btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

एक आध्यात्मिक नजरिया, जीने की एक राह (अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद गंगानंद झा)
01-Apr-2016 12:00 AM 4141     

एशिया और यूरोप के बीच अन्तर स्पष्ट करने के लिए
    लोग एशियाई मन की धार्मिक रुझान एवम् यूरोपीय
    मानसिकता के वैज्ञानिक मिजाज की चर्चा करते हैं। इस अन्तर को इस तथ्य से आधार मिलता है कि वि·ा के करीब करीब सारे ही धर्म एशिया में प्रवर्तित हुए और आधुनिक सभ्यता की शानदार वैज्ञानिक उपलब्धियाँ पश्चिमी मस्तिष्क की बौद्धिक उद्यम तथा गहरी पैठ की उपलब्धियाँ हैं। बड़ी तस्वीर देखें तो पश्चिम में महान धार्मिक प्रतिभाएँ दिखती हैं और साथ ही पूरब में विख्यात वैज्ञानिक भी। जून १८८५ में कैम्ब्रिज में आधुनिक इतिहास के रिजियस प्रोफेसर की हैसियत से दिए गए अपने उद्घाटनीय व्याख्यान में लॉर्ड ऐटन ने कहा-- "तीन हजार सालों को छोड़ दें तो चार सौ सालों के अवलोकन पर हमें कोई दर्शन नहीं मिलता, यह अधूरा तथा दोषपूर्ण अवलोकन होगा।'
धर्म और विज्ञान, आस्था और युक्ति मनुष्य की प्रकृति के अलग-अलग पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। हममें से हर एक व्यक्ति में धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही पहलू मौजूद रहा करते हैं, किसी में एक पहलू अधिक प्रखर होता है किसी में दूसरा। इस पृष्ठभूमि में मैं इस देश की आत्मा की बात करना चाहता हूँ। यह प्राचीन होने के साथ-साथ नवीन भी है। जिसका पूरब के अनेक क्षेत्रों में तथा पश्चिम के भी कुछ भाग पर आधिपत्य रहा है। आंगोर वाट, बोरोबदर तथा दूसरे अनेको अवशेष हमारी पहचान के गवाह हैं। भारत मन का एक ढाँचा है, जीने की एक राह है, इसका धर्म अपनी श्रेष्ठ अवस्था में वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष है, राजनीतिक और आध्यात्मिक है। जीवन के प्रति इसकी दृष्टि कैसी है?
ब्रह्माण्ड के विकास में, जो पदार्थ से जीवन की ओर, जन्तु चेतना से मानव बुद्धि की ओर अग्रसर हुआ है, अगला कदम मनुष्य की बुद्धि से आध्यात्मिक चेतना की ओर होगा। मानवेतर स्तर तक यह गति सहज एवम् स्वचालित रही है, मानवीय स्तर पर यह गति सप्रयास और सजग चेष्टा से ही सम्भव हो सकेगी। मनुष्य स्वतन्त्र कर्ता है। घटक स्वाधीन है। हर किसी में व्यक्ति की चिनगारी रहती है। आत्मा की उपस्थिति ही मानवीय प्रकृति को गरिमामण्डित करती है। यह गणतन्त्र का आधार है और सार्वभौम मानवीय अधिकार की घोषणा को औचित्य प्रदान करता है।
ग्रीक मतवाद ऑर्फिक के अनुसार हम धरती और तारों भरे आसमान की सन्तान हैं। मनुष्य धरती और आसमान का, धूल और प्रतिमा का मिश्रण है। हमारे अन्दर आत्मा अनेकों भौतिक परतों में लिपटी हुई है। अगर हम वस्तुगत घटनाओं के सिलसिले में खो जाते हैं तो मनुष्य की स्वाधीनता अव्यक्त रह जाती है। कर्ता कर्म हो जाता है, नासमझ, विचारहीन, अनुभूति से वंचित। अगर मनुष्य अपना कर्ता भाव, अपनी आन्तरिकता पुन& प्राप्त कर ले, तो वह अपनी भौतिक सत्ता को नियन्त्रित करने और उसका आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने में सफल हो जाता है। अध्यात्म और प्रकृति में विरोध नहीं है। प्रकृति अध्यात्म द्वारा नियन्त्रित की जा सकती है। धर्म का उद्देश्य अपने सम्पूर्ण अस्तित्व, शरीर, मन हृदय और इच्छा को नियन्त्रित करना होता है। प्रार्थना, ध्यान और आत्म-नियन्त्रण के द्वारा हम अपने व्यक्तित्व को समन्वयित करते हैं।
समन्वयित व्यक्तित्व चाहे वे किसी भी धर्म के माननेवाले हों, किसी भी जाति के हों, वे सबके सब एक ही परिवार के सदस्य हुआ करते हैं। जो भी पर्वत शिखर तक पहुँचता है, सितारों तक उसकी पहुँच होती है। ऐसा धर्म अनन्य नहीं होता है, न ही इसका चरित्र एकाधिकारवादी होता है। अगर हम सामाजिक ताने-बाने, रीति-रिवाज, भोजन की आदतें और विवाह के कायदों को दरकिनार कर विचार करें तो हम देखेंगे कि सबमें आध्यात्मिक जागरण, नैतिक पुनर्जन्म पर ही प्रमुखता है।
भारत के इतिहास में प्रारम्भ से ही दृष्टिकोण की सार्वभौमिकता रही है। ऋग्वेद कहता है कि करुणामय ऋषि को उस रहस्यमय सत्य के दर्शन होते हैं जिसमें ब्रह्माण्ड को एक ही घर होता है।
भ्रातरो मनुजास सर्वे स्वदेशो भुवन-त्रयम्
सारे लोग काले और गोरे, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और यहूदी भाई-भाई हैं, और धरती, पानी और आसमान, यह तीन दुनिया, हमारा घर है। अपने युक्तिपूर्ण ज्ञान से परे की चीजों के प्रति, जिनके बारे में बोलना कठिन होता है, हममें श्रद्धा होनी चाहिए। सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हमारी आशाएँ अन्य लोगों के दृष्टिकोण के प्रति हमारी श्रद्धा पर आधारित थीं। दूसरों पर अपना नजरिया लादने का कोई आग्रह नहीं होना चाहिए। एक प्रसिद्ध श्लोक है जो कहता है।
उत्तरम् यत् समुद्रस्यहिमाद्रेस चैवदक्षिणम्
वर्षम् तद भारतम् नाम भारती यत्र संतति&
 इस देश में जब विभिन्न मतावलम्बी सम्मिलित होते हैं, देश के आध्यात्मिक गुरु अलग-अलग लोगों को उनकी अपनी अलग-अलग परम्पराओं की शिक्षा देते हैं एवम् उन्हें उनके नैतिक आचरण में प्रशिक्षित करते हैं। स्वम् स्वम् चरित्रम् शिक्षेरण। भागवत गीता हमें बताता है कि लोगों के मन में भ्रम महज इस वजह से नहीं उत्पन्न करें, क्योंकि हमारी समझ के अनुसार वे अज्ञानी और कर्म में लिप्त हैं।
न बुद्धि-भेदम् जनयेदअज्ञानाम कर्मसंगीनाम
भारत ने यह अथवा वह का दर्शन नहीं अपनाया। जीवन सारे विरोधों को एक वृहत्तर पैटर्न में बुनकर विजय हासिल करता है न कि उनका विनाश करके। इस दृष्टिकोण के नतीजे में भारत में विभिन्न धर्माें के बीच सह-अस्तित्व उभड़ा, जिसमें ये परस्पर को प्रभावित करते रहे हैं।
भारतीय राज्य का धर्मनिरपेक्ष चरित्र इस देश में घर बनाने बाले सारे धर्माें के प्रति सम्मान और आदर पर जोर देता है। अक्सर भारत इस रास्ते से विचलित हुआ है और इसके नतीजे में इसे हानि उठानी पड़ी है।
हमारी सभ्यता के नैतिक और आध्यात्मिक चरित्र कदाचित् वृत्तर मानवीय भाईचारे के आधार की भूमिका अदा कर सकते हैं।
प्रगति अवश्यम्भावी नहीं होती, जो मनुष्य की पीढ़ियों को प्रज्ञा और सद्गुण की नई ऊँचाइयों तक ले जाती है।
भविष्य के सम्बन्ध में कुछ भी अवश्यम्भावी नहीं होता। हम स्पेंग्लर की तरह के नियतिवादियों से सहमत नहीं हैं जो कहते हैं कि "किसी संस्कृति का इतिहास एक व्यक्ति अथवा एक जन्तु अथवा एक पेड़ या फूल के इतिहास का प्रतिरूप होता है।' ऐतिहासिक घटनाएँ भौतिक अथवा जैविक घटनाओं की तरह नहीं होतीं। इनमें प्राकृतिक अवस्थाएँ तथा आध्यात्मिक बल एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। स्वाधीनता एवम् अनिवायऱ्ता एक महत्वपूर्ण बन्धन में जुड़ी होती हैं, एक सजीव सम्पूर्णता। हम डूबेंगे या अमावनीय ऊँचाइयों तक चढ़ जाएँगे, यह सब हम पर निर्भर करता है। जॉन डेवि ने घोषणा की, "प्रगति के भविष्य के बारे में मैं जितना जानता हूँ वह यह है कि मनुष्य पर निर्भर है कि वह कहे कि वह प्रगति चाहता है या नहीं।' अपने बौद्धिक तथा नैतिक अनुशासन से वह जिस भविष्य की तैयारी करता है उसके अलावे और कोई अन्य भविष्य मानव जाति की प्रतीक्षा नहीं करता।
परमाणुओं के नाभिकों में बन्द ऊर्जा के मुक्त करने वाला आविष्कार मानव इतिहास की दिशा बदलकर नई धारा का निर्माण करने वाली नई शक्तियों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इस नई शक्ति का उपयोग लाभ अथवा हानि के लिए किया जा सकता है। हमारे द्वारा की गई तकनीकी प्रगति और हमारे मन की नासमझी, अश्लीलता, ओछेपन और संकीर्णता को देखकर अनेकों लोग हताशा से भर उठे हैं। हमने परमाणु बम बनाया है और पिछले द्वितीय वि·ा युद्ध में इसका इस्तेमाल किया है। हायड्रोजन बम बनाए गए हैं और भविष्य के युद्धों में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि नाभिकीय परीक्षण मात्र से अभी तक अज्ञात तथा अजन्मी पीढ़ियाँ विकृतियों, पंगुत्व, यंत्रणा, रोग तथा अकालमृत्यु का वरण करेंगी। मनुष्य ने अपने आपको निर्मूल करने की क्षमता करीब-करीब पूरी तरह हासिल कर ली है।
मानव-समुदाय परीक्षा के सम्मुखीन है। हमारी बौद्धिक क्षमता और कामों के बीच की विषमता से दुनिया भर के विचारवान और संवेदनशील लोग विषाद में हैं। अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले एच.जी.वेल्स ने लिखा "जीवन में एक भयानक विचित्रता का उदय हुआ है अब तक जीवन एक युक्तिपूर्ण संगति के जरिए कायम रहा है, जैसे आकाशीय पिंड गुरुत्व के स्वर्णिम तार के द्वारा बँधे हुए हैं। अब यह स्वर्णिम तार मानो गायब हो गया हो और हर जगह किसी तरह, कहीं नियमित रूप से बढ़ते जा रहे वेग के साथ गतिशील है। लेखक का वि·ाास है कि इस गतिरोध से बच निकलने की कोई सूरत नहीं है। सर्वनाश उपस्थित है।'
 एच.जी. वेल्स ने नाभिकीय हथियारों की नवीनतम उपलब्धियों के पहले लिखा था। महान मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव जंग बताते हैं -- आत्मा का पथभ्रष्ट विकास मनोवैज्ञानिक गण- विनाश की ओर ले जाता है। मौजूदा हालात इतने कुटिल हैं कि इस सन्देह को दबा पाना मुश्किल लगता है कि सृष्टिकर्ता एक और प्रलय की योजना बना रहा है, जो मनुष्य की मौजूदा जाति का अन्तिम रूप से संहार कर देगा।
च्र्ण्ड्ढ क़ड्ढठ्ठद्धढद्वथ् क्ण्दृत्ड़ड्ढ नाम की फिलिप टॉयनबी की पुस्तक में कैण्टनबरी के आर्चबिशप डॉक्टर फिशर घोषणा करते हैं, "जहाँ तक मेरी जानकारी है, भगवत् इच्छा है कि मानव जाति नाभिकीय अस्त्रों के द्वारा आत्मघाती होगी।' वे कहते हैं कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि मनुष्य जाति सदा सर्वदा जीवित रहेगी, जब कि इसके विपरीत प्रभाव के पर्याप्त प्रमाण ईसाई धर्मग्रन्थों में हैं।
नैतिक आवेश नाभिकीय हथियारों के साथ जुड़ जाएँ, तो एक भयावना सम्मिश्रण तैयार हो जाता है और तब कृपामय बुद्ध के उपदेशों अथवा कष्ट सहनेवाले ईसामसीह के बदले उस कबीलाई ई·ार की ओर हमारी रुझान होने की सम्भावना बढ़ती है जिसके बारे में मान्यता है कि उसने अपने अनुयायियों को शत्रुओं का निर्ममता से विनाश करने का आदेश दिया।
"उन्हें छोड़ो मत, बल्कि पुरुष और नारी, शिशु और दूधमुँहे, बैल और भेड़, ऊँट और गधे-- सबों की हत्या कर दो।' ६ अगस्त, सन् १९४५ को ३००,००० लोगों की आबादी का शहर हिरोशिमा पूरी तरह से निश्चिह्न कर दिया गया। आबादी की एक तिहाई मार दी गई, बाकी में अनेकों घायल हुए। युद्ध पहले की तुलना में अधिक बर्बर हो गया है, अधिक जंगली और अधिक ध्वंसकारी, अधिक भ्रष्ट करनेवाला।
नाभिकीय भौतिकी में शोध कार्य बन्द कर देना कोई समाधान नहीं हो सकता। ये वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हमारी यौक्तिक क्षमताओं की उपलब्धियाँ एवम् मानव विकास का एक भाग हैं। नए ज्ञान की तलाश बन्द नहीं की जा सकती। हमें नए विचारों और जीवन की नई राहों का परीक्षण करते रहना है। अगर हम अपनी जगह दूसरों के लिए नहीं छोड़ने की सम्भावना को रोकना चाहते हैं, तो हमें अपनी सम्भावनाओं का सर्वाेत्तम उपयोग करना है।
मानवता का विलोप अगर होगा तो यह निर्वैयक्तिक शक्तियों अथवा अलौकिक शक्तियों के द्वारा नहीं होगा। अगर ऐसा कभी होगा तो यह मनुष्य के हठ और अहंकार का प्रत्यक्ष परिणाम होगा। इसे ग्रीक साहित्य में हायब्रिस, अथवा शक्ति का निरंकुश प्यार कहा गया है और जिसने मानव इतिहास के अनेक पन्नों को बदसूरत कर रखा है।
आशा छोड़ देने या आस्थारहित हो जाने की कोई जरूरत नहीं है। हमें अपने ब्रह्माण्ड के अन्तरतम के प्रकाश एवम् प्रेम द्वारा सीमाबद्ध होकर सर्जनात्मक एवम् साहसपूर्ण होने की जरूरत है। सबों के लिए शान्ति, स्वाधीनता और सुरक्षा केवल उनके ही द्वारा अर्जित की जा सकती है जो महान आध्यात्मिक विचारों द्वारा संचालित हुआ करते हैं। इस विराट उथलपुथल के बीच सामञ्जस्यपूर्ण और सार्थक जीवन प्राप्त करने का यह एक मात्र तरीका है। ज्ञान नहीं, उदारता की जरूरत है। हमारी सर्वाेत्तम योजनाएँ असफल होती हैं, हमारे सम्मेलन गतिरोध और आक्षेप भरी घोषणाओं में समाप्त होती हैं तो उसकी वजह है कि ये ऐसे लोगों के हाथ में हैं जिनका आन्तरिक विकास नहीं हुआ है। व्यक्तियों के रूप में हम पहले की तुलना में अधिक मानवीय हैं, अधिक संवेदनशील हैं। व्यक्ति के रूप हमें पहले की अपेक्षा काफी नि&स्वार्थ अनुकंपा है, लेकिन समूह के रूप में हम उसी तरह नि&स्र्वाथी अथवा निरपेक्ष नहीं हैं। स्वयम् के बारे में हम कुण्ठाओं से और अपने से अलग राय तथा आस्था रखनेवालों के लिए तीव्र घृणा से भरे हुए हैं । जब तक हम अपने आपका पुनर्निर्माण नहीं करते, हमारी तमाम बाहरी उपलब्धियाँ हमारी सहायता नहीं कर सकेंगी। हमें बेहतर संगठन की नहीं, दिशा और दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत है। हम संयुक्त राष्ट्र संगठन के सदस्य होने के बावजूद तब तक कामयाब नहीं हो सकते जब तक हमारे जीवन में राष्ट्रीय मूर्तिपूजा और क्षमता की राजनीति का प्रभुत्व रहेगा। हमारे मन भ्रान्त हैं, विखण्डित। मानव प्रकृति के अन्धत्व और संसार की ईष्र्या के बारे में हमें किसी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए। हमारा व्यक्तित्व विभाजित है। इसे भलाई करनी चाहिए, लेकिन यह ऐसा नहीं करता। इसे बुराई से परहेज करना चाहिए, लेकिन इसकी बुराई की ओर रुझान अधिक शक्तिशाली होती है। हम शान्ति के लिए प्रार्थना तो करते हैं, पर कलह को बढ़ावा देते हैं। व्यक्तिगत हित को राष्ट्रहित के ऊपर प्राथमिकता देना गलत होता है, ठीक उसी तरह मानव जाति के कल्याण के ऊपर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देना भी गलत होता है।
यहाँ धर्म, ग़ैर सिद्धन्तवादी अर्थाें में, हमारी सहायता कर सकता है। हमारा हताश और व्याकुल समाज एक नए स्वरूप में उभड़ सकता है, अगर हम इस सिद्धान्त का उल्लंघन नहीं करें--- "सर्वप्रथम स्वर्ग के साम्राज्य की कामना करो।' आत्मा को केवल धर्म के अनुशासन के द्वारा ही रोगमुक्त किया जा सकता है। इस अनुशासन की माँग है कि हम अन्तर्राष्ट्रीय सरोकारों में भी परस्पर को एक दूसरे का सदस्य समझने का सिद्धान्त अपनाएँ। राष्ट्रीय नेताओं को चाहिए कि वे अपने हित के संरक्षण के बजाय वृहत्तर हित का ध्यान रखें। हमारे हृदय और मस्तिष्कों को बदलने की जरूरत है। मानवीय महानता, विनम्रता एवम् अच्छाई में हमें विकसित होने की जरूरत है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^