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गवाही और जिजीविषा का कवि
01-Nov-2017 02:23 PM 3371     

हिंदी जगत में कुँवर नारायण का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं। वे तो हिंदी कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, उनको दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित किया गया है, भारत और विदेशों में उत्कृष्ट पुरस्कारों से वे सम्मानित हो चुके हैं। पर सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कुँवर नारायण देश-विदेश में बहुतों के लिए अपने प्रिय कवि हैं। इस साल के 19 सितंबर को कुँवर जी 90 साल के हो गए। लेकिन वह दिन आनंद मनाने का अवसर नहीं हो पाया, क्योंकि कुँवर जी तीन महीनों से बीमार पड़े हैं। उनका मौन रहना हिंदी जगत के लिए एकदम डरावना और अकल्पनीय है। इसका समाधान यह है कि अपने जन्मदिन के अवसर पर कवि अपनी आवाज़ में बोलें। इस प्रयोजन के लिए नीचे पेश किया गया है उनकी कविताओं के सन् 2013 में पोलैंड में प्रकाशित पोलिश अनुवाद का प्रारंभिक निबंध "पोलैंड और मैं" तथा उनकी सन् 1955 पोलैंड की यात्रा से जुड़ी हुई एक कविता।

पोलैंड और मैं
कई कारणों से पोलैंड के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट अनुभव करता हूँ। निजी, साहित्यिक, सामाजिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक पोलैंड की एक गहरी छाप मेरे मन पर छूटी है। उस समय से ही जब मैं अपनी आयु के तीसरे दशक में था। अब मैं अपनी उम्र के नौवें दशक में हूँ पर वह आकर्षण अभी भी कम नहीं हुआ है। उसी क्रम में यह मेरे लिए एक नया अनुभव है कि मेरी कविताओं का एक छोटा संकलन अब पोलिश भाषा में भी उपलब्ध होगा। कई अन्य योरपीय भाषाओं में भी मेरी कविताओं के अनुवाद हो चुके हैं, इसकी मुझे ख़ुशी है, पर पोलिश भाषा में उनका अनुवाद होना और पोलिश पाठक के हाथों में पहुँचना मेरे लिए ख़ास तरह के अपनत्व का भाव रखता है।
पहली बार 1955 में वारसा आया था। वह एक रोमांचक अनुभव था। वहाँ न केवल पाब्लो नेरुदा और नाज़िम हिक़मत जैसे विश्वविख्यात कवियों से मिलना (जो वहाँ उन दिनों आए हुए थे) बल्कि पोलैंड के भी अनेक युवा और वरिष्ठ कवियों से भेंट का स्थायी प्रभाव पड़ा। युद्धोपरान्त का एक तहस-नहस पोलैंड कई तरह की तीख़ी प्रक्रियाएँ उकसाता था। राजनैतिक दृष्टि से 1945 में द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति तथा 1947 में ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भारत की मुक्ति का मेरे अंतर्मन पर गहरा असर रहा। गाँधी की सफलता तथा हिटलर के पतन में इतिहास के ऐसे दो चेहरे प्रतिबिंबित होते थे जिन्होंने हर देश का ध्यान अपने अतीत और भविष्य पर पुनर्विचार की ओर खींचा। इससे उस समय की विश्वव्यापी साहित्यिक ऊर्जा कभी परोक्ष, तो कभी प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होती रही, पर सामान्यत: वह इस प्रच्छन्न विवेक के रूप में कि मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियाँ यदि अनुशासित हों तो रचनात्मक हो सकती हैं, वही यदि अनियंत्रित छोड़ दी जाएँ तो एक जंगली आग की तरह विध्वंसक हो सकती हैं।
1955 के बाद भी कई बार पोलैंड जाना हुआ। जिस तरह से एक विनष्ट देश ने अपने को पुन: संभाला और एक जीते-जागते, स्फूर्त देश में तब्दील कर लिया था उससे यह विश्वास दृढ़ होता था कि अंतत: एक उदार मानव-विवेक का ही भविष्य है। अच्छा लेखन वही है जो हमारे अंदर इस भरोसे को पक्का करे कि मानवतावाद केवल एक आदर्श भावना मात्र नहीं, उच्चतम कोटि की व्यावहारिक बुद्धिमानी भी है। समय बीतने के साथ इस दूसरे वाले पोलैंड के साथ मेरा परिचय और भी घनिष्ठ होता गया। जैसे-जैसे वहाँ के हिंदी साहित्य को बेहतर जाना उसकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय चेतना को बेहतर पहचाना। साथ ही ऐसे अनेक विद्वानों से सीधे संपर्क, जो हिंदी साहित्य पर शोध और अनुवाद कार्य कर रहे थे, स्वयं के लेखन को जानने के लिए भी एक नई दृष्टि देता था। मीवोष, रूज़ेविच, हेर्बेर्त और षिम्बोस्र्का आदि के मेरे अपने कुछ अनुवाद भी मेरे लिए एक नई तरह का काव्यानुभव था। जैसे निजी अनुभवों का कविता में साधारणीकरण होता है, वैसे ही सामूहिक अनुभवों का कविता में निजीकरण भी होता है। यह बात जो मीवोष ने पिछले दो-तीन दशकों की पोलिश कविता की पहचान के सिलसिले में हेर्बेर्त के बारे में कही थी, दरअसल एक सार्विक सचाई है जिसकी अनुगूँजें मेरी कविताओं में भी मौजूद है।
हिंदी जैसी भाषाएँ अपनी संस्कृति और इतिहास में पूरी तरह रची बसी भाषाएँ हैं। अन्य भाषाओं में उनका अनुवाद बहुत सहज नहीं बन पड़ता। लेकिन इस "असहजता" को भी अनुवादों में एक नई तरह का रचनात्मक अनुभव बनाया जा सकता है और इस तरह स्वयं अनुवाद की भाषा में भी एक नई तरह की "सांस्कृतिक जगह" का निर्माण हो सकता है। यह मुश्किल काम ज़रूर है लेकिन इसके फ़ायदे भी हैं। मनुष्य- स्वभाव की विविधता कई रूपों और कई भाषाओं में व्यक्त होती है और उन सब को किसी एक ही भाषा में समेटना मुश्किल है। फिर भी यही एक तरीक़ा है जिससे एक भाषा की कविता दूसरी भाषाओं में पहुँच सकी है। मैंने दूसरी भाषाओं की कविताओं को मुख्यत: अंग्रेज़ी अनुवादों द्वारा जाना है। और भी जाना है कि अनुवादित मूल के कुछ गुण ज़रूर छनकर अनुवादों द्वारा हम तक पहुँचते रहे हैं। इस तरह अनुवाद की भाषा में भी एक नई तरह की कविता के लिए जगह बनी।
मेरी अनेक कविताओं में आज का जीवन-यथार्थ "सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक" सीधे आया है। उनका अनुवाद अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन ऐसी भी अनेक कविताएँ हैं जिनमें मैंने मिथक और इतिहास से संदर्भ लिया है ताकि जीवन को एक बृहत्त परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा और समझा जा सके। नृशास्त्र, मिथकशास्त्र, इतिहास-दर्शन, भाषा-शास्त्र, जीव-शास्त्र आदि क्षेत्रों में जो काम हुआ है वह विचारोत्तेजक ही नहीं कल्पना को भी उकसाता है। इस अर्थ में भारतीय अतीत से मेरा जुड़ाव केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि पूर्णत: उदार अर्थों में वैश्विक रहा है। मेरी कविताओं में "मानवता" के अर्थ बहुत कुछ इतिहास के इसी जटिल और वैश्विक बोध से उत्प्रेरित हैं। इस तरह जो आज "आधुनिक" और "नया" लगता है बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हम अपने अतीत को आज के संदर्भ में किस तरह पढ़तेे हैं, बीते हुए यथार्थ से हम आज के यथार्थ के लिए क्या सबक़ निकालते हैं। कविता शायद इसी तरह हमारे मानवीय अंत:करण तक पहुँचकर हमें ऐसे जीवन-मूल्य दे सकती है जो जीवन-रक्षक हों।
मेरे लिए यह जानकारी सुखद है कि मेरी कविताओं का पोलिश अनुवाद प्रो. दानूता स्ताशिक द्वारा किया जा रहा है। आशा बँधती है कि वे सफल होंगी क्योंकि उन्होंने न केवल हिंदी भाषा और साहित्य को निकट से जाना है बल्कि भारतीय मिथकों पर भी महत्त्वपूर्ण अनुसंधान-कार्य किया है। पोलैंड के साथ संबंधों की शृंखला में इस एक और नई कड़ी का स्वागत। उनके प्रति मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
कुँवर नारायण
नई दिल्ली, नवंबर 2012

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