ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गीत लिखूं मैं ऐसा मेघा ऐसे बरसो तुम
01-Dec-2016 12:00 AM 2488     

इक गीत लिखूँ मैं ऐसा कल-कल झरने जैसा।
दिल में सोयी आग जला दे
परिवर्तन का बिगुल बजा दे
निज हाथों किस्मत लिखने का
मन में दृढ़ संकल्प जगा दे
पावन गीता के जैसा, मीरा भक्ति के जैसा
इक गीत लिखूँ मैं ऐसा।
पत्थर दिल को मोम बना दे
आँखों में पानी ठहरा दे
ऊँच-नीच को समतल करके
मन से मन का योग करा दे
चन्दन पानी के जैसा, अक्षत रोली के जैसा
इक गीत लिखूँ मैं ऐसा।
अँधियारे में दीप जला दे
भूखे को आहार दिला दे
नन्हे-मुन्नों के हाथों में
कापी, कलम, किताब दिला दे
मंदिर, मस्जिद के जैसा, ईद, दिवाली के जैसा
इक गीत लिखूँ मैं ऐसा।
काम, लोभ के रोगी के मन
में विरक्ति, वैराग जगा दे
पनघट पर गाँवों की गोरी
की निश्छल फिर हँसी सुना दे
राधा-श्याम के जैसा, गंगा-यमुना के जैसा
इक गीत लिखूँ मैं ऐसा।

मेघा ऐसे बरसो तुम

पर्वत ओढ़े हरा दुशाला
नदियां तरुणी सी बलखायें
श्वेत धवल मोती पत्तों पर
मन हर्षित संगीत बजायें
सृष्टि पहने अलंकरण, मेघा ऐसे बरसो तुम।
पर्वत से चलकर जल धारा
नदिया में घुल-मिल जाये
सबकी प्यास बुझाती नदिया
सागर में जा मिल जाये
दान धर्म का अद्भुत क्रम, मेघा ऐसे बरसो तुम।
भर जाएँ सब ताल-तलैया
वसुंधरा की प्यास मिटे
जन-जन की सूनी आँखों में
हर्ष जनित उल्लास जगे
झूम उठे स्पन्दित मन, मेघा ऐसे बरसो तुम।
एक जगह पर ना रुक जाना
घूम-घूम अमृत बरसाना
पंछी ने जो नीड़ बनाये
तुम उनको क्षति न पहुँचाना
सभी सुखी हों और संपन्न, मेघा ऐसे बरसो तुम।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^