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इण्डो-ऐंग्लियन्स
01-May-2018 05:40 PM 2036     

भारत में एक प्रभावशाली जनसांख्यिकीय अथवा मनोवैज्ञानिकता का उद्भव हो रहा है और यह संपन्न, शहरी और उच्च शिक्षित है। 2012 या 2013 के आसपास, मेरी बेटियों ने हमारी मातृभाषा कोंकणी में बातचीत करना बंद कर दिया था। यह पूरी तरह साफ नहीं है कि ऐसा किस कारण से हुआ। शायद यह उनके एक शिक्षक के कारण हुआ जो कि उन्हें मुंबई के स्कूल में पढ़ाते थे और घर पर ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी में बात करने को कहते थे या शायद कोई और बात रही हो। हालांकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। फर्क जो पड़ा वह यह था कि हमारा घर अब एक लगभग पूरी तरह अंग्रेजी बोलने वाला कुनबा बन गया था, जिसमें कभी-कभार ही कोंकणी में बातचीत होती थी।
ऐसे हम अकेले नहीं थे। शहरी भारत के संपन्न वर्ग में हमारे जैसे कई परिवारों की भीड़-सी लग गई थी, जो प्रमुख रूप से अंग्रेजी में बतियाते थे न कि उस भाषा में जिसे पढ़-सुनकर वे बड़े हुए थे।
इन परिवारों में से कुछ या इन अंग्रेजी बोलने वाले कुनबों में कम से कम माता-पिता ने अपनी मातृभाषा बोलने का उतना प्रयास किया, जितना वे अंग्रेजी का बोलचाल में प्रयोग करते थे। परन्तु, इन द्विभाषी कुनबों में भी, अंग्रेजी अभी भी हावी है। यह एक प्रयास है कि बच्चे भारतीय भाषा में, कुछ खोखले शब्दों के इतर, बोलने का प्रयास तो करें। दूसरी तरफ अंग्रेजी इन बच्चों को सामान्यतया आती ही है। उनके पास अंग्रेजी की वृहद शब्दावली है, जिसके द्वारा वे जटिल विचारों और कथनों को ज्यादा आसानी से व्यक्त कर सकते हैं।
मैं ऐसे परिवारों को जो घर में अंग्रेजी प्रभावी रूप से बोलते हैं, परिभाषित करने के लिए एक पद, लघु रूप या एक शब्द ढूंढ रहा हूं। इनसे भारत में एक प्रभावशाली जनसांख्यिकीय या कहें तो एक मनोवैज्ञानिकता का निर्माण हो रहा है- संपन्न, शहरी, उच्च शिक्षित, अक्सर अंतरजातीय या अंतर-धार्मिक संघों के रूप में। मैं उन्हें इण्डो-ऐंग्लियन्स कहने का प्रस्ताव करता हूं।
इण्डो-ऐंग्लियन्स ऐंग्लो-इण्डियन्स से इस मायने में अलग हैं कि वे भारत में अंग्रेजी बोलने वाले समुदायों में अव्वल हैं, वे भारत में ऐसे ईसाई हैं जिसमें सभी धर्मों के लोग शामिल थे, हालांकि इनमें हिन्दुओं का प्रभुत्व है। इण्डो-ऐंग्लियन्स एक ऐसी उच्च शहरी खेप या समुदाय है जो भारत के चोटी के सात शहरों (मुम्बई, दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद और कोलकाता) के साथ ही पहाड़ों के छोटे कस्बों में सभी जगह और गोवा में एक गिरोह के रूप में केंद्रित है।
वे इन तमाम छोटे शहरों के भीतर अथवा निश्चित बंद स्थानों में बसे हुए हैं। मसलन गुड़गांव और दक्षिण दिल्ली के कुछ हिस्से, दक्षिण मुम्बई और वहाँ के पश्चिमी उप नगर बांद्रा से अंधेरी, इंदिरा नगर और कोरमंगल और बेंगलुरू के बाहरी रिंग रोड - सरजापुर, कोरेगांव पार्क, कल्याणी नगर, गोचीबावली और हाइटेक सिटी आदि। आर्थिक रूप से इनकी गिनती भारत के शीर्ष एक फीसदी लोगों में होती है। उनका रहन-सहन और क्रयशक्ति उन्हें दुनिया के विकसित देशों के मध्यमवर्ग के समकक्ष खड़ा करता है। इनके बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में पढ़ते हैं और इनके नाम प्राचीन भारतीय नामों की तरह हैं, मसलन आर्यन, कबीर, कायरा, शनाया, तिया आदि।
मेरा अनुमान है कि भारत में इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों की संख्या चार लाख के लगभग है। हालांकि यह एक कोरा अनुमान भर है। इस बाबत कोई अध्ययन नहीं किया गया है। हां 2001 की जनगणना में जरूर एक आधिकारिक आंकड़ा सामने आया था, जिसके अनुसार दो लाख छब्बीस हजार भारतीय अपनी प्रथम भाषा के रूप में अंग्रेजी बोलते हैं। मैंने अपने चार लाख कुनबों के पीछे के तर्क को यहां समाप्ति टीप में साझा किया है। इन चार लाख इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों का अर्थ है - लगभग 14 लाख लोग (इनके परिवार का आकार छोटा होता है)। ये उन 13 से 14 करोड़ लोगों का एक प्रतिशत हैं जो बोलचाल के रूप में अंग्रेजी को भारत की दूसरी भाषा के रूप में मानते हैं और जिन्हें मैं यहां अंग्रेजी में सुविधा महसूस करने वाले (कदढ़थ्त्द्मण् क्दृथ्र्ढदृद्धद्यठ्ठडथ्ड्ढद्म) के रूप में संदर्भित करता हूं। और उन ढाई से तीन करोड़ लोग, जिन्हें मैं अंग्रेजीदा अर्थात् अंग्रेजी को बोलचाल की एक प्राथमिक भाषा मानने वाला समझता हूँ का लगभग पाँच प्रतिशत, उनके लिए मैंने अंग्रेजीदा (कदढ़थ्त्द्मण् क़त्द्धद्मद्य) नाम दिया है।
नीचे दिए तथ्य से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए :
क्ष्ॠद्म उ क्ष्दड्डदृ-ॠदढ़थ्त्ठ्ठदद्म (इण्डो-ऐंग्लियन्स)।
कक़द्म उ कदढ़थ्त्द्मण् क़त्द्धद्मद्यद्म (अंग्रेजीदा)।
कक्द्म उ कदढ़थ्त्द्मण् क्दृथ्र्ढदृद्धद्यठ्ठडथ्ड्ढद्म (अंग्रेजी में सुविधा महसूस करने वाले)।
पिछले दशक में इन इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, जैसे मुझे ही ले लीजिए। अगले पाँच से सात सालों में इसमें हमें एक बड़ा परिवर्तन और वृद्धि देखने को मिल सकती है, शायद ऐसे लोगों की संख्या दोगुनी भी हो सकती है। पश्चिमीकरण के बढ़ने से, अंग्रेजी शिक्षा की मांग के चलते और ज्यादा गंभीर रूप से देखें तो अंतर-जातीय या अंतर-सामुदायिक विवाह (जहां माता-पिता की अलग-अलग मातृभाषा होती है और अक्सर ही बच्चे की मातृभाषा अंग्रेजी बन कर रह जाती है) ऐसे इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों की संख्या में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण हैं। इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों के तीव्र उद्भव और सतत् वृद्धि से समाज, व्यवसाय और प्रशासन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ रहे हैं। हमें इन सबसे पार पाना होगा।
इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों में एक अच्छी खासी संख्या में विवाह अलग समुदायों (और जातियों) के सदस्यों के बीच देखने को मिलते हैं। लम्बे शोध के आधार पर मैं अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा हूं कि इण्डो-ऐंग्लियन्स विवाहों में से अधिकतर विवाह पारंपरिक उच्च जातियों के बीच हो रहे हैं। परन्तु उनमें कुछ प्रभावी प्रगति कर रहे ऐतिहासिक रूप से निम्न जातियों के सदस्य भी हैं। एक बार इण्डो-ऐंग्लियन समाज द्वारा अंगीकृत कर लेने के बाद ऐसे सदस्य अपनी पारंपरिक जातीय पहचान को इण्डो-ऐंग्लियन संस्कृति में मोड़ देते हैं। इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों में जाति की कभी-कभार ही चर्चा की जाती है और कुछ ही जातिगत या धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है।
अब हम शाकाहार को ही लें जो कि अधिकतर ब्राह्मण और बनियों के लिये एक मूल जातीय नियम है। इण्डो-ऐंग्लियन्स में भी काफी संख्या में लोग शाकाहारी हैं, परन्तु वे ऐसे जोड़ीदार से विवाह करने का विरोध नहीं करते, जो मीट या कि गौमांस भी खाता हो। वे अपने जोड़ीदार का घर में मीट पकाने या आर्डर पर बुलाने का भी विरोध नहीं करते। इस बात की भी संभावना नहीं है कि उनके घरों में मांसाहार पकाने के लिए अलग बर्तनों का प्रयोग किया जाता हो। वास्तव में, ऐसे कुनबे में, मैंने शाकाहारी जोड़ीदार को अक्सर मांस से बचकर उसके रस में रोटी डुबाकर खाते भी देखा है। धार्मिक प्रदूषण की धारणा, जो शाकाहार और मांसाहार पकाने के लिए अलग-अलग बर्तनों का उपयोग किया जाए में अभिव्यक्त है, ऐसे इण्डो-ऐंग्लियन्स कुनबों में शायद ही कहीं देखने को मिले। शाकाहार इण्डो-ऐंग्लियन्स के लिए एक नैतिक पसंद है न कि एक धार्मिक मानक।
इन सबने मुझे इण्डो-ऐंग्लियन्स को दो अलग तरीकों से देखकर सोचने पर मजबूर किया। एक तो यह कि उन्हें जाति से परे देखा जाए या यह कि उन्हें एक जाति से परे समुदाय के उदाहरण के रूप में देखा जाए, जहां पारंपरिक जातीय पहचान इस नई इण्डो-ऐंग्लियन पहचान में समावेशित हो चुकी है। एक वैकल्पिक दृष्टिकोण, जिसे मैं तरजीह देता हूं, वह यह कि उन्हें एक अलग ही "जाति" के रूप में देखा जाए जो अपने विशिष्ट सांस्कृतिक मानकों और प्रथाओं के साथ उच्च जातियों के समानान्तर है। इस कुनबे में शामिल होने और सगोत्र विवाह के लिए जो आवश्यक मानदंड है, वह है अंग्रेजी भाषा में महारथ होना।
इण्डो-ऐंग्लियन कुनबे के सदस्य दूसरे गैर-इण्डो-ऐंग्लियन कुनबों के सदस्यों से खुशी-खुशी विवाह कर लेंगे, बशर्ते उनका जोड़ीदार अच्छी अंग्रेजी बोलता हो और इण्डो-ऐंग्लियन समूह के लिहाज से उपयुक्त हो। इस तरह देखने पर इण्डो-ऐंग्लियन्स भारत की सबसे नई और तेज गति से बढ़ने वाली जाति है और वह भी ऐसी एक जाति जिसमें शामिल होने के लिए किसी को उसी जाति में जन्म लेना आवश्यक शर्त नहीं है। मेरे मत में, यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है। इससे इण्डो-ऐंग्लियन जाति में पारंपरिक रूप से पिछड़ी जातियों, अन्य पिछड़ा वर्ग आदि के सदस्य जो अंग्रेजी शिक्षित हैं और पश्चिमी संस्कृति की ओर उन्मुख हैं, को भी शामिल होने में कोई कठिनाई नहीं है।
क्या इण्डो-ऐंग्लियन धार्मिक हैं? पारंपरिक मायनों में नहीं। वे न तो मंदिरों में लगातार जाते हैं, न ही वे धार्मिक संस्कारों का पालन करते हैं। वे कहते हैं, वे वो लोग हैं जिन्हें मैं "फैबइंडिया रिलीजियस" कहता हूं, और ये लोग बहुत ही हल्की सांस्कृतिक परंपराओं जैसे कि त्योहारों पर अच्छे कपड़े भर पहन लेना आदि का पालन करते हैं। हालांकि उनकी आध्यात्मिक आवश्यकताएं तो हैं ही, जिनके लिए वे कई और भारतीय समुदायों के बनिस्बत अब तक का एक अकेला और ज्यादा भावनात्मक रूप से अति-व्यग्र समुदाय है। उनकी जड़विहीनता, रिश्तेदारों से सीमित बातचीत और अपनी पहचान पाने के लिए अपने पेशे पर उनकी निर्भरता को धन्यवाद।
इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे आधुनिक गुरुओं जैसे श्रीश्री रविशंकर और सदगुरु जग्गी वासुदेव, जिनका स्वयं का उद्भव भी इण्डो-ऐंग्लियन्स (और अंग्रेजी को प्रथम मानने वाले वर्ग) के साथ ही हुआ है और यहां तक कि सोक गक्काई जैसे गैर-हिंदू समुदाय की शरण में जाते हैं। और जैसे कि उनकी संख्या बढ़ रही है, हमें इस प्रकार के कई और गुरु देखने को मिलेंगे और इन धनी धार्मिक उपभोक्ताओं के दोहन के लिए नई प्रथाएं भी उभरकर आएंगी।
जैसे कि इण्डो-ऐंग्लियन्स की आबादी बढ़ने के साथ ही इन लोगों के मोटे बटुए से पैसा निकालने के लिए कई व्यवसाय और क्षेत्र भी उभरकर सामने आए हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं मीडिया (इस खंड का देशज होने के कारण मैं इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दूंगा) और शिक्षा क्षेत्र। इसमें शिक्षा क्षेत्र महत्वपूर्ण है, चूंकि वो रचना भी करता है, साथ ही बदले में इण्डो-ऐंग्लियन्स द्वारा तराशा भी जाता है। जो विशेष रूप से रुचिकर है वह यह कि पिछले दशक और उसके आसपास इण्डो-ऐंग्लियन्स के बच्चों के लिए भारतीय शिक्षा उद्यमियों द्वारा कुछ हटकर शिक्षा के कुछ विशेष रास्ते सृजित किए गए हैं।
अब मैं इसकी व्याख्या करता हूं। 1990 के आसपास भारत के अधिकतर शहरों में नई पीढ़ी के स्कूल, कम तनाव और अनुसंधान-उन्मुख शिक्षण पद्धति के वादे के साथ शुरू हुए। उन माता-पिता ने, जो अधिक प्रतियोगी और दोहराव-उन्मुख शिक्षण पद्धति के साथ पले-बढ़े थे, खुशी-खुशी इसे अपनी मौन स्वीकृति दे दी। इस सिस्टम में पढ़कर निकले बच्चे दयालु, पूर्ण विकसित और अपने माता-पिता की तरह जुझारू नहीं थे। यह सब तब तक ठीक है जब उन्हें पूर्व-स्नातक पढ़ाई के लिए अमेरिका या इंग्लैंड जाना पड़ा। जो भारत में रह गये वे प्रतिष्ठित, हालांकि कम प्रतिस्पर्धी संस्थानों अर्थात् राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों, सृष्टि डिजाइन संस्थान, सिम्बायसिस अंतर्राष्ट्रीय और मनिपाल विश्वविद्यालय में पढ़ने चले गये।
समय के साथ प्रगतिशील विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ने लगी और यहां तक कि विधि विद्यालय और दूसरे सुरक्षित विकल्पों अर्थात् सिम्बायसिस में भी प्रवेश पाने के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई। इन सब कारणों के चलते एक नई तरह के कारपोरेट-सहायतित विश्व विद्यालयों की नई लहर आई और शिव नडार, ओपी जिंदल, बीएमएल मुंजाल आदि जैसे विश्व विद्यालयों का उद्भव हुआ। इस प्रकार, इण्डो-ऐंग्लियन्स की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक पूरी तरह वैकल्पिक कम प्रतिस्पर्धी शिक्षा की राह का उद्भव हुआ। यह शिक्षा पद्धति समग्र शिक्षण, उदार कौशल की अनावृत्ति और संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करने पर ज़ोर देती है। इन संस्थानों में प्रवेश ज्यादा कट-ऑफ या प्रवेश परीक्षा में प्रदर्शन के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के समग्र आकलन और कुछ गणितीय आधार होता है।
शिक्षा और मीडिया क्षेत्रों की तरह ही, इन इण्डो-ऐंग्लियन्स और अंग्रेजीदा कुनबों से खर्च कराने के लिए कुछ और व्यवसायों का भी प्रादुर्भाव हुआ है। इनमें सबसे ज्यादा उल्लेखनीय ऑर्गेनिक/हेल्थी फूड और कॉस्मेटिक्स के कुछ ब्रांड जैसे थिंक 24 मंत्रा, फॉरेस्ट एसेंशियल्स, काम आयुर्वेद, रॉ प्रैसरी, एपिगेमिया, पेपरबोट आदि हैं। एक दूसरा व्यवसाय रेस्तराओं का है, जो इस वर्ग पर अपनी निगाह लगाये हैं। इनमें प्रमुख हैं - स्टारबक्स, सोशल, हॉपीपोला आदि। कहा जा सकता है कि जिन्होंने इस मानसिकता वाले लोगों पर ध्यान केंद्रित कर अपने व्यवसाय स्थापित किए हैं, उनके लिए भी व्यवसाय में कोई वृद्धि की कोई गुंजाइश नहीं दिखती, चूंकि ऐसे लोग संख्या में मात्र ढाई से तीन करोड़ ही हैं।
पिछले कुछ सालों में तेजी से उभरे ऑर्गेनिक फूड ब्रांड्स में 24 मंत्रा, कॉन्शस फूड, प्राइड ऑफ काउस मुख्यत: दिलचस्प हैं। वास्तव में ये सभी ऑर्गेनिक उत्पाद अपने जैसे गैर-ऑर्गेनिक उत्पादों की तुलना में बहुत मँहगे उत्पाद हैं, परन्तु इण्डो-ऐंग्लियन कुनबे उन्हें मिलने वाले स्वास्थ्यगत फायदों के कारण अधिक पैसा देने में भी खुशी महसूस करते हैं। इस अधिक राशि को देने के कारण वे अपने आपको पारंपरिक कंजूस मानसिकता वाले भारतीय मध्यम-वर्ग से अलग करते हैं। ज्यादा पैसा देने की उनकी इच्छा का एक स्पष्ट कारण यह भी है कि ये उत्पाद विशिष्ट उत्पादों के समान होते हैं। तहजीब के उत्पादों का उपयोग अथवा उनका स्वामित्व बाहरी दुनिया के लोगों से हटकर उन्हें विशिष्ट दिखाता है। यह लगभग वैसा ही है जैसे यदि आप टेस्ला या प्रियस चला रहे हों, तो ये आपको बाकी लोगों से अलग करेगा ही।
चूंकि विशिष्ट उत्पादों और ब्रांड के प्रयोग और प्रदर्शन से इण्डो-ऐंग्लियन्स की पहचान में चार चांद लगते हैं, अत: इन्हें ऐसे विशिष्ट उत्पाद ही पसंद भी हैं। इनकी पहचान इन्हें उत्पाद चुनने में मदद करती है और तब ये उत्पाद इनकी पहचान को आकार देते हैं। कुछ ऐसे ब्रांड जो इण्डो-ऐंग्लियन्स के लिए महत्वपूर्ण हैं उनमें एप्पल, नेटफ्लिक्स, फैबइंडिया, अनोखी, गुड अर्थ, नीमराना, स्टारबक्स प्रमुख हैं।
इण्डो-ऐंग्लियन या वृहद रूप से देखा जाए तो अंग्रेजीदा लोग मिलकर भी, यहां तक कि शहरों में अथवा उन निर्वाचन क्षेत्रों में जहां वे संकेन्द्रित हैं, संख्या में इतने नहीं हैं कि चुनावों को प्रभावित कर सकें। मुझे ऐसा लगता है कि अगले दशक तक ये लोग इनमें से कुछ संसदीय क्षेत्रों और एक राज्य (गोवा, जिसके बारे में मैंने आगे कहा है) कुछ प्रभावी भूमिका में आ जाएंगे। जहां तक विधायी हस्तक्षेप का संबंध है, इसका मतलब यह है कि उसमें उनकी भूमिका महत्वहीन ही होगी। तो कैसे ये लोग नीति और राजनीति को प्रभावित करते हैं?
गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से न्यायिक पहुंच और सक्रियता, विचार मंचों के माध्यम से नीतियों में हस्तक्षेप, मीडिया कव्हरेज को प्रभावित करना आदि कुछ ऐसे पसंदीदा रास्ते हैं, जिनके माध्यम से ये इण्डो-ऐंग्लियन्स और अंग्रेजीदा लोग नीतियों को प्रभावित करते हैं। विधायी कार्यों को न्यायपालिका को सौंपना, जो कि भारत में होता है, उस मायने में इण्डो-ऐंग्लियन्स अथवा अंग्रेजीदा लोगों के लिए वांछनीय है कि किस प्रकार वे आज भारत में नीति और निर्णयों को प्रभावित करने में सक्षम हो सकें। न्यायिक हस्तक्षेप, इस प्रकार, विधायी शक्ति के पूरक के रूप में विकसित हो चुका है। यहां तक कि इण्डो-ऐंग्लियन्स और अंग्रेजीदा लोग विधायी राजनीति से पूरी तरह पीछे हट चुके हैं। एक और क्षेत्र जहां से इण्डो-ऐंग्लियन्स और अंग्रेजीदा लोगों ने अपने कदम पीछे खींचे हैं वो है आईएएस और दूसरे नौकरशाही कार्यालय, परन्तु ये नीति आयोग, अटल इनोवेशन मिशन जैसे प्रभावी नीति-निर्माता निकायों में ंव्यावसायिक रास्तों के जरिये नीतियों को प्रभावित कर ही रहे हैं।
इण्डो-ऐंग्लियन्स की विधायी असंबद्धता का एकमात्र अपवाद गोवा हो सकता है। मेरे अनुमान के अनुसार गोवा की कुल 18 लाख की जनसंख्या में लगभग दस हजार इण्डो-ऐंग्लियन कुनबे हैं। बाहर के राज्यों के इण्डो-ऐंग्लियन्स अपने दूसरे घर के रूप में गोवा में तेजी से निवेश कर रहे हैं। इसकी खास वजहें पश्चिमी संस्कृति, प्रतिष्ठित रेस्तरां और समुद्र-तट के साथ-साथ दूसरे इण्डो-ऐंग्लियन्स की मौजूदगी हैं। साथ ही यह एक प्रसिद्ध सेवानिवृत्ति ठिकाने के रूप में भी उभर रहा है। समय के साथ "शायद दो दशकों में" मैं गोवा को इण्डो-ऐंग्लियन के गढ़ के रूप में बदलते हुए देख रहा हूं। दूसरा एकमात्र राज्य जिसमें मुझे ऐसी ही संभावनाएं नज़र आती हैं, वो मेघालय है। हालांकि शहरी क्षेत्रों से उसकी दूरी के चलते ऐसी संभावना कम ही है कि संभ्रांत इण्डो-ऐंग्लियन्स यहां अपना ठिकाना बनाएंगे।
मेरी नज़र में गुड़गांव ही एकमात्र ऐसा शहर है, जहां इण्डो-ऐंग्लियन्स एक ऐसे प्रभावी वोटिंग ब्लॉक के रूप में उभर सकते हैं, जो चुनावों के रुझान बदल सकता है। दूसरे बड़े शहरों में, वहां बस्तियां (जो विधानसभा क्षेत्र या यहां तक कि संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के बराबर) होंगी, जैसे मुम्बई के पश्चिमी उपनगरीय क्षेत्र या पोवाई, बैंगलुरू में कोरमंगला या इंदिरानगर, जो भविष्य में कभी उभर सकती हैं। फिर भी, ऐसा लगता नहीं है कि इनकी गैर-विधायी रास्तों के जरिए नीति को प्रभावित करने की काबिलियत को छोड़कर, ये इण्डो-ऐंग्लियन्स निर्वाचन को प्रभावित करने में अपनी नींद जाया करेंगे।
इण्डो-ऐंग्लियन्स एक विरोधाभास की तरह हैं। वे भारत के सर्वाधिक प्रत्यक्ष और अब तक के उपेक्षित वर्ग दोनों से हैं। मैं यहां दूसरे वाक्यांश का प्रयोग भारतीय समाज में एक अलग वर्ग के रूप में उनके उद्भव के संदर्भ में कर रहा हूं, तथापि वह जो अधिकतम लोगों के लिए स्पष्ट न हो। वे संभ्रांत के साथ मिल गए और सामान्य रूप से अंग्रेजी बोलने वाले संभ्रांत वर्ग के रूप में वर्णित किए जाने लगे। फिर भी, जैसा कि हम जानते हैं कि पूरा संभ्रांत या समृद्ध वर्ग अंग्रेजी नहीं बोलता। और यहां कई इण्डो-ऐंग्लियन्स भी हैं, जो समृद्ध शब्द के सही मायनों में आवश्यक रूप से समृद्ध हों। वे अपने अलग और पसंद के विकास भाव, व्यवहार, सोच और आवश्यकताओं के साथ एक सांस्कृतिक वर्ग या जाति के रूप में तेजी से उभर रहे हैं।
यद्यपि इण्डो-ऐंग्लियन्स खुद को एक जाति के रूप में प्रदर्शित नहीं करते, वे एक जाति के रूप में समझे जाने की प्रमुख शर्त - उनकी जाति के सदस्यों से विवाह न करना - को पूरा करते हैं। इस जाति में प्रवेश का मानदंड अंग्रेजी बोलने का उच्च कौशल और इण्डो-ऐंग्लियन जमात में उठने-बैठने का आत्मविश्वास है। इससे मदद मिलती है कि अधिकतर सदस्य सवर्ण पृष्ठभूमि से हैं, जो ऐसा आत्मविश्वास दिखा पाते हैं। परन्तु यहां कोई सख्त रुकावट नहीं है और इण्डो-ऐंग्लियन जाति में आज ऐसी जातियों के सदस्य पर्याप्त संख्या में हैं, जो पारंपरिक रूप से निम्न जाति समझी जाती थीं। इण्डो-ऐंग्लियन जाति में एक बार, मिसाल के तौर पर एक अंतरजातीय विवाह के द्वारा, सदस्यों ने अपनी पारंपरिक जातिगत पहचानों को इण्डो-ऐंग्लियन पहचान में शामिल कर लिया। तब वे हमारे जैसे लोग हो जाएंगे।
इण्डो-ऐंग्लियन पहचान अभी तक पूरी तरह निश्चित और स्थिर नहीं है, परन्तु इस समुदाय की संख्या, जो कि तेजी से बढ़ रही है, से इसका विकास हो रहा है। यह देखना भी मनोहारी होगा कि इस समुदाय का विकास कैसे होता है और बदलते भारतीय गणराज्य को कैसे आकार देता है।

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