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शिक्षा नीति : बुनियादी सवाल
02-Jul-2019 11:03 AM 1131     

सिंगापुर के जन्मदाता ली क्वान अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि मैं जब
विदेश में पढ़ रहा था तब पहली बार मुझे अपनी भाषा, अपनी मातृभाषा
कम जानने और इसीलिए पिछड़ जाने का एहसास हुआ। लौटकर सबसे
पहले मैंने अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा शुरू कराई।

शिक्षा में सुधार के लिए फिर एक भारी-भरकम मसौदा पूरे देश के सामने फैला दिया गया है। बताते हैं कि भारतीय संविधान दुनिया का सबसे भारी भरकम बड़ा, लिखित ग्रंथ है। आजादी से पहले और आजादी के बाद बने शिक्षा नीति के ग्रंथ भी इतने ही बड़े और विशाल होंगे। मुश्किल नीतियों के सही कार्यान्वयन की है। ऊंची मीनार के लिए बुनियाद मजबूत चाहिए। शिक्षा आयोग यूजीसी में बदलाव, डीम्ड आदि विश्वविद्यालयों के नामकरण में परिवर्तन सब इस बुनियादी बदलाव के बाद की बातें हैं।
पहला बुनियादी सवाल है बच्चे का नजदीक से नजदीक स्कूल में दाखिला। क्या हम इसे संभव बना पाए हैं? निश्चित रूप से विश्व बैंक और दूसरी संस्थाओं की मदद से स्कूलों की संख्या हाल ही में बढ़ी है और पिछले 10 वर्षों में उनमें कुछ बुनियादी सुविधाएं भी जैसे टॉयलेट्स, कमरे आदि भी संभव हुए हैं, लेकिन ठीक इसी वक्त जब कुछ कदम इनमें शिक्षा के स्तर को बेहतर करने के लिए उठाने का वक्त आया, बच्चों की दौड़ अंग्रेजी के नाम पर नुक्कड़ अंग्रेजी स्कूलों की तरफ हो गई। इस विशाल देश के गांवो में जाकर इसे देखना एक बेचैनी, विषाद पैदा करता है। स्कूल की पूरी इमारत ठीक-ठाक है लेकिन बच्चे सब मिलाकर 40 से ज्यादा नहीं। कई जगहों पर शिक्षक भी पर्याप्त हैं, उन सबने सरपंच प्रधान की मदद से बच्चों को स्कूल में दाखिले की कोशिश भी की लेकिन सफल नहीं हो पा रहे। यहां सिर्फ शिक्षकों को दोष देने से काम नहीं चलने वाला। गांव-गांव में इन अधकचरे अंग्रेजी स्कूलों को खोलने की इजाजत किसने दी? ये क्या पढ़ा रहे हैं? क्या कोई कदम इनके खिलाफ उठाया गया? इन नुक्कड़ स्कूल में शिक्षक को अंग्रेजी पढ़ानी आती नहीं और हिंदी से दूर रखते हैं. नतीजा बच्चों को भाषा ज्ञान भी गायब। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा जब उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यदा बच्चे हिंदी विषय में 2018 और 2019 में फैल हुए हैं। हिंदी प्रदेशों की दो तीन पीढियां बर्बादी के कगार पर पहुँच चुकी हैं। अगस्त 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन्हीं सवालों के हल के लिए समान शिक्षा और सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के लिए निर्णय दिया था। कोर्ट का मानना था कि यदि सरकारी कर्मचारी, राजनेता आदि के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे तो शिक्षा की तस्वीर बेहतर बनेगी। क्या कस्तूरी रंगन समिति ने इस पक्ष पर विचार किया है? शायद नहीं। यह रोग सिर्फ गांव तक ही सीमित नहीं है। यही हाल शहरों का है। भारतीय रेल के पास किसी वक्त 500 से अधिक सरकारी स्कूल थे। नुक्कड़ अंग्रेजी स्कूलों ने उन्हें भी लगभग बंद होने के कगार पर पहुंचा दिया। विश्व बैंक की नीतियां कितनी चालाकी से काम करती हैं इसका अंदाजा भारत सरकार नहीं लगा पाती। अब जैसे छठे वेतन आयोग में बच्चों की पढ़ाई के लिए अलग-अलग फीस भत्ता देना शुरू किया गया। बस हर सरकारी कर्मचारी ने अपने बच्चे सरकारी स्कूलों से निकाल लिए और उन स्कूलों में भेज दिए जहां फीस ज्यादा जाती है। यही कारण है कि निजी स्कूलों का धंधा रातों-रात इतनी तेजी से बढ़ता गया।
दूसरा बुनियादी सवाल स्कूल की भाषा और एक सहज माहौल का है। अच्छा हो कि पूरे देश में कम से कम पांचवी तक की शिक्षा बच्चों की अपनी मातृभाषा, बोली में दी जाए। कोठारी समिति से लेकर सुब्रमण्यम और अब कस्तूरीरंगन रपट में भी यह बात पुरजोर तरीके से रेखांकित की गई है। वक्त आ गया है कि इसे ठीक सौ दिन के बाद लागू कर दिया जाए। अकेला यह कदम बहुत दूरगामी साबित होगा। शहरों में कम से कम दाखिले के वक्त जो साक्षात्कार अभिभावकों के लिए जाते थे, न्यायालय आदि के हस्तक्षेप के बाद उन पर कुछ रोक लगी है फिर भी ऐसे अनुभव रोज सुनने को मिलते हैं कि मां-बाप दाखिले के लिए गए और वहां प्राचार्य और शिक्षकों ने उन्हें अंग्रेजी न जानने के नाम पर जलील किया। ऐसे स्कूल और शिक्षकों को वैसा ही दंड मिलना चाहिए जैसा किसी जाति, धर्म जैसे दूसरे मानवाधिकार उल्लंघन का। हमारा संविधान हमें बोलने स्वतंत्रता की आजादी देता है तो अपनी भाषा में बोलना भी हमारा अधिकार है। दुनिया के बच्चों के मुकाबले हमारे बच्चों की रचनात्मकता यदि कम है तो उसका मूल कारण जमाने, अपने समय की वह समझ पैदा नहीं होना है। यूपीए सरकार के दौरान एनसीएफ 2005 एक महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार हुआ था। इसकी एक महत्वपूर्ण सिफारस है की स्कूल के अंदर का माहौल और स्कूल की दीवार के बाहर यानी गांव, कस्बे या शहर के माहौल में न्यूनतम अंतर होना चाहिए। थोड़ा और स्पष्ट करें तो जो भाषा बच्चे अपने घर में, गली में, मोहल्ले में बोलते हैं अगर स्कूल की शुरुआत में स्कूल में भी वही बोले तो वह स्कूल जाने से तनाव में नहीं आएंगे। मस्ती से पढ़ेंगे भी और खेलेंगे भी। शायद रातोंरात स्कूल छोड़कर भी नहीं भागेंगे। आप स्कूल छोड़ने वालों से बात करें तो बार-बार यही कारण सामने आते हैं। स्कूल भेजने की उम्र 3 वर्ष करने की सिफारिश पर पुनर्विचार की जरूरत है। दुनियाभर के अनुभव बताते हैं जो बच्चे 5 से 6 वर्ष की उम्र के बाद स्कूल जाते हैं और अपनी भाषा में पढ़ते हैं उनका विकास बेहतर पाया गया है। गांव की स्थितियों में तो 3 वर्ष से बच्चे को स्कूल भेजना शायद उसके विकास में बाधा ही बनेगा। उनको मनमर्जी से खेलने कूदने दो और एक उम्र के बाद ही स्कूल भेजें। जल्दी स्कूल भेजने की सिफारिश शायद शहरी अनुभव ने पैदा की है जो अपने बच्चों को किसी स्कूल के सुपुर्द करके नौकरी पेशे पर जाना चाहते हैं। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के एक पक्ष की तारीफ तो मन से की जानी चाहिए की उन्होंने अंग्रेजी के बूते नौकरियों प कब्जा करने वाले और देश की बाकी जनता को हाशिए पर रखने की कोशिश करने वालों पर कड़ी टिप्पणी की है। देखा जाए तो अंग्रेजी के इस भयानक दौर में इस रिपोर्ट का यह सबसे महत्वपूर्ण अंश है।
यही से सूत्र निकलता है शिक्षा के तीसरे बुनियादी पक्ष पर यानी कि इंजीनियरिंग कानून, मेडिकल और दूसरी कॉलेज के दाखिलो की नीतियों पर। लगभग 20 नेशनल लॉ कॉलेज खुले हैं। क्या आप तेलुगु, मराठी, गुजराती या हिंदी के बूते यहां प्रवेश पा सकते हैं? नहीं। क्या प्रबंधन संस्थानों में प्रवेश पा सकते हैं? नहीं। और तो और करोड़ों का सरकारी अनुदान पा रहे जेएनयू, जामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय में भी नहीं। यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें 95 प्रतिशत भारतीय भाषाओं को जानने वाले, उन में पढ़ने वाले इस क्रूरता से अच्छी शिक्षा से वंचित कर दिए जाएं। 40 वर्ष पहले सिविल सेवाओं की भर्ती के प्रश्न पर डॉक्टर दौलत सिंह कोठारी ने साफ कहा था, अकल केवल अंग्रेजी पढ़े बच्चों की बपौती नहीं है, इसलिए न केवल विश्वविद्यालय बल्कि नौकरियों में भी भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के बराबर का दर्जा मिले। कस्तूरीरंगन रपट ने भी यही बात दोहराई है। कुछ राजनेताओं और बुद्धिजीवियों के कपटी दिमाग ने इसे खामखा हिंदी लादने के दुष्प्रचार में बदल दिया है। रिपोर्ट तो सभी भारतीय भाषाओं को उनका महत्व दिलाने की बात कहती है। अच्छा हुआ सरकार ने इस विवाद से बचने के लिए कदम तुरंत उठा लिया। इसीलिए न केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकार भी अपनी भाषाओं में उच्च शिक्षा और शोध के लिए कदम उठाएं। जब हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 200 या 500 संस्थानों, विश्वविद्यालयों में गिनती कराना चाहते हैं तो हमें उन देशों की बुनियादी शिक्षा को भी समझना होगा। सिर्फ विश्व गुरु कहने से काम नहीं चलने वाला। हाल ही में जारी कुछ सर्वे बताते हैं कि जिन कोचिंग संस्थानों में भारतीय भाषाओं में सामग्री उपलब्ध है बच्चे पहले उसमें पढ़ते हैं, समझते हैं और फिर मजबूरी में अंग्रेजी माध्यम में उत्तर देते हैं। इन्टरनेट भी अपनी भाषाओं की बहुत सुनहरी तस्वीर बयान करता है। वर्ष 2019 में भारतीय भाषाओं में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वाले अंग्रेजी से दो गुने हैं जो अगले तीन वर्षों बाद चार गुना हो जायेंगे। बावजूद इस सबके अंग्रेजी का नशा उतरने का नाम नहीं ले रहा। प्रवेश परीक्षा में भी बदलाव की जरूरत है। सिर्फ वस्तुनिष्ठ प्रश्नों से भाषा और विषय की गहराई को नहीं आंका जा सकता। दुनियाभर के विश्वविद्यालय किसी चुने हुए विषय पर लेख आदि लिखवाना अनिवार्य मानते हैं। लेकिन क्या ये सुधार बिना अच्छे शिक्षकों के संभव हैं? नहीं। पिछले एक दशक में शिक्षकों के बीएड आदि पाठ्यक्रम में बदलाव की सिर्फ बातें हो रही हैं। जमीन पर तो और उल्टा हो रहा है। सिर्फ डिग्रियां बांटी जा रही हैं।
अंतिम प्रश्न हम एक ऐसा नागरिक कैसे बनाएं जो जाति, धर्म, क्षेत्र, जेंडर, नस्ल के भेदभाव से ऊपर उठकर सोच सके। दाखिले के वक्त जाति, धर्म जैसे शब्दों से मुक्ति पाने की भी जरूरत है। हां सामाजिक रूप से पिछड़े, वंचितों, गरीबों के लिए वंचित अंक उर्फ डिप्रवेशन फार्मूला लागू हो। यह प्रयोग जेएनयू में बहुत सफल रहा था। यानि उनको प्राथमिकता जो गाँव पिछड़े क्षेत्रों से है, मात्रभाषा में पढ़े हैं, गरीब हैं, महिला, आदिवासी, दलित आदि आधार हो। आरक्षण का उद्देश्य भी यही था न कि सिर्फ जाति के आधार पर महानगरों के क्रीमी लेयर द्वारा हडपना।
विज्ञान की सही शिक्षा ही सबसे कारगर साबित हो सकती है। सिर्फ न्यूटन या पाइथागोरस के नियम रटना विज्ञान नहीं है। वैज्ञानिक चेतना उस शिक्षा का नाम है जो एक तर्क से चीजों को सिलसिलेवार समझने की कोशिश करता है, प्रश्न करता है और उत्तर खोजने की भी धर्म और रीति-रिवाजों से लदी हुई शिक्षा और पाठ्यक्रम शिक्षा के सबसे बड़े दुश्मन हैं। जिस देश के पास दुनिया की सबसे ज्यादा नौजवान पीढ़ी हो और उसे 21वीं सदी के ऐसे वैज्ञानिक समय में जीने का अवसर मिला हो, तो उसे अब और देर नहीं करनी चाहिए। सिर्फ अतीत राग, महानता की माला जपने से, वैदिक युग की कच्ची सच्ची वैज्ञानिक उपलब्धियां और उनका गुणगान हमारा नुकसान ही करेंगी।

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