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किताबों का बोझ कम करने के नाम पर
01-May-2019 04:28 PM 1398     

इतिहास की किताब का बोझ कम करने की दिशा में एनसीईआरटी ने दसवीं की कक्षा के इतिहास की किताब से तीन पाठ हटा दिए हैं। पहले यह पुस्तक 200 पेज की थी। अब 72 पेज हटा दिए गए हैं। पाठ्यपुस्तकों का बोझ कुछ तो कम हुआ ही होगा। गौरतलब हो कि 2017 में भी एनसीईआरटी ने तकरीबन 1,334 बदलाव किए थे। इसमें से 182 पाठ्यपुस्तकों में सुधार, डेटा अपडेट करना एवं नए तथ्य जोड़ने आदि शामिल है। यह तो अच्छी पहल है कि समय-समय पर पाठ्यपुस्तकों को अधुनातन करने के लिए आंकड़ों, तथ्यों को सुधारा और अपडेट किया जा रहा है। दिलचस्प यह भी है कि वो कौन से डेटा थे या किस प्रकार के अपडेट को शामिल किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में किन विशेषज्ञों को शामिल किया गया। पाठ्यपुस्तकों से ख़ास पाठों को हटाए जाने के बाद एनसीईआरटी ने तर्क यह दिया कि पाठ्यक्रम को व्यावहारिक बनाने और पढ़ाई का बोझ कम करने के लिए मानव संसाधन एवं विकास मंत्री के सुझावों के बाद लिया गया। पाठ्यपुस्तक एवं पाठ्यचर्या निर्माण समिति का गठन ख़्यात संस्था एनसीईआरटी किया करती है। इन समितियों में विभिन्न शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों, विद्यालयों, स्वयंसेवी संस्थाओं, शिक्षाविदों आदि को शामिल किया जाता है। समिति के मेंबरान शामिल की जाने वाली सामग्री, प्रस्तुति, कथ्य की तथ्यता आदि की जांच करने के बाद लेखन प्रक्रिया में शामिल होती है। लिखी हुई सामग्री का पुनर्पाठ एवं समीक्षा विद्वत् समिति के सदस्यों से कराई जाती है। जब इन तमाम समितियों से कथ्य और कथानक की प्रस्तुति, तथ्य आदि की जांच के उपरांत अनुमति मिल जाती है तब यह पाठ्यपुस्तक के तौर पर छापने का अधिकार एनसीईआरटी प्रयोग कर पुस्तकें छापती है। संभव है उक्त प्रक्रिया में फिर भी कोई चूक रह जाए जिस ओर यदि ध्यान दिलाया जाए तो उसे सुधारा जा सकता है। उक्त संदर्भ में इसे इसी रूप लिया जा सकता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि 2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के आधार पर तैयार पाठ्यपुस्तकों में अब गलती दिखाई दी? क्या अब तक किसी की नज़र इस ओर नहीं गई? हालांकि जब भी गलती दिखाई दी तभी सुधार लेना इसमें कोई गलत भी नहीं है। लेकिन क्या यह उस विद्वत् समिति की कार्य दक्षता और विवेक पर शक करना नहीं है? क्या समिति के विशेषज्ञों की विषयी ज्ञान और शिक्षण शास्त्र की समझ पर प्रश्न खड़ा नहीं है?
गौरतलब है कि 2002 में भी पाठ्यपुस्तकों के साथ इस प्रकार की कवायद की जा चुकी है। तब सर्वोच्च न्यायालय को इस पूरे विवाद पर हस्तक्षेप करना पड़ा था। तब भी इतिहास की किताबें ही सुधार और पाठ हटाए जाने की परिधि में आई थी। इसके साथ ही यह भी बताया गया था कि फलां फलां पेज के कथ्य को शिक्षक कक्षा में चर्चा करने से बचें। उसी दौरान साहित्य को भी नहीं छोड़ा गया था और हिन्दी की किताब से प्रेमचंद की कहानी को हटा कर मृदुला सिन्हा की रचना "ज्यों मेहंदी के रंग" को जोड़ा गया था। तब भी इस रद्दोबदल पर अकादमिक क्षेत्र में काफी विवाद और संवाद हुए थे। किन्तु जब तक तब की सरकार रही तब तक ज्यों की त्यों परिवर्तन जारी रहे। पाठ्यपुस्तकों से ख़ास पाठ, पृष्ठ आदि को हटाने का इतिहास कोई नया नहीं है। हां चौकाने वाली बात सिर्फ इतनी सी है कि यह बस्ते का बोझ कम करने की चिंता किस समय में सता रही है। पांच वर्ष में नींद नहीं खुली, न ही पाठ्यपुस्तकों की चिंता सताई किन्तु जब चुनाव होने हैं तब किताबों के तथ्यों को सुधार के फरमान जारी किए गए। हालांकि एनसीईआरटी सरकार की सलाहकार के तौर पर काम करती है। लेकिन सीधे-सीधे मानव संसाधन मंत्रालय इस संस्था पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है। अंतर सिर्फ यही होता है कि इस मंत्रालय के मंत्री बदल जाते हैं। जो अपनी-अपनी विचारधारा के आधार पर एनसीईआरटी के मार्फत पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यचर्याओं में तब्दीलियां कराया करते हैं।
बस्ते का बोझ कम करने के लिए प्रो. यशपाल ने सिफारिश की थी। उनकी सिफारिश को सरकारों ने कितनी तवज्जो दी यह किसी से भी छुपी नहीं है। उन्होंने तो जीडीपी का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करने की सिफारिश भी की थी लेकिन इस पर आज तक सरकार गंभीरता नहीं दिखा पाई। लेकिन स्व और पार्टी हित को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने पाठ्यपुस्तकों को एक सशक्त हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं कि पाठ्यपुस्तकों में किन पाठों को शामिल किया जाए और किन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाए इसके पीछे गहन शिक्षा-शिक्षण शास्त्र के तमाम विमर्शों को ताक पर रख दिया जाता है। कक्षा में दसवीं की जिस इतिहास की किताब से तीन पाठों को हटा कर बोझ कम करने की दुहाई दी जा रही है उस पर नज़र डालना गलत नहीं होगा।
"भारत-चीन में राष्ट्रवादी आंदोलन" नाम से पहला अध्याय भारत-चीन (विशेष रूप से वियतनाम) में राष्ट्रवाद के उदय पर है कि किस तरह उपनिवेशवाद और वियतनाम में साम्राज्यवादी विरोधी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को आकार दिया गया था। दिलचस्प है कि किसी भी देश के संघर्ष आंदोलन व स्वतंत्रता की लड़ाई में स्त्री-पुरुष दोनों की ही भूमिका अहम रही है। इन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। यदि किसी भी देश के आंदोलन में महिला की भूमिका रही तो उसे हटाकर हम किस प्रकार की ऐतिहासिक समझ विकसित कर रहे हैं। क्या हम बच्चों को वैश्विक स्तर पर राजनीति, भौगालिक, सांस्कृतिक बदलावों, संघर्षों आदि से महरूम रखना चाहते हैं। या उन्हें यथार्थ की जमीन से भी परिचित कराना हमारा मकसद है। उद्देश्य स्पष्ट रखना होगा कि हम इतिहास के जरिए किस प्रकार की समाजो-सांस्कृतिक समझ बच्चों में विकसित करना चाह रहे हैं।
दसवीं की पुस्तक से हटाए गए पाठ में दूसरा अध्याय है ""वर्क लाइफ एंड लेजर : लंदन और बॉम्बे।"" गौरतलब है कि जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर महानगरों का विकास और आधुनिकीकरण हुआ वैसे वैसे कई बुनियादी परिवर्तन भी दर्ज होते गए। यह पाठ ख़ासकर शहरों के विकास के इतिहास को प्रस्तुत करता है इसके साथ ही बेराजगार और गलियों में सामान बेचने वाले फेरीवाले की जिंदगी और उनकी जीवन की तल्ख़ हक़ीकतों को प्रस्तुत किया गया।
दीगर बात है कि इसमें शहरों के तेजी से विकास से जुड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों से संबंधित जानकारी दी गई है। यह समझना ज़रा मुश्किल है कि इस पाठ को हटाने से कौन का बोझ कम हुआ? क्या हम बच्चों को अपने परिवेशी समझ से काट कर रखना चाहते हैं। या फिर तथाकथित निम्न तबके के कामों से जुड़े कर्मियों से हम बच्चों को परिचय नहीं कराना चाह रहे हैं। ध्यान रहे कि बंगाल की वर्तमान सरकार ने शंगूर आंदोलन को बतौर वहां की पाठ्यपुस्तक में शामिल कराया था। समाज में होने वाले प्रमुख आंदोलनों की पृष्ठभूमि, उसके समाजो राजनीतिक बुनावटों को समझने के लिए यदि किताबों को शामिल की गईं तो उसके पीछे के शैक्षणिक दर्शन को भी हमें समझने की आवश्यकता है न कि पाठ्यपुस्तकों के बोझ कम करने के नाम पर गैर जिम्मेदाराना तौर पर हटा दिया जाए।
तीसरा अध्याय जिसे किताब से बेदख़ल किया गया यह भी मानिख़ेज़ है। ""नोवल्स सोसाइटी एंड हिस्ट्रर"" यह पाठ ख़ासकर उपन्यासों की लोकप्रियता के इतिहास के बारे में है। किस तरह से इसने पश्चिम और भारत में सोचने के आधुनिक तरीकों को प्रभावित किया। यदि हम "टेल आफ टू सिट्जि" पढ़ते हैं तब हमें तत्कालीन समाज की स्थिति के बारे में कहानी के मार्फत जानकारी मिलती है। वहीं "मिड नाइट चिल्ड्रेन" पढ़ते हैं तब हमें भारत के विभाजन और विभाजन पूर्व के इतिहास की जानकारी मिलती है।
उसी तर्ज पर हम कृष्णा सोबती की कहानी "सिक्का बदल गया", "मलबे का मालिक", "ट्रेन टू पाकिस्तान" आदि उपन्यास, कहानियां एक ख़ास कालखंड़ की न केवल कहानी कहती हैं, बल्कि इन कहानियों के जरिए बच्चों में इतिहास बोध पैदा करती है। क्या हमें इस प्रकार कहानियों, उपन्यासों आदि को पाठ्यपुस्तकों से बाहर करना चाहिए। फिर तो हमें "गोदान", "कर्मभूमि", "नमक का दारोगा" आदि को भी बाहर का रास्ता दिखाना होगा। जहां तक दलित विमर्श के नाम पर एक पाठ को हटाया गया तो क्या हमें "जूठन", "मणिकर्णिका" आदि उपन्यासों को भी अपठनीय कृतियों की सूची में डाल कर कह देना चाहिए कि इसे हटाने से बच्चों पर किताबी बोझ कम होगा। यह तर्क कितना वाजिब और शैक्षणिक दर्शन और शिक्षा शास्त्र के अनुकूल है इस पर मंथन करने की आवश्यकता पड़ेगी।
पाठों को हटाने, जोड़ने का सिलसिला न रुका है और न रुकेगा। याद हो कि इससे पूर्व एनसीईआरटी नौवीं कक्षा की इतिहास की पाठ्यपुस्तक से भी तीन पाठ हटा चुकी है। इसमें एक अध्याय जातीय संघर्ष को विमर्श के केंद्र में रखता था। इस पूरी तब्दीली में मानव संसाधन मंत्री ने यह सुझाव दिया था कि सभी विषयों का पाठ्यक्रम कम किया जाए, लेकिन एनसीईआरटी ने सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों के कंटेंट को लगभग 20 फीसदी कम कर दिया। वहीं गणित और विज्ञान के पाठ्यक्रम में सबसे कम कैंची चलाई है।

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