ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दोहे फागुन के
01-Mar-2019 03:48 PM 1227     

मुरली तौरी बांस की, फिर भी अति इतरात
बांस के जंगल काट दूं तो निपटंू तौसे नाथ

होठ भले प्रभु तौरे हो उनमें मेरी मिठास
तीन लोक का क्या करूं तुम न मौरे पास

कहां देवर की फब्तियां कहां भौजी की गार
एसएमएस से मना रहे होली का त्यौहार

होली नाशै बैर अहं नेह बरसावै फाग
क्या सोचे है बावरा फाग खेल ले फाग।
फागुन और मधुमास में, भटक गया वैराग
गौरी की अंगड़ाई से, लगी फाग में आग

आज भंग औ रंग है, रंग में भंग न डार
लगे साठ की डोकरी नई नवेली नार

टेसू कहे गुलाब से, फागुन करे पुकार
मेरा रंग तेरी महक, जोबन चढ़े बहार

कृष्ण कहे सुन राधिके क्यों तू रुठी जात
सौतन मुंह लागि रही तौसू करूं न बात

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^