ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदुस्तान के बाहर भी हिंदी से मज़ाक
01-Jun-2019 12:29 AM 845     

जर्मनी या जर्मनभाषी दूसरे देशों में अपनी भाषा से सीधे भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने वाले व्यक्तियों का अकाल क्यों है, इस प्रश्न का उत्तर देने का आंशिक प्रयास भारत में गोएटे संस्थान, दक्षिण ऐशिया संस्थान, प्रो. हेल्वेत्सिया, जर्मन बुक ऑफिस तथा ऑस्ट्रियाई संस्कृति फॉरम जैसी संस्थाओं द्वारा की जा रही धांधलियों के ज़रिये अपने लेखों में उजागर करने की कोशिश करता रहा हूँ। गोएटे तथा दक्षिण ऐशिया संस्थानों के हिंदी के शिक्षक विद्वान् बने भारत में घूम रहे हैं, नालायकों ने हिंदी को तथा अन्य भारतीय भाषाओं को सिर्फ़ भारत में ही आहत नहीं किया, अपने देश में भी इन्होंने इस मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी। नीचे मैं जर्मनी से मुझे मिली एक मेल को उद्धृत कर रहा हूँ, जो मेरे इनबॉक्स में एक साल से अधिक समय से पड़ी थी, एक ऐसे खाते में, जो निष्क्रिय पड़ा था और जिसमें आई पुरानी मेलों को मैं मिटा रहा था। अचानक इस मेल का विषय पढ़कर मैं चौंक गया : "भ्रष्टाचार पर आपके विवादास्पद आलेख के सन्दर्भ में।" इस लम्बे पत्र में मैंने कुछ असम्बद्ध पंक्तियाँ छोड़ दी हैं। जर्मन से हिंदी में अनूदित शेष सामग्री इस प्रकार है :
मेरा नाम लार्स वेयर्नर है। पिछले से पिछले सप्ताह मुझे मेरा डिप्लोमा मिल गया है और तब से मैं स्वयं को भारतशास्त्री कह सकता हूँ। सुनने में अच्छा लग रहा है। अध्ययन मैंने हिंदी/उर्दू, भाषा इंडोनेशिया/मलय, फ़ारसी तथा पुर्तगाली का किया है।
बरसों से मैं आपकी पत्रिका का प्रशंसक रहा हूँ। बड़े उत्साह से तथा अक्सर मैंने आपकी पीडीऐफ़ फाइलें डाउनलोड की हैं, उनके पन्ने पलटे हैं, और समय मिलने पर अनुवादों को देख-देख कर समझने की कोशिश करता रहा हूँ कि क्या कैसे होता है, इसे हिंदी में कैसे कहते हैं।
और अब मेरी ईमेल की वजह : साहित्य के व्यापार में भ्रष्टाचार पर आप द्वारा उठाया गया एक नया विवाद, विशेषकर के.सच्चिदानंदन के मामले में। इस सन्दर्भ में मैं कुछ टिप्पणी करना चाहूँगा, क्योंकि मैं बहुत नाराज़ हूँ, या बहुत-सा नाराज़...
सबसे पहले ऐसे जर्मनभाषी उपलब्ध न होने की समस्या, जो दक्षिण ऐशियाई भाषाओं से अनुवाद कर सकें। आपने स्वयं लिखा है, "क्ष् ड्डदृ ददृद्य त्त्ददृध्र् ठ्ठ कद्वद्धदृद्रड्ढठ्ठद दठ्ठद्यत्ध्ड्ढ द्मद्रड्ढठ्ठत्त्ड्ढद्ध, ठ्ठथ्द्मदृ ढद्धदृथ्र् द्यण्ड्ढ ठ्ठद्धड्ढठ्ठ दृढ क्ष्दड्डदृथ्दृढ़न्र्, ध्र्ण्दृ ड़ठ्ठद द्यद्धठ्ठदद्मथ्ठ्ठद्यड्ढ क्ष्दड्डत्ठ्ठद थ्त्द्यड्ढद्धद्यद्वद्धड्ढ ड्डत्द्धड्ढड़द्यथ्न्र् त्दद्यदृ ण्त्द्म थ्र्दृद्यण्ड्ढद्ध द्यदृदढ़द्वड्ढ." हे ईश्वर!, यह आपने 2011 में लिखा था और इस बीच आपका परिचय डागमार मार्कोवा से हो चुका है। उनके अलावा कुछ और भी सक्षम व्यक्ति यूरोप में हैं। बहुत अधिक नहीं हैं, और अधिक कभी होते भी नहीं थे।
और ज़ाहिर है कि धोखेबाज़ भी हैं। आपने खुद कई बार इस बारे में लिखा है। मेरा मतलब जनाब लोथार लुत्से से है। मृत्योपरांत भी उसे एक प्रख्यात विद्वान् का दर्ज़ा मिला हुआ है। एक आसान से पाठ, "तोबा टेक सिंह", की तुलना मूल से करने पर स्पष्ट हो जाता है कि उसका अनुवाद उर्दू से नहीं किया गया। लेकिन, मुझे माफ़ कीजियेगा, कौन भूतनी का इस चीज़ की परवाह करता है! बल्कि यहाँ मामला अंग्रेजी अनुवादों तथा हिंदी के कई संस्करणों से नक़ल करके बनाए गए एक संकलन का है, जिसमें मंटो के पाठ मूल से बहुत भिन्न हैं। और चूंकि किसी भूतनी के को इसमें दिलचस्पी नहीं है, तो ये अनुवाद जर्मनी के प्रतिष्ठित ज़ूअरकंप प्रकाशन द्वारा एक संकलन में प्रकाशित भी हो जाते हैं। इतर-यूरोपीय साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों (जिनकी संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है, ज़्यादा कभी नहीं होती थी) के सामने मंटो की सबसे मशहूर कहानी एक नकली माल की तरह पेश की गई है। वाह वाह!
लुत्से की भारी ग़लतियों पर एक गिरोह द्वारा आवरण डाला जाता है। क्रिस्टीना ओएस्टरहेल्ड की, जो मंटो की चुनिन्दा कहानियों के संकलन "श्वात्र्से नोटित्सेन" की संपादिका हैं, उर्दू लगभग त्रुटिहीन है। अर्थात ओएस्टरहेल्ड बाकी दुनिया के लिए बेईमान है। भाषा में इतने ही माहिर किसी भी अन्य जर्मन भारतशास्त्री ने इस समस्या पर कभी अपना मुंह नहीं खोला। सबसे बड़ा कारण इसका यही लगता है कि हाइडलबर्ग यूनिवेर्सटी के प्रोफ़ेसरों का जर्मनी के अन्य भारतविद्या संस्थानों पर दबदबा है। वित्तीय स्तर पर, कर्मियों की संख्या के स्तर पर, संरचना के स्तर पर। लेकिन हाइडलबर्ग में कोई ख़ासियत नहीं है। अन्य विषयों में भी धोखेबाज़ों की भरमार है।
हाइडलबर्ग से उलट एक उदाहरण : लीपज़िग यूनिवर्सिटी का भारतविद्या संस्थान, जहाँ मैंने पढ़ाई की है, विख्यात नहीं है, बल्कि कुछ हद तक बदनाम ही है। वास्तव में लगभग एक वर्ष पूर्व, भारतविद्या के अध्ययन के सन्दर्भ में, लीपज़िग दक्षिणी गोलार्ध में सबसे बुरी जगह थी। इसकी वजह थी प्रो. कातारीना कीनले, लेकिन साथ ही संस्थान के निदेशक प्रो. ऐली फ्रांको भी। वहां दाखिला लेने से पहले मैं यह नहीं जानता था। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो लीपज़िग में भारतविद्या के क्षेत्र में कुछ अच्छा काम भी हुआ है। सिर्फ़ संस्कृत के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि हिंदी में भी। कीनले की पूर्ववर्ती डॉ. मार्गोट गात्सलफ्फ़ ने हिंदी से जर्मन में बहुत अनुवाद किये हैं। परन्तु उनका मुख्य विषय कोषविज्ञान था। उनका शब्दकोष हिंदी-जर्मन मैकग्रेगोर की हिंदी-इंग्लिश डिक्शनरी से किसी तरह कमतर नहीं है। लेकिन 65 वर्ष की आयु हो जाने पर उन्हें रिटायर होना ही था। मैं कभी उनका छात्र नहीं रहा था।
इसलिए मुझे पहले फ्रांको से संस्कृत सीखनी पड़ी (एक भारी मुसीबत), उसके बाद कीनले, और भारत से आयात की गई एक भाषा-शिक्षक से (बड़ा अनर्थ)। पाठ्य पुस्तक के रूप में रूपर्ट स्नेल की "टीच योरसेल्फ हिंदी" का इस्तेमाल किया जाता था। यह था स्टैण्डर्ड! लेकिन यह स्टैण्डर्ड क्या है? यह पुस्तक बिना किसी कार्यप्रणाली की एक घटिया पुस्तक है। बहुत-सी आवश्यक सूचनाएं इसमें हैं ही नहीं। इस पूरी पुस्तक को निगल कर पचा लेने के बाद "फिर मिलेंगेे" तक नहीं बोला जा सकता। अगर यह पुस्तक स्टैण्डर्ड है तो अच्छे हिंदी-अनुवादक कहाँ से आयेंगे? फिर उसके बाद तो पुस्तकों का अंग्रेज़ी अनुवाद आने तक ही इंतज़ार करना पड़ेगा। पहले की तरह अब भी दक्षिण ऐशियाई भाषाओं से अनुवाद करने के लिए अंग्रेज़ी एक ठेठ माध्यम बनी हुई है। यह और बात है कि नमिता गोखले का मत भिन्न है। आखिर में वह हमेशा कह सकती हैं कि उसका वक्तव्य एक व्यक्तिपरक वक्तव्य था।
और भारतविद्या की मेरी उच्चशिक्षा ऐसे चली थी :
अक्टूबर 2004 में मेरी पढ़ाई शुरू हुई थी। एम.ऐ में दाखिले के छः महीने बाद बोलोन्या-सुधारों के अंतर्गत बैचलर-मास्टर-प्रणाली लागू हो गई। इसके साथ मैं लीपज़िग यूनिवर्सिटी में ही अटक गया, और किसी यूनिवर्सिटी में मैं पढ़ाई नहीं कर सकता था। 2005 का अंत होते-होते मुझ पर स्पष्ट हो गया कि मुझे कोई कदम उठाना पड़ेगा। मास्टर लोग लगातार छात्रों में कुछ न कुछ दोष निकालने में लगे रहते थे : "यह तुझसे न होगा, यह तू नहीं जानता", वगैरह वगैरह। मैं उनसे परे ही रहना चाहता था। अतः मैंने जिज्ञासावश ही यूनिवर्सिटी के भाषा संस्थान में ऐच्छिक विषय के तौर पर भाषा इंडोनेशिया के एक पाठ्यक्रम में प्रवेश ले लिया। अगस्त 2006 में एक साल जर्मनी छोड़कर मैं इण्डोनेशियाई सरकार से एक छात्रवृति पाकर इंडोनेशिया चला गया। आज मैं भाषा इंडोनेशिया/मलय फर्राटे से बोल लेता हूँ। लेकिन भारतविदों का, देखा जाये तो, भाषा इंडोनेशिया अथवा मलय से क्या सरोकार! अपवाद : जर्मन अकादमिक आदान-प्रदान सेवा संस्कृत के विशेषज्ञों को इंडोनेशिया जाने के लिए यात्रा-भत्ता देती है, जो वहां जाकर प्रमबनन तथा बोरोबुदुर के मन्दिर देखकर एक लेख में पुष्टि कर सकें कि ये महान मंदिर हैं। वाह! जावा की भाषा की लिपि भले ही उन्हें न आती हो। लेकिन इसकी भी - पुनः - किसी साले को क्या परवाह है!
इंडोनेशिया से लौटने के बाद मैंने माध्यमिक परीक्षा दी। हिंदी व्याकरण के लिए मैंने अपनी हताशा में सी.एम. नईम की प्राथमिक उर्दू का इस्तेमाल किया। नईम की पुस्तक के व्याकरण वाले शानदार हिस्से में लिप्यान्तरण के लिए एक विशेष विधि अपनाई गई है; मतलब उसमें व्याकरण को समझने के लिए उर्दू पढ़ना आना ज़रूरी नहीं है। नईम की मदद से मैं पास भी हो गया। इसके अलावा हिंदी की एक नई प्रोफ़सर भी आ गई थी, डॉ. ईरा शर्मा। मेरी किस्मत अच्छी थी। पर संस्थान में वातावरण दिन पर दिन निराशाजनक होता जा रहा है। निर्देश ये हैं कि हिंदी पर केन्द्रित भारतविद्या के छात्रों को एक दूसरी आधुनिक भारतीय भाषा भी सीखनी ही है।
मैंने मराठी सीखनी थी। एक भारी मुसीबत! मुझे तब जीवन-यापन के लिए सोमवार से शुक्रवार शराब बनाने के एक कारखाने में रात की पारी करनी होती थी। हर दिन मेरी हालत ख़राब होती थी और थकन से मेरी जान निकल रही होती थी। उसी समय मैंने पुर्तगाली तथा हिंदी विषयों की परीक्षा में भी बैठना था। और रात को आठ घंटे खटना भी था। मैंने भी सोचा, "फ़क ऑफ्फ़" और मैंने मराठी की कक्षा में जाना छोड़ दिया। मुझमें ताक़त नहीं बची थी।
इसके बजाय मैंने प्रो. कीनले से अनुमति मांगी कि विकल्प के तौर पर मुझे एक आधुनिक भारतीय भाषा के बजाय फ़ारसी सीखने की अनुमति दी जाये। अनुमति तुरंत मिल गई। असली मक़सद उस का यह था कि इस बन्दे से पीछा छूटे। 2008/2009 में किया गया फ़ारसी का कोर्स मुक्ति पाने जैसा था। हिंदी के लिए भी। फ़ारसी की पाठ्यपुस्तक स्नेल की "लर्न योरसेल्फ हिंदी" से भी गई-गुज़री थी, लेकिन शिक्षिका ज़हीन थी। एक साल फ़ारसी पढ़ लेने के बाद मैं फ़ारसी में बातचीत कर सकता था। कई साल हिंदी पढ़ने के बाद हिंदी में बिलकुल नहीं कर सकता था। यहाँ फ़ारसी ने मेरी हिंदी मज़बूत करने का काम किया। फ़ारसी का पाठ्यक्रम पूरा कर लेने के बाद मैं अपने खाली समय में उर्दू-लिपि सीखने लगा। अपने आप ही। वैसे आधुनिक फ़ारसी नस्ख में लिखी जाती है। जबकि उर्दू नस्तालिक़ में, पर यह देखने में ज़्यादा खूबसूरत होती है, लेकिन पढ़ने तथा लिखने में अधिक कठिन होती है। दूसरी तरफ़, उर्दू के अधिकतर लफ़्ज़ों के बीच फ़ासला न होने पर उनमें संस्कृत की कुछ-कुछ झलक होती है। बहरहाल, मैं तब से उर्दू के शब्दकोष इस्तेमाल कर सकता था। हिंदी अब धीरे-धीरे बोधगम्य होने लगी थी।
जनवरी 2011 में ईरान में फ़ारसी का एक पाठ्यक्रम करने के लिए मैंने आवेदन-पत्र दिया। संयोगवश ही मुझे इस छात्रवृति के बारे में कहीं से पता लग गया था। वृत्ति पाने में मैं सफल हुआ। अगस्त 2011 में अगस्त का पूरा महीना मैंने ईरान में बिताया। वहां छात्रवृत्ति पाकर जो भारतीय आए हुए थे, वे मुझे खाली समय में हिंदी बोलने का अभ्यास करवाते थे। किस्मत अच्छी थी।
लेकिन भारतविद्या वाली समस्या बनी रही। मुझे भारत में रहने के लिए जर्मन अकादमिक आदान-प्रदान सेवा की वृत्ति नहीं मिली। प्रोफ़ेसरों ने मेरे नाम की सिफ़ारिश ही नहीं की। "आप बहुत ख़राब फ़ारसी बोलते हैं, और सिर्फ़ उर्दू कर रहे हैं।" आहा! यह मुझे प्रो. कीनले बता रही थी। उसे न फ़ारसी आती है न ही उर्दू। और चूंकि मेरे पास इतने पैसे नहीं होते थे, इसलिए मैं आज तक कभी भारत नहीं जा सका। लेकिन मैं भारतविद हूँ।
ऐम.ऐ. के लिए शोध-प्रबंध प्रो. कीनले ने मुझसे दो बार लिखवाया। विषय पर सहमति होना ही एक मुश्किल का काम हो गया था। अंततः मैंने अनुवाद-विज्ञान पर एक शोध-प्रबंध लिखा - जवाहर लाल नेहरू के संकलन "ख्र्ड्ढद्यद्यड्ढद्धद्म ढद्धदृथ्र् ठ्ठ ढठ्ठद्यण्ड्ढद्ध द्यदृ ण्त्द्म ड्डठ्ठद्वढ़ण्द्यड्ढद्धन्" के प्रेमचंद द्वारा किये गए हिंदी अनुवाद पर। लेकिन मैंने प्रबंध अंग्रेज़ी में लिखा। बिना प्रोफ़ेसर की अनुमति लिये। जर्मनी में किसी भी यूनिवर्सिटी में ऐसा कोई भी नहीं कर सकता। मुझे यह मालूम नहीं था। प्रोफ़ेसरनी को भी मैंने कुछ नहीं बताया था : मुझे बेवकूफ़ाना ताने और फज़ूल की बकबक सुनने का कोई शौक़ नहीं था। सब कुछ मैंने अपने सर पर किया। कार्यप्रणाली और ऐतिहासिक सन्दर्भों से लेकर शैलीगत प्रश्नों तक। एम.ऐ. का शोधप्रबंध लिखने की प्रेरणा मुझे अपने हिंदी के ज्ञान को बेहतर बनाने की इच्छा की वजह से मिल रही थी। और इसके साथ मेरी आत्मा को शांति मिलनी थी। अगर मुझे उर्दू और फ़ारसी न आती होतीं तो मैं यह प्रबंध कभी न लिख पाता; पश्चिमी भारतशास्त्रियों की अकादमिक कसौटी में सिर्फ़ हिंदी का ज्ञान काफ़ी नहीं होता।
बाद में इसका नतीजा था : "अनुतीर्ण" और "प्रबंध को जर्मन में लिखिए" कर दिया मैंने। अपना प्रबंध दूसरी बार लिखा। सचमुच एक उत्तम प्रबंध लिखा मैंने। पहला ग्रेड था 2.3 और दूसरा 2.7। 2.3 तो अन्याय था ही, पर 2.7 की क्या औक़ात होती है? 2.7 का जो प्रमाणपत्र मिला, उसमें झूठ ही झूठ थे। दूसरी परीक्षिका शेट्लिश को तो हिंदी आती ही नहीं। वह संस्कृत की विशेषज्ञा है। उन दिनों (2013-2014) हिंदी की शिक्षिका डॉ. शर्मा काफ़ी बीमार थी। संस्थान में यही दो अनपढ़ कमीनियाँ थीं। अफ़सोस है कि इससे बेहतर शब्द मैं इनके बारे में नहीं लिख सकता। (वास्तव में लार्स ने जो शब्द जर्मन में इस्तेमाल किया है, वह इससे भी अधिक कड़ा है। अ.मे.)
मुझे बहुत धक्का लगा। तो जर्मनी में पढ़ा-लिखा कर भारतशास्त्री इस तरह तैयार किये जाते हैं। किसी भी भारतशास्त्री ने इस चीज़ का ख्याल नहीं किया कि मास्टर्स की डिग्री के लिए मुझे एक और मुख्य विषय में भी उतीर्ण होना था (पुर्तगाली भाषाशास्त्र में भी मुझे कोई बढ़िया अनुभव नहीं हुए)। और अभी भारतविद्या की अंतिम परीक्षा मेरे सामने मुंह बाए खड़ी थी। अंतिम परीक्षा का परिणाम मैं अन्यायी, अयोग्य लोगों के हाथ में नहीं छोड़ना चाहता था। मेरे साथ बुरा से बुरा किया जा सकता था। लेकिन इसके बिना मैं यूनिवर्सिटी छोड़ भी नहीं सकता था। मैंने फिर तकरीबन पूरा एक साल पुराने प्रोफ़ेसरों के रिटायर होकर गुम होने और नए प्रोफ़ेसरों के संस्थान में आने का इंतज़ार किया। इस बीच कभी डॉ. शर्मा स्वस्थ हो चुकी थीं और सचमुच नए लोग भी आ गए। मेरी अच्छी किस्मत! परीक्षा के अंतिम परिणाम में मेरा ग्रेड था : 1.5.
मेरे तथा भारतविद्या संस्थानों की स्थिति के बारे में इतना काफ़ी है। जर्मनी में भारतविद्या की हालत ख़राब है। वास्तव में बर्लिन में तो कुछ बचा नहीं है (आम बात है, बर्लिन बस राजधानी ही बन कर रह गई है...), और बाकी सब अफ़सोस मना रहे हैं।
और अब मैं फिर भ्रष्टाचार पर आता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ : दूर से देखने पर भारत में भ्रष्टाचार इतना खास नहीं लगता। मेरे मत से इंडोनेशिया में हालात इससे भी बदतर हैं।
फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले का उदाहरण ले लें : इस वर्ष इंडोनेशिया अतिथि राष्ट्र था। 2006 में भारत था।
भिन्नता : तब कुछ ठोस हुआ था। उदाहरणतया अलका सरावगी की पुस्तक "कोलकाता बायपास" का मार्गोट गात्स्लाफ़ द्वारा किया गया जर्मन अनुवाद प्रकाशित हुआ था। हाइडलबर्ग में द्रौपदी प्रकाशन की स्थापना हुई थी। उनका दायरा कुछ ऐसा है, जो मुझे पसंद नहीं है। लेकिन उनके द्वारा प्रकाशित की गई कई पुस्तकें सचमुच पढ़ने लायक हैं। सच्चिदानंदन को शायद उनसे कुछ मिला नहीं।
अपनी पत्रिका के हर अंक में आप इस अफ़सरशाही गंदगी से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसा कुछ कभी आसान नहीं होता और कभी आसान नहीं होगा। मैं श्रद्धा से आपके समक्ष नतमस्तक होता हूँ। जब मैं पढ़ता हूँ तो मुझे जानकर ख़ुशी होती है कि आप अपने काम में कितना खून-पसीना एक करते हैं। मुझे ख़ुशी होती है, जब आप बच्चियों द्वारा किये गए परीकथाओं के अनुवाद की प्रशंसा करते हैं, जैसा कि मैंने गत अंक में पढ़ा है। सच में कहें तो सबसे ज़्यादा मुश्किलों का सामना नौसिखियों को करना पड़ता है और उन्हें प्रोत्साहन तथा सहायता की ज़रूरत होती है। मुझे स्वयं को ऐसे अनुभव न के बराबर हुए हैं।
जिस गिरोह का ज़िक्र लार्स ने जर्मन सन्दर्भ में किया है, उसका समानांतर एक उससे बड़ा गिरोह भारत में हिंदी की मिट्टी बरसों से पलीत कर रहा है। ऐसा नहीं है कि इन दोनों गिरोहों का परिचय आपस में नहीं है, बल्कि ये दोनों गिरोह मिल कर वो सब करते रहे हैं, जिनके भारत तथा जर्मनी में एक जैसे उदाहरण मौजूद हैं। जैसे जर्मनी के हिंदी के प्रोफ़ेसर योजनाबद्ध प्रणाली से मेधावी छात्रों के पनपने की कोई राह नहीं छोड़ते, वैसे ही भारत में भी ऐसे जर्मन के प्रोफ़ेसर हैं, जिन्होंने कई होनहार छात्रों की ज़िन्दगियाँ बरबाद की हैं। और इसी किस्म के हाइडलबर्ग के प्रोफ़ेसरों तथा कुछ जाने-माने हिंदी लेखकों की मिलीभगत से हिंदी के सर पर अंग्रेज़ी तथा संस्कृत के सर पर जर्मन को बिठाने के भी घोर प्रयास किये गए हैं और अंशतः सफल भी हुए हैं।
मान्यवर लोथार लुत्से, जिनका ज़िक्र लार्स ने अपने मेल में किया है, वह इन्हीं हस्तियों को हस्तियाँ बना गए, और इन हस्तियों द्वारा की गई इनकी अनुशंसा के सदके वह भारत में पद्मश्री से भी सम्मानित होकर गए। जैसे जर्मनी के हिंदी के प्रोफ़ेसर योजनाबद्ध प्रणाली से मेधावी छात्रों के पनपने की कोई राह नहीं छोड़ते, वैसे ही भारत में भी ऐसे जर्मन के प्रोफ़ेसर हैं, जिन्होंने कई होनहार छात्रों की ज़िन्दगियाँ बरबाद की हैं। गुलाब सिंह भाटी, जिन्होंने एक श्रमसाध्य एवं अतुल्य जर्मन-हिंदी मुहावरा-कोष अस्सी के दशक में प्रकाशित किया था, और "जो" जैसे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के जर्मन सेंटर के अनेकों भूतपूर्व छात्र हैं, जो एक वृहत जेएनयू-उत्पीड़ित क्लब की स्थापना कर सकते हैं।
यह सर्वविदित है कि अपनी मातृभाषा में ही साहित्यिक अनुवाद किये जा सकते हैं, लेकिन भारत आये भारतविदों ने न केवल भारतीय तिकड़मबाज़ अनुवादकों के साथ मिलकर हिंदी से जर्मन में अनुवाद किये, बल्कि जर्मन से हिंदी में भी कर डाले। धन जर्मन तथा भारतीय संस्थाओं का, दोनों देशों के करदाताओं का, लगा और ये लोग यश लूटते रहे। जिसने इनकी सच्चाई बताने की कोशिश की, उसे हर साहित्यिक, अकादमिक तथा बुद्धिजीवी दायरे से बहिष्कृत किया गया।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^