ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी
डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी

21 सितंबर 1976 को कैमूर, बिहार में जन्म। बीएचयू से एमए तथा जेएनयू से एमफिल एवं पीएचडी। "द संडे इंडियन" के 60 से अधिक अंकों का संपादकीय दल प्रमुख के रूप में प्रकाशन। 70 से अधिक व्याख्यान एवं काव्य पाठ की प्रस्तुति। कविता संग्रह "सितुही भर समय", सम्पादित पुस्तक "भाषा और हम" प्रकाशित। सह-लेखक के तौर पर "लिखने की शुरुआत - एक संवाद" तथा संयुक्त सम्पादन में "उत्तर मध्यकालीन कविता" पुस्तकें प्रकाशित। नवोदित लेखक सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार तथा डॉ. अंजना सहजवाला कविता सम्मान-2012 से पुरस्कृत।


लेखन मैं को काको गुसैयां
इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी एक विशाल क्षेत्र की भाषा है और 10 राज्यों की आधिकारिक भाषा है। इससे कहीं अधिक आबादी इसका दैनिक व्यवहार करती है। सुदूर हिमाचल प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र की सीमा तक और पाकिस्तान की सीमा से लगे राजस्थान से लेकर बंगाल तक हिंद
भाषाओं का नस्लवाद और 8वीं अनुसूची
यह बात लगभग सर्वमान्य है कि भाषा और बोली में कोई भेद नहीं होता, इसलिए अगर किसी बोली का उपयोग लाख और हजार लोग नहीं बल्कि केवल दो व्यक्ति भी करते हों तो उसे भाषा कहना ही उचित होता है। कुछ साल पहले अंडमान की बोआ सिनियर की मृत्यु के साथ "बो" भाषा समाप
हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र
जितने बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी है उसे दो चार सौ ग्रियर्सनों, रामचंद्र शुक्लों और रामविलास शर्माओं की आवश्यकता थी परंतु हम किए क्या? रामविलास शर्मा के "भाषा और समाज" को प्रकाशित हुए 60 साल हो चुके हैं, हम उससे कितना आगे बढ़े? हिं
हिन्दू, हिन्द, हिन्दी और नदी संस्कृति
तमिल से लेकर संथाली, खासी तक, मणिपुरी से लेकर मलयालम तक सब विशाल हिंदी जाति में समाहित हों और हम व्यवहार के स्तर पर स्थापित करें कि हिन्दी इन सभी भाषाओं को गले लगा रही है। किसी भी भाषा का विकास उसके क्षेत्र और परिवेश विशेष से गह

भाषाओं का परिवारवाद और हिंदी
हिंदी, भारत की राजभाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 50 करोड़ है। एक बड़ा तबका इसे राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देता है। यह भी तथ्य है कि भारत के बाहर अनेक देशों में हिन्दी का उपयोग होता है और नये संचार माध्यमों के आने के बाद यह तेजी से अहिन्
परिवारवाद और भाषा
जब भी भाषाओं की बात आती है तो उनके जिक्र के साथ एक पदक्रम जैसा संबंध भी आता है। सेना के अधिकारियों/सिपाहियों की तरह भाषाओं का भी पदक्रम निर्मित किया जाता है। किसी भाषा विशेष के लिए देव भाषा, ईश्वरीय भाषा, खुदा की भाषा, गॉड की भाषा के साथ-साथ देवी
कारखाने में नहीं बनती भाषा
मनुष्य आरंभ से ही अपने वजूद को लेकर सचेत रहा है। उसकी चेतना ज्यों-ज्यों विकसित होती गयी अपने अस्तित्व को लेकर उसका चिंतन भी प्रबल होता गया। शायद "मनुष्य" और "व्यक्ति" शब्द की सार्थकता यानी मनुष्य का होना उसके मनन करने और खुद को अभिव्यक्त करने की क
हिन्दी प्रेमी हैं, तो आइए बहुभाषी बनें
हिंदी इस देश की सम्मिलित आवाज है, यह केवल एक भाषा का नाम नहीं है यह इस देश की प्राणवायु का नाम है। देश की विविध संस्कृतियों को जोड़ने वाले पुल का नाम है। एक भरी पूरी संस्कृति और एक जीवनशैली का नाम है। हमने, खासतौर से हिंदी के कर्ताधर्ता लोगों ने एक
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