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हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह
01-May-2019 04:25 PM 1654     

नामवर सिंह असाधारण प्रतिभा संपन्न आलोचक थे। असाधारण इसलिए कि उनकी पुस्तक "बकलम खुद" 1951 में छपी जब वे सिर्फ 24 साल के थे। "हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग" 1952 में छपी जब वे 25 साल के थे, "आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँँ" 1954 में छपी जब वे 27 साल के थे और उनकी बहुचर्चित पुस्तक "छायावाद" 1955 में छपी जब उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष की थी। बतौर काशीनाथ सिंह उन्होंने "छायावाद" पुस्तक मात्र ग्यारह दिनों में लिखकर पूरी की थी। इसी तरह उन्होंने "पृथ्वीराज रासो की भाषा" अट्ठारह दिनों में और "दूसरी परंपरा की खोज" भी दस-बारह दिनों में ही लिखी थी। जीयनपुर के गंवई परिवेश से काशी में आकर और भयंकर आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए इतनी कम उम्र में ऐसी ऐतिहासिक कृतियों का लेखन सामान्य प्रतिभा के वश की बात नहीं है।
नामवर सिंह ने "छायावाद" नामक पुस्तक लिखकर हमें छायावाद की विशेषताओं से परिचित कराया और उसके सकारात्मक मूल्यों को रेखांकित किया। अपनी उक्त पुस्तक में उन्होंने छायावाद की सामान्य प्रवृतियों का विश्लेषण किया और छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों- प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा- की काव्यगत विशेषताओं पर भी व्यापक रूप से प्रकाश डाला। उन्होंने छायावाद को सामाजिक विकास क्रम में रखकर उसके प्रगतिशील तत्वों को रेखांकित किया। यह पुस्तक इतनी लोकप्रिय हुई कि 1968 में जब उसका दूसरा संस्करण आया तो उसके फ्लैप पर विज्ञप्ति छपी, "यह पुस्तक दृष्टि की मौलिकता, विवेचन की स्पष्टता तथा आलोचना शैली की सर्जनात्मकता के लिए पिछले दशक की सबसे लोकप्रिय पुस्तक रही है।"
आर्थिक तंगी के बावजूद नामवर सिंह में स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ था। संघर्ष से कभी न थकने वाली क्षमता थी। वे काशी, सागर, जोधपुर आदि से होते हुए अंत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में आए और वहाँ अपनी प्रतिभा और क्षमता का भरपूर इस्तेमाल किया। जेएनयू में आने के बाद उनका महत्व तेजी से बढ़ा। अपने जेएनयू को सुयोग्य शिक्षकों और आवश्यक संसाधनों से समृद्ध किया ही, दिल्ली के अलावा हिन्दी के दो बड़े केन्द्रों काशी और इलाहाबाद में भी उनके रिश्तेदार, शिष्य और अनुयायी बड़ी संख्या में सम्मान जनक जगह बनाने में सफल हुए। कहा जा सकता है कि अब हिन्दी जगत में नामवर जी की तूती बोलने लगी। उनके अवकाश ग्रहण करने के भी लगभग एक दशक बाद देश के प्राय: सभी बड़े शहरों में उनके शिष्यों और अनुयायियों ने "नामवर के निमित्त" के आयोजन किए। नामवर सिंह की स्थापनाओं की प्रतिष्ठा में उनके इस प्रभामंडल की महती भूमिका है। अकारण नहीं है कि राजेन्द्र यादव ने काशीनाथ सिंह की पुस्तक "घर का जोगी जोगड़ा" के विषय में लिखा है, "अगर ऐसी कलम हो तो हिटलर को भी भगवान बुद्ध का अवतार बनाकर पेश किया जा सकता है।" ("घर का जोगी जोगड़ा" के फ्लैप से)। राजेन्द्र यादव का यह कथन काशीनाथ सिंह की लेखनी पर तो बेहतरीन टिप्पणी है ही, नामवर सिंह के कृतित्व पर भी एक टिप्पणी है।
नामवर सिंह से संबंधित उक्त यथार्थ की ओर मुझे इसलिए संकेत करना पड़ रहा है क्योंकि मैं उनकी आलोचना के कुछ स्याह पक्ष की ओर भी संकेत करना चाहता हूँ। अमूमन नामवर सिंह के विषय में उनके उजले पक्ष पर ही लिखा गया है। हिन्दी आलोचना को उनके ऐतिहासिक योगदान के लिए मैं भी उनका कायल हूँ किन्तु, यह भी सच है कि अपनी असाधारण प्रतिभा और आलोचना-क्षमता का उपयोग करते हुए नामवर सिंह ने हिन्दी कविता के स्वाभाविक प्रवाह को गलत दिशा में मोड़ दिया, हिन्दी कविता उनकी समीक्षा-दृष्टि की अनुगामिनी हो गई और उससे हिन्दी कविता की अपूरणीय क्षति हुई।
नामवर सिंह की पुस्तक "छायावाद" की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। जिस जमाने में छायावादी कविता लिखी जा रही थी वह दौर राष्ट्रीय चेतना धारा की कविता का भी था। हिन्दी में छायावाद और भारत की राजनीति के रंगमंच पर महात्मा गाँधी का आना लगभग एक साथ हुआ। यह वही समय है जब हिन्दी कविता को मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामेश्वर शुक्ल अंचल, सियारामशरण गुप्त आदि कवि समय की मांग के अनुकूल राष्ट्रीय चेतना से संपन्न कविताओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर रहे थे, देश की जनता को जगा रहे थे और आजादी की लड़ाई में प्रकारान्तर से अपनी हिस्सेदारी निभा रहे थे। उस समय की यही मांग थी। यह सही है कि छायावाद में भी बन्धनों से मुक्ति की आकाँक्षा है लेकिन उसमें पलायन भी है और व्यक्तिवाद भी। राष्ट्रीय चेतना धारा की कविताओं में व्यक्तिवाद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। महान व्यक्ति वह होता है जो इतिहास की स्वाभाविक दिशा को पहचान सके और उसे गति देने में अपनी समुचित भूमिका निभा सके। छायावाद के साथ ही नामवर सिंह ने यदि उस दौर की राष्ट्रीय चेतना धारा की कविता को भी पर्याप्त महत्व दिया होता और उसी स्तर की किसी पुस्तक का प्रणयन करके उसे भी प्रतिष्ठित किया होता तो हिन्दी कविता के विकास की दिशा कुछ भिन्न होती। नामवर सिंह ने हिन्दी की इस स्वाभाविक काव्यधारा की उपेक्षा की और उसके बरक्स छायावाद को प्रतिष्ठित किया। इसका दूरगामी प्रभाव हिन्दी की काव्य परंपरा पर पड़ा।
"कविता के नए प्रतिमान" नामक पुस्तक की भूमिका हिन्दी कविता के लिए और अधिक घातक साबित हुई। इस पुस्तक में नामवर सिंह ने कविता के जिन नए प्रतिमानों को रेखांकित किया है उनकी दृष्टि में वे यथार्थवादी कविता के प्रतिमान हैं। इस पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं, "कविता के नए प्रतिमान के केन्द्र में मुक्तिबोध हैं...। इस पुस्तक का आधार यह धारणा है कि नयी कविता में मुक्तिबोध की स्थिति वही है जो छायावाद में निराला की थी। निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपने युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उनकी सीमा को चुनौती देकर उस सर्जनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन संभव हो सका।" (कविता के नए प्रतिमान, भूमिका)
नामवर सिंह ने अपनी इस पुस्तक में काव्य-भाषा की विशिष्टता, काव्य- बिम्ब और सपाटबयानी, नाटकीय काव्य- संरचना, विसंगति और विडंबना, अनुभूति की जटिलता और तनाव तथा ईमानदारी और प्रामाणिक अनुभूति को कविता के नए प्रतिमान माना है। उन्होंने उनका कहीं सैद्धांतिक और कहीं व्यावहारिक रूप से विवेचन किया है और हिन्दी आलोचना में उन्हें स्थापित करने का प्रयास किया है। ये प्रतिमान रूप से भी संबंधित है और वस्तु से भी। निश्चय ही नामवर जी की यह विशेषता है कि उन्होंने किसी प्रतिमान का विवेचन स्वतंत्र रूप से नहीं किया है। रूपगत और वस्तुगत प्रतिमानों का अत्यंत सफल विवेचन वे इसलिए कर सके हैं कि उन्होंने इन दोनों के द्वंद्वात्मक संबंध को समझा है। निश्चय ही यह द्वंद्वात्मक दृष्टि माक्र्सवाद की देन है। पुस्तक के अंत में उन्होंने मुक्तिबोध की मशहूर कविता "अँधेर में" का विश्लेषण भी किया है।
बहरहाल, इस पुस्तक में वे पूरी तरह नयी कविता के पक्ष में खड़े दिखायी देते हैं और छायावादी दृष्टि और संस्कारों की आलोचना करते हैं। प्रगतिवाद के जो तत्व छायावाद के तत्वों से जुड़ते हैं उनकी चर्चा वे छोड़ देते हैं और उन पक्षों को उठाते हैं जिनकी आलोचना नई कविता के पक्ष में जाती है।
नामवर सिंह के चतुर्दिक व्याप्त व्यापक प्रभा-मंडल के बावजूद उनकी इस पुस्तक की सर्वत्र प्रशंसा नहीं हुई। उनकी स्थापनाओं के प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं भी आयीं। जिम्मेदार, समझदार और निर्भीक लेखकों ने "कविता के नए प्रतिमान" के दूरगामी दुष्प्रभाव की ओर नामवर सिंह का ध्यान आकृष्ट किया और उन्हें सचेत किया। नेमिचंद्र जैन ने लिखा कि, "नामवर सिंह का विश्लेषण उस प्रवृत्ति को समर्थन देता जान पड़ता है जो कहता है कि कविता की दुनिया एक स्वायत्त दुनिया है। जिसका मूल्यों से, किसी सामाजिक सार्थकता से कोई संबंध नहीं।" (उद्धृत, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण की भूमिका से)
नामवर सिंह ने दूसरे संस्करण की भूमिका में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए अपनी स्थापनाओं को न्याय संगत ठहराने का प्रयास किया है। कोई भी ईमानदार औ तटस्थ पाठक समझ सकता है कि उनके पक्ष कितने लचर हैं। नामवर सिंह लिखते हैं, "इस पुस्तक से कुछ मित्रों को रूपवादी झुकाव की शिकायत है। खासतौर से उन्हें जो मुझसे सुसंगत माक्र्सवादी आलोचना दृष्टि की अपेक्षा रखते हैं। इस दृष्टि से सबसे पहले विचारणीय है श्री नेमिचंद जैन की समीक्षा, जो 12 जनवरी 1969 के "साप्ताहिक हिन्दुस्तान" में "प्रायदृष्टि" स्तंभ के अंतर्गत "कविता के प्रतिमानों की खोज" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। नेमि जी की जो बात बहुत अजीब लगी वह है, "माक्र्सवादी नामवर सिंह का सर्वथा रूपवादी आलोचना-दृष्टि की ओर क्रमश: झुकाव।" (कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण की भूमिका)
नामवर सिंह को नेमिचंद्र जैन की प्रतिक्रिया "अजीब" लग सकती है किन्तु आज लगभग आधी सदी बाद इतिहास ने प्रमाणित कर दिया है कि नेमिचंद्र जैन की प्रतिक्रिया बिलकुल सही थी। नामवर सिंह ने कविता के जिन प्रतिमानों की खोज की, उन प्रतिमानों के सहारे विकसित हुई नई कविता और उसके प्रतिनिधि कवि मुक्तिबोध कभी भी बहुसंख्यक समाज में स्वीकृत नहीं हो सके। हिन्दी समाज में मुक्तिबोध की पहचान एक जटिल कवि के रूप में हो चुकी है और उनकी तुलना में नागार्जुन ज्यादा लोकप्रिय और जनपक्षधर कवि के रूप में पहचाने जाते हैं। यहां तक कि मुक्तिबोध की जिस प्रसिद्ध कविता "अंधेरे में" की विस्तृत व्याख्या खुद नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक में की है और पुस्तक के दूसरे संस्करण में दुबारा उसकी व्याख्या की है, उसकी बाद में भी लगभग एक दर्जन आलोचकों ने व्याख्याएं की हैं। तब भी वह कविता पाठकों को ठीक से समझ में नहीं आती। यह उस कविता की दशा है जो बकौल नामवर सिंह नई कविता की चरम उपलब्धि है। "अँधेरे में" मुक्तिबोध के प्रतिनिधि काव्य संकलन "चाँद का मुंह टेढ़ा है" की ही अन्तिम कविता नहीं, कदाचित उनकी अन्तिम रचना भी है जिसे कवि-कर्म की चरम परिणति भी कहा जा सकता है। कुल मिलाकर इसे यदि नई कविता की भी चरम उपलब्धि कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी।" (कविता के नए प्रतिमान, पृष्ठ- 230)
मुक्तिबोध और नागार्जुन की कविता की भिन्न बनावट और भिन्न जमीन की हकीकत को स्वयं नामवर सिंह भी स्वीकार करते हैं। "पूर्वग्रह" के एक अंक में उन्होंने लिखा है, "नागार्जुन, त्रिलोचन आदि ठेठ भारतीय कवियों की रचनाओं का सिंहावलोकन करता हूं तो लगता है कि ये कविताएं काव्य-चिंतन के एक अन्य ढांचे की अपेक्षा रखती हैं, मुक्तिबोध केन्द्रित कविता के नए प्रतिमान से यह ढांचा निश्चय ही भिन्न होगा।" (पूर्वग्रह, 44-45) और बाद में यह "भिन्न ढाँचा" ही वास्तव में हिन्दी कविता के स्वाभाविक विकास की दिशा तय करने वाला ढाँचा प्रमाणित हुआ।
आज हिन्दी कविता की स्वाभाविक परंपरा नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और उन तमाम गीतकारों की है जिनकी लोक में तो खूब स्वीकृति है किन्तु हिन्दी के पाठ्यक्रमों से लेकर सम्मानों-पुरस्कारों की दुनिया से वे अधिकतर बाहर हैं। इतिहास की पुस्तकों में भी उनका उल्लेख उपेक्षा के साथ किया जाता है। दुष्यंत कुमार जैसे श्रेष्ठ गजलकार को हिन्दी साहित्य के इतिहास में भी मुश्किल से जगह मिल पाती है। हिन्दी के पाठ्यक्रमों से वे अमूमन गायब हैं।
कविता के नए प्रतिमानन द्वारा स्थापित हिन्दी कविता की परंपरा से आज गीत यदि बहिष्कृत हैं, गजलों की चर्चा नहीं होती तो उसी सीमा तक लोक ने भी इस नई कविता से तौबा कर लिया है। कवि-सम्मेलन, जो कभी श्रेष्ठ कविता की कसौटी हुआ करते थे, निराला, नागार्जुन जैसे कवि मंच से कविता पढ़कर अपनी धाक जमा लेते थे, आज उन मंचों पर भद्दे हास्य करने वाले भड़ैतों का कब्जा हो चुका है। न तो श्रेष्ठ कवि वहां कविता पढ़ने जाते हैं और न तो गंभीर श्रोता कविता सुनने ही। आखिर उर्दू कविता में यह विभाजन क्यों नही हो पाया? अली सरदार जाफरी, कैफी आजमी, जावेद अख्तर, निदा फाजली जैसे शायर फिल्मों में भी लिखते हैं, मुशायरों में भी पढ़ते हैं और पाठ्यक्रमों में भी पढ़े-पढ़ाए जाते हैं। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि हिन्दी कविता की आज की इस दुर्दशा के पीछे नामवर सिंह की पुस्तक "कविता के नए प्रतिमान" की भी खास भूमिका है। "कविता के नए प्रतिमान" वास्तव में हिन्दी की लोकधर्मी कविता की हत्या के प्रतिमानों की खोज साबित हुई।
कविता के बाद नामवर सिंह ने कहानी में दिलचस्पी दिखायी है। "कहानी : नयी कहानी" नामक पुस्तक की भूमिका में वे लिखते है, "हिन्दी आलोचना जो अभी तक काव्य-समीक्षा रही है, कविता से इतर कथा, नाटक आदि साहित्य रूपों का विधिवत विश्लेषण करके ही अपने को सुसंगत एवं समृद्ध बना सकती है...। इसीलिए मेरे निकट उनका महत्व केवल कहानियों की समीक्षा तक सीमित न होकर एक व्यापक समीक्षा पद्धति के निर्माण की दिशा में है।" निस्संदेह नामवर सिंह की कहानी संबंधी आलोचना, हिन्दी आलोचना की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी लिखा है कि उनकी आलोचना का सबसे मजबूत पक्ष कथा आलोचना ही है। इनके पहले हिन्दी में कहानी आलोचना सतही थी।
"दूसरी परंपरा की खोज" पुस्तक की स्थापनाएं भी कम विवादास्पद नहीं हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को दूसरी परंपरा का आलोचक सिद्ध करते हुए नामवर जी लिखते हैं, "द्विवेदी जी ने कम से कम हिन्दी में रवीन्द्रनाथ की प्रेरणा से वह दिया जो उनसे पहले किसी ने नहीं दिया था। मिसाल के लिए कबीर का क्रान्तिकारी रूप, कबीर के माध्यम से जाति धर्म निरपेक्ष मानव की प्रतिष्ठा का श्रेय तो द्विवेदी जी को ही है। एक प्रकार से यह दूसरी परंपरा है।" (दूसरी परंपरा की खोज, पृष्ठ-15)
इस विषय पर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की टिप्पणी को उद्धृत करना यथेष्ट होगा, "इस पुस्तक के पाठक को साफ लगेगा, नामवर जी ने आचार्य शुक्ल के कमजोर पक्ष को ही सामने रखने की कोशिश की है और तुलना में द्विवेदी जी के चमकीले पक्ष को। नामवर जी की आलोचना की यह एक कमजोरी है कि वे जब जिस लेखक को उठाना चाहते हैं, उसकी चमकीली झांकियां प्रस्तुत करते हैं और उसी के अनुरूप अपना तर्कशास्त्र गढ़ लेते हैं और उसकी तुलना में जिन लेखकों पर प्रहार करना चाहते हैं उनके कमजोर स्थलों को उद्धृत कर व्यंग्य कटाक्ष करने लगते हैं।" (नामवर के विमर्श, पृष्ठ-272) आगे चलकर अपनी बात स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं, "नामवर जी की दूसरी परंपरा की कसौटी एक शब्द में कहें तो लोक धर्मिता है। द्विवेदी जी का अपने लोक जीवन से लगाव है। इसीलिए वे दूसरी परंपरा के हैं। क्या लोक जीवन का यह लगाव शुक्ल जी में कम था?" (वही, 273) निस्संदेह आचार्य द्विवेदी और शुक्ल जी की परंपरा इतनी भिन्न नहीं है। बल्कि मेरी दृष्टि में आचार्य द्विवेदी की आलोचना वस्तुत: आचार्य शुक्ल की आलोचना का ही अगला विकास लगता है। द्विवेदी जी ने शुक्ल जी की आलोचना परंपरा को और अधिक समृद्ध किया है।
कहना न होगा कि नामवर सिंह की आलोचना में अन्तर्विरोध भी कम नहीं है। माक्र्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा पर उनके दो बहुचर्चित निबंध इसके प्रमाण हैं। एक रामविलास शर्मा के जीवन काल में प्रकाशित "केवल जलती मशाल" और दूसरा उनके निधन के तत्काल बाद "इतिहास की शव साधना"। उनकी आलोचना पद्धति के विषय में कर्मेन्दु शिशिर की टिप्पणी है, "नामवर सिंह ने जहां भी हस्तक्षेप किया है, वह चाहे जितना संक्षिप्त हो, कोई न कोई नई बात, नई दृष्टि अथवा उसे देखने समझने का नया नजरिया जरूर मिल जाएगा। चाहे वे कबीर पर लिख रहे हों अथवा मैथिलीशरण गुप्त पर। नई कविता से समकालीन कविता के बीच कविता के नए प्रतिमान को अगर अपवाद मानें, तो वे समग्र कालखंड के व्यवस्थित मूल्यांकन की कभी कोई कोशिश ही नहीं करते। दरअसल ऐसी उनकी प्रकृति ही नहीं रही। इसलिए समकालीनता के दीर्घ विचार विस्तार में संभव है आपको उनमें एकसूत्रता का अभाव मिले और अंतर्विरोध भी।" (पाखी, अक्टूबर 2010, पृष्ठ-65)
बावजूद इसके आलोचना के प्रति अपनी व्यापक दृष्टि का परिचय देते हुए नामवर सिंह लिखते हैं, "वस्तुत: साहित्य में राजनीतिक मतभेदों को अनावश्यक तूल देने वाले वामपंथी लेखक यह मोटी-सी बात भूल जाते हैं कि माक्र्सवाद केवल एक राजनैतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक विश्व-दृष्टि है- राजनीति जिसका एक पक्ष है, निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष। यह विश्व-दृष्टि लेखक को अपने समय की वास्तविकता को उसकी समग्र जटिलता के साथ समझने में सहायक होती है। इसलिए लेखकों के बीच कायदे से विश्व-दृष्टि पर बहस होनी चाहिए, राजनीतिक लाईन पर नहीं।" (आलोचना, अप्रैल-जून, 74)
नामवर सिंह के अध्ययन का क्षेत्र विशाल है। साहित्य की समीक्षा के लिए वे इतिहास, समाजशास्त्र, दर्शन आदि का अध्ययन आवश्यक समझते है। दुनिया भर के नए विमर्शों और नवीनतम अवधारणाओं से वे अपने को जोड़े रखते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने माक्र्सवादी समीक्षा को अधुनातन साहित्य चिंतन से जोड़ा।
वाचिक परंपरा के आलोचक के रूप में भी उनकी ख्याति है। उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों में, "छायावाद", "इतिहास और आलोचना", "कहानी : नयी कहानी", "कविता के नए प्रतिमान", "आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियांं", "दूसरी परंपरा की खोज", "वाद विवाद संवाद" प्रमुख हैं। "हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग" तथा "पृथ्वीराज रासो की भाषा" उनकी शोध परक पुस्तकें हैं। "कहना न होगा" तथा "बात बात में बात" उनके साक्षात्कार हैं। आशीष त्रिपाठी के संपादन में आय़ी उनकी आठ किताबों की श्रृंखला क्रमश: "कविता की जमीन और जमीन की कविता", "हिन्दी का गद्यपर्व", "प्रेमचंद और भारतीय समाज", "जमाने से दो दो हाथ", "साहित्य की पहचान", "आलोचना और विचारधारा", "सम्मुख, और "साथ साथ" प्रकाशित है। जेएनयू के क्लास नोट्स भी उनके तीन छात्रों ंशैलेश कुमार, मधुप कुमार और नीलम सिंह ने मिलकर "नामवर के नोट्स" शीर्षक से संपादित किया है। नामवर सिंह ने "जनयुग" साप्ताहिक और "आलोचना" (त्रैमासिक) का लम्बे समय तक संपादन किया है।
नामवर सिंह हिन्दी के अकेले ऐसे आलोचक हैं जिनके जीवन काल में ही उनके साहित्यिक अवदान का आकलन करने वाले अनेक ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें रणधीर सिन्हा द्वारा संपादित "आलोचक नामवर सिंह", सुधीश पचौरी द्वारा संपादित "नामवर के विमर्श", कमला प्रसाद, सुधीर रंजन सिंह और राजेन्द्र शर्मा द्वारा संपादित "नामवर सिंह : आलोचना की दूसरी परंपरा", भारत यायावर द्वारा संपादित, "आलोचना के रचना पुरुष : नामवर सिंह", श्रीप्रकाश शुक्ल की कृति "नामवर की धरती", सुमन केसरी द्वारा संपादित "जे.एन.यू. में नामवर सिंह" तथा "पहल", "पूर्वग्रह", "दस्तावेज", "पाखी" व "बहुवचन" जैसी पत्रिकाओं के नामवर सिंह पर केन्द्रित विशेषांक उल्लेखनीय हैं।
नामवर सिंह की आलोचना पद्धति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए नंदकिशोर नवल लिखते हैं, "नामवर जी की आलोचना शैली माक्र्सवादी है और उसी के अनुरूप वह पूर्ववर्ती आलोचना के उन सभी औजारों को काम में लाती है जो आज भी साहित्य की व्याख्या और मूल्यांकन की दृष्टि से उपयोगी है। उनकी आलोचना हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना की महत्वपूर्ण कड़ी है। स्वभावत: वह आचार्य रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा की विरासत को समेट कर चलती है। नामवर जी की आलोचना की भाषा सामान्य भाषा का ही एक उन्नत रूप है, पर उसमें शास्त्र-ज्ञान और तज्जनित गंभीरता छिपी हुई है। उसमें सादगी और पैनापन तो है ही, गजब की हार्दिकता है जो साहित्य के प्रति उनकी गहरी आत्मीयता की देन है। हिन्दी में पिछले दिनों सृजनात्मकता की बहुत चर्चा हुई है। नामवर जी की आलोचना शास्त्रीय आलोचना की तरह व्यवस्थित, सांगोपांग और तार्किक परिणतियों तक जाने वाली और सृजनात्मक आलोचना की तरह मौलिक और नवीन है।" (हिन्दी आलोचना का विकास, पृष्ठ 374)
नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष के रूप में ख्यात हैं। उनकी इस प्रतिष्ठा के पीछे उनके लेखन के अतिरिक्त उनकी वक्तृत्व कला, उनकी अध्यापन शैली, उनकी शिक्षण संस्था, उनकी मित्र-मंडली और उनके शिष्यों की विशाल सेना है। नामवर सिंह को वाचिक परंपरा का आचार्य कहा जाता है। उनकी वक्तृत्व कला से हिन्दी की सामथ्र्य का बोध होता है। एक अध्यापक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा का जिक्र करते हुए उनके ही एक छात्र डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है, "बेहद विद्यार्थीप्रिय अध्यापक थे। उनकी क्लास खचाखच भरी रहती थी। जिधर से निकलते नामवर जी जा रहे हैं, नामवरजी जा रहे हैं की फुसफुसाहट होती।" इसी तरह के विचार उनके एक दूसरे छात्र और प्रख्यात ललित निबंधकार डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र का भी है जिसे उन्होंने मुझसे एक दिन बतकही में व्यक्त किया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का भारतीय भाषा केन्द्र एक जमाने में देश के हिन्दी विभागों के लिए एक मॉडल के रूप में प्रसिद्ध था। आज भी हिन्दी-उर्दू का एक ही संयुक्त विभाग देश में शायद दूसरा नहीं है। इसकी परिकल्पना नामवर जी की ही है। इस विभाग में नामवर जी के अलावा केदारनाथ सिंह, मैनेजर पाण्डेय, वीरभारत तलवार, पुरुषोत्तम अग्रवाल जैसे अध्येताओं और समीक्षकों ने समृद्ध किया तो इसके पीछे नामवर जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नामवरजी की मित्र-मंडली में साहित्य के प्राचीन केन्द्र काशी और आधुनिक केन्द्र दिल्ली दोनों के महारथी रहे हैं। उनके प्रिय और सुयोग्य शिष्य तो देशभर में फैले हुए हैं। नामवर जी की प्रतिष्ठा में इन सबकी भूमिका है।
नामवर सिंह द्वारा "आलोचना" पत्रिका का लम्बे समय तक संपादन करना भी एक ऐतिहासिक कार्य माना जाएगा। इस पत्रिका ने आलोचना के क्षेत्र में कई प्रतिमान बनाए, कई आलोचकों को प्रतिष्ठित किया। किन्तु सहाराश्री के अखबार "राष्ट्रीय सहारा" से जुड़ने और बिहार के एक अपराधी प्रवृत्ति के नेता की पुस्तक का विमोचन करने जैसे कार्यों के लिए उन्हें खरी- खोटी भी सुननी पड़ी।

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