ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जल की महिमा अंग्रेजी से अनुवाद - संजीव त्रिपाठी
01-Apr-2016 12:00 AM 1454     

शायद आदि मानव की पहली कुछ खोजों में यह शामिल रहा होगा कि, जीवित रहने के लिए वायु और जल का अलग-अलग महत्व है। वायु हमारे पास आती है और हम श्वाँस लेते है, परन्तु पानी की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए हम को उसके पास जाना पड़ता है। मानव शरीर सामान्य सीमा तक वायु की गंध और अशुद्धता को निथार सकता है, लेकिन थोड़ा-सा भी प्रदूषित जल जीवन के लिए हानिकारक हो सकता है। हमको जीवित रहने के लिये वायु चाहिये, परन्तु शरीर के पालन पोषण के लिए जल चाहिये। पानी शारीर में स्नेहक का कार्य करता है। कई बार, कई स्थानों पर, जल की कमी से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है, पर अधिकांश जगह वायु प्रचुर मात्र में उपलब्ध है। आदि मानव ने जल के प्रचुर स्रोत ढूंढें और वह उसके आसपास बस गया। इसी के कारण नदी पर आधारित सभ्यता विकसित हुई।
इसका अनुमान नहीं है कि मनुष्य को यह कब ज्ञात हुआ कि जल से उपचार किया सकता है। किसी भी रोग का सबसे सरल उपचार शरीर के आतंरिक अंगों को जल से स्वच्छ करना है। पानी एक बहुत अच्छा विलायक है और उसमें शरीर के आंतरिक अंगों में एकत्रित अवशेषों और जीवाणुओं को साफ़ करने का सामथ्र्य है। इस तरह जल का औषधि के रूप में उपयोग होता है। जीवन में इस तरह के अनुभवों से ही शायद मनुष्य ने यह सीखा हो कि सभी प्रकार के श्रोतों से आने वाले जल के गुण एक जैसे नहीं होते। एक जैसा व साफ़ सुथरा दिखने के बावजूद झरना, वर्षा, नदी और तालाब के पानी में अंतर बहुत हो सकता है। हमें यह मालूम नहीं है कि पानी के ये सब प्रयोग करते हुये कितने हजारों साल गुजर चुके है।
ऐसा हो सकता है कि जल के गुणों की खोज के बाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज हुई हो और वह है, मनुष्य के जीवन काल (उम्र) का अवलोकन करना। मनुष्य की आयु को उचित पालन-पोषण से बढ़ाया जा सकता है, शायद यह मानव सभ्यता की सबसे बौद्धिक खोज रही होगी। यह बात इस काल्पनिक अवधारणा की ओर इंगित करती है कि मानव के शरीर की आंतरिक शुद्धता से अर्जित शक्ति, जीवाणु और अशुद्धता से बचाव कर सकती है। आगे के अवलोकनों से यह प्रतीत होता है कि "पवित्र जल' के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति बीमारी से मुक्त हो सकता है और यहाँ तक कि वह मृत्युशैय्या से भी उठ खड़ा हो सकता है। आगे के और अवलोकनों को देखने से प्रतीत होता है कि आकाशीय गृह जैसे सूर्य, चन्द्र और तारे आदि दिन-ब-दिन, साल व साल, हमेशा "नूतन' दिखाई देते हैं, इससे उस पौराणिक कथा को बल मिलाता है कि, ब्रह्माण्ड में कहीं न कहीं "अमृत' की मौजूदगी है - जो जीवन को अमरत्व दे सकता है।
इस लेख के लेखक ने यह स्वीकार करता है कि मानव के आबादीकरण और मनुष्य की शुरूआती खोजों के बारें में अभी बहुत ज्यादा अध्ययन की आवश्यकता है। अभी तक हमने हो सकता है कि केवल वैदिक रचनाओं के संभवत& उद्भव के आधार पर ही पुनर्निर्माण किया हो? यह एक संयोग ही है कि रचनाकारों ने वेदों के कुछ भागों की रचना गंगा नदी के किनारे पर रहते हुये ही की थी, उन्हें वहाँ की ख़ूबसूरत वनस्पति और अद्भुद स्वास्थ्यप्रद गुणों वाले नदी के जल के कारण वहाँ का वातावरण बहुत पसंद था। शायद इसी के कारण हिमालय क्षेत्र में "गंगा' के श्रोत की खोज हुई, और "गंगा' देवी की पौराणिक कथा का अवतरण हुआ कि स्वर्ग से मानव जाति के भले के लिए दैवीय शक्ति के रूप में "गंगा' का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। गंगा का स्वर्ग में आकाशगंगा से सम्बन्ध माना जाता है।
पाप और कर्म : "पाप' की अवधारणा का प्रादुर्भाव भारतीय परम्परा में धीरे धीरे हुआ। वैदिक काल के पूर्व से ही यह अवधारणा थी कि सभी मनुष्यों को जीवन में एक जैसी खुशियाँ नहीं मिलती हैं। कुछ लोगों को दूसरों की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती  हैं और वहीं कुछ लोगों के हिस्से में दु&ख कुछ ज्यादा ही होता है। इन सब असमानताओं की तार्किक व्याख्या करने के लिए एक नई परिकल्पना का प्रादुर्भाव हुआ और जिसे "कर्म' के सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। "कर्म' का संचयन "सत्य' के पथ से विचलित होने से होता है। चूँकि सत्य अज्ञात है, इसलिए किसी को यह मालूम ही नहीं होता कि वह "कर्म' का संचयन करा रहा है या नहीं? ऐसा मानना है कि एकत्रित कर्माें का प्रभाव जीवन की दशा के रूप में दिखाई देता है और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी और जन्म-दर-जन्म अंतरित होता है और कर्माें का प्रभाव कम होने में कई पीढ़ियों और जन्म गुजर जाति है। इस अज्ञात के प्रति डर की सामाजिक मान्यता, भारतीय परम्परा का आधार बन गई।
"कर्म' समाज को सुव्यवस्थित और अनुशासित रखने का एक औजार बन गया। यह मान लिया गया कि जो लोग जीवन में सुखी हैं, जिनके पास ज्ञान है, और जो अपने परिवार का अच्छी तरह से पालन-पोषण कर रहे हैं, यह सब उनके "सत्कर्माें' के प्रभाव के कारण है और इसके विपरीत अन्य लोग अपने "दुष्कर्माें' के कारण रोगी, दुखी या असहाय हैं। यह बहुत ही स्वाभाविक है कि यदि कोई ग़रीब या साधनों से वंचित व्यक्ति अपनी मेहनत से अपने आप को दरिद्रता से बाहर निकालता है, तो यह उसके अच्छे "कर्माें' का ही प्रभाव है। दार्शनिक रूप से जीवन को सत्कर्माें के पथ में ढालने की एक प्रथा का अवतरण हुआ, जिसे "जैन धर्म' के नाम से जाना जाता है। मान्यता यह है कि कि कर्म मन (चित्त) को दूषित कर देते हैं और उसे "सत्कर्माें' के पथ पर चल कर कठिन तपस्या के द्वारा "शुद्ध' किया जा सकता है। "सत्य' और "अहिंसा' इस धर्मसंहिता के आधार स्तम्भ हैं।
वैदिक परम्परा ने भी "कर्म' के सिद्धांत को स्वीकार किया और उसके शुद्धीकरण के यन्त्र को अपने तत्त्वविज्ञान के अनुसार अपनाया। विस्तृत शुद्धीकरण के संस्कार अभियान्त्रित किये गये जिससे मनुष्य को उसके एकत्रित पापों से छुटकारा दिलाया जा सके। जीवन का प्रमुख उद्देश्य उस अनंत शक्ति से मिलना बताया गया, जिसे धार्मिक भाषा में "मोक्ष' या आम भाषा में "मुक्ति' कहते हैं। मान्यता यह है कि मनुष्य को कर्माें से छुटकारा दिलाया जा सकता है और वह कठिन तप और संस्कारों से अतीन्द्रिय होकर मृत्यु उपरांत स्वर्ग में वास कर सकता है। चूँकि युवा और वयस्क लोग जीवन की व्यस्तता के कारण यह सब संस्कार नहीं कर पाते हैं, इसलिए खासकर वृद्धावस्था के लोगों के लिए इन संस्कारों का विशेष महत्त्व है, जिससे वह मृत्यु से पूर्व अपने आप को पापों से मुक्त कर सके। यह युक्ति हिन्दू प्रथा का मुख्य आधार बन गयी।
पुण्य स्नान और अभिषेक : जहाँ हिन्दू और जैन धर्म के अनुसार मनुष्य का अपने कर्माें को भोगने के लिए अवश्य ही पुनर्जन्म होता है, तो वहीं, यहूदी मान्यता के अनुसार, मनुष्य मृत्यु के उपरांत स्वर्ग या नरक में पहुंचता है। परम्पराओं और सामाजिक स्तिथियों के कारण जीवन में कठिन नियमों का प्रचलन हुआ। इन जटिल नियमों के अनुसार, सभी वयस्क व्यक्ति किसी न किसी रूप में पाप के भागीदार होते हैं। इन पापों से छुटकारा पाने और पवित्रीकरण के लिए "पवित्र जल' में "डुबकी' (स्नान) लगाने के संस्कार का प्रचलन हुआ। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बार-बार "डुबकी' लगाने से ज्यादा शुद्धीकरण होता है। "डुबकी' लगाने का संस्कार ईसाईयों के एक नए सम्प्रदाय बापटिस्म (एठ्ठद्रद्यत्द्मथ्र्) में "दीक्षा स्नान' के संस्कार के रूप में परिवर्तित हो गया। यहाँ मान्यता यह थी कि "शरीर' स्वत& ही "पापों' से दूषित हो जाता है और उसे जल में "डुबकी' लगाने से पवित्र किया जा सकता है।
हालाँकि हिंदू पवित्रीकरण की प्रकियाओं के जानकार थे, लेकिन डुबकी से पाप धुलने की अवधारणा भारत में बाहर से आयी। यह प्रक्रिया ग्रीक में अपनाई जाती थी, और संभवत& ३०० ईशा पूर्व भारत में आई, जब भारत के लोग ग्रीक लोगों के संपर्क में आये। मेगस्थेनेसस, एक ग्रीक यात्री, जो उस समय भारत की यात्रा पर आया था, उसने इस बारे में कोई जिक्र नहीं किया है, जबकि, हेन सान्ग, एक चीनी यात्री, जो भारत की यात्रा पर ६०० ईशा बाद आया था, उसने भारत में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल "प्रयाग' नामक स्थान पर "पवित्र स्नान' का विस्तृत वर्णन किया है। लगभग उस समय से भारतीय दर्शन में पवित्र स्नान प्रचलन में आया और यह माना जाने लगा कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से पापों से छुटकारा पाया जा सकता है। वेदों में बताये गये जप तप और यज्ञ के तरीकों की तुलना में पवित्र जल में डुबकी लगाना बहुत आसान है, इसलिए यह बहुत ज्यादा प्रचलन में आया और समय के साथ यह प्रकिया एक "मेला' के रूप में अवतरित हुई और एक बड़ा "पर्व' बन गया।
कुम्भ मेला को पूरी तरह समझने के लिये दो अन्य कथाओं को भी समझाना पड़ेगा, पहली कथा "कुम्भ' (अक्षय कलश) के अनुसार एक समय एक राजा के दीर्घ शासन काल और राज्य की समृद्धि की कामना के लिए उसके राज्याभिषेक के समय एक पवित्र नदी से जल लाया गया और उससे स्नान कराया गया। राज्याभिषेक एक बहुत पुरानी वैदिक प्रक्रिया है, जिसमें सिंहासन पर बैठने से पहले राजा का जल से अभिषेक किया जाता है, जिससे सिंहासन पर बैठने वाला व्यक्ति जल के समरूपता के गुण का अपने आप में समावेश कर सके। समरूपता राजा का अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है, जिससे वह बिना किसी भेदभाव के शासन और सभी के साथ उचित न्याय करता है। राज्याभिषेक की प्रक्रिया को "राजा' बनने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म  माना जाता है।
कुम्भ मेला का महत्व : इस संस्कार का असल महत्व क्या है? जैसा कि ऊपर बताया गया कि इसकी पवित्रता के बारे में कई पौराणिक कथायें जुड़ीं हुई हैं। गूढ़ तथ्य यह है कि नदी के बहते हुये पानी में शरीर के लिए उपचारात्मक शक्तियाँ होती हैं और खासकर गंगा नदी के जल में खनिजों का संतुलित संघटन होने से और अधिक मात्रा में घुली हुई प्राण वायु (ऑक्सीजन) शुद्धीकरण का कार्य करती है, जिससे इसके जल का विशेष महत्व है। जल को पवित्र उसके शा?ात रूप और जीवाणु प्रतिरोधक गुणों के कारण माना जाता है। गंगा नदी का निचला हिस्सा अभी अनियंत्रित गंदे पानी के बहाव और शवों के कारण प्रदूषित है और बंगाल पहुँचते-पहुँचते नदी का जल बहुत प्रदूषित हो जाता है। हालाँकि हरिद्वार में गंगा का जल शुद्ध और स्वच्छ है। इन दिनों "कुंभ मेला' ने विशालाकाय रूप ले लिया है और इसमें शामिल होने के लिए एक दृढ़ संकल्प और पर्याप्त परिश्रम की आवश्यकता होती है। इस पर्व में किसी विशेष दिन को लाखों भक्तों द्वारा एक साथ पवित्र स्नान करना, पूरे वि?ा के लिए अपने आप में एक अचम्भा है।

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