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शोध समझ में आए तो नवाचार बढ़ जाए
01-Oct-2019 11:20 AM 823     

स्वतंत्र भारत में चर्चा होती आ रही है कि जन-जन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आविष्कारोन्मुखी प्रवृत्ति का संवर्धन हो। विज्ञान और तकनीकी के कई संस्थान खुले। लक्ष्य था कि उद्योग जगत को सुयोग्य जन शक्ति मिले जिससे नवाचारमय उत्पादन हो, लाभ हो, अर्थिक प्रगति हो। लेकिन इंडस्ट्री का कहना है कि इंजीनियरिंग ग्रेज्युएट्स के बेसिक कंसेप्ट (आधारभूत अवधारणाएं और सिद्धांत) की समझ स्पष्ट नहीं है, निर्माण कौशल का अभाव है, प्रेक्टीकल में कमजोर हैं, नवाचार में नगण्य और व्यावहारिक संवाद में भी निपुण नहीं है।
नीति निर्माता तकनीकी शिक्षा में अंग्रेजी को विश्व स्तरीय गुण मानते आ रहे हैं। विडम्बना है, लोक भाषा हिन्दी/ भारतीय भाषा से हट जाने से विज्ञान और इंजीनियरिंग के अधिकांश ग्रेज्युएट्स इंडस्ट्री के लायक कम और सामाजिक संवेदना में शून्य से रह जाते हैं। "धोबी का कुत्ता घर का, न घाट का" जैसी स्थिति? एक और बात, कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थी लोक भाषा हिन्दी/अन्य भारतीय भाषा में पढ़कर आईआईटी, एम्स जैसी नामी संस्थानों में प्रवेश पाते हैं, लेकिन प्रथम वर्ष में अंग्रेजी में पढ़ाई के कारण अच्छी परफ़ोर्मेंस न होने पर आत्महत्या भी कर लेते हैं।
क्या कारण है? 1835 में मैकाले ने शिक्षा नीति प्रस्तावित की और स्वीकृत हुई कि अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा दी जाए। उद्देश्य था भारत को अंग्रेजीमय इंडिया बनाना और भारतीय संस्कृति को भुलवा देना। 1947 तक उनके उद्देश्य की प्राप्ति लगभग 70 प्रतिशत हुई, स्वतंत्र भारत में पिछले 70 वर्षों में यह बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गई। अंग्रेजी में शिक्षित दीक्षित बहुसंख्य युवा वर्ग सरकार का गौरव बन गया जिसे विविध मंचों पर गाया बजाने लगा। अंग्रेजी को कक्षा-1 से पढ़ाने की व्यवस्था होने लगी। बिहार के कुछ ग्रामीण स्कूलों में अंग्रेजी के शब्दों की वर्तनी ध्वन्यात्मक तरीके से लिखकर पढ़ाए जाने के भी उदाहरण हैं। शोध अर्थात् नए विचार, नवाचार और आविष्कारोन्मुखी प्रवृत्ति की आधार नींव स्कूली शिक्षा में रख जाती है।
चिन्तनीय है, क्यों पिछड़े हम नवाचार में, क्यों भूल रहे अपनी संस्कृति? भारतीय भाषा के तिरोभाव से भारतीय संस्कृति और परंपरागत ज्ञान का लोप होगा। पाश्चात्य संस्कृति के आलिंगन के नशे में मानवता का ह्रास होगा। राजनीतिक दासता से तो मुक्ति मिली, लेकिन भाषिक दासता का नशा चढ़ता जा रहा है। जीआईआई वैश्विक नवाचार सूचकांक बहुत पीछे है। जनसंख्या के हिसाब से प्रतिद्वंद्वी चीन का 17 और भारत का 57 है। नवाचार क्षमता का अनुपात चीन में 0.92 है, लेकिन भारत का 0.65 है। कोरिया, जापान, फ्रांस, जर्मनी से तो बहुत पीछे है, जबकि वहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अध्ययन अंग्रेजी में नहीं अपितु उनकी अपनी भाषा में किया जाता है। उच्च स्तरीय शोध का प्रकाशन उनकी अपनी भाषा में होता है। इन्नोवेशन क्षमता अनुपात (इन्नोवेशन आउटपुट/इन्नोवेशन इनपुट) कई देशों का 0.90 से अधिक है। चिन्ता का विषय है।
क्या समाधान है? नए भारत का लक्ष्य ऊँचा है, 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का और इसके साथ जन-जन की खुशहाली का भी। यह विशिष्ट जनशक्ति से ही सम्भव है, जिसमें लोकभाषा हिन्दी/भारतीय भाषाओं में विज्ञान और तकनीकी विकास के बारे में संवाद करने की क्षमता हो, रचनात्मकता हो, सृजनात्मकता हो। ग्लोबल इन्नोवेशन इंडेक्स को सुधारने के लिए समावेशी नवाचार को बढ़ाने पर बल देना होगा। नवाचार संस्कृति में नए विचारों, नए प्रयोगों, नए उत्पादों आदि को प्रोत्साहन मिलता है। इसके लिए सामान्य जन भागेदारी, शोधकत्र्ता और सामान्य नवाचारी के बीच संवाद सुगम हो, अधिक हो।
80 प्रतिशत अंग्रेज़ियत को घटाने के लिए सुनियोजित समयबद्ध प्रयास करने की आवश्यकता है। बड़ी चुनौती है। उत्तरोत्तर लक्ष्य सिद्धि के लिए निर्धारित कर सकते हैं कि अंग्रेज़ियत का दुष्प्रभाव 2020 में 75 प्रतिशत, 2025 में 60 प्रतिशत, 2030 में 40 प्रतिशत और 2035 में 20 प्रतिशत रह जाए। अपनी भाषा में दक्षता के साथ विश्व व्यवहार के लिए विदेशी भाषा सीखना आसान हो, आवश्यकता न बने।
प्रस्तावित कार्य योजना? तकनीकी शिक्षा को प्रथम वर्ष में हिन्दी-अंग्रेजी मिश्रित मोड में दिया जाए। प्रति वर्ष एक समाज उपयोगी तकनीकी-प्रधान लेख हिन्दी में अनिवार्य हो। इसकी उपादेयता स्वयं विषय को भलीभांति समझने से और समाज के प्रति संवेदना संवर्धन से और अनुकूल एवं नवाचारमय (इन्नोवेटिव) तकनीकी विकास करने की अभिरुचि के रूप में है। आवश्यक पाठ्य पुस्तक लेखन का भी कार्य किया जाए।
तकनीकी शब्दावली का निर्माण क्ष्क्ष्च्र्, ग़्क्ष्च्र्, क्ष्क्ष्क्ष्च्र्, क्ष्क्ष्ग्, ॠक्ष्क्ष्ग्च् का समूह विषय विभाजन कर समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित कर तकनीकी शब्द बनाएँ। यह कार्य 2020 तक पूरा किया जाए। प्रारूप तकनीकी शब्दावली को क्च्च्र्च्र् से मानक करा लें। यह कार्य क्च्च्र्च्र् पर न छोड़ा जाए।
शोध कार्य में किए गए लिटरेचर सर्वे में भारत के परंपरागत ज्ञान भंडार को भी खोजने और उनसे शोध विषय सम्मत नए विचारों का उल्लेख किए जाने पर बल दिया जाए, इसे महत्त्वपूर्ण माना जाए। आर्यभट्ट, कणाद, अगस्त्य, कपिल, पाणिनी आदि मनीषियों के कार्य बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस दृष्टि से तकनीकी संस्थानों में संस्कृत अध्ययन की भी सुविधा हो। यह एक क्रेडिट विषय के रूप में हो, जिसे कक्षा में अथवा ग्ग्र्ग्र्क्द्म से किया जा सकता है।
शोध, अनुसंधान और नवाचार की जानकारी लोकभाषा हिन्दी/भारतीय भाषाओं में भी हो। 30 प्रतिशत शोध पत्र भारतीय भाषा में लिखे और समीक्षायित जर्नल में प्रकाशित किए जाएँ। तभी समावेशी नवाचार (इंक्लूसिव इन्नोवेशन) का लाभ मिलेगा। ग़्क्ष्ङक़, ग़्एॠ, ग़्ॠॠक् में टीचर क्वालिटी के मूल्यांकन में इसे अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
रिसर्च से नवाचार (ङड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण् द्यदृ क्ष्दददृध्ठ्ठद्यत्दृद) की योजना की पहल की जाए। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (क़्च्च्र्) ने ॠज़्च्ॠङ (ॠद्वढ़थ्र्ड्ढदद्यत्दढ़ ज़्द्धत्द्यत्दढ़ च्त्त्त्थ्थ्द्म ढदृद्ध ॠद्धद्यत्ड़द्वथ्ठ्ठद्यत्दढ़ ङड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण्) "अवसर" प्रोग्राम 2018 में प्रारंभ किया। बहुत ही सराहनीय पहल है। "अवसर" योजना में पीएच.डी. विद्यार्थी और पोस्ट डॉक्टरेट फैलो से अपनी-अपनी रिसर्च को जन सामान्य को लक्ष्य कर अंग्रेजी अथवा हिन्दी में लिखकर भेजने का प्रावधान रखा था। पुरस्कृत लेखों में 100 प्रतिशत अंग्रेजी में और शून्य हिन्दी में है। अर्थात् विज्ञान एवं तकनीकी संस्थानों में भारतीय भाषा में विज्ञान लेखन के प्रशिक्षण की सुविधा दिए जाने की नितांत आवश्यकता है।
विडम्बना है कि हिन्दी भाषा को साहित्य तक सीमित रखा गया, विज्ञान आदि साहित्येतर पक्ष की अनदेखी की गई। हिन्दी मठ अपनी-अपनी ढपली बजाते रहते हैं। समाजोपयोगी समावेशी हिन्दी को प्रोत्साहित एवं सम्मानित किया जाए। इसलिए आवश्यक है कि एक भारतीय भाषा संघ को मजबूत किया जाए जिसकी आवाज सरकार भी सुने। संघे शक्ति कलियुगे।
इधर हिन्दी/भारतीय भाषा में विज्ञान लेखन में कई परेशानियां भी हैं- राष्ट्रीय मानक क्ष्ग़्च्क्ङक्ष्घ्च्र् पर हिन्दी में टाइप कर यूनीकोड फाइल बनाने वाले टाइपिस्ट नहीं मिलते और किसी तरह लिखा भी तो उसके प्रकाशन को रिसर्च की मान्यता नहीं है। फोनेटिक टाइपिंग से सरता है, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी हैं, जैसे इसके प्रयोग से अंग्रेजी के शब्दों की वर्तनी भूलने लगे हैं। भारतीय भाषाओं में टाइपिंग और वॉइस इनपुट के लिए प्रशिक्षण सॉफ्टवेयर ओपेन डोमेन में उपलब्ध कराए जाएँ। अपेक्षित भाषा-टैक्नोलॉजी, जैसे 15-20 सुंदर यूनिकोड फॉन्ट, ओसीआर, टेक्स्ट टू स्पीच, अनुसृजन (द्यद्धठ्ठदद्मड़द्धड्ढठ्ठद्यत्दृद) सहायक तंत्र, ऑफिस सॉफ्टवेयर, डिक्शनरी आदि का भी विकास हो, ये ओपेन डोमेन में सुलभ हों और इनका प्रचार-प्रसार हो। ये सभी एक पैकेज में न हों, अलग-अलग डाउनलोड करने की आवश्यकता न हो।
हिन्दी में शोध कॉन्फरेंस के लिए किसी तकनीकी संस्थान और विश्वविद्यालय में वित्तीय अनुदान देने का प्रावधान नहीं है। प्राइवेट कंपनी से तो कोई अपेक्षा नहीं कर सकते। प्रत्येक विश्व विद्यालय को निर्देश दिए जाएँ कि भारतीय भाषा में तकनीकी संगोष्ठी, कार्यशाला आयोजन के लिए वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाए और संयोजक से प्रतिबद्धता ली जाए कि लगभग दस विशेषज्ञ-समीक्षायित शोध पत्र उपलब्ध करा सकें। उनका समीक्षायित शोध जर्नल में प्रकाशन हो।
ग़्एॠ और ग़्ॠॠक् के शिक्षक गुणवत्ता मूल्यांकन में भी हाई इम्पेक्ट फेक्टर वाले (अंग्रेजी) जर्नल को ही मान्यता है। इस अनिवार्यता को 50 प्र.श.-60 प्र.श. रखा जाए और शेष मूल्यांकन 40 प्र.श.-50 प्र.श. समाजोपयोगी तकनीकी निबन्ध और गाँव गरीबों के जीवन स्तर को सुधारने में तकनीकी अनुप्रयोगों को प्रोत्साहित किए जाने के आधार पर हो। घ्र्द्वठ्ठथ्त्द्यन्र् (गुणवत्ता) के साथ ङड्ढथ्ड्ढध्ठ्ठदड़ड्ढ (उपादेयता) पर भी बल दिया जाए।
आशा है, नए भारत के निर्माण में समावेशी नवाचार (क्ष्दड़थ्द्वद्मत्ध्ड्ढ क्ष्दददृध्ठ्ठद्यत्दृद) की पहल होगी। "शोध समझ में आए तो नवाचार बढ़ जाए (ङड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण् द्यदृ क्ष्दददृध्ठ्ठद्यत्दृद)" को सार्थक बनाए जाने के लिए लोकभाषा हिन्दी/भारतीय भाषाओं में विज्ञान शिक्षण और लेखन को प्रोत्साहन दिया जाए। अनुसंधानकर्ता और उद्यमी (कदद्यद्धड्ढद्रद्धड्ढदड्ढद्वद्ध) के बीच संवाद हो। जब उद्योग बढ़ते हैं, तब नए उत्पाद और टेक्नोलोजी की तलाश में रहते हैं। उन्हें लोक भाषा हिन्दी/भारतीय भाषाओं में शोधपरक जानकारी से बहुत लाभ होने की संभावना है। ध्यातव्य है कि इन्नोवेशन छोटे मझोले उद्यमों में अधिक तेजी से होते हैं।

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