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भिन्न षड्ज...
01-Jan-2018 02:49 PM 3741     

इस बार इंग्लैंड में लगभग दस वर्षों बाद ऐसी भयानक बर्फबारी हुई है। हमारे शहर वॉलसॉल में भी सड़कों पर आठ-आठ इंच बर्फ जमी थी। जिंदगी की सारी भागदौड़ पर प्रकृति ने विराम-सा लगा दिया था, यों कहूँ कि अपने-आप से बातचीत करने का एक अवसर दिया।
बर्फ की वजह से स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि सभी बंद थे। बेटा बोर्नमथ में रहता है, वह घर से ही ऑफिस का काम कर रहा था। मुझे खाँसी-ज़ुकाम हो रहा था, सिर दर्द से भन्ना रहा था, आवाज़ साथ नहीं दे रही थी, सोच रही थी कि दोपहर के भोजन के पश्चात थोड़ी देर विश्राम करूँगी, लेकिन उसने जबरदस्ती बैठा लिया। बोला, "आइये आपको एक बहुत अच्छी चीज़ दिखाता हूँ। इस बहाने हम मम्मी-बेटा साथ बैठ सकेंगे।" अस्वस्थता के बावजूद मेहमान बेटे के मनुहार भरे आग्रह को टाल नहीं सकी। वह मेरे लिये कंबल ले आया, आप बस यहीं कंबल ओढ़कर बैठ जाइये, सो मैं, बेमन से बैठ गई।
पद्मविभूषण ज्ञान सरस्वती पंडिता किशोरी अमोनकर के 80वें जन्मदिन पर फ़िल्म अभिनेता, निर्देशक अमोल पालेकर द्वारा बनाई एक फ़िल्म को देखने के लिये। बीच-बीच में अनेक छोटे-मोटे व्यवधान हुए। लेकिन पता ही नहीं चला कि कैसे एक घंटा निकल गया। फिल्म समाप्त होने पर विस्मृत-सी अवस्था में मेरे मुख से एक ही शब्द निकला। "अद्भुत!" किशोरी ताई का गायन, संगीत के प्रति उनकी गहन निष्ठा एवं लगन, गुरु के प्रति उनकी अगाध आस्था और समर्पण और अमोलजी के द्वारा इस विराट व्यक्तित्व को उसके सहज सौंदर्य के साथ, उसकी विशालता में प्रस्तुत करना! सभी कुछ अद्भुत! अद्भुत! साधुवाद अमोलजी! पूरा वृत्तचित्र किशोरीजी के संगीत, उनके व्यक्तित्व और उनकी सोच-प्रक्रिया पर केंद्रित था। कहीं कोई विषयांतर नहीं।
एक बार शास्त्रीय संगीत सीखने की चाहत हुई थी, प्रारंभिक पाठों में जाना कि संगीत के सात स्वर। षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत एवं निषाद। सब भिन्न होते हुए भी अभिन्न। प्रत्येक स्वर का नाद क्रमशः ऊँचा होते जाता है। इन सात सुरों को सप्तक कहते हैं। सप्तक के कुशल प्रयोग अर्थात स्वरों के मेल और उनके उतार-चढ़ाव से बनने वाली मनोमुग्धकारी सुंदर रचना को राग कहते हैं। षड्ज का हर राग में होना जरूरी है मानो वह इस खानदान के बड़े बुज़ुर्ग हों जिनकी उपस्थिति के बिना कोई कार्य संपन्न नहीं हो सकता। जो स्वर किसी राग में बार-बार आएँ उन्हें वादी कहते हैं। जो स्वर वादी से कम किंतु अन्य स्वरों की अपेक्षा अधिक आएँ उन्हें संवादी स्वर कहते हैं। मैं सोच रही थी कि यह संगीत शास्त्र है अथवा संभाषण कला?
मेरा बेटा पुलकित प्रसिद्ध तबला वादक उस्ताद सरवर साबरी का शिष्य है। भारत में जन्मा, ब्रिटेन में पला-बढ़ा, पच्चीस वर्षीय यह युवा भारतीय शास्त्रीय संगीत की विलक्षणता और आध्यात्मिक प्रभाव से इतना मोहित और चमत्कृत है कि शास्त्रीय संगीत के बड़े-बड़े कलाकारों की कला का आस्वाद लेना ही उसका शौक बन गया है। उसकी वजह से मुझे भी इन बड़े कलाकारों की पुरानी से पुरानी, दुर्लभ रिकॉर्डिंग सुनने का अवसर प्राप्त होता है। भला हो तकनीकी विकास का, यू-ट्यूब पर क्या कुछ नहीं मिल जाता। इस फिल्म को देखना एक उदात्त अनुभव से गुज़रने के समान था।
किशोरीजी की अलौकिक, भावपूर्ण गायकी को शास्त्रीय संगीत-क्षेत्र के बड़े-बड़े दिग्गजों ने एक स्वर से सराहा है। इस वृत्तचित्र में उनकी गायकी की विशेषताओं को लेकर उस्ताद ज़ाकिर हुसैन, पं. शिवकुमार शर्मा, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, उस्ताद अमज़द अली खाँ तथा पं. सुरेश तलवलकर आदि ने सटीक टिप्पणियाँ की हैं। एक जगह पं. सुरेश तलवलकर कहते हैं "किशोरी ताई शब्दों को एकदम सोने की तरह, तराजू में तौल कर प्रयोग करती हैं। शब्दों के ह्रस्व-दीर्घ का उच्चारण की शुद्धता, स्वरों के भीतर निहित भाव की अभिव्यक्ति आदि के प्रति वे अत्यंत सतर्क रहती हैं।"
कितनी ठोस, कितनी सटीक बात! यही तो कला है। जब गायन-सिद्धि निरंतर अभ्यास-साधना से ही प्राप्त हो सकती है तो वाचा-सिद्धि क्यों नहीं? हम मनुष्य नित-निरंतर परस्पर वार्तालाप करते रहते हैं। कितना अभ्यास होता है हमें बोलने का, कम से कम हम तो यहीं समझते हैं। जन्म से मृत्यु तक न जाने कितने करोड़ छोटे-बड़े शब्द हमारे इस छोटे से मुँह से निकल जाते हैं। लेकिन क्या हम बोलने से पहले सोचते हैं? क्या कभी अपनी बात को तौलते हैं? क्या उसकी सार्थकता पर कभी विचार करते हैं? शायद, अपनी कही बात के अंदाज़ पर, उसके नाद पर कभी हम विचार तक नहीं करते। बातचीत के इसी आदान-प्रदान में कभी-कभी कोई बात चुभ जाती है। क्यों? क्योंकि सुर बदल जाता है। जहाँ सुर बदला बस, वहीं बात बिगड़ जाती है। एक मात्रा बदल जाने से अर्थ का अनर्थ हो जाता है।
इतिहास साक्षी है नारायण राव पेशवा की हत्या में रघुनाथराव की पत्नी आनंदीबाई की क्या भूमिका थी। जिसने "नारायण रावासं धरावे" को बदलकर "नारायण रावासं मारावे" कर दिया। "ध" च "मा" करणे यह कहावत मराठी में तब ही से प्रचलित हुई। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ स्वर बदलने से बात बदल जाती है। अर्थ बदल जाते हैं। मूड बदल जाता है। संप्रेषणीयता बाधित होती है।
किशोरी ताई के विषय में तलवलकरजी की उपरोक्त टिप्पणी से एक घटना चलचित्र की भाँति मानस पटल पर घूम गई। उस समय मेरा भतीजा भोलू एक-डेढ़ वर्ष का था, तब मेरी उम्र कुछ चौदह-पंद्रह की रही होगी। एक दिन उसे संभालते-खेलते मैंने देखा कि वह एक लकड़ी उठाने की चेष्टा कर रहा था, संभवतः उसे रोकने की दृष्टि से जोर से "ऐ" चिल्ला पड़ी। स्वर की तीव्रता से बच्चा घबरा कर न केवल सहम गया बल्कि रुँआसा होकर होठ बिसूरने लगा, अब मेरे द्रवित होने की बारी थी क्योंकि उसे रुलाने का मेरा कोई उद्देश्य न था। सो सहज ही "ऐ" के आगे "बी सी डी" जोड़कर गीत बना दिया और अनुभव किया कि मेरे स्वर बदलते ही भोलू के बिसूरते होठ सामान्य हो गये। वह निरापद हो पुनः खेलने-किलकने लगा। लेकिन अपने मनोरंजन के लिये यह खेल मैंने उसके साथ कई दिनों तक खेला। तब उम्र कम थी, लेकिन आज उस घटना की सहज स्मृति ने विचार करने को बाध्य कर दिया कि छोटे से बच्चे का व्यवहार भी बिना स्वर और संगीत का ज्ञान कराए या सिखाए ही बदले हुए स्वर से कितना प्रभावित होता है। आज भोलू उर्फ़ डॉ. अनिरुद्ध सिरोठिया भारतीय नौ-सेना में चिकित्सक हैं और स्वयं भी बहुत अच्छा गाते हैं।
शायद जन्म लेते ही हम स्वरों की कोमलता और तीव्रता का अनुभव करने लगते हैं। बल्कि हमारी सभी ज्ञानेंन्द्रियाँ आँख, नाक, कान, जिह्वा और स्पर्श चैतन्य हो उठती हैं। तभी तो बालक स्नेहिल स्पर्श, बोली, दृष्टि को बिना सिखाए, बिना कहे समझ जाते हैं।
किशोरी ताई कहती हैं कि जो स्वर नहीं हैं उन्हें जितना संभव हो टालना चाहिये, क्योंकि इससे स्वरों के सौंदर्य की हानि होती है। विडंबना यह है कि आज बेसुरेपन की बाँसुरी पर ही मोर नाच रहे हैं। सुर-लय का बोध शून्य हो गया है। आज संपूर्ण विश्व में हर क्षेत्र में सुरहीनों की तूती बाज रही है।
यह फिल्म मेरे मन पर एक गहरी छाप छोड़ गई। संगीत की इस महान- साधिका के जीवन में एक ऐसा समय भी आया जब वे दीर्घकाल के लिये अपनी आवाज़ खो बैठीं। एक गायिका, एक साधिका, जिसकी शिराओं में संगीत दौड़ता हो। उसका कंठ साथ छोड़ दे तो उसके लिये उससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा? लेकिन किशोरीजी की सतत् साधना, अटूट निष्ठा और अखंड आस्था का ही परिणाम था कि उस कठिन समय में भी उन्होंने अपना संतुलन नहीं खोया। वे उसे ईश्वर का वरदान मानते हुए बताती हैं कि उस अनिवार्य मौन व्रत से उनकी अंतर्यात्रा, स्व का शोध, आरंभ हुआ, जिसमें वे डूबती चली गईं। वे कहती हैं कि उन्होंने संगीत के विषय में जो कुछ पहले सीखा था, उन दस वर्षों में उस पर चिंतन-मनन किया और अंतर्गान में उतरती गईं। उन्हें विश्वास था कि उनकी खोयी हुई आवाज़ एक दिन पुनः लौटेगी। यह उनकी गहन आस्था का ही परिणाम था कि न सिर्फ उनकी आवाज़ लौटी अपितु अपनी उत्कृष्ट गायकी से उन्होंने शास्त्रीय की उन ऊँचाईयों को छुआ है जहाँ सिर्फ़ किशोरी ताई जैसा समर्पित व्यक्तित्व ही पहुँच सकता है।
जो स्वर समर्पण, स्वानुभूति और संवेदना से उपजते हैं वे हृदय को झंकृत कर देते हैं। यही कारण है कि दर्शक उनके संगीत के रंग में रंग जाते हैं। वे कहती हैं कि वे मनोरंजन के लिये नहीं बल्कि श्रोता की आत्मा को जागृत करने की कामना से गाती हैं। वे कार्यक्रम की तारीख निश्चित होने के साथ ही कौन-सा राग गाना है यह तय कर लेती हैं और इतने वर्षों के गायन के पश्चात भी महीनों एकाग्रता से उस राग विशिष्ट का अभ्यास करती हैं। उनके विषय में लोगों को शिकायत थी कि वे कार्यक्रम के पहले किसी से ठीक तरह से मिलती या बात नहीं करतीं। लेकिन इस फिल्म में उन्होंने इस बात का खुलासा करते हुए कहा कि कार्यक्रम के लिये किये गये महीनों के सतत् अभ्यास के बाद वे मानसिक रूप से उस राग में पूर्णतः निमग्न होती थीं। वे एक प्रकार से ध्यानावस्था में होती थीं। किसी से संवाद करना, अर्थात उस विशिष्ट ध्यानावस्था का भंग होना। शायद, यही कारण है कि जब वे गाती, तो अपने साथ-साथ श्रोताओं को भी उसी भाव समाधि में पँहुचा देती थीं। कार्यक्रम के पूर्व उनके किसी से बातचीत न करने का कारण सुनकर मेरा मन उनके प्रति असीम सम्मान से भर गया।
किशोरी ताई जयपुर घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व करती थीं। वहाँ का वैशिष्ट्य; संगीत की तकनीकी बारीकियाँ है। लेकिन किशोरी ताई संगीत-चमत्कार उत्पन्न करने लिये नहीं, बल्कि ईश्वर के लिये गाती थीं। उनका ईश्वर के लिये किया गया गायन उन्हें संगीत-समाधि में पहुँचा देता था। स्वर के साथ किशोरी ताई की गहरी अंतरंगता, राग के साथ उनका गहन तादात्मीकरण ही उन्हें एक विलक्षण भावपूर्ण गायकी प्रदान करता था। जिससे श्रोता भी उनके साथ-साथ उनकी गायकी के इस अद्भुत रस में तल्लीन हो जाते हैं और ब्रह्मानंद सहोदर सुख को अनुभूत करते थे।
वे, 7 अप्रैल 2017 को अपनी इस लोक की यात्रा को संपूर्ण कर महायात्रा पर चली गईं। आज, वे सशरीर हमारे बीच में नहीं है। लेकिन आपनी गायकी से वे हमारे बीच में सदा-सदा के लिये उपस्थित रहेंगी।
व्यवसायिकता के इस युग में जहाँ कला की मौत हो गई है, बाज़ारवाद ने मनुष्य को पूरी तरह अपने शिकंजे में कस लिया है। मूल्यहीनता के इस युग में जहाँ एक गीत गाकर लोग स्वयं को मियाँ तानसेन समझने लगते हैं, एक कहानी लिखकर स्वयं को प्रेमचंद समझने की भूल कर बैठते हैं। वहाँ किशोरी ताई का संगीत के प्रति ऐसा समर्पण अद्भुत एवं दुर्लभ ही नहीं अपितु अनुकरणीय भी है। मैं विस्मृत-सी सोच रही थी कि किशोरी ताई की भाँति साधारण मनुष्य भी "स्वर" के प्रति इतना सजग हो जाए तो हमारा संपूर्ण जीवन संगीतमय हो उठेगा।

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