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हम-तुम आज़ादी वो मैं हूं
01-Dec-2017 10:10 PM 3544     

हम-तुम

होश में कैसे रहते आपकी नज़र में रहे
किया तो कुछ भी नहीं फिर भी हम ख़बर में रहे
ग़रीब गाँव का दुख हमसे तो देखा न गया
तमाम ज़िंदग़ी हम इसलिए शहर में रहे
जिन्हें न तुक का पता है न ख़बर लय की है
मगर वो कह रहे ग़ज़ल को कि बहर में रहे
हमको मंदिर में न मस्जिद में नींद आती है
इसलिए रात को हम अपने-अपने घर में रहे

किसी की एक तीली से घरों में आग लगी
तुम्हारे डर में हम और तुम हमारे डर में रहे
किसी के दिल में अपना एक घर बना न सके
कभी अगर में रहे हम कभी मगर में रहे
राह मिलती ज़रूर ढूँढ़ते अगर मंज़िल
हम उम्रभर न जाने कौन से सफ़र में रहे
हमको नफ़रत है फ़ासले से किनारे से नहीं
तुम्हारे साथ रहे जब भी हम लहर में रहे।

आज़ादी

बड़ा बेशर्म है पर वो भी बहुत शरमाया
लुटेरा उससे बड़ा जब भी सामने आया।
उसने फिर प्यार दिखाया नये तरीके से
देश को मुँह में रखा, चूसा, खूब चुभलाया।
वो सेमिनार में बोलेगा जल समस्या पर
आज जल्दी में घर के नल को खुला छोड़ आया।
अघाए लोगों ने फिर खूब रोटियां सेंकीं
मामला भूख से हुई मौत का फिर गरमाया।
छोड़ो दुनिया की फ़िक्र अपने घर की फ़िक्र करो
बाप ने बिगड़े हुए बेटे को फिर समझाया।
उसे भी आसमान छूने की चाहत होगी
पुराने रिश्तों की ज़ंजीर वो भी तोड़ आया।
मुश्किलें और बढ़ीं और बढ़ीं और बढ़ीं
आदमी अपनी मुश्किलों से जब भी घबराया।

वो मैं हूं

ठोकरें खाता हुआ बढ़ता रहा वो मैं हूं
सलीब रोज़ नई चढ़ता रहा वो मैं हूं
तेरी आंखों में उम्मीदों का एक समंदर है
उसी में डूबता उभरता रहा वो मैं हूं
मिला न अब कोई उम्मीद रही मिलने की
फिर भी आईने से लड़ता रहा वो मैं हूं
मौत का हक़ है ज़िन्दग़ी पे मगर रोज़ नहीं
जो रोज़ ज़िन्दग़ी पे मरता रहा वो मैं हूं
रेत पर अक्श किसी का उभर गया था कभी
उसी में रंग नए भरता रहा वो मैं हूं।

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