ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी की कठिनाई, भाषा की नहीं
01-Mar-2018 01:54 PM 3674     

कठिन हिंदी बनाम सरल हिंदी का प्रश्न कोई नया नहीं है। पिछले दशकों में यह सवाल सभा-संगोष्ठियों में बार-बार उठाया जाता रहा है। हिंदी की एक व्यावसायिक पत्रिका भी एक समय अपने पन्नों पर कठिन हिंदी-गद्य के नमूनों को "यह किस देश-प्रदेश की भाषा है" शीर्षक के तहत सामने लाती रही है। हिंदी की दुरूहता को लेकर सवाल उठाने वालों की आज भी कमी नहीं है। हिंदी को दुरूह बताकर अंग्रेजी का दामन पकड़े रहने वाली पीढ़ी को अंग्रेजी की कठिनाई उतना परेशान नहीं करती, जितनी हिंदी की पारिभाषिकी। परन्तु हिंदी इसलिए कठिन नहीं है कि उसका भाषाशास्त्र, उसकी व्याकरणिक संरचना कठिन है, बल्कि इसलिए कि उसे सीखने-सिखाने की कोई सुनियोजित पद्धति हमारे यहां नहीं है। हिंदी के लिए लोग टयूशनें नहीं करते। "यह तो मातृभाषा है। अत: सीखने की भला क्या जरूरत।" - इस धारणा के चलते ही हिंदी-शिक्षण पर प्रारंभ से ही बल नहीं दिया जाता, जिससे व्यक्ति की हिंदी की भाषिक नींव इतनी कमजोर हो जाती है कि वह आगे चलकर सामासिक पदावलियों, पारिभाषिकों को आत्मसात् नहीं कर पाता। आज भी लोग प्रयत्नपूर्वक जितना समय अंग्रेजी सीखने में व्यय करते हैं, उससे अल्प समय में वे हिंदी सुगमता से सीख सकते हैं। किन्तु जिस हिंदी को उच्चभ्रू वर्ग में महज बम्बइया फिल्मों, चतुर्थ श्रेणी कर्मिकों अथवा बहिनजियों की भाषा के रूप में ही देखा-समझा जाता रहा हो, उसे सीखने के लिए समय कौन जाया करे। वह तो बिना प्रयास ही सीखी जा सके वाली भाषा मान ली गयी है। इस गलतफहमी का ही यह नतीजा है कि एक तरफ तो इस ढुलमुल शिक्षा-तंत्र में अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा को माध्यम के रूप में अपनाया जा रहा है, दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर हिंदी के प्रयोग की गगनचुम्बी अपेक्षाएँ की जा रही हैं। शिक्षा और शासन तंत्र के बीच विद्यमान इस फासले के चलते ही भारत जैसे बहुभाषी देश में हिंदी के शिक्षण-प्रशिक्षण को योजनाबद्ध ढंग से क्रियान्वित नहीं किया गया बल्कि हिंदी के क्रियान्वयन से जुड़ी सरकारी संस्थाओं पर हिंदी शिक्षण का दायित्व भी सौंपकर इस कार्य की इतिश्री मान ली गयी। यही वजह है कि न तो देश में एकरूप मानक हिंदी का विकास हो सका और न ही हम हिंदी में ऐसी कार्यक्षम पीढ़ी ही पैदा कर सके जो अपने बलबूते सरकारी कामकाज का दक्षतापूर्वक निष्पादन कर सकती। लिहाजा आज भी देश में हिंदी के पठन-पाठन के प्रति कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखायी देती जिससे कि सर्वसाधारण में एक भाषिक जागृति पैदा हो।
जहां हम "कठिन हिंदी बनाम सरल हिंदी" का सवाल उठाते हैं, वहां हमें यह भी देखना चाहिए कि क्या यह कठिनाई सिर्फ हिंदी के साथ ही है या अन्य भाषाओं के साथ भी है। मेरे मत से कोई भी भाषा न तो सरल होती है और न कठिन। वह अभ्यास से सरल होती है और व्यवहार न करने से कठिन प्रतीत होती है। एक भाषा के कई रूप होते हैं। बोलचाल की भाषा, बाजार की भाषा तथा कार्यालयीन एवं ज्ञान-विज्ञान की भाषा। जहां तक हिंदी का प्रश्न है, बोलचाल की भाषा सरल व सहज लगती है किन्तु यह बोलियों के प्रभाव से संपृक्त होती है। मसलन, भोजपुर क्षेत्र में भोजपुरी, अवध में अवधी, ब्रज क्षेत्र में ब्रज, बुंदेलखंड क्षेत्र में बुंदेलखंडी, बिहार में मैथिली, हरियाणा में हरियाणवी, राजस्थान में राजस्थानी तथा हिमाचल में हिमाचली बोली का वर्चस्व है। ये सभी हिंदी क्षेत्र हैं किन्तु यहां के शहरों तक में सर्वसाधारण की भाषा यहां की बोलियां हैं। यहां तक कि कार्यालयों तक में पारस्परिक बातचीत की भाषाएं क्षेत्रीय बोलियां ही होती है। ये बोलियां दूसरी बोलियों के लोगों को बेशक कठिन लगें किन्तु अपने क्षेत्र में इन्हें लोग बखूबी समझते-बूझते हैं। यहां मुद्दा खड़ी बोली मे लिखी और बरती जाने वाली हिंदी की क्लिष्टता का है। शायद हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसका इतनी बोलियों के साथ गहरा सरोकार है। कन्नड, मलयालम, तमिल, तेलुगु या कि पंजाबी व बंगला में शायद इतनी बोलियां/उपबोलियां न होंगी। इन बोलियों की वजह से ही हिंदी में तमाम उच्चारण- भेद मिलते हैं। हिंदी का आजकल बाजार और अर्थव्यवस्था में भी प्रयोग बढ़ रहा है, इसलिए दूसरे शब्दों में वह बाजार की भी भाषा बन गयी है। सरकारी कार्यालयों/बैंकों, उपक्रमों में इस्तेमाल की जाने वाली हिंदी का रूप व्यावसायिक है। आज की हिंदी पर बाजार का भी बेहद दबाव है इसलिए हिंदी का प्रयोग बाजार की शक्तियों से भी परिचालित है। पत्रकारिता, जनसंचार, मीडिया, बेंकिंग तथा अर्थजगत- इन समस्त क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग में आमूलचूल बदलाव दिखायी देता है। भारतेन्दु के जमाने से अब तक की हिंदी की भाषिक यात्रा का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि हिंदी ने जमाने के साथ-साथ कई छवियां बदली हैं और आज हिंदी जिस नई चाल में ढलती दिखायी पड़ती है उस पर एक तरफ संस्कृतनिष्ठता का तो दूसरी तरफ अंग्रेजियत का गहरा असर है। सरकारी कार्यालयों में शब्द-निर्मिति का आधार मूलत: संस्कृत तथा गौणत: अन्य भारतीय भाषाएं है। किन्तु कुल मिलाकर हिंदी की नई पारिभाषिकी पर संस्कृत की तत्सम पदावलियों का प्रभाव दॄढतर है। "हिंदी-हिन्दुस्तानी" की तमाम हिमायत के बावजूद हिंदी को उस चाल में ढ़ालने का प्रयत्न सरकारी स्तर पर नहीं हुआ। लिहाजा अपनी उर्वरता की जबर्दस्त क्षमता के बावजूद तत्सम-न्यस्त हिंदी की पारिभाषिकी सुनने-समझने, लिखने तथा बोलने में कठिन अवश्य है, इसमें दो राय नहीं। दूसरी तरफ खुली अर्थ व्यवस्था और मीडिया की संक्रामक छवि ने भी हिंदी को बेतरह अपने प्रभाव में लिया है, जिसके चलते अखबारों में वित्तीय क्षेत्र की खबरें बहुतेरे अंग्रेजी के शब्दों से भरी होती हैं। हम देखें तो यह व्याधि पहले कुछ नामावलियों तक ही सीमित थी। जैसे, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड ने अपने हिंदी दैनिक का नाम "नवभारत टाइम्स" रखा जिसकी तर्ज पर "कुबेर टाइम्स", "प्रयागराज टाइम्स", "जेवीजी टाइम्स" इत्यादि पत्र-पत्रिकाएं आई। यह नाम केवल "टाइम्स" के उपयुक्त हिंदी रूपांतर के अभाव के चलते नहीं दिया गया बल्कि इसके पीछे "टाइम्स" की अंग्रेजियत को बरकरार रखना है। जबकि "द हिन्दुस्तान टाइम्स" के हिंदी संस्करण "हिन्दुस्तान" के साथ ऐसी बात नहीं है। बाजार की शक्तियों का ही प्रभाव है कि आज वित्तीय संस्थानों, कंपनियों तथा बैंकों के नाम ज्यादातर अंग्रेजी में ही मिलते हैं- और अब यह व्याधि हिंदी की वाक्य-रचना, गद्य-रूपों तथा बोलचाल की भाषा तक व्याप्त हो गयी है। आज एक अलग किस्म की अंग्रेजी मिश्रित हिंदी इलेक्ट्रानिक मीडिया की जबान पर हावी है कि भाषा शुचिता के समर्थकों को इससे उकताहट होने लगी है। यह सच है कि हिंदी में अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में "अनुकूलन" और "समावेशन" की क्षमता अधिक है, फिर भी अनावश्यक रूप में हिंदी में तीव्रता से घुलते-मिलते अंग्रेजी के शब्द-संस्कार ने हिंदी की अपनी पहचान का संकट भी खड़ा कर दिया है। यद्यपि एक वर्ग इसे हिंदी का सरलीकरण मानता है किन्तु क्या इस तरह के सरलीकरण के प्रयोग अंग्रेजी में किये जा सकते हैं? शायद नहीं। हिंदी के गद्यरूपों अथवा बोलचाल में अंग्रेजी का इस हद तक समावेशन बिल्कुल गैरजरूरी हे कि वह "हिंग्रेजी" लगने लगे।
आखिर फिर हिंदी की अपनी कठिनाई क्या है? क्या वह वाकई कठिन है या कठिन बताई जा रही है। क्या हिंदी के पारिभाषिकों को सरल बनाने का कोई उपाय है? हिंदी की पहली विशेषता यह है कि इसे जिस तरह बोला जाता है, उसी तरह लिखा जाता है। बोलने और लिखने में हिंदी ही एक ऐसी भाषा है, जिसमें न्यूनतम अंतर पाया जाता है। एक कवि ने कहा है, "जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख।" इसकी ध्वनियों का सर्वथा शुद्ध अंकन किया जा सकता है। यह बात अलग है कि स्थानीय प्रभावों से ग्रस्त उच्चारण के आधार पर लेखन प्रदूषित हो सकता है। जैसे भाउचर (वाउचर), वेक्ति (व्यक्ति) आदि। लेकिन बोलने वाला यदि हिंदी के लेखन रूप से परिचित है तो वह बोलचाल की भिन्नता के बावजूद सही लिखेगा। हिंदी की वर्णमाला में व्यंजन और स्वर-ध्वनियों की इतनी व्यापकता है कि हिंदी ही क्यों, भारतीय सहित विदेशी भाषाओं के शब्दों/पदावलियों तक के सर्वोत्तम उच्चारण किये जा सकते हैं। हिंदी की दूसरी विशेषता यह है कि इसके शब्द-निर्माण का मुख्यत: आधार संस्कृत है जो कि सभी भारतीय भाषाओं के मूल में कमोवेश निहित है। असमी, बंगला, उडिया, हिंदी, पंजाबी, गुजराती और मराठी इन सब भाषाओं का मूल स्रोत या कि गोत्र एक ही है- संस्कृत। ये सभी भाषाएं, संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश की द्रविड परिवार की भाषाओं तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम - में तमिल को छोड़कर शेष भाषाओं में संस्कृत के शब्द पचास प्रतिशत तक हैं तथा तमिल में भी संस्कृत शब्दों की बहुतायत है। इस तरह जिस भाषा बहुल देश की भाषाओं के विन्यास में संस्कृत की भागीदारी लगभग समान हो, वहां एक बडे भूभाग में बोली, लिखी और समझी जाने वाली तथा राष्ट्रभाषा पद की अधिकारिणी हिंदी सामान्यत: सभी लोगों के लिए न्यूनाधिक समझने योग्य तो होगी ही। हाल के वर्षों में हिंदी के प्रयोग और प्रचलन का दायरा हिंदी फिल्मों तथा पर्यटन-विकास के चलते और भी बढ़ा है। हिन्दी की वाक्य रचना में सर्वनाम, कारक और विभक्तियां इतनी सुनिश्चित हैं कि इनके उचित अभ्यास के बाद दोषपूर्ण प्रयोग की संभावनाएं नगण्य ही होती हैं। आज अंग्रेजी में पूरी वयस्कता के बावजूद "प्रिप्रोजीशन्स" के उचित स्थापन में अंग्रेजीदां लोग भी चक्कर खा जाते हैं तथा वे निर्भान्त रूप से इनके निर्दोष प्रयोग का दावा नहीं कर सकते। यह बात हिंदी में नहीं है।
हिंदी के क्रियापदों में भी सरलता है प्राय: "होना", "करना" और "बनाना" जैसी सहायक क्रियाओं की मदद से हिंदी के अधिकांश क्रियापदों का हम प्रयोग कर सकते हैं। क्या ऐसा प्रयोग अंग्रेजी में संभव की सूची नहीं याद करनी पड़ती। प्राय: हम एक ही विशेषण से "सुपरलेटिव" रूपों तक का कार्य चला लेते हैं। जहां तक वाक्य रचना का प्रश्न है, हिंदी में कर्ता, कर्म तथा क्रिया का क्रमानुसार प्रयोग मान्य है किन्तु अंग्रेजी में जिस हद तक "डू नाट", "डज नाट", "डिड नाट", "हैव टू", "विल नाट", "वुड नाट", "नाइदर", "नार" , "नो", "नाट", "फार", "सिंस", "शैल", "विल" तथा "डायरेक्ट" और "इनडायरेक्ट" नैरेशन के प्रयोग व्यवहार की अपनी बंदिशें हैं वे हिंदी में प्राय: नहीं हैं। हमने हिंदी की सरलता की तुलना अंग्रेजी से इसलिए की है कि हिंदी के रास्ते में अंग्रेजी ही बाधक है। अंग्रेजी में इतने सारे प्राणायाम के बाद भी भारतीयों के लिए इस भाषा मे सर्जनात्मक दक्षता पा सकना और वह भी ब्रिटिश और अमेरिकी मानकों के अनुसार बेहद कठिन है। जबकि हिंदी में थोड़े से प्रयास से ही हम सहज वाक्य-रचना कर सकते हैं। हिंदी की वाक्य रचना में जो थोड़ी बहुत कठिनाई दिखायी देती है वह हैं "लिंग-निर्धारण" की। किन्तु यह समस्या केवल हिंदी की नहीं है, संस्कृत, अरबी, फारसी, अंग्रेजी, फ्रेंच, मराठी सभी की है। अंग्रेजी में भी लिंग-निर्धारण की समस्या है। अंग्रेजी में पुÏल्लग, स्त्रीलिंग, नपंुसकलिंग और उभयलिंग- चार प्रकार के लिंग निर्धारण हैं- इसके बदले हिंदी में केवल दो लिंग और दो वचन ही मान्य हैं जबकि इसकी आधार-भाषा संस्कृत में तीन लिंगों, तीन वचनों का प्रावधान है। अंग्रेजी में जहां सर्वनामों में भी लिंग निर्धारण होता है, हिंदी के सर्वनामों में लिंग भेद नहीं होता, जैसे- वह खाता है। वह खाती है। जबकि अंग्रेजी में पहले "वह" के लिए "ही" तथा दूसरे "वह" के लिए "शी" लिखना अनिवार्य है। किसी भी भाषा का अपना व्यावहारिक, व्याकरणिक ढाँचा होता है। कही लिंग-निर्धारण सरल है तो कहीं कठिन। कहीं कारक-निर्धारण कठिन है तो कहीं सरल। हिंदी में विशेषणों, क्रियाओं के साथ लिंग निर्धारण की व्यवस्था है, किन्तु जैसा कि ऊपर कह आया हूं, अंग्रेजी में विशेषणों की कंपरेटिव-सुपरलेटिव श्रेणियां कम उलझन में नहीं डालतीं। अंग्रेजी क्रियाओं में लिंग भेद भले नहीं हो, क्रियाओं का "एकवचन" तथा "बहुवचन" के अनुसार प्रयोग हो अपरिहार्य है। तो निष्कर्ष यह निकलता है कि हर भाषा में व्याकरणिक नियमों की बंदिशें हैं जिनका व्यवहार भाषा की शुद्धता के लिए जरूरी है।
हिंदी की जो सबसे बड़ी कठिनाई है, वह है इसकी पारिभाषिकी। बैंकिंग, वित्त, वाणिज्य, शेयर बाजार, साहित्य, आयुर्वेद, अभियांत्रिकी, चिकित्साशास्त्र, गणित, रसायनशास्त्र, भौतिकी इत्यादि अन्याय नव ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों की शब्दावलियां- जिन्हें हमने ज्यादातर अंग्रेजी के हिंदी रूपांतरों के रूप में अपनाया है, उनमें संस्कृतनिष्ठता के चलते जटिलता का आभास होता है। लेकिन मैं कहूं कि यह जटिलता कहां नहीं है? क्या अंग्रेजी में भी जो शब्द लैटिन या फ्रेंच की मूल धारा से आए हैं, वे सरल हैं? नहीं। तब फिर हम हिंदी में संस्कृत से आए या बने शब्दों को सरलीकृत कैसे कर सकते हैं। कहना न होगा कि हिंदी अपने स्वभाव से ही सरलता की ओर अग्रसर भाषा है, लेकिन जहां पर पारिभाषिकता की बंदिशें होंगी, वहां हम उनके उन रूपों को एक सीमा से आगे सरलीकृत नहीं कर सकते। मेरे एक मित्र "हाइपोथिकेशन" का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं "हाइपोथिकेशन" का अर्थ है दृष्टिबंधक। अब जिन्हें इसके और सरलीकरण की दरकार हो, क्या उनके लिए "दृष्टि" को "नजर" और बंधक को "बंदी" का पर्याय मान "नजरबंदी" रूप दिया जा सकता है? नहीं। क्योंकि ऐसा करते ही मूल शब्द अपना अर्थ खो देता है। इसलिए पारिभाषिकी की कठिनाई के बावजूद जब तक हमें किसी अन्य भारतीय भाषा में या कि अरबी-फारसी में या कि "अनुकूलन" के जरिये उचित स्थानापन्न न मिले, तब तक हमें उसके तदवत् रूप को ही स्वीकार करना चाहिए। विधिक प्रकथनों के लिए तो यह बात और भी ध्यातव्य है। इसलिए हमें भाषा के रूप को सरल बनाने के लिए जो काम करने चाहिए वे हैं - क्रियापदों को आसान बनाना, सम्मिश्र वाक्यों की जगह छोटे-छोटे सारगर्भित वाक्यों का गठन। अंग्रेजी, अरबी, फारसी के बहुप्रचलित शब्दों का इस्तेमाल व अनुकूलन कर हिंदी को एक प्रवाहपूर्ण भाषा का स्वरूप देना। धार्मिक, कल्याणपरक एवं नीतिकथाओं मे नीति-कथाओं में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते होंगे कि गोरखपुर से निकलने वाली "कल्याण" पत्रिका से उस दौर के लाखों लोगों ने हिंदी सीखी थी तथा "चन्द्रकांता" व "चन्द्रकान्ता संतति" जैसे जासूसी उपन्यासों के रसास्वादन के लिए भी लाखों लोगों ने हिंदी पढ़ी। अपने शुरूआती दौर में उर्दू में लिखने वाले धनपत राय भी व्यापक हिंदी भाषी समुदाय से जुड़ने के लिए प्रेमचंद के रूप में हिंदी में उतरे और अपने उपन्यासों व कहानियों से उन्होंने अवध की बोली की जो मिठास भरी, उसने उन्हें उपन्यास सम्राट के शिखर पद तक पहुंचा दिया। अमीर खुसरो, रहीम, जायसी, कबीर, तुलसी, भारतेन्दु हरिशचन्द्र, प्रेमचंद तथा उर्दू शायरी में मीर आज इसीलिए अमर हैं कि उन्होंने भाषा को शास्त्रीयता की गिरफ्त से बाहर निकाला और उसे आमजन के लिए आसान बनाने की कोशिशें कीं। मीर ने लिखा - बात मुझसे रेखते में न कर, यह हमारी जबान है प्यारे।
एक बार बनारस में मुझे इटली विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर मरिओला ओफ्फ्रेदी से बातचीत का मौका मिला। हिंदी पर उनके प्रवाहपूर्ण अधिकार को देख मैं चकित था। हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के पठन-पाठन पर बातचीत में उन्होंने कहां कि यहां की साहित्यिक पत्रिकाओं की जो भाषा है - विशेषकर समीक्षा-आलोचना की भाषा, वह बहुत मुश्किल है, जबकि अंग्रेजी मे समीक्षा की भाषा आसान है। यह और बात है कि अंग्रेजी में रचनात्मक कृतियों की भाषा मुश्किल है। उनका कहना था कि समीक्षा की भाषा इतालवी में भी मुश्किल है और हिंदी में तो बहुत मुश्किल है। ध्यातव्य है कि यह कथन हिंदी पर असाधारण अधिकार रखने वाली एक विदेशी महिला का है। लेकिन मेरा यह मानना है कि हर भाषा में बोलचाल, कामकाजी तथा शैक्षिक-साहित्यिक भाषा के बीच फासला है। बोलचाल की भाषा से हम हिंदी अथवा अंग्रेजी किसी भी भाषा की परिभाषिकी का काम नहीं चला सकते। जहां तक साहित्य-समीक्षा तथा शैक्षिक हिंदी की दुरूहता और स्तरीयता का सवाल है, ऐसी स्थिति कमोवेश हर भाषा में है। किन्तु यह कम आश्वस्तिकारी बात नहीं है कि हिंदी के रचनात्मक साहित्य-उपन्यास, कथा-साहित्य, संस्मरण, व्यंग्य, रिपोर्ताज, फीचर आदि गद्य रूपों की भाषा सरल है। आज की कविता की भाषा सरल ही है। वह कठिन इसलिए लगती है कि उसकी इमेजरी, उसका भावबोध तथा कविदृष्टि पाठक के विशेष पाठकीय स्तर की मांग करती है।
हिंदी की तत्समनिष्ठता को लेकर इस पर क्लिष्टता के आरोप लगाये जाने की बात नयी नहीं है। डॉ. रघुवीर, जिन्होंने हिंदी शब्दनिर्मिति की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया, उनके नाम पर हिंदी के अनेक हास्यास्पद पर्यायों को सामने रखकर लोग भले ही हिंदी की खिल्ली उड़ाते नजर आते हों किन्तु जिस हिंदी का शाब्दिक आधार अभी केवल अंग्रेजी में उपलब्ध शब्द-संपदा के अनुवाद पर टिका हो, उसके प्रयोग-प्रचलन में आने तथा ग्राह्य होने में समय तो लगेगा ही। सवाल केवल "देश", "प्रजातंत्र" तथा "समाचार" जैसे शब्दों को "मुल्क", "जम्हूरियत" तथा "खबर" में बदल देने का नहीं है क्योंकि ऐसे आम-फहम शब्द तो हिंदी के व्यापक शब्दकोश में पहले से ही भारी संख्या में हैं- बल्कि यह देखने का भी है कि देश, प्रजातंत्र तथा समाचार जैसे शब्द अपने आप में ही इतने सरल हैं कि इनके स्थानापन्न की जरूरत की क्या है। इसके अलावा "प्रलेख", पुनर्भुगतान, प्रति-परीक्षा, शपथपत्र, पात्रता, पहचान, याचिका जैसे शब्दों के लिए भी पहले से ही दस्तावेज, अदायगी, जिरह, हलफनामा, हकदारी, शिनाख्त तथा अर्जी जैसे शब्द प्रचलित हैं और इसके लिए हिंदी वालों की कोई जिद कभी नहीं रही है कि ऐसे शब्दों की जगह कठिन हिंदी शब्दों का प्रयोग ही किया जाए। जो लोग हिंदी में प्रचलित और अब आमफहम ही चल परिवहन, संग्रहण, सावधि, प्रलेखीकरण, कार्यान्वयन, परिव्यय, समाशोधन, उपक्रम, आस्ति तथा दृष्टिबंधक जैसे शब्दों को ट्रांसपोर्ट, मोबिलाइजेशन, फिक्स्ड, डाक्यूमेंटेशन, इम्प्लीमेंटेशन, आउटले, क्लियरिंग, अंडरटेकिंग, एसेट तथा हाइपोथिकेशन, के रूप में ही चलाते रहने के हिमायती हैं, वे बेशक बाहर से अंग्रेजी शब्दों के सरल प्रतिरूपों के हिमायती हों किन्तु उसके लिए वे अपनी ओर से नये पारिभाषिकों को सीखने-प्रयोग करने की कोई तकलीफ नहीं उठाना चाहते। ऐसा वर्ग ही आगे चलकर कहता है कि ऐसी हिंदी (बनाम हिंग्रेजी) से तो अंग्रेजी का प्रयोग ही अच्छा है, चाहे अंग्रेजी के मसौदे को क्लिष्ट एवं अग्राह्य बनाने के लिए उसे शब्दकोश का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। इसके लिए वे प्रस्तुत रहेंगे क्योंकि इससे उनकी भाषा की धाक जमती है। और राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में कहें तो ऐसा समुदाय ही यह सोचता है कि "हमारे चिंतन की सूक्ष्मता इतनी सूक्ष्म है कि वह महारानी एलिजाबेथ की भाषा के सिवा और किसी भाषा में लिखी ही नहीं जा सकती।"
डॉ. नगेन्द्र कहा करते थे भाषा की सरलता एक सापेक्षिक गुण है जो प्रसंग, वक्ता, बोधक्य आदि पर आश्रित है। मंतव्य यह कि जैसा प्रसंग वैसी भाषा। चिंतन यदि सूक्ष्म और जटिल होगा तो भाषा का स्वरूप भी जटिल होगा। हर व्यक्ति की भाषा, वक्तृत्व तथा विषय पर अपनी पकड़ होती है। उसके लेखन-संभाषण में भाषा का संप्रेषित रूप उसके भाषिक व्यक्तित्व का ही अंश होता है। यह माना जाता है कि भाषा की जटिलता विचार की जटिलता की छाया है। किंतु विचारक में यह क्षमता होनी चाहिए कि वह याथशक्य विचार और चिंतन की सूक्ष्मता व जटिलता को आसान भाषा के जरिये व्यक्त करे। कबीर के पद सरल हैं और जटिल भी। सरल इतने हैं कि गांव-गिरांव घूमते जोगी-फकीर भी खंझडी पर मस्ती के साथ उनके निर्गुनिया पद, दोहे आदि गाते नजर आते हैं तथा कठिन इतने कि बड़े-बड़े भाषा-साधक, कवि-मनीषी उनके तत्व-ज्ञान, निर्गुण-ब्रह्म के अवधारण में उलझ कर रह जाएं। कबीर तो पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर उनके पदों की व्याख्या इतनी दुष्कर क्यों है। इसलिए कि उनकी भाषा कठिन नहीं है, उनका चिंतन प्रगाढ है। चिंतन को समझ लें तो भाषा की कठिनाई अपने आप दूर हो जाती है। हिंदी की कठिनाई भी मूलत: भाषा की कठिनाई नहीं, चिंतन को, विचार को, विषय को, शास्त्र को ठीक से न समझ पाने की कठिनाई है। और यही कठिनाई आज अंग्रेजी से किये गये हिंदी अनुवादों में दिखायी देती है।
हिंदी और अंग्रेजी का रिश्ता बहुत पुराना है। यह केवल एक भाषा का दूसरी भाषा के साथ बनने वाला स्वाभाविक रिश्ता नहीं है, बल्कि इसके पीछे ब्रिटिश साम्राज्यवाद की गहरी जड़ें हैं। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने हमारे देश पर आधिपत्य जमाने के लिए ही हुक्का पीना सीखा, हिन्दुस्तानी रखैलें रखीं तथा भारतीय भाषाओं के व्यवस्थित प्रशिक्षण के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज की नींव रखीं। हम गर्व से भले कहें कि अंग्रेजों की दिलचस्पी भारत में, भारतीय भाषाओं के विकास में रही है, किन्तु सच्चाई यह है कि उन्होंने यदि भारतीय भाषाओं के व्याकरण लिखे, शब्दकोश बनाए, भाषा-शिक्षण की पुस्तकें तैयार कीं तो इसलिए कि ईस्ट इंडिया कंपनी के कारिंदे, सिपह-सालार बेहतर शासन चलाने के लिए भारतीय भाषाएं सीख सकें। उन्होंने रेलें चलाईं तो इसलिए कि भारत का सस्ता माल या कि उत्पाद यूरोप के देशों में ले जाकर मुनाफे पर बेच सकें। उन्होंने भाषा सर्वेक्षण कराये तो इसलिए कि वे हिंदी और अन्य देशी भाषाओं की ताकत का आकलन कर सकें। ग्रियर्सन का खुद का मानना था कि "हिंदी भाषा के पास देशज शब्दों का विशाल भण्डार है और सूक्ष्म विचार व्यक्त करने के लिए सम्यक् शब्दतंत्र। हिंदी का शब्दभंडार और अभिव्यंजना शक्ति किसी मायने में अंग्रेजी से कम नहीं है।" और आज आजादी के पचास वर्ष बाद भी भारतीयों द्वारा भारतीय भाषाओं का ऐसा कोई देशव्यापी सर्वेक्षण नहीं कराया गया। जिससे यह पता चलता कि हिंदी की शक्ति और श्रीवृद्धि कितनी हुई, अन्य भारतीय भाषाओं के प्रसार की क्या स्थिति है तथा अंग्रेजी हमारी व्यवस्था में किस हद तक सेंध लगा चुकी है। ऐसा शायद इसलिए कि हमारे भीतर औपनिवेशिकता का रक्त अभी भी बह रहा है और हमें अपनी भाषा की, राष्ट्र की कतई चिंता नहीं है।
हम हिंदी को सरल बनाने की बात सोचते हैं, किन्तु उपनिवेशवाद की छाया में पली-पुसी पीढ़ी हिंदी का विरोध करती है। सरकारी कामकाज में प्रयोग की बाध्यता के बावजूद अनेक प्रान्तों में अव्वल तो हिंदी की स्वीकार्यता ही नहीं है और यदि है भी तो वह ज्यादातर साइनबोर्डों, पत्रशीषों, मुहरों तथा अधकचरे अनुवाद प्रस्तुत किये जा रहे हैं, उससे हिंदी की स्थिति और भी हास्यापद होती गयी है।
एक बैंक की सेवा नियमावली का अवलोकन करते हुए मेरी दृष्टि उसके अनूदित पाठ पर गयी। मैंने पाया कि वहां को क्दृदढत्द्धथ्र्ठ्ठद्यत्दृद को "पुष्टीकरण", च्र्ड्ढद्धथ्र्त्दठ्ठद्यत्दृद को "पर्यवसान’ क्दृदध्ड्ढन्र्ठ्ठदड़ड्ढ को "प्रवहण" च्र्द्धठ्ठदद्मढड्ढद्ध को "अंतरण" च्र्ड्ढद्धथ्र्त्दठ्ठथ् एड्ढदड्ढढत्द्यद्म "सेवांत प्रसुविधाएं", ख्दृत्दत्दढ़ च्र्त्थ्र्ड्ढ को "पद ग्रहण काल" घ्ठ्ठन्र्ठ्ठडथ्ड्ढ को "संदेय" तथा क्थ्दृद्मत्दढ़ ॠथ्थ्दृध्र्ठ्ठदड़ड्ढ को "संवरण भत्ता" लिखा गया है। यदि ध्यान से देखें तो एक प्रशासनिक सेवा नियमावली में ऐसे अनुवाद कितने अव्यावहारिक एवं दुरूह लगते हैं। तथा अलग से कोई "पर्यवसान" या कि "प्रवहण" कहे तो हम कतई अनुमान भी न लगा पाएंगे कि ये च्र्ड्ढद्धथ्र्त्दठ्ठद्यत्दृद और क्दृदध्ड्ढन्र्ठ्ठदड़ड्ढ के ही प्रतिरूप हैं। क्या इन्हें "स्थायीकरण", "सेवा समाप्ति", "वाहन", "स्थानांतरण", "सेवानिवृत्ति लाभ", "कार्य ग्रहण अवधि", "देय" तथा "लेखाबंदी भत्ता" लिखा जाता तो बेहतर होता। किंतु "मक्षिका स्थाने मक्षिका" अनुवाद की यही सद्गति होती है। अन्यथा, आज से नहीं, सैंकड़ों वर्षों से अनुवाद होता आया है। हिंदी में ही शेक्सपीयर के नाटकों के रांगेय राधव कृत अनुवाद, बंगला उपन्यासों के हिंदी अनुवाद, जान गाल्सवर्दी की पुस्तक "स्ट्राइफ" का प्रेमचंद कृत अनुवाद, रूस के लेखकों गोर्की, तोल्सतोय, पुश्किन, दास्तोव्स्की आदि के अनुवाद, हेनरी जेम्स के उपन्यास "द पोट्रेट ऑफ ए लेडी" का मोहन राकेश कृत अनुवाद "एक औरत का चेहरा", डोमनिक लेपिएर की विश्वचर्चित कृति "द सिटी आफ ज्वाय" का मोहिनी राव कृत अनुवाद, पंडित नेहरू की आत्मकथा का हरिभाऊ उपाध्याय कृत अनुवाद "मेरी कहानी" तथा सीमान द बोउआ की "द सेकंड सेक्स" का प्रभा खेतान द्वारा किया गया अनुवाद- "स्त्री: उपेक्षिता"। इन अनुवादों के अलावा बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में ही प्रख्यात विकासवादी जीव वैज्ञानिक हैकल की मानक कृति "दि रिडिल ऑफ दि युनिवर्स" का आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने "विश्व प्रपंच" शीर्षक से हिंदी में जो अनुवाद किया, वह भाषा की रवानगी और बोधगम्यता के कारण आज भी एक आदर्श प्रयास के रूप में स्मरणीय है - और यह काम आचार्य शुक्ल ने तब अंजाम दिया जब न तो केन्द्र सरकार और न विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा पारिभाषिक शब्दावलियों के निर्माण के लिए आयोगों, संस्थानों, समितियों आदि का गठन हुआ था, न ही पारिभाषिक शब्दकोश निर्मित हुए थे। सच पूछिये तो हैकल की उस कालजयी कृति के महत्व को समझकर हिंदी में उसके अनुवाद के प्रकाशन के बाद ही अनेक अग्रगण्य योरोपीय भाषाओं मे उसका अनुवाद सामने आया। कृति के शीर्षक के ही अनुवाद को देखें तो "दि रिडिल्स के अनुवाद के लिए "पहेलियां" या "प्रहेलिकाएं" जैसा शब्द न रखकर आचार्य शुक्ल ने भारतीय दर्शन में बहुधा प्रयुक्त "प्रपंच" शब्द का इस्तेमाल कर "विश्व प्रपंच" इस शब्द युग्म को यथातथ अनुवाद की कोटि में रखते हुए भी भारतीय विचार-सरणि की आधार-भित्ति पर स्थित किया।
इन अनुवादों को पढ़ने वाले हिंदी समाज को कभी भाषा की कठिनाई का वैसा बोध नहीं हुआ जितना आज के कार्यालयीन साहित्य के अनुवाद की भाषा को लेकर कठिनाई महसूस की जा रही है। स्पष्ट है कि इसके लिये केवल अनुवादक ही दोषी नहीं है, वह पूरी पृष्ठभूमि दोषी है जिसके तहत यह मान लिया गया है कि मौलिक प्रयत्नों के बदले अनुवाद के जरिये हिंदी को बढ़ावा दिया जाये। हमारे देश में जहां की भाषा हिंदी है, दूरदर्शन व आकाशवाणी के समाचारों तक में पहले अंग्रेजी पाठ तैयार होता है, फिर हिंदी में उसका अनुवाद किया जाता है। ऐसी स्थिति में हिंदी में मौलिकता कैसे पैदा हो सकती है और जो भाषा मौलिक रूप में व्यक्त नहीं होती वह सर्वथा सरल भी नहीं होती। भाषा सीखने के बारे में आलोचक रामविलास शर्मा कहते हैं, "जनता की तरफ कान लगाये रखो, लोगों से मिलते-जुलते रहो और उनकी बातें सीखो और जो तुम्हारे यहां बहुत अच्छे लेखक हों, उनसे सीखो कि उन्होंने भाषा का कैसा व्यवहार किया है।" वे इस बारे में तोल्सतोय का उदाहरण देते हैं। तोल्सतोय जब पचहत्तर साल के थे, उनके उपन्यासों का दुनिया भर की बड़ी-बड़ी भाषाओं में अनुवाद हो चुका था तब एक बार वह गांव में अपनी डायरी लेकर कुछ लिख रहे थे व घूम रहे थे। मास्को के कुछ छात्र उनसे भेंट करने आए तो घर में पता चला कि वह गांव गये हैं। वे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गांव पहुंचे और उन्होंने तोल्सतोय से पूछा कि आप इन किसानों के बीच क्या कर रहे हैं? तोल्सतोय ने कहा : "मैं रूसी भाषा सीख रहा हूं।" जो व्यक्ति पचहत्तर वर्ष की उम्र में अपनी भाषा की दीगर गहराइयाँ सीख सकता है, उससे हमें सीखना चाहिए। आज स्थिति यह है कि कोई भी व्यक्ति जनता से सीखना नहीं चाहता। अच्छे लेखकों को पढ़ता नहीं, सड़क छाप हिंदी में लिखे उपन्यास और घटिया अंग्रेजी पाकेट बुक्स पढ़ता है तो उसे अच्छी हिंदी कैसे आयेगी। हम किसी की अच्छी भाषा, अच्छे भाषण को पढ़-देख चमत्कृत हो उठते हैं कि ऐसी भाषा तो हमारे लिए जैसे नयी है और हम रोज सुनते हैं पर ध्यान नहीं देते। हाट-बाजार में, गली-कूचों में, खेत-खलिहानों में, दुकानदारों, आढतियों, मिस्त्रियों के बीच नित नयी भाषा जन्म ले रही है और हम भाषा के इस बिखरे साम्राज्य से अनजान हैं। क्योंकि हम सीखना नहीं चाहते।
अच्छी भाषा मात्र व्याकरण पढ़ने से नहीं आती, हिंदी में रचे गये सत् साहित्य को पढ़ने से आती है। आज समाज में ही हिंदी साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव है तो उसे हिंदी का ज्ञान कैसे हो। क्योंकि उसमें तो हिंदी सीखने-पढ़ने की प्रवृत्ति ही नहीं है- बिना भीतरी ललक के, उत्सुकता के वह हिंदी का ज्ञान पाना चाहता है। आज हिंदी से जीविकाबद्ध लोगों की हिंदी पर ही दृष्टिपात करें तो उनमें से अधिकांश के हिंदी से भाषा की विरासत का बोध होता है। ऐसी हिंदी जिस पर अनुवाद की यान्त्रिक छाया विद्यमान होती है- बाणभट्ट के उस बेटे की याद दिलाती है जो अनुवाद-निपुण तो है परन्तु भाषा-निपुण नहीं। उसकी भाषा में मौलिकता का, दृष्टि का, प्रस्तुतीकरण का नयापन नहीं है। दूसरे शब्दों में, वह साहित्य-संस्कार से मार्जित नहीं है और तब ही उसके कण्ठ से "शुष्कं वृक्षं तिष्ठत्यग्रे" जैसा शुष्क अनुवाद फूटता है। वह चाहकर भी अपने दूसरे भाई की कला-चेतन और साहित्यिक दृष्टि से संवलित भाषा तक नहीं पहुंच पाता जो इसी पदावली को "नीरस तरूरिह विलसति पुरत:" कहकर बाणभट्ट को अपने कवि-व्यक्तित्व से आश्वस्त कर देता है। आज मीडिया के दृश्य-संजाल पर जिस तरह की मीडियाकर हिंदी का वर्चस्व है वही हमारे समाज के हिंदी-ज्ञान का आदि स्रोत हो कर रह गया है। हमारा समाज टीवी, वीडियो, इण्टरनेट तथा केबल नेटवर्क के इर्द-गिर्द सिमटकर आज एक ऐसे अन्त:पुर में रम गया है जैसे ज्ञान के अनन्त द्वार इन्हीं स्रोतों से खुलते हों। हम अंग्रेजी की ही बात करें तो क्या अंग्रेजी कविता की अच्छी समझ के लिए शैली, कीट्स, बायरन, ग्रे और इलियट को पढ़ना जरूरी नहीं है, क्या अच्छे और पैने अंग्रेजी गद्य के लिए शेक्सपियर, बर्नार्ड शॉ, आर्थर मिलर, हेमिंग्वे, गाल्सवर्दी, चाल्र्स डिकेन्स, कैथरिन मैन्सफील्ड जैसे लेखकों को पढ़ना अनिवार्य नहीं? नि:संदेह, अनिवार्य है। हिंदी ज्ञान के लिए हिंदी साहित्य के पठन-पाठन का वातावरण बनना जरूरी है। हिंदी में नित्यप्रति विकसित हो रही पारिभाषिकी की समझ के लिए भी संबंधित शास्त्र की समझ अनिवार्य है। पिछले वर्षों में हिंदी पत्र-पत्रिकाएं साप्ताहिक हिन्दुस्तान, संडे मेल, वामा, सारिका, दिनमान, दिनमान टाइम्स, धर्मयुग, पराग तथा रविवार आदि एक-एक कर जिस तरह काल-कवलित हुई हैं, उसकी वजह केवल हिंदी की घटती रीडरशिप ही नहीं है बल्कि पूंजीवादी घरानों का हिंदी पत्रकारिता के रसूख एवं स्तर को लगातार नीचे गिराना भी रहा है, क्योंकि विज्ञापन कमाने में हिंदी पत्रिकाओं की स्थिति आज भी दोयम दर्जे की ही है। लिहाजा बाजार अंग्रेजी की पत्रिकाओं से अंटा पड़ा है। किन्तु हमें हिंदी की इस दुर्दशा पर भी उदास होने का कोई हक नहीं है क्योंकि आज हिंदी की जो सर्जनात्मक पत्रिकाएं निकल रही हैं, उन्हीं का पठन-पाठन हिंदी क्षेत्रों में कितना है? ऐसे हिंदी जन कितने है जो पहल, वसुधा, दस्तावेज, समकालीन भारतीय साहित्य, पूर्वग्रह, साक्षात्कार आदि पत्रिकाओं के सर्जनात्मक योगदान से परिचित हैं। क्या इन्हें पढ़ना-जानना सिर्फ साहित्यिक जनों का कर्तव्य है? क्या हिंदी के अध्ययन-अध्यापन एवं जीविकोपार्जन से जुड़ी नयी पीढ़ी इन पत्रिकाओं में आकार ले रहे हिंदी के नये स्वरूप से परिचित हैं - शायद नहीं और सूदूर कस्बों में तो इन पत्रिकाओं की कोई आहट भी सुनाई नहीं देती, क्योंकि इनके पास विक्रय का कोई मजबूत तन्त्र नहीं है और न ही आज के उपभोक्ता समाज में इन्हें पढ़ने की दिलचस्पी ही - और तो और - लाखों-करोड़ों का अनुदान पचाने वाले महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों तक में ऐसी पत्रिकाएं देखने को नहीं मिलती- तो फिर अच्छी हिंदी समाज मे कैसे आएगी?
हिंदी की पारिभाषिकी के अपने कोई "बैरियर्स" नहीं हैं। उनके अन्य विकल्पों के लिए हिंदी के द्वार हमेशा खुले हैं। कठिन पारिभाषिकों को जहां तक सरल और सम्प्रेषणीय बनाया जा सके, बनाया जाना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो तरक्की अंग्रेजी ने दो सौ वर्षों में की है वह हिंदी महज दो-तीन दशकों में नहीं कर सकती क्योंकि उसकी राह में अंग्रेजी ही नहीं, अंग्रेजी मानसिकता की गहरी किलेबन्दी है। अंग्रेजी की सरलता की हाँक लगाने वाले भी जानते हैं कि जीव विज्ञान, भौतिकी, रसायन शास्त्र और आयुर्विज्ञान आदि विषयों की पारिभाषिकी भी कोई सरल नहीं है- वह गहन अभ्यास से ही ग्राह्य है। रोजी-रोटी से नाभिनालबद्ध होने के चलते उसके काठिन्य को भी लोग पचा लेते हैं किन्तु हिंदी की थोड़ी सी भी कठिनाई उन्हें रास नहीं आती। जो लोग हिंदी की पारिभाषिकी की कठिनाई का सवाल खड़ा करते हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि आज की खुली अर्थव्यवस्था में, जबकि भारत में एक नया विश्व-बाजार पैदा हो रहा है, यद्यपि यह अंग्रेजी के वर्चस्व का नया दौर है। तथापि उपभोक्तावाद के विकास और अपने-अपने उत्पादों का बाजार प्रशस्त करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी हिंदी के लुभावने विज्ञापनों के साथ भी मीडिया के दृश्य पटल पर छा चुकी है। एक नयी हिंदी बन रही है। एक नया भाषा-समाज विकसित हो रहा है। किन्तु कम्प्यूटरीकरण के क्षेत्र में हिंदी का प्रवेश अभी भी घुसपैठिये-सा ही है, जिससे हिंदी के रास्ते में रुकावट पैदा हुई है। भू-बाजारीकरण की शक्तियां भी हिंदी की पक्षधर नहीं है। यही समय है जब कि हिंदी को अधिक वरीयता तथा समर्थन मिलना चाहिए और यह काम केवल केवल हिंदी अधिकारियों एवं हिंदी के आचार्यों का नहीं है बल्कि भारत के नागरिकों, हिंदी-अहिंदीभाषी समस्त जनता का है, जिससे वास्तविक अर्थों में वह साहित्य, कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी तेजी से बदलते सूचना समाज और खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में अपना हस्तक्षेप कायम रख सकें। यह तभी संभव है जब हिंदी के कम प्रचलित और दुरूह-से लगते पारिभाषिकों को भी प्रयोग में लाकर ग्राह्य एवं सर्वसमावेशी बनाया जाए। इसके लिए हिंदी के अधिकारियों और अध्यापकों से ज्यादा हिंदी के कार्यकर्ताओं की जरूरत है।

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