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इंकार का अधिकार अनारकली ऑफ आरा
01-May-2017 07:13 PM 3890     

गांव गिराव में एक कहावत चलती है, "गरीब की जोरू सबकी भौजाई", अर्थात् स्त्री की अपनी कोई अस्मिता या पहचान नहीं है। उसकी पहचान कूती जाती है इस बात से कि वह किसके संरक्षण या अधिकार में है। जितना शक्तिशाली संरक्षक उतनी ही मान मर्यादा की हकदार स्त्री। यह बात जुदा है कि मालिक या संरक्षक जब जी चाहे उसे धकिया या लतिया सकता है।
खैर यहां बात उन स्त्रियों की हो रही है जो किसी के संरक्षण या अधिकार क्षेत्र की सुरक्षा-घेरे से बाहर हैं और अपने बलबूते अपनी जिंदगी बिताने की जुर्रत करती हैं। और उस पर हिमाकत यह कि वह स्त्रियों के लिए तथाकथित सम्मानजनक पेशे को चुनने की बजाय किसी ऐसे पेशे का चयन कर बैठें जो समाज की नजरों में उतना अच्छा और सच्चा न माना जाता है। यह बात और है कि इस कम अच्छे पेशे के बिना समाज का काम भी नहीं चलता। दिक्कत इस बात की भी है कि कई मर्तबा यह पेशा चुनने में औरत की इच्छा नहीं बल्कि उसकी तथाकथित परंपरा का भी हाथ होता है। यहां बात हो रही है नाचने-गाने का पेशा करने वाली उन स्त्रियों की जिन्हें समाज सर्वसुलभ और सार्वजनिक सम्पत्ति समझता है। चूंकि वह खुलेआम लोगों का दिल बहलाती हैं इसलिए मान ही लिया जाता है कि उनकी हां या ना का कोई मतलब नहीं है। जो चाहे वह उनकी इच्छा या अनिच्छा की परवाह किये बिना उनका उपयोग कर सकता है। अगर वह ना कहती हैं तो वह उसकी बेअदबी समझी जाती है और उन्हें इसका अच्छा खासा खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। प्रश्न यह है कि सती-सावित्री नारी या बदनाम औरत की यह छवि निर्मित करनेवाला यह समाज क्या स्त्री को यह अधिकार देगा कि वह अपने छोटे-बड़े फैसले आप ले सके। विशेषकर असहमति जताने या इंकार का फैसला।
स्त्री अधिकार से जुड़े इन प्रश्नों को बेहद बेबाक ढंग से उठाते हुए उसका जवाब भी बेहद प्रभावशाली ढंग से दिया गया है हालिया रिलीज फिल्म "अनारकली ऑफ आरा" में कि स्त्री की देह अगर उसकी है तो देह पर अधिकार भी सिर्फ और सिर्फ उसी का है। वह अगर किसी के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार करती है तो किसी के प्रस्ताव को ठुकरा भी सकती है। चयन का अधिकार भी उसे है और इंकार या ना कहने का हक भी। हालांकि इस विषय पर अर्जुन रामपाल और चित्रांगदा सिंह अभिनीत फिल्म "इंकार" भी बनी थी और बड़े-बड़े तर्कों के साथ स्त्री अधिकार के इस सवाल को वहां भी उठाया गया था लेकिन फिल्म की ज्यादा चर्चा नहीं हुई। पिछले साल रीलिज और सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित कर चुकी फिल्म "पिंक" भी इसी सवाल से टकराती है। फिल्म ने प्रशंसा और पैसे दोनों ही कमाए। सवाल यह है कि "अनारकली ..." इन दोनों फिल्मों से किस मायने में जुदा या खास है।
पिंक में अमिताभ बच्चन अपनी प्रभावशाली आवाज और गंभीर लहजे में भरी अदालत में जिन तर्कों को परोसते हुए दर्शकों और श्रोताओं की तालियां बटोरते हैं उसी बात को स्वरा भास्कर दो-टूक लहजे में कहकर न केवल मजमा लूटती हैं बल्कि गहरा असर भी छोड़ती हैं। जहां इंकार और पिंक की महिलाएं तथाकथित सफेदपोश पेशे से जुड़ी हैं वहीं अनारकली नाचने गाने के बदनाम पेशे से ताल्लुक रखती है। गौरतलब है कि यह पेशा उसकी ख्वाहिश नहीं बल्कि उसकी नियति है। हां इस नियति के लिए उसके मन में कहीं कोई अफसोस नहीं है।
वह अपने इस काम को बेहद लगन से अंजाम देती है। गाना उसके लिए महज पेशा नहीं बल्कि जुनून है और बाद के दिनों में जब वह आरा से भागकर दिल्ली जाती है जहां कुछ दिनों के लिए गाने से उसका नाता टूट जाता है तो इस सदमे से वह बीमार भी पड़ जाती है। एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उसकी मां की मृत्यु किसी समारोह में नाचते गाते हुए ही आकस्मिक दुर्घटना में हुई थी। वह दृश्य अत्यंत हृदयविदारक है जब एक विवाह समारोह में नाचते हुए विलासी जमींदार बंदूक की नोक पर नोट रखकर उसे होंठों से वह नोट उठाने का इशारा करता है। नोट उठाते हुए बंदूक चल जाती है और मनोरंजन करती हुई चमकी दुख भरी कहानी में बदल जाती है।
इस मौत के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती पर मां की बेबस मौत अनारकली में वह हिम्मत पैदा करती है कि वह अपनी बेइज्जती का बदला संपन्न और बाहुबली वर्ग से खुद लेती है। पिंक में जहां लड़कियों की लड़ाई वकील के रूप में प्रगतिशील पुरुष लड़ता है वहीं अनारकली अपने अपमान का जवाब खुद देती है। जिस तरह के सार्वजनिक समारोह में सरेआम मंच पर चढ़कर एक विश्वविद्यालय के विलासी वीसी साहब ने उसकी इज्जत उतारने की कोशिश की थी ठीक उसी अंदाज़ में भरी सभा में कार्यक्रम पेश करते हुए उनके परिवार, अमले और विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की मौजूदगी में वह उनके दुष्कर्मों का पर्दाफाश करती है और वीसी साहब कुछ नहीं कर पाते। उल्टे पुलिस का आला अफसर उनके खिलाफ कदम उठाने को बाध्य होता है। मंच पर अपने नृत्य कौशल का जलवा दिखाती हुई, क्रोध से फुंफकारती हुई अनारकली का जवाब काबिले गौर ही नहीं प्रशंसनीय भी है,
"रंडी हो, रंडी से कम या फिर बीवी हो, हाथ पूछकर लगाना।"
अनारकली का यह संवाद न केवल वीसी बल्कि उन तमाम लोगों के गाल पर तमाचे की तरह पड़ता है जो स्त्री के चरित्र का आंकलन उसके पेशे, आचरण और पोशाक के आधार पर करते हैं और स्त्री को चरित्र प्रमाण-पत्र देना अपना पैदायशी अधिकार समझते हैं।
अनारकली इस तथ्य को बड़े जोरदार ढंग से स्थापित करती है कि स्त्री समाज की दृष्टि में अच्छी हो या बुरी सती हो या असती पर उसे अपनी संपत्ति समझने का अधिकार किसी को भी नहीं है। स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे हाथ लगाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। और अगर कोई ऐसा करने की जुर्रत करेगा तो उसे वीसी की तरह ही परिणाम भुगतने के लिए तैयार भी रहना होगा। निर्देशक अविनाश दास की यह पहली ही फिल्म है पर स्वरा भास्कर, संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी के दमदार अभिनय और चुस्त पटकथा के कारण बेहद प्रभावशाली बन पड़ी है। अपने सशक्त स्त्री विमर्शीय तेवर के कारण ही यह फिल्म तमाम द्विअर्थी संवादों और गीतों के बावजूद अपनी गहरी छाप छोड़ती है। साथ ही इसकी एक और विशेषता तो यह भी है कि यह पूरे पुरुष वर्ग को कटघरे में खड़ा नहीं करती।
इसमें जहां वीसी और बुलबुल पांडेय जैसे भ्रष्टाचारी और खल चरित्र हैं वहीं हीरामन, अनवर, पत्रकार और रिकार्डिंग कंपनी के मालिक जैसे सहृदय और सहयोगी पात्र भी हैं। न केवल हिंदी सिनेमा बल्कि स्त्री सशक्तीकरण के इतिहास में भी इस फिल्म का महत्वपूर्ण स्थान होगा।

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