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डॉ. श्रीराम त्रिपाठी
डॉ. श्रीराम त्रिपाठी

5 जुलाई 1957 को गोरखपुर ज़िले के भरोहिया नामक गाँव में जन्म। गुजरात युनिवर्सिटी से एम.ए. तथा पीएच.डी.। दो दशकों तक गुजरात के एक कॉलेज में हिन्दी-अध्यापन। "भूख" (कहानी-संग्रह), "धूमिल और परवर्ती जनवादी कविता" (शोध-प्रबंध), "प्रेमचंद : एक तलाश" (आलोचना) तथा "समकालीन हिन्दी कहानी" (संपादन) प्रकाशित।


बोली-भाषा-2
पढ़ने-लिखने से समझदारी आती है। पहले भी सुनता था और आज भी सुनता हूँ। आज एक नई बात जुड़ी कि पढ़े-लिखे कम समझदार होते हैं। वे सिर्फ़ अपना हित सोचते हैं सह-हित नहीं। समझदारी में सह की चिंता होती है। सह का मतलब ही दो है और सम्-मझ भी दो का ही इशारा करता है।
बोली और भाषा
बोली और भाषा कैसे एक-दूसरे के विरोधी हैं और साहित्य इन्हें कैसे संयोजित करता है, उसे ही समझने की कोशिश यहाँ हुई है। इतना समझ लेना चाहिए कि बोली और भाषा परस्पर निर्भर हैं। मतलब कि एक-दूसरे के सह हैं। परंतु सहना दोनों का समान नहीं है। एक सहता है, तो
हिन्दी भाषा
भा षा वह है, जो सुनाई भी दे और दिखाई भी दे। वह सुनाती हुई दिखाये और दिखाती हुई सुनाये। किसी भी भाषा का यही जीवन है और किसी भी जीवन की यही भाषा है। मनुष्य की कोशिश अपने आधार और लक्ष्य को एकने की रही है। इससे आधार और लक्ष्य एक होकर भी दो
सबके हित का काम
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।। करतब (कर्तव्य) बायस (वायस) कौआ। अंग्रेज़ी बायस का अर्थ पक्षपात, (पूर्वग्रह) का और वेष मराल (हंस) का। यही कौवा कागभुसुंडि है, जो रामकथा का श्रोता होने के उपरांत वाचक भी है। वैसे ध्यान रहे कि कौआ प्रक
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