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प्राग में पहला हिंदी अध्यापक
01-Sep-2019 06:56 PM 967     

हम लोग अपनी पहली हिंदी क्लास का इंतज़ार उत्सुकता से कर रहे थे। नाम हमें मालूम था लेकिन आदमी कैसा होगा। दरवाज़ा खुल गया, छोटे कद का नीली आँखोंवाला, कम बालोंवाला बुज़ुर्ग दाखिल हुआ। बुज़ुर्ग क्या, शायद पचास के थे, लेकिन अठारह सालोंवालों को सब लोग बुज़ुर्ग लगते हैं।
अपना परिचय देकर बोले - "तुम लोगों से मिलकर ख़ुशी नहीं है। लड़कियाँ। शादी करोगी, कुछ नहीं बनोगी।" हमारे उत्साह पर ठंडा फुहारा पड़ा लेकिन डॉ. पोरीज़का कोई नारीविरोधी नहीं थे। कहना चाहिए कि "कुछ बनना" उनके लिए वैज्ञानिक काम करना था और विज्ञान का मतलब भाषाविज्ञान था, विशेषकर हिंदी व्याकरण। पढ़ाने के सिवा अपने जीवन का शायद क्षण-क्षण इसी में लगे रहते थे। उनकी शादी नहीं हुई। शादी, बच्चे, घर, यह सब सिर्फ़ रुकावटें समझते थे। एक छोटे कमरे में अकेले रहते थे, सारा काम वहीं करते थे। मानना चाहिए कि उनका अनुमान किसी हद सही निकला - तीनों लड़कियों ने पढ़ते-पढ़ते शादी कर ली, एक ने पढ़ना छोड़ दिया।
डॉ. विंसेंस पोरीज़का (1905-1982) गरीब घर के बेटा थे। उनके पिता दरज़ी थे। कुल मिलकर आठ भाई-बहनें थे। विंसेंस स्कूल में ही बहुत प्रतिभावान् निकला। उस ज़माने में बच्चों को आगे पढ़ाना बहुत महँगा पड़ता था। यह देहाती दरज़ी के बस का नहीं था। फिर भी एक मौका मिला - थेओलोजी पढ़ना। इसलिए पोरीज़का पादरी बने। अपनी थीसिस में भगवद्गीता और बाइबल की तुलना की। इस सिलसिले में संस्कृत सीख ली। फिर हिंदी। किसी तरह से पाठ्य-पुस्तक और ख्र्त्दढ़द्वठ्ठद्रण्दृदड्ढ मिलने में सफल हुए और किसी की मदद के बिना ख़ुद हिंदी, उर्दू और बांग्ला सीख ली। उच्चारण भी अच्छा सीख लिया। कुछ साल तक पादरी के पद पर रहे, फिर चाल्र्स यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने का अवसर मिला। बीच में अरबी, फ़ारसी और यूरोपीय की कई भाषाएँ सीख लीं। कितने लेख लिखे, कितना अध्ययन-अध्यापन किया, यह गिनना शायद संभव नहीं है। उस ज़माने में पाठ्य-पुस्तकें और शब्दकोश मिलना बहुत मुश्किल था। पोरीज़का जब किसी तरह से इंतिज़ाम किया तो हमारे लिए अपने हाथ से या टाइपराटर से प्रतिलिपि की। हमें भी यही सलाह देते थे। इसमें उन्होंने कितना दिल और समय लगाया यह बताया भी नहीं जा सकता। बड़ा हिंदी-चेक शब्दकोश तैयार कर रहे थे लेकिन पूरा नहीं कर पाये। उनके देहांत के बाद जो बच गया वह हमारे बहुत काम आया। यह भी कहना चाहिए कि दिल के बहुत अच्छे थे हालांकि पढ़ाने में सख़्ती से पेश आते थे। घर का काम बहुत देते थे। जल्दी गुस्सा हो जाते थे, हम पर डांट पड़ती थी, लेकिन फिर जल्द ही मुस्कुराते थे। हम लड़कियाँ उनके लेक्चर से पहले लिपस्टिक नहीं लगाती थीं और सादे से सादे कपड़े पहनती थीं। कहीं वह यह न बोलें - "मेक-अप करना आता है, बढ़िया कपड़े पहनना आता है लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं आता।" लेकिन हमारा ध्यान बहुत करते थे। उदाहरण के लिए जाड़ों में क्लास में आते ही हमारे पाँव देखकर बोले - "ये हलके जूते पहने बर्फ़ में चलती फिरती हो, तुम बीमार पड़ जाओगी। अगली बार ये जूते देखना नहीं चाहता।"
बहुत साल बाद का एक किस्सा है। पोरीज़का से मुलाकात हुई और मेरे साथ मेरा चार साल का बेटा था। बातचीत हिंदी व्याकरण की थी और क्या। लेकिन उनका ध्यान बच्चे की ओर गया तो देखा कि बच्चा बहुत बोर हो रहा है। तो व्याकरण छोड़कर एक पुरानी चेक वीरगाथा सुनाने लगे। लड़के का दिल भरा नहीं सो फिर उनकी आस्तीन खींचकर कहने लगा कि क्या आप और कोई परीकथा जानते हैं। और पोरीज़का सुनाने लगे, एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी--- मैंने बार-बार मन ही मन अपने से पूछा कि पोरीज़का ने छोटे बच्चों से ऐसा सुलूक करना कहाँ सीखा था। हाँ वह जो कुछ सीखना चाहते तो सीख गये। बच्चों से सुलूक भी करना। यह सब ऐसे हो व्यक्तिगत निजी यादें हुईं। डॉ. पोरीज़का नहीं रहे, देहांत बहुत पहले हुआ। लेकिन उनकी बड़ी दुभाषीय "हिंदी पाठ्यपुस्तक" अब तक बहुत से देशों में काम आती है। जितना उनसे सीखा इतना किसी और से नहीं सीखा जा सका।
सब से अच्छा सबक उनसे यह मिला कि कोई कार्य अगर अपने बस से बाहर भी लगता हो, हद से ज़्यादा शुरू क्यों न लगे तो फिर भी इस में लग जाना चाहिए और किसी न किसी तरह से पूरा करना चाहिए। अगली बार ऐसा ही कार्य इतना मुश्किल नहीं लगेगा और शायद किसी दिन बिलकुल आसान लगेगा। मैं तो जीवन भर उनकी आभारी रही।

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