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हिन्दी के अंतरंग शत्रु
01-Nov-2019 10:53 AM 400      इन दिनों अपनी हिन्दी दो तरह के अंतरंग शत्रुओं से जूझ रही है- एक हैं हिन्दी के "विभीषण" और दूसरे हैं हिन्दी के "घुन"। हिन्दी के "विभीषण" तो संसद भवन की पावरफुल कुर्सियों या तरह-तरह के पुरस्कारों की लालच में सीधी- सादी जनता को अपने लच्छेदार भाषणों से गुमराह करते हुए सत्ताधारियों की चाटुकारिता करते रहना अपना परम धर्म समझते हैं और इसीलिए अंग्रेजी के एक छत्र राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हिन्दी की जड़ खोदते रहते हैं। किन्तु, हिन्दी के "घुन" तो हिन्दी रूपी काठ की नौका को भीतर ही भीतर छलनी कर रहे हैं और उसे डुबो देने पर आमादा हैं। उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि जिस काठ को वे भीतर ही भीतर कुतर रहे हैं वहीं से उनको जीवन रस मिलता है जिनसे वे जिन्दा हैं। आखिर उनका तो यही स्वभाव जो ठहरा। विभीषण तो राम-भक्त थे। बाद में राम की कृपा से लंका के राजा भी बने। किन्तु हमारे देश की जनता ने उन्हें कभी सम्मान नहीं दिया। उन्हें हिकारत की नजर से ही देखा। उन्हें "घर का भेदिया" माना जिनके फूट जाने के कारण सोने की लंका बर्बाद हो गई थी। किन्तु, लंका का सिंहासन और राम के स्नेह का कवच भी विभीषण को इस देश की जनता की नजरों में सम्मान नहीं दिला सका। भोजपुरी क्षेत्र में आज भी यह कहावत प्रचलित है, "घर का भेदी लंका जारै"। हमारे इतिहास के जयचंद और मीरजाफर तो घृणा के प्रतीक ही बन गए हैं। किन्तु आज भी देश में अनेक लोग हिन्दी के विभीषण, मीरजाफर और जयचंद की भूमिका निष्ठापूर्वक निभा रहे हैं और दूसरी ओर हिन्दी की रोटी खाने वाले असंख्य जन "घुन" बनकर अनजाने ही उसे खोखला कर रहे हैं। हिन्दी की चिन्दी करने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वालों को इतना भी नहीं सूझता कि जहाँ आज हिन्दी को मजबूत और समृद्ध करने की जरूरत है, उसे न्याय के क्षेत्र की भाषा बनाने, प्रशासन की भाषा बनाने, ज्ञान की भाषा बनाने, उच्च शिक्षा की भाषा बनाने की जरूरत है, मेडिकल और इंजीनियरिंग की भाषा बनाने की लड़ाई लड़ने की जरूरत है, वहां उसकी बोलियों को अलग करके, उसे खंड-खंड करके कमजोर करने की मांग करना आत्मघाती कदम है। इतना ही नहीं, यह इतिहासविरोधी कदम भी है। इतिहास की सुई कभी उल्टी दिशा में नहीं चलती। सभ्यता का इतिहास यही बताता है कि जंगल की कबीलाई जिन्दगी से जैसे जैसे मनुष्य सभ्यता के विकास की ओर बढ़ता है वह क्रमश: और अधिक व्यापक स्तर पर संगठित होता जाता है। गणों से लघु जातियों और उससे महाजातियों का विकास हुआ है। महाजातियों से लघु जातियां नहीं बनती। हम जितना ही अतीत में जाएंगे भाषाओं की संख्या ज्यादा मिलेगी कम नहीं। दुनिया में भाषाएं सिर्फ मर रही हैं। हर पन्द्रह दिन में एक भाषा खत्म हो रही है। इसे रोका नहीं जा सकता। असल में, भाषाओं के विकास की वंशवृक्ष वाली अवधारणा पुरानी हो चुकी है। अब यह प्रमाणित हो चुका है कि भाषाओं का विकास नदी की धार की तरह होता है। जैसे-जैसे नदी समुद्र की ओर आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे अगल-बगल की छोटी-छोटी नदियां उसमें मिलती जाती हैं और मुख्य नदी का हिस्सा बन जाती हैं। मुख्य नदी और भी चौड़ी तथा गहरी होती जाती है। समुद्र में मिलने से पहले गंगा नदी "हुगली" बनकर गंगा सागर के समीप विशाल रूप धारण कर लेती है। इसी तरह इतिहास जितना ही आगे बढ़ता है, छोटी जनपदीय भाषाएं बड़ी भाषा में विलीन होती जाती हैं। बहुत छोटी जनपदीय भाषाएं जो खत्म होने के कगार पर हैं। उनके तत्वों को सहेजकर और उन्हें अपनी जातीय भाषा में शामिल करके अपनी विरासत को बचाया जा सकता है और उससे अपनी जातीय भाषा को और अधिक समृद्ध किया जा सकता है जिससे साम्राज्यवाद की भाषा से होड़ लेने के वह काबिल बन सके। जो अपेक्षाकृत बड़ी जनपदीय भाषाएं हैं उनके प्रति द्वंद्वात्मक नहीं, सहयोग का संबंध जोड़ना होगा। उनसे अलग होकर नहीं, साथ रहकर मजबूत हुआ जा सकता है। चार भाई एक साथ रहते हैं तो समाज पर उनका दबदबा बना रहता है, और वे एक साथ तभी तक बने रह सकते हैं जब तक उनमें तालमेल हो और उनका मुखिया एक हो। बँट जाने पर वे कमजोर तो होते ही हैं आपस में भी एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। विश्व-ग्राम के भ्रम-जाल वाले इस ग्लोबल युग की मुख्य परिघटना हमारा विखंडन है। उनका सिद्धांत ही है "थिक ग्लोबली ऐक्ट लोकली"। जब तक इस यथार्थ को हम नहीं समझेंगे उससे बचाव का रास्ता नहीं निकाल पाएंगे। विखंडन के इस युग में अस्मिता के नाम पर हिन्दी को विखंडित करने की पहल यदि व्यक्तिगत स्तर पर कोई करता है तो इसे उस व्यक्ति की समझदारी की कमी कही जा सकती है, किन्तु यदि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए स्थापित बड़े-बड़े संस्थान हिन्दी के हित के प्रतिकूल कार्यक्रमों में लिप्त हों, तो हमें समझना चाहिए कि अब यह रोग महामारी का रूप ले चुका है। क्योंकि ऐसे संस्थानों में कोई भी निर्णय विद्वानों की उच्चस्तरीय समितियाँ लेती हैं। वर्धा स्थित गांधी के नाम पर बना महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की कुछ गतिविधियाँ भी इसी तरह की हैं। इस विश्वविद्यालय की स्थापना प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन (1975, नागपुर) में पारित प्रस्ताव के आधार पर हुई थी, जिसका उद्देश्य महात्मा गाँधी के विचारों को ध्यान में रखते हुए उच्च शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना है। इसे हिंदी को एक समृद्ध अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए काम करना था, इसीलिए इसे भाषा विश्वविद्यालय के रूप में खड़ा किया गया था, लेकिन आज यह पूरी तरह से भारत के दूसरे साधारण विश्वविद्यालयों की तरह काम कर रहा है। इसमें हिंदी माध्यम से दर्जन भर से अधिक विषय पढ़ाए जा रहे हैं, जबकि हिंदी में उन विषयों के अध्यापन के लिए समुचित सामग्री का अभाव है। विश्वविद्यालय को चाहिए कि वह इस अभाव को दूर करने को प्राथमिकता दे और हिंदी में आधार सामग्री तैयार करे ताकि अन्य विवि भी उसका उपयोग कर सकें, किन्तु इस दिशा में उसकी पहल संतोषजनक नहीं है और उसके कई कदम नागपुर में पारित प्रस्ताव की मूल भावना से मेल नहीं खाते। साहित्य अकादमी भी हमारे देश की एक स्वायत्तशासी और साहित्य की दुनिया की सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्था है। हिन्दी की जड़ खोदने में इस संस्था ने भी अथक प्रयास किया है। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल न होने के बावजूद हिन्दी की दो महत्वपूर्ण बोलियों (मैथिली और राजस्थानी) को इसी संस्था ने सबसे पहले मान्यता देकर हिन्दी से अलग होने के लिए रास्ता दिखाया। यह संस्था हर वर्ष लाखों रुपए के तरह-तरह के पुरस्कार देती है और भारत की विभिन्न भाषाओं की श्रेष्ठ चयनित पुस्तकों का प्रकाशन भी करती है। जिस देश में सैकड़ों भाषाएं प्रचलित हों और उनमें भरपूर साहित्य भी रचा जा रहा हो वहां पुरस्कारों के चयन व ग्रंथों के प्रकाशन हेतु भारत के संविधान में स्वीकृत बाईस भाषाओं में रचित साहित्यिक कृतियों को अपनाना सर्वाधिक उपयुक्त और निरापद मार्ग था किन्तु साहित्य अकादमी ने उक्त बाईस भाषाओं के अलावा दो अन्य भाषाओं को भी स्वीकार कर लिया है और वे दो हैं अंग्रेजी और राजस्थानी। अंग्रेजी साम्राज्यवाद की भाषा है, शासक वर्ग की भाषा है, उन लोगों की भाषा है जिन्होंने सैकड़ों वर्ष तक हमें गुलाम बनाए रखा और आज भी ऐसे चंद अमीरों और शासकों की भाषा है जो शासन के लिए, आतंक जमाने के लिए, अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। अंग्रेजी हमारे देश की भाषा नहीं है, फिर भी उसे सीखने सिखाने के लिए सारा सरकारी तंत्र लगा हुआ है और लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए अपनी गाढ़े की कमाई होम कर रहे हैं क्योंकि उसे नौकरी के लिए अनिवार्य कर दिया गया है। यह ऐसा तथाकथित आजाद मुल्क है जहां राष्ट्रभाषा हिन्दी सहित चाहे जितनी भी भारतीय भाषाएं जानते हों, आप को कोई भी नौकरी नहीं मिलेगी और चाहे भारत की कोई भी भाषा न जानते हों सिर्फ एक विदेशी भाषा अंग्रेजी जानते हों तो इस देश की कोई भी नौकरी ससम्मान मिल सकती है। इस आजाद देश की जनता को अपने बारे में न्याय भी अपनी भाषा में नहीं मिलता और उसे अपने बारे में प्राप्त न्यायालय के फैसले को समझने के लिए भी वकील के पास जाना पड़ता है। ऐसी भाषा को और उसमें लिखने वाले साहित्यकारों को सम्मानित-पुरस्कृत करने की साहित्य अकादमी को क्या जरूरत थी? उसके सम्मान के लिए तो पूरी दुनिया ही पलकें बिछाए खड़ी है। इससे भी अधिक आपत्तिजनक कार्य है राजस्थानी भाषा की स्वीकृति। राजस्थानी की स्वीकृति हिन्दी की शक्ति को कम करने के लिए, हिन्दी को खंड-खंड करने के उद्देश्य से ही की गयी है। साहित्य अकादमी ने पहली बार जब मैथिली को मान्यता दी थी तो उसी का परिणाम था कि उसका नैतिक समर्थन और उससे शक्ति अर्जित करके मैथिली की राजनीति करने वालों ने अपना आन्दोलन आगे बढ़ाया और अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधान मंत्रित्वकाल में मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया। इस तरह हिन्दी की अविभाज्य अंग रही मैथिली को, हिन्दी से अलग, बंगला, ओड़िया, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ आदि की तरह स्वतंत्र दर्जा दे दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पिछली जनगणना में मैथिली भाषियों की संख्या हिन्दी की संख्या में से घटा दी गई। उल्लेखनीय है कि हिन्दी की सबसे बड़ी ताकत उसके बोलने वालों की संख्या है। अपने संख्या बल से ही हिन्दी भारत की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है। अगर मैथिली की तरह राजस्थानी, भोजपुरी, मगही, छत्तीसगढ़ी, अवधी, ब्रजी, बुन्देली, अंगिका, कुमायूंनी, गड़वाली, हरियाणवी आदि को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाय तब तो हिन्दी के पास संख्या बल के नाम पर और साहित्य के नाम पर भी कुछ बचेगा ही नहीं। हम हिन्दी साहित्य के इतिहास में चंदबरदायी और मीरा को पढ़ते हैं जो राजस्थानी के हैं, सूर को पढ़ते हैं जो ब्रजी के हैं, तुलसी और जायसी को पढ़ते हैं जो अवधी के हैं, कबीर को पढ़ते हैं जो भोजपुरी के हैं और विद्यापति को पढ़ते है जो मैथिली के हैं। इन सबको हटा देने पर हिन्दी साहित्य में बचेगा क्या? वैसे भी मैथिली को हिन्दी से अलग हुए एक दशक से अधिक हो गए, कितना फायदा हुआ उसे? मैथिली माध्यम के कितने प्राइमरी स्कूल मिथिलाँचल में खुले? मैथिली माध्यम के कितने इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज मिथिलांचल में खुले? हाँ, मिथिलांचल राज्य के रूप में बिहार का एक और टुकड़ा करने की माँग जरूर होने लगी। इतना ही नहीं, अपने पड़ोस से झगड़ा भी शुरू हो गया स्थाई रूप से। अंगिका वालों की शिकायत है कि मैथिली ने जो साहित्य अपना बनाकर पेश किया और संवैधानिक मान्यता प्राप्त की उसका बड़ा हिस्सा वास्तव में अंगिका का है। फायदा सिर्फ उन चंद लेखकों का हुआ जिन्हें मैथिली में लिखने के नाते साहित्य अकादमी अथवा इसी तरह की अन्य सरकारी अथवा सरकार द्वारा वित्त पोषित संस्थाओं से किसिम-किसिम के ईनाम मिले। फायदा मिथिलाँचल के उन चंद युवकों को भी मिला होगा जिन्होंने एक विषय के रूप में मैथिली साहित्य पढ़कर सिविल सर्विस अथवा इसी तरह की परीक्षाएं पास करके सरकारी नौकरियाँ हासिल कर लीं। किन्तु इन चंद लोगों की गिनी-चुनी सफलताओं की तुलना में हानि कितनी हुई - इसका क्या कोई आकलन कर पाएगा? हिन्दी की संख्या बल तो घटी ही, खुद मैथिली की ताकत कितनी घट गई? दुनिया भर के विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों में जहाँ मैथिल कोकिल विद्यापति हिन्दी के महान कवि के रूप में पढ़ाए जा रहे थे, अब वे यदि हिन्दी के पाठ्यक्रम में रखे जाएंगे तो वह असंवैधानिक होगा। अब वे सिर्फ मैथिली के कोर्स में ही रखे जा सकेंगे। क्या कोई साहित्यकार चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए? सचाई तो यह है कि मैथिली भाषी जनता हिन्दी से अलग नहीं है। भाषा वैज्ञानिकों ने भी मैथिली को हिन्दी की एक बोली ही माना है। किन्तु पुरस्कार तथा अपने अन्य तुच्छ स्वार्थ के किए कुछ लोगों ने हिन्दी और मैथिली का बँटवारा करा दिया। उन्हें पता है, नागार्जुन जैसे हिन्दी के बड़े कवि को भी हिन्दी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिल सका था। उन्हें मिला था मैथिली के लिए। ऐसे लोग पुरस्कार के लिए कुछ भी कर सकते हैं। साहित्य अकादमी ने राजस्थानी को मान्यता दे दी है। राजस्थानी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए लगातार संघर्षरत है। मैथिली की मान्यता से उसे ताकत मिली है। जबकि हकीकत यह है कि जिस राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग जोरों से की जा रही है उस नाम की कोई भाषा वजूद में है ही नहीं। राजस्थान की 74 में से सिर्फ 9 (ब्रजी, हाड़ौती, बागड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, शेखावटी) बोलियों को राजस्थानी नाम देकर संवैधानिक दर्जा देने की मांग की जा रही है। बाकी बोलियों पर चुप्पी क्यों? हिन्दी की बोलियों द्वारा संविधान में शामिल होने की मांग को अस्मिताओं के उभार के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। अस्मिता के नाम पर भाषा की राजनीति करने वाले कौन से लोग हैं? कुछ गिने-चुने नेता, कुछ अभिनेता और कुछ स्वनामधन्य बोलियों के साहित्यकार। नेता, जिन्हें स्थानीय जनता से वोट चाहिए। उन्हें पता होता है कि किस तरह अपनी भाषा और संस्कृति की भावनाओं में बहाकर गाँव की सीधी-सादी जनता का मूल्यवान वोट हासिल किया जा सकता है। बोलियों को संवैधानिक मान्यता दिलाने में वे साहित्यकार सबसे आगे हैं जिन्हें हिन्दी जैसी समृद्ध भाषा में पुरस्कृत और सम्मानित होने की उम्मीद टूट चुकी हैं। हमारे कुछ मित्र तो इन्हीं के बल पर हर साल दुनिया की सैर करते हैं और करोड़ों का वारा-न्यारा करते हैं। वस्तुत: साम्राज्यवाद की साजिश हिन्दी की शक्ति को खण्ड-खण्ड करने की है क्योंकि बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिन्दी, दुनिया की सबसे बड़ी दूसरे नंबर की भाषा है। इस देश में अंग्रेजी के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिन्दी ही है। इसलिए हिन्दी को कमजोर करके इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता को, इस देश की रीढ़ को आसानी से तोड़ा जा सकता है। अस्मिताओं की राजनीति के पीछे साम्राज्यवाद की यही साजिश है। हिन्दी के "विभीषण" साम्राज्यवाद की इस दुरभिसन्धि में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं क्योंकि उन्हें भी कुछ टुकड़े मिलने की उम्मीद है। ऐसे विभीषण, जो बोलियों की वकालत करते हुए अस्मिताओं के उभार को जायज ठहरा रहे हैं, अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, खुद व्यवस्था से साँठ-गाँठ करके उसकी मलाई खा रहे हैं और अपने आस-पास की जनता को जाहिल और गंवार बनाए रखना चाहते हैं ताकि भविष्य में भी उन पर अपना वर्चस्व कायम रहे। जिस देश में खुद राजभाषा हिन्दी अब तक ज्ञान की भाषा न बन सकी हो वहाँ भोजपुरी, राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा देकर वे उन्हें क्या बनाना चाहते हैं? जिस भोजपुरी, राजस्थानी या छत्तीसगढ़ी का कोई मानक रूप तक तय नहीं है, जिसके पास गद्य तक विकसित नहीं हो सका है उस भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराकर उसमें मेडिकल और इंजीनियरी की पढ़ाई की उम्मीद करने के पीछे की धूर्त मानसिकता को आसानी से समझा जा सकता है। अगर बोलियों और उसके साहित्य को बचाने की सचमुच चिन्ता है तो उसके साहित्य को पाठ्यक्रमों में शामिल कीजिए, उनमें फिल्में बनाइए, उसके शब्दों, मुहावरों और उसकी सांस्कृतिक विरासत से हिन्दी को समृद्ध कीजिए। उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करके हिन्दी से अलग कर देना और उसके समानान्तर खड़ी कर देना तो उसे और हिन्दी, दोनों को कमजोर बनाना है और उन्हें आपस में लड़ाना है। लगभग पांच वर्ष पहले ज्ञान के सबसे बड़े सर्च इंजन विकीपीडिया ने अपने सर्वेक्षण में दुनिया की सौ भाषाओं की सूची जारी की थी। उसमें हिन्दी को चौथा स्थान दिया था। इसके पहले हिन्दी को दूसरे स्थान पर रखा जाता था। पहले स्थान पर चीनी रहती थी। यह परिवर्तन इसलिए हुआ की सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही, हरियाणवी और छत्तीसगढ़ी को स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिया गया है। हिन्दी को खण्ड-खण्ड करके देखने की यह अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति है। आज भी यदि हम इनके सामने अंकित संख्याओं को हिन्दी बोलने वालों की संख्या में जोड़ दें तो फिर हिन्दी दूसरे स्थान पर पहुँच जाएगी। किन्तु यदि उक्त भाषाओं के अलावा राजस्थानी, ब्रजी, कुमायूनी-गढ़वाली, अंगिका, बुंदेली जैसी बोलियों को भी स्वतंत्र भाषाओं के रूप में गिन लें तो निश्चित रूप से हिन्दी भारत की भाषाओं में भी सातवें-आठवें स्थान पर पहुंच जाएगी और जिस तरह से हिन्दी की उक्त बोलियों द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की माँग जोरों से की जा रही है यह परिघटना आगे के कुछ ही वर्षों में यथार्थ बन जाएगी। दरअसल, इतिहास बताता है कि हिन्दी को प्रतिष्ठित करने की लड़ाई लड़ने वालों में हिन्दी भाषियों का योगदान बहुत कम रहा है। महात्मा गाँधी गुजरात के थे, लाला लाजपत राय पंजाब के थे, काका कालेलकर, बाल गंगाधर तिलक महाराष्ट्र के थे, महर्षि दयानंद सरस्वती गुजरात के थे, राजा राममोहन राय, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, ईश्वरचंद विद्यासागर, केशवचंद्र सेन, नेताजी सुभाष चंद बोस आदि सभी बंगाल के थे। हिन्दी क्षेत्र का कौन था- मदन मोहन मालवीय और पुरुषोत्तम दास टंडन को छोड़कर? हिन्दी वालों ने हिन्दी का हमेशा अहित ही किया है और यह "नेक" काम वे आज भी उसी निष्ठा से कर रहे हैं, उद्देश्य है अपना तुच्छ स्वार्थ। ऐसे लोग अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए हिन्दी की आहुति देने में भी पीछे नहीं रहेंगे। किन्तु, जिस तरह इस देश की जनता ने विभीषण को माफ नहीं किया उसी तरह आज भी हिन्दी के इन अंतरंग शत्रुओं, घुनों और छुटभैये विभीषणों को माफ नहीं करेगी।
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