ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हम अभी भी नहीं सुधर रहे हैं
01-May-2016 12:00 AM 2039     

आजादी के बाद के विकसित भारत के सबसे गंभीर सूखे से जूझ रहे दे¶ा में योजना व घोषणा के नाम पर भले ही खूब कागजी घोड़े दौड़ रहे हों, लेकिन हकीकत के धरातल पर ना तो समाज और ना ही सरकार के नजरिये में कुछ बदलाव आया है। जहां पानी है, वहां उसे बेहिसाब उड़ाने की प्रवृति यथावत है तो जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधनों का क्षणिक स्वार्थ के लिए उजाड़ने में कोई भी पीछे नहीं है। जान लें कि पानी किसी कारखाने में बन नहीं सकता और इसके बगैर धरती का अस्तित्व संभव नहीं है। पानी की बढ़ती जरूरत को पूरा करने का एकमात्र साधन है कि आका¶ा से बरसी हर बूंद को कायदे से संरक्षित किया जाए और हर बूंद को किफायत से खर्च किया जाए। सबसे बड़ी बात कि हमारा तंत्र यह तय नहीं कर पा रहा है कि जल संकट से जूझ रहे इलाकों में किस तरह के काम-धंघे, रोजगार या खेती हो।
बुंदेलखंड में लगातार सूखे के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। यहां गांव के गांव वीरान हैं, पानी की कमी के चलते। मनरेगा या अन्य सरकारी योजना में काम करने वाले मजदूर नहीं हैं, क्योंकि लोग बगैर पानी के महज पैसा लेकर क्या करेंगे। इस ग्रेनाईट संरचना वाले पठारी इलाके का सूखे या अल्प वर्षा से साथ सदियों का है। जाहिर है कि यहां ऐसी गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाना थी जिसमें पानी का इस्तेमाल कम हो, लेकिन यहां खजुराहो के पास 17 करोड़ का एनटीपीसी की बिजली परियोजना पर काम चल रहा है। इसमें 650 मेगावाट के तीन हिस्से हैं, जाहिर है कि कोयला आधारित इस परियोजना में अंधाधुंध पानी की जरूरत होती है। यही नहीं इस्तेमाल के बाद निकला उच्च तापमान वाला दूषित पानी का निबटारा भी एक बड़ा संकट होता है। इसके लिए मझगांव बांध और ¶यामरी नदी से पानी लेने की योजना है। जाहिर है कि इलाके की जल कंुडली में "कंगाली में आटा गीला' होगा। विडंबना है कि उच्च स्तर पर बैठे लोगों ने महाराष्ट्र के दाभौल में बंद हुए एनरॉन परियोजना के बंद होने के उदाहरण से कुछ सीखा नहीं।
यह तो बानगी है कि हम पानी को लेकर कितने गैर-संवेदन¶ाील हैं। इस साल के बजट में केंद्र सरकार ने पांच लाख खेत-तालाब बनाने के लिए बजट का प्रावधान रखा है। प्रधानमंत्री के पिछले मन की बात प्रसारण में भी कई लाख तालाब खोदने पर जोर दिया गया था। जाहिर है कि बादल से बरसते पानी को बेकार होने से रोकने के लिए तालाब जैसी संरचनाओं को सहेजना अब अनिवार्यता है। लेकिन हकीकत में हम अभी भी तालाबों को सहेजने के संकल्प को दिल से स्वीकार नहीं कर पाए है। इटावा के प्राचीन तालाब को वहां की नगरपालिका टाईल्स लगवा कर पक्का कर रही है। ¶ाायद यह जाने बगैर कि इससे एकबारगी तालाब सुदर तो दिखने लगेगा, लेकिन उसके बाद वह तालाब नहीं रह जाएगा और उसमें पानी भी बाहरी रुाोत से भरना होगा। इसके पक्का होने के बाद ना तो मिट्टी की नमी बरकरार रहेगी और ना ही पर्यावरणीय तंत्र। ज्यादा दूर क्या जाएं, दिल्ली से सटे गाजियाबाद में ही पिछले साल नगर निगम के बजट में पारंपरिक तालाबों को सहेजने के लिए पचास लाख के बजट का प्रावधान था, लेकिन उसमें से एक छदाम भी खर्च नहीं किये गये। यहां वार्ड क्रमांक छह के बहरामपुर गांव के पुराने तालाब को हाल ही में म¶ाीनों से समतल कर बिजलीघर बनाने के लिए दे दिया गया। सरकारी अभिलेख में यह स्थान जोहड की जमीन के तौर पर 2910 हैक्टेयर क्षेत्र में दर्ज है। इससे पहले यहां सामुदायिक भवन बनाने की योजना भी थी।
बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले में सूखे की सबसे तगड़ी मार है और यहां की साठ फीसदी आबादी पलायन कर चुकी है। गौरतलब है कि टीकमगढ़ जिले में साठ के द¶ाक तक एक हजार से अधिक तालाब हुआ करते थे जोकि यहां के खेतों व कंठ की प्यास बुझाने में सक्षम थे। देखते ही देखते तीन-चौथाई तालाब कॉलोनी या खेतों के नाम पर सपाट कर दिए गए। "सरोवर हमारी धरोहर', जलाभिषेक और ऐसी ही लुभावने नाम वाली परियोजनाएं संचालित होती रहीं, बजट खपता रहा लेकिन तालाब गुम होते रहे। हाल ही में यहां जिला मुख्यालय के बीस एकड़ में फैले वृंदावन तालाब में जेसीबी म¶ाीनें लगा कर खुदाई का मामला सामने आया। पता चला कि महज कुछ निर्माण कार्यों में भराई के लिए यहां से मिट्टी खोदने का काम चल रहा है। कहने को तालाब की निगरानी के लिए एक सरकारी चौकीदार भी है लेकिन वह दबंग लोगों के सामने असहाय है। तालाब के जल ग्रहण क्षेत्र को इस बुरी तरह से खोद दिया गया है कि वह खदान सा दिख रहा है और जाहिर है कि उसमें जल आने और अतिरिक्त पानी के बाहर निकलने के रास्ते पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिए गए हैं। आने वाले बारि¶ा के मौसम में जब इसमें पानी भरेगा नहीं तो अगला कदम इसकी जमीन पर कब्जा करना ही होगा।
बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर में जल संकट का स्थाई डेरा है, लेकिन यहां के कोई चार सौ साल पुराने दलपत सागर पर कब्जे, सुखाने व कॉलोनी बनाने में किसी को कोई झिझक नहीं है। इस तालाब का विस्तार तीन सौ एकड़ में था और इसमें ¶ाहर की दो लाख से अधिक आबादी की जल-मांग पूरा करने की क्षमता हुआ करती थी। इसके संरक्षण का मामला एनजीटी में गया, कई आदे¶ा भी हुए और इसकी जमीन पर कब्जा कर कॉलोनी काटने वालों व कतिपय अफसरों पर मुकदमें भी हुए। फिर उन कलेक्टर का तबादला हो गया जो दलपत सागर को बचाना चाहते थे। आज भरी गर्मी में इस वि¶ााल झील में ¶ाहर की गंदी नालियों की बदबू आ रही है और हर दिन इसका कुछ हिस्सा संकरा हो जाता है।
यह तो महज बानगी है, असल में पूरे दे¶ा में सार्वजनिक जल संसाधनों - कुएं, बावडी, तालाब आदि के प्रति उपेक्षा के भाव की कहानियां लगभग एक जैसी हैं। पानी के मुख्य रुाोत नदियों की पवित्रता आंकने के लिए इस तथ्य पर गौर करना होगा कि दे¶ा के ¶ाहरी इलाकों से हर रोज 6200 करोड़ लीटर गंदा पानी निकलता है, जबकि दे¶ा में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की कुल क्षमता 2,327 करोड़ लीटर से ज्यादा नहीं है। स्पष्ट है कि सीवेज का अस्सी फीसदी सीधे नदियों में बह रहा है और इससे नदियां जीवनदायी नहीं दु:खदायी बन गई हैं। जल संसाधनों के प्रति उपेक्षा व कोताही का खामियाजा हम अभी भी भुगत रहे हैं और आने वाले दिनों में इसके परिणाम और घातक होंगे

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