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डॉ. अमरनाथ
डॉ. अमरनाथ

1954 में रामपुर बुजुर्ग, गोरखपुर में जन्म। गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. और पी-एच.डी की उपाधियां प्राप्त। एक दर्जन से अधिक आलोचना की पुस्तकें प्रकाशित। "हिन्दी जाति" और "हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली" आदि एक दर्जन से अधिक आलोचना पुस्तकें प्रकाशित। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बीच सेतु निर्मित करने एवं भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के उद्देश्य से संचालित अपनी भाषा संस्था की पत्रिका "‘भाषा विमर्श" का संपादन।


हिन्दी के अंतरंग शत्रु
इन दिनों अपनी हिन्दी दो तरह के अंतरंग शत्रुओं से जूझ रही है- एक हैं हिन्दी के "विभीषण" और दूसरे हैं हिन्दी के "घुन"। हिन्दी के "विभीषण" तो संसद भवन की पावरफुल कुर्सियों या तरह-तरह के पुरस्कारों की लालच में सीधी- सादी जनता को अपने लच्छेदार भाषणों से ग
हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह
नामवर सिंह असाधारण प्रतिभा संपन्न आलोचक थे। असाधारण इसलिए कि उनकी पुस्तक "बकलम खुद" 1951 में छपी जब वे सिर्फ 24 साल के थे। "हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग" 1952 में छपी जब वे 25 साल के थे, "आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँँ" 1954 में छपी जब वे 2
राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी और महात्मा गाँधी
आजादी के बहत्तर साल बीत गए। आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति। दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सबकुछ पराई भाषा में होता है फिर भी
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