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हिन्दी के अंतर्विरोध-1
01-Oct-2019 11:18 AM 808     

किसी भी भाषा की सक्षमता का पता इस बात से चलता है कि उसमें बहुलता भरी आवाजों के लिए कितनी जगह है। यानी बिलकुल भिन्न आवाज़ों को समाहित करने की क्षमता कितनी है। उदाहरण के लिए अगर हम महाभारत ग्रंथ को देखें तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता अनेक कथाओं और विविध जीवन प्रसंगों का समाहार करने की क्षमता है। इस दृष्टि से जब हम हिन्दी को देखते हैं तो बहुत सकारात्मक स्थितियां नहीं नजर आती हैं।
हिन्दी जितने बड़े क्षेत्र और जनसंख्या की भाषा है, इसके कर्ता-धर्ता की जिम्मेदारी थी कि वे हिन्दी भाषा के साहित्य और इतिहास को अधिक से अधिक समावेशी बनाते परंतु शुरू से ही जोड़ने और हिन्दीे की विस्तृत परंपराओं को समेटने की बजाय इसे तोड़ने और सीमित करने की प्रवृत्ति अधिक दिखाई पड़ती है। यह प्रवृत्ति अनेक स्तरों पर देखने को मिलती है। भाषा के स्तर पर, भाषा के इतिहास के स्तर पर, साहित्य और साहित्यकारों के स्तर पर, लोक के स्तर पर आदि-आदि। (पुरस्कार आदि के स्तर पर जो दिखता है उसकी चर्चा न ही की जाए तो बेहतर।)
यह सच्चाई है कि भाषा और साहित्य के इतिहास को अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि साहित्य भाषा में ही होता है और जबसे हिन्दी साहित्य के इतिहास के शुरू होने की बात की जाती है तब लिखित साहित्य आरंभ हो चुका था। फिर इन इतिहासों में, भाषा के इतिहास पर इतनी कम चर्चा क्यों मिलती है और जो बातें मिलती भी हैं वे इतनी अंतर्विरोध भरी क्यों हैं। पहले जो गलतियां हो गयीं, सो हो गयीं, पर आज जो लोग काम कर रहे हैं, क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि पुरानी गलतियों को सुधारें। उदाहरण के लिए, खड़ी बोली हिन्दी के पहले कवि के रूप में लगभग सभी इतिहासों में अमीर खुसरो (1253-1325) की चर्चा मिलती है। लेकिन खड़ी बोली हिन्दी के दूसरे कवि कौन थे और वे कब आते हैं, इस सवाल की चर्चा नहीं के बराबर मिलती है। अगर हिन्दी साहित्य के इतिहासों के आधार पर बात की जाए तो खुसरो (1300) के करीब 550 साल बाद भारतेंदु युग में खड़ी बोली में कविता लिखी जाती है। भाषा की सामान्य समझ रखनेवाला व्यक्ति भी इस बात को जानता है कि सैकड़ों वर्षों तक कोई भाषा चुप नहीं रहती और न ही इतने वर्षों तक उसका रूप स्थिर रहता है। इतने बड़े अंतराल का स्पष्ट रूप से दो अर्थ निकलता है, पहला यह कि अमीर खुसरो के बाद के इतिहास के बड़े हिस्से को हम किसी कारण से हिन्दी में रखना नहीं चाहते इसलिए उसका जिक्र नहीं करते। दूसरा यह कि अमीर खुसरो की तथाकथित हिंदी असल में उस समय की थी ही नहीं। किसी ने बाद में उनके नाम से ऐसी हिन्दी लिख कर उनके ग्रंथ में जोड़ दी।
और भी कई सवाल हैं जो हिन्दी के इतिहासकारों को परेशान करते हैं। जैसे कि जहांगीर के दरबार में जेम्स प्रथम के दूत सर टॉमस रो के साथी एडवर्ड टेरी ने अपनी पुस्तक "ए ह्वायज टू ईस्ट इंडिया" (लन्दन, 1655) में जिस भाषा को "इन्दोस्तान" के नाम से याद करते हुए लिखा है कि "इन्दोस्तान" बड़ी जानदार भाषा है और यह कम से कम शब्दों में बहुत कुछ कह डालने में सक्षम है।" तो फिर वह भाषा कौन सी है? फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से बहुत पहले से अंग्रेज जिस भाषा को मूर्स, इन्दोस्तान्स, हिन्दोस्तानिक (ग्दृदृद्धद्म, क्ष्दड्डदृद्मद्यठ्ठदद्म, क्तत्दड्डदृद्मद्यठ्ठदत्ड़) आदि कह रहे थे उनका स्थान हिन्दी साहित्य के इतिहास में कितना है।
हम सब जानते हैं कि उर्दू शब्द का मामला 19वीं सदी का है, उसके पहले इस शब्द के प्रयोग के प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। उर्दू-हिन्दी के नाम से विवाद 1850 के बाद शुरू होता है, जब अंग्रेजों की नीति के कारण रोजगार के सवाल भाषा से जुड़ गए और आर्थिक हितों के कारण भाषा विरोध चरम पर जा पहुंचा। परंतु इसके पहले के साहित्यकारों की भाषा की चर्चा इतिहासों में क्यों नहीं मिलती? मसलन वली दक्कनी (1648-1744) से बहुत पहले दक्षिण में जो साहित्य रचा गया जिसका बड़ा प्रेरक बहमनी राज्य (1348 से 1526 तक) रहा था और जिसके बारे में फिराक गोरखपुरी लिखते हैं- "जिस समय उर्दू (ध्यान रहे कि तब यह दक्कनी या हिंदवी थी) भारत में बाजारी बोली से अधिक महत्व न रखती थी, उस समय दक्षिण में वह सांस्कृतिक माध्यम के रूप में प्रतिष्ठापित हो गयी। दक्षिण में उर्दू के महत्व प्राप्त करने का एक और राजनीतिक कारण है। जिस समय उत्तर भारत में मुसलमान विजेता की हैसियत से सारा राजकाज अपने ही हाथों में लिये हुए थे, उसी समय से दक्षिण में तत्त्कालीन आवश्यकताओं से मुसलमान शासकों ने हिन्दुओं का अधिकाधिक सहयोग प्राप्त करने का प्रयत्न किया जिसमें वे सफल भी हुए। दक्षिण राज्यों में महत्वपूर्ण पदों पर अच्छी संख्या में हिन्दू--विशेषत: ब्राह्मण-- रहे थे। (बहमनी राज्य का नामकरण भी गंगू ब्राह्मण के कारण हुआ।) दक्षिण के मुसलमान बादशाहों का अपने पड़ोसी हिन्दू राज्यों से भी अधिक मेल-जोल रहा। फलत: दक्षिण के सुल्तानों ने हिन्दी को जो उस समय की उर्दू से भिन्न न थी अधिक महत्व देना शुरू किया।"
1500 ईसवी से पहले दक्षिण में ढेर सारे सूफी संत और कवि हुए जिनकी गद्य और पद्य रचनाएं पर्याप्त मात्रा में मिलती हैं। इन संतों में गंजुल इस्लाम, ख्वाजा सैयद गेसूदराज, शाह मीरानजी, मौलाना वजही आदि प्रमुख हैं। यहां तक कि बाद के राजा भी रचनाकार के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। मुहम्मद कुली कुतुबशाह जिसका शासन 1580 से 1611 तक रहा, वे बड़े रचनाकार थे। उन्होंने कई भाषाओं में कविता की और साहित्यिक कोटि की कविताएं कीं। इसके बाद जो साहित्य की परंपरा चली उसमें वली दक्किनी, सिराज, मीर तकी मीर, मुहम्मद रफी सौदा, मीर सोज़, नजीर अकबराबादी, मोमिन, ग़ालिब आदि तक की अटूट परंपरा मिलती है। और ऐसा कोई खाली हिस्सा नहीं मिलता जिसे कल्पना से भरने की जरूरत पड़े। यही नहीं पद्य के साथ-साथ गद्य के भी उदाहरण मिलते हैं जो कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में दुर्लभ बात मानी जाती है।
उस दौर की भाषा में लिखनेवाले हिन्दू-मुसलमान दोनों थे, शम्सुर्रहमान फारूक़ी ने अपनी पुस्त्क "उर्दू का आरम्भिक युग" में ऐसे लोगों की पर्याप्त चर्चा की है जिनमें अजयचन्द भटनागर (1550), सर्वसुख दीवाना (1727-1788), टेकचन्द बहार (मृत्यु 1766), बुद्धसिंह कलंदर (1770), टीकाराम तसल्ली (1780), कांजीमल सबा (1780), जसवन्त सिंह परवाना (1757-1813), वृन्दावन खुशगो (1756), राजा रामनारायण मौजूं (1760), राजा कल्याण सिंह आशिक (1752-1821) राजा किशन दास (1781-1823), दयाशंकर नसीम (1811-1844), घनश्याम लाल आसी (1798-1869) आदि का नाम सम्मान से लिया जाना चाहिए। और यह परंपरा आगे तक चली जाती है। हिन्दी के आधुनिक काल के उन्नायक भारतेन्दु हरिश्चंद्र और हिन्दी के आज तक के सबसे बड़े रचनाकार माने जानेवाले प्रेमचंद दोनों उर्दू से हिन्दी में आए थे। यहां तक कि आज के सबसे बड़े शायरों में से एक गुलजार वास्तव में संपूरण सिंह कालरा हैं। अब यह एक अलग विचार का विषय है कि सिनेमा में जाने के बाद संपूरण सिंह क्यों गुलजार हो जाते हैं? और युसुफ खान क्यों दिलीप कुमार बन जाते हैं?
यह सर्वमान्य तथ्य है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र न केवल उर्दू लिपि और भाषा जानते थे बल्कि "रसा" नाम से शायरी भी करते थे। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी लिखते हैं कि "उस ज़माने में और भी आवाजें उर्दू के विरोध में उठ रही थीं। बनारस में ये आवाज़ें ज्यादा मुखर थीं लेकिन इनमें भारतेंदु के कटाक्ष अधिक स्पष्ट होकर सामने आते हैं। कारण यह कि उनका लेखक एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपने साहित्यिक जीवन का आरम्भ उर्दू लेखन से किया और आज भी उर्दू साहित्य के इतिहास में उसका स्थान सुरक्षित है।"
सिर्फ नाम के कारण राष्ट्रीय स्तर पर किसी भाषा के स्वीकार और अस्वीकार का ऐसा उदाहरण पूरी दुनिया में शायद ही कहीं और देखने को मिले। डॉ. फ़ारूक़ी ने बिलकुल सही लिखा है कि "उस भाषा के लिए जिसे आज हम "उर्दू" कहते हैं, "हिन्दी" शब्द का इस्तेमाल उन्नीसवीं शताब्दी के नौवें दशक (1881-1890) के आते-आते बहुत कम होने लगा। और जब "उर्दू" शब्द भाषा के नाम के तौर पर प्रचलित हो गया तो अंग्रेजों ने भी "हिन्दुस्तानी" शब्द को त्याग दिया। इसमें इनका फ़ायदा भी था, क्योंकि "उर्दू" शब्द में "मुसलमानी रंग" हिन्दुस्तानी शब्द से अधिक था और अंग्रेज़ यही चाहते थे कि "उर्दू" को मुसलमानों की भाषा के तौर पर जाना जाए।" अंग्रेज़ इस विचार को स्थापित करने हेतु कितने आग्रही थे इस बात को इस घटना से समझा जा सकता है कि 1879 में प्रकाशित शब्दकोश का नाम फेलन ने ॠ ग़्ड्ढध्र् क्तत्दड्डद्वद्मद्यठ्ठदत्-कदढ़थ्त्द्मण् क़्त्ड़द्यत्दृदठ्ठद्धन्र् रखा था परंतु प्लेट्स (घ्थ्ठ्ठद्यद्यद्म) ने 1884 में प्रकाशित अपने शब्दकोश का नाम ॠ क़्त्ड़द्यत्दृदठ्ठद्धन्र् दृढ छद्धड्डद्व, क्थ्ठ्ठद्मद्मत्ड़ठ्ठथ् क्तत्दड्डत् ठ्ठदड्ड कदढ़थ्त्द्मण् रखना ज़रूरी समझा। (पृ. 49, उर्दू का आरंभिक युग) हिन्दुस्तानी का "उर्दू और क्लासीकल हिन्दी" में विभाजन आम जनता की नहीं सत्ता की मर्जी थी।
यह बात भी उल्लेाखनीय है कि जब उर्दू नाम के कारण एक भाषा हिन्दी से अलग हो गयी तब उसका जिक्र साहित्य के इतिहास में नहीं होना तो समझ में आता है। यानी जैसे 1850 के बाद अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी आदि भाषाओं के साहित्य को हिन्दी से बाहर कर दिया गया वैसे ही उर्दू को भी बाहर कर देते यह एक बात थी परंतु जब वह हिंदी या हिन्दुस्तानी ही थी तब के लेखकों को तो ब्रज आदि के लेखकों की तरह इतिहास में जगह दी जा सकती थी। बावजूद इसके आज तक एक भी ऐसा इतिहास देखने को क्यों नहीं मिलता जिसमें इन्हें हिन्दी का रचनाकार माना गया हो। ऐसे अनेक रचनाकारों के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि हिन्दू होने या "हिन्दू परंपरा का चित्रण करने के कारण उर्दू के इतिहासकार उनको अपने इतिहास में स्थान" नहीं दिए और हिन्दुस्तानी में लिखने के कारण हिन्दी के इतिहासकारों का वे स्नेह नहीं पा सके। परिणाम यह हुआ कि दयाशंकर नसीम जैसे बहुत सारे श्रेष्ठ रचनाकारों की रचनाओं से हिन्दी और उसके पाठक वंचित रह गए। या नजीर अकबराबादी जैसे अनेक रचनाकारों को बहुत देर से साहित्यकार माना गया।
अगर आप हिन्दी को इतने बड़े देश की भाषा बनाने का और संयुक्त राष्ट्र की भाषा या विश्वभाषा बनाने का दावा कर रहे हैं तो वह इसके अंगों को काटने और विभाजित करने से नहीं बनेगी। यह बड़ी भाषा इसकी बिसरी हुई परंपराओं को जोड़ने से बनेगी।

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