" का प्रतीक भी ऐसे ही नीलकण्ठ शिव जैसा है।
इस कविता में समाज के विभिन्न वर्गों का सशक्त रूपायन होता है। इसमें सामान्यजन, सत्ताधीश, बुध्दिजीवी, गुरूजन सभी का चरित्र उद्धाटित होता जाता है। इन्हीं के मध्य से उभरता है "प्रमथ्यु" का चरित्र जो उस साहसी युवा शक्ति का प्रतीक है जो परिवर्तन लाना चाहती है जिसमें साहस है, बुध्दि है, दृढ संकल्पशक्ति है लेकिन उसकी अग्रज पीढी कायर, मोहान्ध और यथा स्थितिवादी है। फलत: बदलाव की भूमिका तैयार होने के बाद भी कुछ नहीं बदलता है। शोषण और भ्रष्टाचार का खेल जारी रहता है।
"प्रमथ्यु" इसी तरह की यथास्थितिवादी  मनोवृत्तियों से संघर्ष करने वाली शक्ति का प्रतीक है।
"प्रमथ्यु" कोई व्यक्ति तो नहीं है। यह हमारी चेतना में छिपी परिवर्तन की शाश्वत आकांक्षा का प्रतीक है जो बार-बार सिर उठाती है। "प्रमथ्यु" उस सर्जनात्मक शक्ति का प्रतीक है, जो रूढियों की बेडियों में जकड़ी होकर भी मुक्ति पाने के लिए कसमसाती है, तड़पती है, बार-बार प्रयास करती है। यह उस दुर्दमनीय संकल्पशक्ति का प्रतीक है जिसे रूढिग्रस्त मान्यताएं ध्वस्त नहीं कर पाती हैं। वस्तुत: "प्रमथ्यु" प्रत्येक मानव के हृदय में छिपी मुक्ति-कामना का प्रतीक है। और जिस दिन यह मुक्ति कामना, परिवर्तन की सतत आकांक्षा और विपरीत परिस्थितियों से अनवतर संघर्ष की आग बुझ जाएगी, उसी दिन "प्रमथ्यु" की मृत्यु हो जायेगी। उसी दिन सम्पूर्ण मानव जाति के भविष्य का सूर्य भी अस्त हो जाएगा।

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