ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सम्भाल पैबंद
01-May-2019 06:31 PM 1984     

सम्भाल

ठेले पर बिकते छोटे बड़े झुमके
खरीदने का बहुत शौक था मुझे
वैसे ही जैसे
किराने की दुकान पर
मिलने वाले लोगों से बतियाने का

विदेश में ना तो ठेले लगते है
ना ही किराने की दुकानें मिलती हैं

पुरानी झुमकियों की पिटारी खोलती हूँ
तो दिखाई देते हैं कई अकेले झुमके
जिनके जोड़ीदार गिर गए कभी शॉल में फँसकर
या उड़ गए तेज़ हवा के साथ

कई बार बताती हैं सखियाँ
कि ठेले पर बिकने वाले झुमकों में
पेच नहीं मिलते
इसलिए जाना चाहिए मुझे बड़ी दुकानों पर
कई बार पूछती हैं मुझसे कि
क्यों सम्भाले हैं अभी तक
ये बिन जोड़ी के झुमके

मुस्कुरा देती हूँ बस कुछ कह नहीं पाती
क्योंकि मैंने तो सम्भाल रखी हैं
कई बिन पेच की आवारा-सी यादें
कई बिन जोड़ीदार के अकेले से सपने
कई किराने की दुकान पर बने बेनाम से रिश्ते

जब इतना कुछ सम्भाला है तो
कैसे फेंक दूं ये ठेले से खरीदे अल्हड़ झुमके?


पैबंद

माँ ने बताया था
लगा लेना पैबंद फटे कपड़े पर
और टूटते रिश्तों पर भी

पैबंद लगाने से बच तो गए
कुछ कपड़े और रिश्ते भी

लेकिन पैबंदों की मौजूदगी ने
कभी भूलने न दिया कि
इनके नीचे से कपड़ा फटा है
और रिश्ता टूटा ही है।

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