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ईश आराधना
01-Aug-2016 12:00 AM 1266     

हवा बसंती
हलके से छुए मुझे---
सहलाए तन को,
और – स्फुरित कर दे मन को!

सुबह का सूरज
खिड़की से झाँकता सा--
अनंत आकाश को
अपने बाजुओं में समेटे --
उज्जवलित कर दे तन को --
और प्रफुल्लित कर दे मन को!!!

भीना-भीना प्रकाश
भीगा-भीगा धुआँ
मैं पलकें बंद ---
समस्त तन मन प्राणों से --
उस परम को महसूस करती
उसकी सत्ता में डूबती सी!!!

ईश्वर की आराधना
मन को गहराईयों में खींचे
जैसे संसार आलोपित हो ---
सिर्फ प्रकाश मुखरित हो उठा हो!!!
कहीं कुछ और नहीं
कही कोई शोर नहीं ---
बस आत्म मुग्ध सी मैं ----
जैसे उसमें एकाकार हो उठी हों!!!
चातक के हृदय की प्यास ---
मानो होठों पे उतर आई हो
अश्रुपूरित नयनों से
अविचल — अनुरागी --
पोर-पोर में स्पंदित --
मंत्र मुग्ध-सी मैं --
ईश्वर... जैसे मैंने तुम्हें पा लिया हो --
तुम्ही से आलोकित
तुम्ही में विलोपित!!

अब -- कहीं कुछ और नहीं!
अब -- कहीं  कोई शोर नहीं!
वहाँ -- कोई और भी नहीं!
शायद ---- मैं भी नहीं!!!

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