ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
इटली की शिक्षा प्रणाली
01-Feb-2018 09:31 AM 1568     

यह बात करीब पच्चीस वर्ष पहले की है। तब मेरा बेटा उत्तरी इटली के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था। यहाँ बच्चे प्राथमिक विद्यालय में छः वर्ष पूरे करने के बाद जाते हैं। एक दिन मेरी पत्नी ने बताया कि बेटे के स्कूल के बच्चों के अभिभावकों की एसोसिएशन ने एक मीटिंग बुलाई है और मुझे उसमें जाना चाहिये। मीटिंग में गया तो मालूम चला कि अभिभावक चिन्तित थे कि इटली सरकार प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा पद्धति बदलना चाहती है। अधिकतर लोगों का विचार था कि नयी पद्धति से छोटे बच्चों के मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ेगा इसलिए हमें इस बदलाव का विरोध करना चाहिये।
हालाँकि उस समय मुझे इटली में रहते हुए करीब दस वर्ष हो चुके थे पर मुझे उनके प्राथमिक विद्यालयों के बारे में यह नहीं मालूम था कि यहाँ के प्राथमिक शिक्षा के पाँच सालों में बच्चों को केवल एक ही शिक्षिका के साथ पढ़ते थे। यानि बच्चे को पहली कक्षा में जो शिक्षिका मिलती थी, जब बच्चा दूसरी या तीसरी कक्षा में जाता था तो वही शिक्षिका भी दूसरी या तीसरी कक्षा की शिक्षिका बन जाती थी। यहाँ कक्षा में बच्चे भी पंद्रह या बीस से अधिक नहीं होते। इस तरह से वह शिक्षिका अपनी कक्षा के हर बच्चे को अच्छी तरह से जानती थी, उसके परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को भी समझती थी और वह बच्चे की शिक्षा की आवश्यकताओं का बेहतर ध्यान रख सकती थी। यहाँ प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाने वालों में पुरुष शिक्षक बहुत कम हैं, अधिकतर शिक्षिकाएँ ही हैं।
मीटिंग में आये अभिभावक चिन्तित थे कि छोटे बच्चों की कक्षाओं की शिक्षकाएँ हर साल बदल जायेंगी तो बच्चों और शिक्षकों के बीच जो रिश्ता बनना चाहिये वह नहीं बनेगा। मुझे लगा कि जब मैंने भारत में प्राथमिक विद्यालय में पढ़ायी की थी तब तो हमारे शिक्षक हर वर्ष बदलते थे लेकिन इसका हमारे पढ़ने या समझ और विकास पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। इतालवी सरकार के शिक्षा विशेषज्ञों का कहना था कि एक शिक्षक बच्चों को सभी विषय ठीक से नहीं पढ़ा सकता, इसलिए बच्चों की पढ़ायी में अलग-अलग शिक्षकों को मिल कर काम करना चाहिये, लेकिन यहाँ के अभिभावक इस बात से सहमत नहीं थे।
अभिभावकों के विरोध के बावज़ूद इटली सरकार ने 1990 में प्राथमिक विद्यालयों की "एक शिक्षक" वाली पद्धति को बदल दिया। बच्चों के अभिभावकों ने इस बात का विरोध नहीं छोड़ा। उनका कहना था कि प्राथमिक शिक्षा से बच्चे के सारे जीवन की नींव बनती है, उसमें एक शिक्षक से जो बच्चे का रिश्ता बनता है वह बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए 2008 में इस नीति में फ़िर से बदलाव लाया गया जिसके अनुसार हर कक्षा में अलग-अलग विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों के साथ, एक शिक्षक पर बच्चों की शिक्षा की प्रमुख ज़िम्मेदारी होगी।
सतही तौर पर देखें तो इटली और भारत की शिक्षा प्रणालियों के बीच कोई अंतर नहीं लगता, लेकिन उसे समझने की कोशिश करें तो कई अंतर समझ में आते हैं। दोनों ही जगह बच्चों की शिक्षा अनिवार्य है। इटली में 6 से 16 वर्ष के हर बच्चे के लिये विद्यालय जाना अनिवार्य है। यहाँ विद्यालय तीन तरह के होते हैं - प्राथमिक (पहली से पाँचवीं कक्षा), माध्यमिक (छठी से आठवीं कक्षा) तथा उच्चतर माध्यमिक जो कि दो भागों में बँटे होते हैं, उनके पहले भाग में नौंवी से ग्यारहवीं कक्षा होती है और दूसरे भाग में बारहवीं तथा तेरहवीं कक्षा।
इटली के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तीन तरह के होते हैं। एक तो "वैज्ञानिक लिचेओ" जहाँ बच्चे विज्ञान तथा गणित जैसे विषय पढ़ते हैं। दूसरे "शास्त्रीय लिचेओ" जहाँ बच्चे भाषा, साहित्य, समाज शास्त्र, इतिहास जैसे विषय पढ़ते हैं। तीसरे तकनीकी विद्यालय जहाँ बच्चे किसी तकनीकी कार्य क्षेत्र की शिक्षा पाते हैं। तकनीकी विद्यालय अलग-अलग तरह के होते हैं, कृषि विज्ञान से लेकर पर्यटन, इलेक्ट्रॉनिक, होटल मेनेजमैंट तक। जैसा भारत में होता है कि एक ही उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कुछ बच्चे विज्ञान पढ़ें, कुछ कॉमर्स या कुछ साहित्य, वैसा यहाँ नहीं होता। यहाँ यह भी नहीं होता कि प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं की सारी पढ़ाई एक ही विद्यालय में हो।
तकनीकी विद्यालयों में पहले तीन वर्षों में, तकनीकी विषयों के साथ-साथ, छात्र भाषा, साहित्य, भूगोल, इतिहास इत्यादि भी पढ़ते हैं। केवल अंतिम दो वर्षों में उनकी तकनीकी शिक्षा पर अधिक ज़ोर दिया जाता है।
तीनों तरह के उच्चतम माध्यमिक विद्यालयों में इतालवी भाषा की पढ़ाई पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। शिक्षा का माध्यम भी इतालवी ही रहता है। तेरहवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने पर राष्ट्रीय बोर्ड की परीक्षा होती है, उसमें सब छात्रों को इतालवी में एक लम्बा आलेख लिखना होता है, जिसका छात्रों के नतीजों पर बहुत महत्व पड़ता है। इसलिए आपने साहित्य पढ़ा हो, विज्ञान पढ़ा हो या तकनीकी, अगर आप को इतालवी भाषा अच्छी तरह से नहीं आती, आपको अच्छे नम्बर नहीं मिलेंगे।
आठवीं कक्षा तक सभी विद्यालयों में कैथलिक धर्म का विषय भी होता है। जो छात्र किसी भी वजह से कैथोलिक धार्मिक शिक्षा नहीं चाहते, उनके लिए खेल या पुस्तकालय में अन्य कार्य प्रायोजित किये जा सकते हैं।
इटली में करीब एक तिहाई छात्र, आठवीं कक्षा के बाद या फ़िर उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के पहले भाग की ग्यारह वर्ष की शिक्षा पूरी करके काम पर लग जाते हैं। एक तिहाई छात्र तेरह वर्ष की शिक्षा के बाद काम पर लगते हैं। बाकी के केवल एक तिहाई छात्र विश्वविद्यालय में पढ़ने जाते हैं।
विश्वविद्यालयों में पढ़ने वालों में से केवल एक तिहाई छात्र ही शिक्षा पूरी करके डिग्री लेते हैं, बाकी के दो तिहाई लोग डिग्री लेने से पहले ही काम में लग जाते हैं और उनकी डिग्री अधूरी रह जाती है। विश्वविद्यालय की स्नातक डिग्री के लिए हर छात्र को एक शोध करना होता है और थीसिस लिखनी होती है, बिना इसके डिग्री नहीं मिलती। इस दृष्टि से यहाँ की स्नातक डिग्री मिलना भारत की बीए या बीकॉम जैसी डिग्री मिलने के मुकाबले में बहुत कठिन होता है।
विश्वविद्यालय स्तर तक यहाँ की पूरी पढ़ायी इतालवी भाषा में होती है। पहले माध्यमिक विद्यालय के छात्रों को अंग्रेज़ी, फ्राँसिसी या जर्मन में से एक विदेशी भाषा सिखायी जाती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से प्राथमिक विद्यालय में ही अंग्रेज़ी पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया है। हालाँकि कुछ माध्यमिक विद्यालयों में अब भी बच्चे अगर चाहें तो फ्राँसिसी या जर्मन भी पढ़ सकते हैं। साथ ही विश्वविद्यालय स्तर पर उत्तर-स्नातकी शिक्षा के कुछ कोर्स अंग्रेज़ी में भी किये जा सकते हैं, लेकिन अब भी सभी मूल विषयों में पढ़ायी का माध्यम इतालवी ही है।
इटली की सारी शिक्षा व्यवस्था में सरकारी विद्यालयों का अधिक महत्व है और उनके शिक्षा स्तर को ऊँचा माना जाता है। कैथोलिक धर्म के संस्थान भी कुछ विद्यालय चलाते हैं जिन्हें सरकारी सहायता मिलती है, लेकिन पढ़ायी की दृष्टि से सरकारी विद्यालयों तथा कैथोलिक विद्यालयों में कोई अंतर नहीं। जैसे भारत में जिस तरह से शिक्षा के प्राईवेट संस्थान होते हैं जहाँ फीस अधिक लगती है, वैसे विद्यालय इटली में इक्का-दुक्का ही हैं और वहाँ अधिकतर विदेशियों के बच्चे ही पढ़ते हैं।
चाहे विद्यालय हों या विश्वविद्यालय, अपने मनपसंद के विषय में कहीं भी दाखिला मिलने में कठिनाई नहीं होती, न ही उनके लिए कोई मेरिट लिस्ट या एन्ट्रैंस टेस्ट होता है। केवल कुछ तकनीकी विषय हैं जैसे कि चिकित्सा शास्त्र या इन्जीनियरिंग, जिनमें भर्ती होने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एन्ट्रैंस टेस्ट होता है।
छोटे बच्चों से लेकर विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों की परीक्षाओं में लिखित परीक्षा के साथ-साथ, मौखिक परीक्षा का भी उतना ही महत्व है। अगर छात्र को किसी विषय की सही समझ नहीं हो तो केवल कुछ उत्तर रटने से अच्छे अंक पाना कठिन होता है। छोटे बच्चों को इतालवी साहित्य, दर्शन, धर्म जैसे विषयों पर किताबें पढ़ने और उनके बारे में बहस करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसलिए जो छात्र आठवीं या ग्यारहवीं के बाद विद्यालय की पढ़ायी छोड़ कर काम में लग जाते हैं, उनमें से भी बहुत से लोग जीवनभर विभिन्न विषयों पर पढ़ना नहीं छोड़ते। इसलिए जब आप उनसे बात करते हैं तो यह नहीं कह सकते कि कम पढ़े होने की वजह से, उनकी साहित्यिक, दार्शनिक समझ बूझ कम है।
इटली में बच्चे कम हैं और पिछले पचास सालों से हर वर्ष जनसंख्या कम हो रही है। साथ ही, दूसरे देशों से आने वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है लेकिन फ़िर भी बच्चों की कुल संख्या में कमी आ रही है। इसलिए यहाँ कक्षाएँ छोटी होती है, कभी-कभी एक कक्षा में दस से भी कम बच्चे होते हैं। इसलिए शिक्षक बच्चों पर अधिक ध्यान दे सकते हैं। सभी विकलांग बच्चे भी सामान्य विद्यालयों में बाकी के बच्चों के साथ ही पढ़ते हैं। जिस कक्षा में विकलाँग बच्चे हों, वहाँ उनकी आवश्यकताओं को परखा जाता है और उनके लिए कक्षा में अतिरिक्त शिक्षकों का सहयोग दिया जाता है। इसलिए यहाँ विकलाँग बच्चों के लिए अलग से विद्यालय नहीं हैं। भारत तथा इटली की शिक्षा प्रणालियों के अंतरों के बारे में सोचूँ तो मन में दो बातें आती हैं। पहली तो भारत में अभिभावकों में जिस तरह की चिन्ता दिखती है कि कैसे अपने बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाया जाये, वह यहाँ नहीं दिखती, क्योंकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा है। दूसरी बात यह कि भारत में बच्चे भारी बस्ते लेकर स्कूल जाते हैं और जिस तरह कॉलिज में भर्ती होने के बारे में चिंतित होते हैं, वह भी यहाँ नहीं दिखता।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^