ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गलियों में गालियाँ काशी का अस्सी उपन्यास में बोलचाल की भाषा
01-Aug-2017 11:51 PM 2918     

वैसे तो वाराणसी को अक्सर "होली सिटी" कहते हैं। पर वहाँ रहनेवालों की बोली को लेकर वाराणसी बिलकुल "होली" (यानी पवित्र) नहीं लगती। कम से कम मुझे यह अनुभव हुआ काशीनाथ सिंह का लोकप्रिय "काशी का अस्सी" उपन्यास पढ़ने के बाद। जितने गंदे शब्द, गाली-गलौज, बोलचाल की ज़बान और गाने-कविताएँ इस उपन्यास में हैं उतने किसी दूसरी आधुनिक, हिंदी में लिखी हुई किताब में शायद नहीं मिल पाएँगे। जिस समय मैं यह किताब पहली बार पढ़ रही थी उस समय मैं दो हफ़ते अपनी हिंदी टीचर कविता कुमार के घर में बनारस में रही थी। हमने साथ-साथ किताब पढ़ी और मुझे ठीक से याद है कि कविता जी को पढ़ते समय ख़ूब हँसी भी और शर्म भी आती रहीं। "काशी का अस्सी" बनारस शहर की जीवन-शैली का व्यंग्य से भरा चित्रण देता है। लेखक जैसे अंदर से वाराणसी पर नज़र डालता है और "होली सिटी" की कल्पना को सिर से उलटकर रख देता है। काशीनाथ सिंह ने इस उपन्यास में पवित्रता की शान के पीछे छुपा शहर का एक आम-सा चेहरा दिखाने की कोशिश की।
आप लोग जानते हैं कि "काशी" वाराणसी या बनारस का पुराना नाम है। तो "अस्सी" क्या है? अस्सी बनारस का सबसे मशहूर ऐतिहासिक और परंपरागत मोहल्ला माना जाता है। उपन्यास के पात्र अपने मोहल्ले को ही दुनिया का केन्द्र समझते हैं। और मोहल्ले का केन्द्र है : पप्पू चायवाले की दुकान। अगर आप कभी वाराणसी गए होंगे तो आपने अवश्य अस्सी घाट को भी देखा होगा। घाट पहुँचने से पहले आप शायद अस्सी रोड पर पप्पू चायवालेे की दुकान से गुज़रे होंगे या शायद आपने वहीं रुककर चाय पी होगी।     
अनेक तस्वीरों में आप वही जगह देख सकते हैं जिसमें किताब के पात्र मिलकर चाय पीते हैं और बहसें करते रहते हैं। वही है किताब की पृष्ठभूमि। जो सारी बहस, बातचीत और कहानियाँ अस्सीवालों के बीच में चलती हैं वे सब उपन्यास में हैं। वैसे तो किताब को "उपन्यास" कहना कुछ मायावी, कुछ ग़लत लगता है, क्योंकि पाँचों कहानियाँ जो इस किताब में जुड़ी हैं, वे सब पहले अलग-अलग संग्रहों और पत्रिकाओं में छपी हुई थी। नतीजा यह निकला कि "उपन्यास" शुरू से आख़िर तक एक-ही कहानी नहीं है, बल्कि कहानियों और बहसों का संग्रह है, जैसे एक बनारसीपन का ऑर्कइफ़ है। लेखक अस्सीवालों को ख़ुद बोलने देते हैं। और अस्सीवाले बोलते भी ख़ूब : प्रदेश और देश के राजनीति पर चर्चा करते रहते हैं; आधुनिक बदलाव के असर के बारे में सोचते-विचारते हैं, अफ़वाहें फैलाते हैं; नेताओं, पंडितों और टूरिस्ट लोगों के मज़ाक भी उड़ाते हैं। इसके अलावा, आराम से पान या भाँग खाकर मौज-मस्ती से जीते हैं, बस! कथाकार के शब्दों में : "जमाने को लौड़े पर रखकर मस्ती से घूमने की मुद्रा "आइडेंटिटी कार्ड" है इसका!" (पृ. 11) इस पर ध्यान भी रखें कि पात्र असली व्यक्तियों पर आधारित हैं और लेखक ख़ुद उनमें से एक पात्र बन गया है जिसका नाम "कन्नी" गुरू है।
किताब के लेखक, डॉक्टर काशीनाथ सिंह, 1937 में उत्तर प्रदेश में पैदा हुए थे। वे बनारस हिंदी यूनिवॉर्सिटी (एक्तछ) के हिंदी विभाग में हिंदी भाषा और साहित्य पढ़ाते थे। पहले, मुझे इस बात की बहुत हैरानी हुई कि हिंदी के किसी प्रॉफ़ेसर को भी इतनी अश्लील (मतलब गंदी) भाषा आ सकती होगी! फिर, मैंने सोचा : इनके अलावा और कौन होगा जो ऐसे लिख सकता? साठ के दशक में उन्होंने हिंदी की कहानियाँ लिखने की शुरूआत की। आज तक वे कहानियाँ लिखते आ रहे हैं। "काशी का अस्सी" उपन्यास 2002 में प्रकाशित हुआ था। किताब पर आधारित एक नाटक और फ़िल्म भी बनी थी। "मोहल्ला अस्सी" दो साल पहले, 2015 में निकलनेवाली थी लेकिन बन्ने के बाद अभी तक भी रिलीज़ नहीं हो पाई क्योंकि हिंदुस्तानी क्ड्ढदद्यद्धठ्ठथ् एदृठ्ठद्धड्ड दृढ क़त्थ्थ्र् क्ड्ढद्धद्यत्ढत्ड़ठ्ठद्यत्दृद ने "मोहल्ला अस्सी" अश्लील भाषा की वजह से रिलीज़ होने को रोक दी। शायद हम आनेवाले दिनों में फ़िल्म को सिनेमा के पर्दे पर देख भी पाएँ, पर मुझे लगता है कि अगर ऐसा होता भी है तो उसमें भी कई फ़िल्मी सींस को कटवा दिया हुआ होगा। तो जो अस्सी की अश्लील और ख़ूबसूरत भाषा का पूरा मज़ा लेना चाहता है, उसे किताब पढ़नी चाहिए होगी!
तो आख़िर, अस्सी और भाषा का क्या संबंध है? कथाकर पहले पन्ने में ही यह ऐलान करता है :
मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच नन्द-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है! जो भाषा में गन्दगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद् "परम" (चूतिया का पर्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएँ (पृ. 11)।
इस उल्लेख का मतलब है कि भाषा और अस्सी का रिश्ता प्रेमियों का जैसा बहुत गहरा है। दूसरा मतलब यह है कि भाषा अस्सीवालों के पहचान से गहरी रूप से जुड़ी है। लोग अपनी भाषा में ही अपने दिल की बात अभिव्यक्त कर देते हैं। इसके अलावा, बोलचाल की ज़बान "बनारसीपन" का माहौल भी बनाती है। मेरा चुना हुआ शीर्षक "गलियों में गालियाँ" भाषा की तरफ़ भी और पुराने मोहल्ले अस्सी की जगहों की तरफ़ भी इशारा करता है। अस्सी की गलियां, सड़कें, दुकानें वग़ैरह किताब में मौजूद है। मोहल्ले की जगहें और बोलचाल की भाषा दोनों यही रचनाती हैं जिसे हम "लोकल आइडेंटटी" (स्थानीय पहचान) कह सकते हैं। मोहल्ला अस्सी की हक़ीक़त को दो तरीक़ों से साहित्य में अनुवाद किया गया है : पहला है जगहें (यानी टोपॉग्रफ़ी) और दूसरा तरीक़ा है : भाषा के विविध रूप।
बोलचाल की भाषा सचमुच उपन्यास का आधार है। लेखक  ने बड़ी संवेदनशीलता से आम आदमी की बोलियाँ नकल करने का प्रयास किया है। बीच-बीच में अश्लील ज़बान का इस्तेमाल होता है। गाली-गलौज के अलावा बोली का प्रयोग भी होता है। अवधी, जो पूर्व-उत्तर प्रदेश और कई और प्रदेशों में बोली जाती है, इसमें भी शामिल है। उच्चारण के छोटे-मोटे बदलाव से अवधी बोली बनती है। दो आदमियों की बातचीत सुनिए :
खड़ाऊँ पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला - "किस दुनिया में हो गुरू! अमरिका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घंटे-भर से पान घुला रहे हो?"
मोरी में "पच" से पान की फीक थूककर गुरू बोले - "देखौ! एक बात नोट कर लो! चन्द्रमा हो या सूरज - भौंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुद यहाँ आएगा। तन्नी गुरू टस-से-मस नहीं होंगे हियाँ से! समझे कुछ? (पृ.11)
"देखौ" या "हियाँँ" तुरंत एक स्थानीय रंग दिलवाते है। इस बात पर ध्यान रखिए कि कभी संस्कृतवाले शब्द (जैसे कि चंद्रमा) खड़ी बोली हिंदी और गाली बिलकुल पास-पास बैठे हैं। कभी-कभी लगता है कि दोनों के बीच में झगड़ा चल रहा हो लेकिन इस झगड़े में व्यंग्य (यानी त्द्धदृदन्र्) पैदा हो जाता है। शुद्ध हिंदी और संस्कृत के मिश्रण में कभी मज़ेदार या बिलकुल मामूली बातें अभिव्यक्त होती हैं, जैसे कि जवान अस्सीवालों के "जीवनदर्शन" में : "जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्म् तो मरितव्यम्, फिर दाँत कटाकर क्यों करितव्यम्?" (पृ.14) यह वाक्य हिंदी और संस्कृत का एक मिश्रण है। दिलचस्प बात यह है कि मोहल्ले अस्सी में जितनी ऐतिहासिक परतें छिपी हुई हैं उतनी ही बोलचाल की भाषा में भी दिखाई देती हैं। मतलब यह है कि भाषा की अलग-अलग परंपराएँ आज की लोकसंस्कृति में, यानी पॉपुलर कल्चर में, जीते आ रही हैं।
जैसे कि कवि सम्मेलन में, होली के समय कवि और गायक बनारस शहर में आकर इकट्ठा होते हैं। मंच पर बैठकर दो कवि "पोएट्री काँटेस्ट" की शैली में कविताएँ-कथाएँ सुनाते हैं। कवि-सम्मेलन कोई उबानेवाली घटना नहीं है, क्योंकि उस मौक़े पर कवि लोग वत्र्तमान सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं की तेज़ आलोचना करते हैं। किताब में यह सलाह दी गई है : "गालियों में दिलचस्पी हो तब भी आइए और राजनीतिक व्यंग्य में हो तब भी!" कथाकार हमको बताता है कि बीजेपी-वाले कवि-सम्मेलन को मना करना चाहते हैं क्योंकि कवि उनका भी ख़ूब मज़ाक उड़ाते हैं। "कवि सम्मेलन" एक और उदाहरण है कि पुराने रूपों में समकालीन विषयों से भरा हुआ है। गाली-गलौज, अवधी की बोली, खड़ी बोली, संस्कृत और अंग्रेज़ी के माध्यम से बनारस शहर की "आजकल की" स्थानीय दुनिया उभरी हुई है।
"काशी का अस्सी" उपन्यास पढ़ने लायक़ क्यों है और यह किताब पढ़कर हम क्या सीख सकते हैं - बनारस शहर और हिंदी साहित्य के बारे में?
पहली बात : अगर असली बनारस को देखना चाहें तो पप्पू की दुकान के पास जाना, चाय पीकर बहस और मस्ती का मज़ा लो! पर मत भूलना : तुम्हारे जाने के बाद ही गुरू लोग तुम्हारा मज़ाक उड़ा जाएँगे! दूसरी बात : बनारस की संस्कृति बहुत प्राचीन और पवित्र है। हो सकता है, काशीनाथ सिंह हमको यही याद दिलाते हैं कि प्राचीनवाला "काशी नगर" एक कल्पना है, किसी ब्रेंड की तरह सालों से दुनिया-भर-के लोगों को आकर्षित करती रहती है। अगर आप मशहूर अस्सी घाट से हटकर चौराहों पर, कूचे-गलियों में घुसते हैं तो आपको कोई दूसरा, आधुनिक और बहुत जीवित बनारस शहर मिलेगा। वहीं लोग अलग-अलग बोलियों में गाली देते हैं। और तो  और वे कहानियाँ-कविताएँ सुनाकर पुरानी परंपरा में नए विषय, नए जीवन से भार लेते हैं। तीसरी बात : सिंह जी की कहानी यह साबित करती है कि हिंदी साहित्य कोई सूखा, उबानेवाला मामला तो नहीं है। साहित्य में आधुनिक जीवन का चित्रण और सामाजिक आलोचना भी मिलती है। अगर हम आजकल के बनारसी समाज, पॉपुलर कल्चर और आम लोगों के सोच-विचार को गहरे रूप से समझना चाहते हैं तो "काशी का अस्सी" सच में पढ़ने में बहुत दिलचस्प एक किताब है।

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