ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राजनीति के घाट पर संतन की भीड़
01-May-2018 05:35 PM 1486     

ये कैसा समय आ गया है कि राजनीति के घाट पर संत इकट्ठे हो रहे हैं। नाना प्रकार के संत। कोई लेपटॉप बाबा है तो कोई कम्प्युटर बाबा। कोई घड़ी वाला बाबा है तो कोई गृहस्थ बाबा। सबको भरम है कि उनके पीछे लोग दीवाने हैं। वे जो कहेंगे, लोग वही करने लगेंगे।
नेताओं को भी खुशफ़हमी है। जिसके पास जितने संत, उतना ही बड़ा वोटबैंक। कोई साष्टांग दंडवत कर रहा है तो कोई संतों के डेरों में नाक रगड़ रहा है। नज़ारा अद्भुत है। संत नेताओं को बना रहे हैं, नेता तथाकथित संतों को बना रहे हैं। दोनों मिलकर जनता को बना रहे हैं।
हमारे राजनेताओं को क्या हो गया है। अवाम को इतना मूर्ख समझ लिया है। यह उन्नीस सौ साठ-सत्तर का हिंदुस्तान नहीं है। दो हज़ार अठारह-उन्नीस में चुनाव जीतने के लिए सरकार के दिमाग में बासे और एक्सपायर हो चुके सॉफ्टवेयर काम नहीं आएँगे। अपने को कुछ तो अपडेट करो भाई। आज का भारत आपसे काम और परिणाम चाहता है। नौटंकी नही। अब आपके हथकंडे भी लोगों को समझ आने लगे हैं। गाल बजाने से वोटों की फसल नहीं उगती।
और देखिए तो पांच साल में सबसे ज़्यादा संतों ने ही धर्म को बदनाम किया है। कितने जेल में हैं और कितने कारोबारी बने बैठे हैं। कितनों पर गंभीर अपराधों के मामले चल रहे हैं। कितनों के आश्रमों की पोल खुली। उनमें क्या-क्या नहीं होता था। किसी से छिपा नहीं है।
और इन संतों को भी देखिए। राजरोग लग गया है। नेता जब चरणों में लोटते हैं तो वे अपने को महर्षि वशिष्ठ से कम नहीं समझते। लाखों करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करने का दावा करने वाले संत अब सरकार की गाड़ी, सचिव और चालीस-पचास हज़ार रुपए चाहते हैं - एक क्लर्क की तनख्वाह। सरकार के पद खाली पड़े हैं। जितना मंत्री पद की रेवड़ियां बांटने में खर्च होगा, उतने में कम से कम सौ बेरोज़गारों को नौकरी मिल जाती। एक बेरोज़गार को नौकरी मिलने से कम से कम पचास वोट पक्के हो जाते। संतों को रेवड़ी बांटने से जितने वोट पक्के हुए उससे ज़्यादा लोग तो इससे नाराज़ हो गए। वोट के लिए अधेड़ों की सेवानिवृति की उमर दो साल बढ़ा दी। घर का जवान बेटा दो साल से बेरोज़गार बैठा है। चिंता तो उसकी है। बाप की नौकरी के दो साल बढ़ा कर न बाप का वोट मिलेगा न बेटे का। बेरोज़गार बेटे का दर्द और तनाव पिता के सीने में नासूर बन कर फूटता है। इसे समझिए। बेरोज़गार बेटे की शादी भी नहीं होती। दो साल की नौकरी के साथ बेटे की जगह पिता मंडप में फेरे नहीं ले सकता। इसे समझना पड़ेगा। पिता को तो आप पेंशन भी देंगे। बेटे को नौकरी देते तो कुछ वोट बढ़ ही जाते। कम नहीं होते। मुफ़्त में बुजुर्गों को तीरथ दर्शन करा रहे हैं। आम आदमी की गाढ़ी कमाई के पैसों का दुरुपयोग। याने दो क़दम चले चार क़दम पीछे। हासिल क्या। अगर आप मुफ़्त में ही कुछ देना चाहते हैं तो चिकित्सा दीजिए, शिक्षा दीजिए, सड़कें दीजिए, साफ पानी दीजिए, नौकरी दीजिए, जिसका वादा आप घोषणा-पत्र में करते हैं। फिर भूल जाते हैं। मुफ़्त में देने के लिए तीर्थगाड़ी और संतों की रेवड़ी ही रह गई थी।
दुस्साहस तो देखिए। संत कहते हैं - नदी संरक्षण के लिए अफसरों से काम लेना पड़ेगा। इसके लिए उन्हें मंत्री के अधिकार चाहिए। बड़े मासूम हैं संत। उन्हें पता नहीं कि चुनाव के साल में अफसर किसी की नहीं सुनते। कुछ समय बाद आचार संहिता लग जाएगी। फिर क्या कर पाएंगे। एक पैसा नहीं मिलेगा। चार साल में गंगा के लिए कितना काम हुआ, यमुना के लिए कितना काम हुआ। तो फिर आप गाड़ी-घोड़ा क्या चुनाव प्रचार के लिए माँग रहे हैं सरकारी गाड़ी और मशीनरी का खुल्लम खुल्ला दुरुपयोग होगा। घोषित रूप से कथित संत किसी दल में नहीं हैं इसलिए उनकी धर्म सभाओं को कौन रोकेगा। वहां नदी संरक्षण का सन्देश देंगे या चुनाव प्रचार करेंगे।
अरे संत जी! नदी संरक्षण करना है तो उसके लिए एक पैसे की ज़रूरत नहीं है। आप लोगों का तो समाज पर बड़ा असर है। पांच-छह संत हैं। पांच-छह नदियाँ हैं - केन, बेतवा, ताप्ती, पार्वती, काली सिंध और सोन। एक-एक नदी गोद ले लीजिए। अभी से जाकर डट जाइए। शिविर लगाइए। एक-एक नदी किनारे। छेड़िए आंदोलन। एक-एक आदमी एक तसला लेकर रोज़ घर से आए। दो घंटे श्रमदान करे और चला जाए। सारी शिल्ट भरी है नदियों में। उथली हो गईं हैं। अभी से गहरा कराइए तो मॉनसून आते-आते पानी रोकने का बड़ा काम हो जाएगा। आधे मध्यप्रदेश में रेगिस्तान ने दस्तक दे दी है। उपग्रह की रिपोर्टें आपके सामने हैं। एक-एक आदमी पर नदी किनारे आम, जामुन और नीम का एक-एक पौधा रोपने की ज़िम्मेदारी डाल दीजिए । हरा भरा राज्य बनाने के लिए गाड़ी और सचिव नही चाहिए संतो।
नदियों में गंदे नाले मिल रहे हैं। आप तो सक्षम हैं। रोक दीजिए उसे। हर नगरपालिका से संकल्प पत्र लीजिए। समाज से चंदा कराइए। सौ रुपए प्रति व्यक्ति। एक करोड़ लोगों ने भी दिया तो कितने जल-मल शुद्धिकरण प्लांट लग जाएंगे। माफ़ कीजिए - नर्मदा और चंबल के लिए मत कीजिए। नर्मदा के नाम पर वोट बैंक की फसल उगेगी। हर-हर नर्मदे के नारे लग जाएँगे और चंबल तो अभी भी भारत की सबसे साफ़ नदियों में से एक है। इसलिए इनको भगवान के लिए छोड़ दीजिए। चुनाव के टाइम सरकार से भीख-दान लेने की क्या ज़रूरत है। आप तो ऋषि-मुनि परंपरा के लोग हैं। दान देते हैं - विद्या, ज्ञान, पर्यावरण सुधार, जागरूकता वगैरह-वगैरह। वशिष्ठजी ने राम को विद्या दान दिया, वैज्ञानिक मुनि अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता में बिजली उत्पादन की तकनीक और विमान उड़ाने की तकनीक समाज को दी, विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना अपने घर के लिए नही की थी, भारद्वाज ऋषि ने विमान शास्त्र में छोटे और आज के बड़े याने बोइंग विमान बनाने का विवरण इस देश को दिया, अत्रि ऋषि ने कृषि के विकास में जो योगदान दिया, उसे आप कैसे भूलेंगे, ऋषि वामदेव की भारतीय संगीत को अद्भुत देन है, शौनक ऋषि ने दस हज़ार विद्यार्थियों का गुरुकल चलाया। उनके लिए ही कुलपति शब्द पहली बार इस्तेमाल हुआ, चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को कूटनीति दी, दधीचि ने समाज की सुरक्षा के लिए अपनी हड्डियां तक दान कर दीं, भागीरथ किसके लिए गंगा लाए थे, पतंजलि ने योग किसको दिया, चरक, धन्वन्तरि और सुश्रुत ने चिकित्सा दी, वाल्मीकि ने रामायण दी, संत तुलसीदास ने मर्यादा और नैतिक मूल्यों का सन्देश रामचरित मानस के ज़रिए दिया, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य प्रथम और भास्कराचार्य द्वितीय ने गणित और खगोलशास्त्र दिया, पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण दिया - और कितने नाम गिनाऊँ। इसीलिए कृतज्ञ राष्ट्र ने सप्त ऋषियों को आकाश के तारामंडल में स्थान दिया है। आज तक पुजते हैं। हमारी प्राचीन संस्कृति में ऋषि-मुनियों ने क्या-क्या नहीं दिया और बदले में समाज से धेला भी न लिया - लाल बत्ती वाली कार भी नहीं। आप लोगों ने क्या दिया, जो सौ साल बाद भी याद रखा जाए, हज़ार साल तो छोड़ दीजिए। आपने तो बारह घण्टे चमकने वाले जुगनू का प्रकाश भी न दिया। कुछ तो सोचिए। संत हो तो संत बन कर दिखाओ।
(लेखक के विचारों से संपादक की सहमति आवश्यक नहीं है।)

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