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गंगानंद झा
गंगानंद झा
बैद्यनाथ-देवघर (झारखण्ड) में जन्म। सीवान (बिहार) के डी.ए.वी स्नातकोत्तर कॉलेज में वनस्पति-शास्त्र के अध्यापन से सेवा-निवृत्त। चाल्र्स डार्विन के क्रम-विकासवाद, जवाहरलाल नेहरू के scientific temper तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जीवन-दर्शन के समन्वय के आलोक में जीवन-पथ के प्रति अपने कौतूहल बरकरार है।

अपना आसमान तराशना
राजशेखर ने उस दिन मुझे अपने शिक्षक-सह-गुरु समर्पण के द्वारा लिखित एक किताब भेंट की। किताब का नाम था क्ठ्ठद्धध्त्दढ़ ठ्ठ द्मत्त्न्र् (अपना आसमान तराशना)। हार्पर कोलिन्स इण्डिया ने अध्यात्म प्रवर्ग में इसे प्रकाशित किया है। राजशेखर की अपने शिक्षक के प्र
जययात्रा के पड़ाव
मैं अपने अनुभवों को एक फ्रेम में गूँथने की जद्दोजहद करता हूँ तो एक किताब मेरे जेहन में उभरती है। इसका नाम है- "टिया- एक अन्तर्यात्रा।" लेखक का नाम है समर्पण। वे रामकृष्ण मिशन के संन्यासी है। यह पंचतंत्र की शैली की एक आख्यायिका है। टिया एक तोता है,
अवधूता, गगन घटा गहरानी
अदिम मनुष्य बादल, आसमान, सागर, तूफान, नदी, पहाड़, विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जीव-    जन्तुओं के बीच अपने आपको असुरक्षित, असहाय और असमर्थ महसूस करता था। वह भय, कौतूहल और जिज्ञासा से विह्वल हो जाता था। उसका जीवित रह पाना उसके अपने पर
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य
प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, बिखराव का सतत दबाव, प्रत्येक पल बिखरने के संकट की उ

प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य
प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, बिखराव का सतत दबाव, प्रत्येक पल बिखरने के संकट की उ
एक आध्यात्मिक नजरिया, जीने की एक राह (अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद गंगानंद झा)
एशिया और यूरोप के बीच अन्तर स्पष्ट करने के लिए
    लोग एशियाई मन की धार्मिक रुझान एवम् यूरोपीय
    मानसिकता के वैज्ञानिक मिजाज की चर्चा करते हैं। इस अन्तर को इस तथ्य से आधार मिलता है कि वि·ा के करीब करीब सारे ह
स्मृति चारण
जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिनकी हम व्याख्या नहीं कर पाते। मैं मात्र बीस महीनों के लिए ईशान भारत के असम राज्य के सिलचर में रहा था। यह बात करीब छप्पन साल पहले की है। वहाँ के लोगों से अप्रत्याशित रूप में बहुत ही स्नेह, सम्मान और स्वीकृति मिली। ल
नई विश्व सभ्यता
मनुष्य हर जगह एक ही हैं और सबों के महानतम मूल्य एक समान होते हैं। उनके बीच फर्क, जो तयशुदा तौर अर्थपूर्ण होते हैं, का सरोकार बाहरी, अस्थायी सामाजिक हालात से रहता है तथा उन हालात के साथ ही बदलता रहता है। आज के परिवहन एवम् संचार के तरीके सीमाओं को भ

अपनी बात दार्जिलिंग
कवि दार्जिलिंग के होटल ठहरा था। सुबह सोकर उठा खिड़की खोली, तो भौंचक रह गया। हिमाच्छादित कंचनजंगा पर सुनहली धूप की पृष्ठभूमि में रंग-बिरंगे फूलों का मेला। निहारता ही रह गया कवि। फिर उसका मन मान से भर गया। मेरी भागीदारी एवम् उपस्थिति के बग़ैर प्रकृति
गणतंत्र एक मत है
भारत 1947 में स्वाधीन हुआ। साफ और समुचित तरीके से देश का शासन संचालित करने की अपेक्षा यह आसान रहा है। यह दायित्व अधिक कठिन प्रतीत होता है। इसके लिए निःस्वार्थ नेतृत्व के साथ ईमानदार और सुयोग्य सिविल सेवा, अनुशासित सेना तथा पुलिस बल की जरूरत होती ह
नव वर्ष का अभिनन्दन
न्यता है कि रोमन देवता जेनस के दो चेहरे हैं। एक से वह आगे और दूसरे से पीछे देखता है। साल के पहले महीने का नाम जनवरी इसी रोमन देवता के सम्मान में रखा गया। एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है और दूसरे से अगले वर्ष को। बीते साल की संवेदना, स्मृति और स
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