ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक फ़ैन का इकबालिया बयान
01-Aug-2018 12:37 AM 1766     

हिन्दी की वरिष्ठ एवं बहुआयामी लेखिका चित्रा मुद्गल यूं तो उम्र में मुझसे पांच साल बड़ी हैं पर उन्होंने मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया, हम जब भी मिलते हैं, बचपन की सहेलियों की तरह मिलते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है। हर बार जब मैं दिल्ली जाती हूँ, वह बड़े आग्रह से अपने घर आने के लिए आग्रह करती हैं। पिछली बार जब जाना हुआ तो वह अवध जी की तीमारदारी में ऐसे व्यस्त थीं कि जैसे एक वात्सल्यमयी माँ अपने बीमार बच्चे की प्यार और मनुहार से देखरेख करती है। मन गद्गद् हो उठा। पिछले साल बीमारी की वजह से मेरा दिल्ली जाना नहीं हुआ तो फ़ोन पर उन्होंने बड़े प्यार के साथ मेरी हिम्मत बँधाई, बिलकुल मेरी बड़ी बहन की तरह।
मुझे याद है कि दिल्ली विश्विद्यालय में आयोजित प्रतियोगिताओं अथवा सेमिनार्स में मैं उन्हें बस दूर से देखा करती, उनकी बड़ी-सी बिंदी पर मेरा ध्यान ऐसा केंद्रित हो जाता कि मेरे पल्ले शायद ही कुछ पड़ता होगा क्योंकि मेरा मुख्य विषय अंग्रेज़ी साहित्य था, मन ही मन, मैं "प्राइड ऐंड प्रेजुडिस" की नायिका जेन बैनेट और "इम्पोर्टेंस ऑफ़ बीइंग अर्नेस्ट" की ग्वेंडलन के माथों पर चित्रा जी की बिंदी ठोक कर आनंद लिया करती। जब मैंने हिंदी में लिखना शुरू किया तो हिंदी के कार्यक्रमों अथवा प्रतियोगिताओं में बड़े-बड़े लेखकों को दूर से देखने को मिल जाता था। दिल्ली विश्वविद्यालय की एक कहानी प्रतियोगिता में मेरी कहानी "वह काली" को पुरस्कार मिला किन्तु मैं झिझक के मारे पुरस्कार-समारोह में पहुँची ही नहीं। बाद में जब सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी से पहली बार मिलने का मौक़ा मिला, जो उस कहानी प्रतियोगिता के निर्णायक भी थे, तो उन्होंने मुझे देखते हुए कहा कि उन्हें मुझसे ऐसी उम्दा कहानी की उम्मीद नहीं की थी जो एक काली लड़की की मनोदशा को इस खूबसूरती से चित्रांकन कर सकती हो। उस समय मुझे लगा कि मैं भी चित्रा जी की तरह अच्छी कहानियां लिख सकती थी। उस ज़माने में मेरे पास इतने पैसे नहीं होते थे कि उनकी पुस्तकें लेकर पढ़ सकूं पर इसका मुझे कोई अवसाद नहीं था। उन्हें देख कर मुझे जो अपनेपन का अहसास मुझे होता था, मेरे लिए वही काफ़ी था।
चित्रा जी और नासिरा शर्मा जी से मेरा औपचारिक परिचय लंदन में हुए विश्व हिंदी सम्मलेन-1999 के दौरान हुआ, जिसकी मैं उपाध्यक्ष (संस्कृति) थी। लगा ही नहीं की हम पहले कभी नहीं मिले थे, मेरी बेटी, शैली से तो वह ऐसे प्यार से मिलीं कि जैसे वह उनकी अपनी ही बेटी हो। वहीं से हमारी मित्रता और गाढ़ी होती चली गयी। ज़ाहिर है कि मैंने चित्रा जी के विषय में जानकारी इकट्ठी की - कैसे साठ के दशक में उन्होंने अंतरजातीय प्रेम विवाह किया, जो एक अमीर परिवार की युवती के लिए आसान नहीं रहा होगा, फिर उनका मज़दूर यूनियन के लिए काम करना और एक अमीर पिता की बेटी का 25 रुपये महीने किराए की एक खोली में रहना मुझ जैसी एक रोमैंटिक युवती के लिए, सचमुच एक अजीबो-ग़रीब फंतासी ही थी। ऐसा सच में कब-कब और कहाँ-कहाँ होता है, बिलकुल बारबारा कार्टलैंड के उपन्यासों जैसा जीवन जीवन जी रही होंगी वह! बस, तभी से मैं उनकी फ़ैन हो गयी। वास्तविकता से मेरा कुछ लेना-देना वैसे भी अधिक नहीं रहा, जिसका फ़ायदा और नुक़सान दोनों ही मैंने जीवन भर भुगते हैं।
चित्रा जी की तरह ही, मैंने भी अपनी स्नातकोत्तर पढ़ाई पत्राचार-पाठ्यक्रम के माध्यम से की थी और मैं जानती थी कि विवाह के बाद फिर से पढ़ाई शुरू करना कितना कठिन होता है। उनकी ही तरह मुझे भी चित्रकला में गहरी अभिरुचि थी पर जहां-जहां परिवार के हस्तक्षेप की वजह से मैंने अपनी रुचि को आसानी से दरकिनार कर दिया, चित्रा जी का जीवट देखिए कि उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्टस से फ़ाइन-आर्टस का अध्ययन किया। पढ़ाई के दौरान श्रमिक नेता दत्ता सामंत के संपर्क में आकर वह श्रमिक आंदोलन से जुड़ीं, घरों में झाडू-पोंछा कर, उत्पीड़न और बदहाली में जीवन-यापन करने वाली बाइयों के उत्थान और बुनियादी अधिकारों की बहाली के लिए संघर्षरत संस्था "जागरण" की बीस वर्ष की वय में सचिव भी बनीं, काश कि मैंने यह सारी जानकारी कुछ वर्ष पहले इकट्ठी की होती, थोड़ी-सी और हिम्मत दिखाई होती तो शायद मैं भारत से भाग खड़ी न होती, विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना किया होता। ख़ैर, मेरा संयोग विदेश में बसना लिखा था। साहित्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह समाज सेवा के लिए भी वक्त निकाल पाईं और इसीलिए वह मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत रही हैं पर यह बात मैंने अब तक किसी को नहीं बताई, इसका कारण शायद यह भी कि मुझे स्वयं इसकी जानकारी नहीं थी।
व्यास सम्मान और रूस के अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन पुरस्कार से सम्मानित चित्रा जी से मेरी दूसरी मुलाक़ात भी लंदन में ही हुई जब 2003 में वह "इन्दु शर्मा कथा सम्मान" के सिलसिले में वह एक बार फिर लंदन पहुंचीं, किन्तु दुर्भाग्यवश, इस बार उनके संग अधिक समय बिताने को नहीं मिला। 2008 में जब मेरा तीसरा कथा-संग्रह, "पंगा" (मेधा प्रकाशन) से छपने को तैयार था तो प्रकाशक अजय मोंगा ने मुझे सुझाव दिया कि इसकी भूमिका आप चित्रा जी से लिखवाएं। मुझे लगा कि वह मज़ाक कर रहे थे। मन में गुदगुदी तो अवश्य हुई पर कहाँ चित्रा जी जैसी बड़ी लेखिका और कहाँ मैं, उनकी एक अदना सी फ़ैन! किन्तु हिम्मत जुटाकर आग्रह कर ही डाला। मन ही मन डर लग रहा था कि कहीं वह यह न सोचें कि "यह मुंह और मसूर की दाल?"
मैं जानती हूँ कि उनकी नज़र से कोई अच्छी रचना अथवा रचनाकार बचा नहीं रह सकता और यह भी कि उन्होंने मेरी भी कुछ कहानियां तो अवश्य पढ़ी होंगी। झिझकते हुए फ़ोन किया तो उन्होंने न केवल झट से हामी भर ली बल्कि मेरा उत्साह बढ़ाते हुए यह भी कहा, "अरे भई, दिव्या, हाल ही में तुम्हारी कहानी "ठुल्ला किलब" पढ़ी, यह तो सचमुच एक ऐतिहासिक कहानी है।" उनसे अपनी कहानी की तारीफ़ सुनकर मैं भाव-विह्वल हो उठी। फिर जिस तत्परता से उन्होंने पंगा का प्राक्कथन लिख भेजा, वह सचमुच प्रशंसनीय था। स्पष्टतः मैं बहुत महसूस कर रही थी और आज भी जब मैं उस क्षण को याद करती हूँ तो रोमांचित हो उठती हूँ।
कुछ समय पहले मैंने चित्रा जी का स्त्री की आज़ादी के विषय में एक साक्षात्कार पढ़ा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक हमारे देश का माहौल प्रौढ़ नहीं हो जाता, लड़कियों को ही ज़िम्मेदारी से काम लेना होगा, संयम दिखाना होगा। विदेशी स्वतंत्रता जैसा हक़ मांगने से पहले उन्हें स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता में फ़र्क समझना होगा। यदि हम अपने समाज के प्रति दायित्वपूर्ण नहीं हैं तो फिर अपने प्रति भी दायित्वपूर्ण नहीं है। उनकी इस परिपक्व विचारधारा से मैं बहुत प्रभावित हुई, नारीवाद की दुहाई देने वालों को शायद यह बात गवारा न हो किन्तु इस विषय पर भी मेरे विचार चित्रा जी से हूबहू मिलते हैं।
लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन कुछ बातें सिर्फ़ अपने सुकून के लिए होती हैं, जो मन के किसी कोने को गुलज़ार किए रहती हैं। अंत में मैं यह अवश्य कहना चाहूंगी कि मुझ जैसी एकल युवती के लिए, दो छोटे बच्चों के साथ, एक विदेशी ज़मीन पर पांव जमाना एक बड़ी चुनौती थी जिसे मैं स्वीकार कर पाई क्योंकि मेरे सम्मुख चित्रा जी जैसी साहसी और मनीषी महिलाओं के उदाहरण थे। मेरा यह छोटा सा विनम्र लेख सिर्फ़ ऐसी ही कर्मठ महिलाओं को समर्पित है, जिनके पदचिह्नों पर चलकर मुझ जैसी न जाने कितनी युवतियां अपनी मंज़िल तक पहुँची और पहुँचती रहेंगी।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^