ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिन्दी साहित्य का जर्मन अनुवाद
01-Feb-2018 09:57 AM 2431     

मनुष्यों की परिस्थितियों को आपस में समझने के लिये, उनके शांतिपूर्ण, अहिंसात्मक सहजीवन के लिये साहित्य के अनुवादों का बहुत बड़ा महत्व है, क्योंकि केवल एक-दूसरे को समझने में अपरिचित, अन्य प्रकार के तथ्यों का अस्वीकारण कम हो जाता है। पारस्परिक समझ के काम में साहित्य के अनुवाद बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं जो हमारे समय में जब विदेशी-द्वेष बढ़ता जा रहा है, अत्यधिक अनिवार्य हैं।
साहित्य सभ्यता से उत्पादित वस्तु है, जो उस सभ्यता को प्रतिबिंबित करता है जिसमें वह पैदा हुआ। अनुवाद साधारणत: दो विभिन्न सभ्यताओं से संबंधित है। इस प्रकार साहित्य का अनुवाद करना एक ऐसी कला है जो दूसरे क्षेत्र की सभ्यता से पूर्ण तरह पारंगत हो जाना तथा अपनी सभ्यता की अच्छी जानकारी चाहती है, ताकि अनुवाद करना, मतलब अपनी सभ्यता में दूसरी सभ्यता को पार करना, कलात्मक रूप से किया जाये जिससे पाठक अनुवाद को अपनाये। इसके अतिरिक्त अनुवाद दोनों भाषाओं की शब्दकला की अच्छी जानकारी मांगता है।
भारत की सभ्यता कई शताब्दियों से जर्मन साहित्य, जर्मन कला एवं जर्मन विद्या को भी प्रेरित करती आ रही है। सर्वप्रथम धर्म का रहस्यवाद और दर्शनशास्त्र ग्योटे, हेर्डर, हाइने, मक्स म्यूलर, हेरमन ब्रोकहाउस जैसे जर्मन कवियों, विचारकों और वैज्ञानिकों को आकर्षित करते थे। हाल में हमारे समय के वास्तविक भारत में रुचि बढ़ती जा रही है। अंग्रेजी में लिखी भारतीय रचनाओं के अनुवाद से जर्मन पाठक को स्वाधीनता प्राप्त करने से पहले और उसकी प्राप्ति के बाद भारत की वास्तविकता का बहुमूल्य ज्ञान मिल गया। इन रचनाओं में मुल्क राज आनंद, र.क. नारायण, ख्वाजा अहमद अब्बास, भवानी भट्टाचार्य आदि की रचनायें हैं। लेकिन यह केवल इसलिये संभव हो पाया क्योंकि विश्व में अंग्रेजी भाषा का बहुत बड़ा प्रसारण और सामाजिक सम्मान है जिससे अंग्रेजी से जर्मन में या दूसरी यूरोपियन भाषाओं में अनुवाद करने की संभावनायें भारतीय भाषाओं की तुलना में ज्यादा अधिक और अच्छी थीं और आज भी हैं। अर्थात् अंग्रेजी की तुलना में आधुनिक भारतीय भाषायें अभी भी प्रतिकूल परिस्थिति में हैं, यद्यपि अंग्रेजी से बराबर हो जाने का प्रक्रम चालू ही हो रहा है। इस प्रक्रम में हिन्दी का पथ प्रशस्तीकरण करने का अधिकार है। यह भाषा बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से भारत में सबसे बड़ी है और विश्व में चीनी और अंग्रेजी भाषाओं के बाद ही तीसरा स्थान रखती है। अभी तक हिन्दी साहित्य के जर्मन में अनेक अनुवाद किये गये हैं, लेकिन अनुवाद के लिये चुनाव न्यूनाधिक अनियमित रूप से हो गया और भिन्न लेखकों और कवियों की प्रसिद्ध हो गई अलग रचनाओं का ध्यान रखा गया था। जिन लेखकों की रचनाओं का अनुवाद जर्मन में हुआ उन में हैं- बिहारीलाल, प्रेमचंद, भीष्म साहनी, जगदीश चंद्र, फणीश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय आदि। परन्तु हिन्दी साहित्य की संपत्ति के समक्ष ये अनुवाद ऊँट के मुंह में जीरा हैं। मेरे विचार से विभिन्न कालों और प्रवृत्तियों के लेखकों एवं कवियों की रचनाओं का जर्मन और दूसरी यूरोपियन भाषाओं का भी प्रणालीबद्ध प्रकाशन करने के लिये प्रयास करना चाहिये।
मेरे मन में हैं- भक्तिकाल, रीतिकाल, भारतेंदुकाल, द्विवेदीयुग, यथार्थवाद, छायावाद, प्रयोगवाद, नई कहानी आदि। जर्मन पाठकगण को इस साहित्य का पूर्ण प्राचुर्य खोलने के उद्देश्य के लिये और भारत की सभ्यता के आधुनिक विकास की जानकारी बढ़ाने के लिये विराट काम करना चाहिये। लेकिन इसके लिये यह भी आवश्यक है कि :
- भारत में हिन्दी का प्रोत्साहन और समर्थन आगे बढ़ाया जाये। - जर्मन विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में आधुनिक भारतीय भाषाओं की, विशेषकर हिन्दी की, पढ़ाई को ज्यादा समर्थन मिले। - जर्मन में व्याकरणों, पाठ्य-पुस्तकों, शब्दकोषों जैसी हिन्दी पाठ्य सामग्री ज्यादा विकसित की जाये, जो दूसरी ओर से यह भी मांगता है कि यह बहुत बड़े खोज कार्य के आधार पर हो जाये। - आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य, विशेषकर हिन्दी साहित्य का जर्मन में अनुवाद करने का प्रोत्साहन और समर्थन किया जाये तथा भारतीय लेखकों और उनके अनुवादकों को काम के वार्तालापों के अवसर भी दिये जायें।
मेरे विचार से इसमें विश्व में और खासतौर पर मेरी मातृभूमि जर्मनी में भारतीय सभ्यता के बारे में ज्ञान फैलाने का महत्वपूर्ण योगदान है।

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