ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चित्रकूट पर्वत श्रृंखला
01-Aug-2016 12:00 AM 2554     

जैसा कि पहले अन्य लेखों में भी देखा जा चुका है, वाल्मीकि अपने कवित्त में प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करने में अद्वितीय है। उनके वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो कवि को राम का वन में इस तरह घूमना बहुत पसंद है, जिससे कि वह प्राकृतिक सुदंरता का विस्तार से महिमा मंडन कर सके। अनेक तरह के पौधे, फूल, जानवर और पक्षियों का उल्लेख करने में कवि को दक्षता हासिल है। ऐसा लगता है कि उनको उपमा अलंकारों का उपयोग करने में बहुत आनन्द आता है और पाठक को अनके उपयोग कर बांधे रखते हैं। पिछले लेख में भी हमने यह गंगा के सौन्दर्य विवरण में भी अनुभव किया था। इस लेख में हम चित्रकूट पर्वत के बारे में कवि के वर्णन का उल्लेख करेंगे।
वनवास के दौरान चित्रकूट राम का पहला पड़ाव था जहाँ उन्होंने अपनी कुटिया बनाई थी। वाल्मीकि के अनुसार चित्रकूट यमुना नदी के दक्षिणी किनारे पर एकांत पर्वत स्थान था। उनके अनुसार वह गंगा व यमुना नदियों के संगम स्थल प्रयाग से लगभग बीस मील दूर था। इस स्थान के बारे में राम, लक्ष्मण और सीता को ऋषि भारद्वाज ने बताया था। तीनों लोगों ने रात्रि विश्राम प्रयाग में ऋषि के अतिथि के रूप में किया और दूसरे दिन सुबह बताये हुये रास्ते पर वह चित्रकूट के लिए निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने एक और रात्रि विश्राम किया और अगले दिन चलकर अपने गंतव्य स्थल पर पहुँच गये। चित्रकूट पहुँचकर वह ऋषि वाल्मीकि से मिले जिन्होंने ने उनके रुकने का प्रबंध करने में सहयोग किया। ऐसा संभव है कि चित्रकूट के ऋषि वाल्मीकि स्वयं रामायण के रचयिता कवि हो?
हालाँकि राम अपने पिता राजा दशरथ के वचन की मर्यादा रखने के लिए स्वयं वन जाने को तैयार हुये थे पर शायद उन्होंने वनवास की परिस्तिथियों के बारे में पूरी तरह से विचार नहीं किया होगा। वह सीता की भावनाओं के प्रति भी संवेदनशील थे, जो वनवास की परिस्तिथियों को पूरी तरह न समझते हुये राम के साथ जाने को अचानक तैयार हो गईं। वन में घुसते ही राम ने सीता को युक्तिपूर्ण तरीके से मन बहलाने के लिए वन की शोभा और उसके रंग बिरंगे फूल पत्तों के बारे में बताना शुरू कर दिया और कहा कि वैदेही देखो यह फूलों वाले पेड़ अति शोभायमान लग रहे हैं। देखो यह किम्सुका का पेड़ फूलों की लड़ियों से पूरी तरह ढंका हुआ है, और यह अखरोट व बिल्व के पेड़ फलों से लदे हुये हैं। हमारे रहने के लिए यहाँ पर्याप्त भोजन उपलब्ध है। उन्होंने लक्ष्मण को भी वन के उपहार के बारे में बताया और कहा कि देखो यहाँ सभी पेड़ों से मधुकोष टपक रहा है। वो सभी मधुमक्खियाँ द्वारा तैयार किये गये ताजे शहद से भरे हुये हैं और दूसरी तरफ सुन्दर पुष्प फैले हुये हैं। मुझे पक्षियों के चहकने की आवाज सुनाई दे रही हैं और सुन्दर मोर नाच रहे हैं, उधर हाथियों और चिड़ियों के झुण्ड दिखाई दे रहे हैं। यह वन हमारे घूमने और निवास के लिए अति उत्तम रहेगा।
समय गुजरने के साथ राम वन और पर्वती वातावरण में ढल गये। वाल्मीकि ने सुन्दर कवित्त के द्वारा इस सैर के दौरान राम और सीता के बहुत विलक्षण प्रेम प्रसंगों का वर्णन किया है। कवि के द्वारा दिये विवरण से पता चलता है कि यह क्षेत्र खनिज संपदाओं से भरपूर है और दिन के उजाले में शिलाओं के रंग बिखर रहे हैं। चीता, भालू और तेंदुआ बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हैं। जंगली होने के वाबजूद भी वन्य प्राणी मनुष्य के लिए घातक नहीं हैं। फल वाले पेड़ों पर पक्षी चारों तरफ से आकर एकत्रित हो रहे हैं। चारों तरफ रंग-बिरंगे सुन्दर फूल खिले हुये हैं। प्रकृति का सौन्दर्य देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पृथ्वी पर यह स्थान स्वर्ग हो।
कवि के अनुसार उस क्षेत्र में किन्नर और विद्याधर लोग रहते थे, किन्नर युद्ध कौशल और विद्याधर कला के लिए जाने जाते थे, स्पष्टतया इन लोगों को एकान्तता की परवाह नहीं थी और वो सार्वजानिक रूप से अपनी प्रेम लीलायें करते थे। राम के शब्दों में दृश्य और स्थान न मन, वाणी और शरीर के अनुरूप थेे। राम ने प्रेम से सीता को छूकर पूछा कि वैदेही तुम मेरे साथ खुश तो हो?
चित्रकूट में सीता के लिए मुख्य आकर्षण मन्दाकिनी नदी थी, पर्वत से स्वच्छ जल के झरने धीरे-धीरे बह रहे थे। उसे देखकर उनको अयोध्या की सरयू नदी की याद आने लगी। नदी में हंस और बगुले विचरण कर रहे थे और जल, हिरण और अन्य वन्य प्राणियों के झुण्ड के तरफ बह रहा था।
नदी की सबसे अच्छी जगह उसके रेतीले किनारे थे जहाँ फलों और फूलों के घने पेड़ बहुत सुन्दर लग रहे थे। इस स्वर्गीय शोभा के बीच में बड़ी-बड़ी जटाओं वाले ऋषि मुनि रहते थे। मृगचर्म में लिपटे हुये वो नदी के जल में प्रक्षालन कर रहे थे। उनको जल में खड़े होकर पूजा और सूर्य नमस्कार करते देखकर राम विह्वल हो गये। उन्होंने कहा- ऐसा कोई नहीं होगा जिसकी मन्दाकिनी नदी के जल में डुबकी लगाने से थकान दूर नहीं हो!
भरत और राम का मिलाप चित्रकूट पर्वत पर ही कुटिया में हुआ था। अभिवादन, वार्तालाप और कहानी दो भाइयों के बीच प्रेम का एक अनूठा उदाहरण है। दो भाई अपने-अपने तर्कों से अपने निर्णयों की सत्यता और कत्र्तव्य निष्ठा बतलाते हैं। राम को पिता दशरथ के देहांत के बारे में जैसे ही भरत से पता चलता तो है वह मन्दाकिनी नदी के किनारे पिता की आत्मा की शांति के लिए पिण्डदान संस्कार करने चल पड़ते हैं। मन्दाकिनी नदी के किनारे ही भरत राम से अयोध्या वापस जाने के लिए अनुरोध करते हैं। लेकिन राम के वापस न जाने के निर्णय का सम्मान करते हुये, भरत राम से उनकी चरण पादुका मांगते हैं और कहते हैं कि जब तक आप अयोध्या वापस नहीं आ जाते, तब तक आप की जगह यह चरण पादुका राज सिंहासन पर रहेगी। भरत ने अपनी महानता दिखाते हुये मन्दाकिनी नदी के किनारे ही राम को उनकी चरण पादुकाओं के द्वारा राज्य समर्पित कर दिया था औ भरत ने वचन लिया था कि वह भी चौदह वर्ष तक शैय्या त्याग कर भूमि पर ही शयन करेंगे और फल आदि खाकर ही जीवन यापन करेंगे।
जब दक्षिण में राक्षस कुल शक्तिशाली हो गया तो उस समय चित्रकूट रावन के क्रूर सेनानी खर के अधीन था। राक्षसों के द्वारा इस क्षेत्र में ऋषियों और मुनियों को डराया और आतंकित किया जाता था। राक्षसों को ऋषियों मुनियों का यहाँ रहना, पूजा-पाठ और यज्ञ करना पसंद नहीं था क्योंकि ऋषि हिंसा का विरोध करते थे। खर के डर से भयभीत होकर धीरे-धीरे ऋषि मुनि सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर गयेे। राम, लक्ष्मण और सीता भी यहाँ से दक्षिण दिशा में दंडक वन को चले गये। वो सभी लोग दो वर्ष चित्रकूट, दस वर्ष दंडक वन में रहे और अंत में पंचवटी जाकर बसे जहाँ से रावन ने सीता का अपहरण किया।
वाल्मीकि स्थानों के बारे में बहुत विधिवत हैं। दिशा और दूरियों की विस्तृत जानकारी ने कहानी को ऐतिहासिक ग्रन्थ बनाने में बहुत मदद की है। अयोध्या को सन्दर्भ केंद्र मानकर कहानी पश्चिम और दक्षिण दिशा की ओर आगे बढ़ती है। घोड़ों पर लम्बी यात्रा तय करने के लिए दूरी यात्रा में लगे समयावधि के रूप में वाल्मीकि लम्बी दूरियों के बारे में बताते हैं। छोटी दूरियों को वह कोस या योजन के रूप में उल्लेख करते थे। वाल्मीकि रामायण में चित्रकूट स्थान प्रयाग से दक्षिण पश्चिम दिशा में दश कोस बताया गया है, जो आज के भारत के उत्तरप्रदेश राज्य के चित्रकूट क्षेत्र से मिलता-जुलता है। ऋषि विश्वामित्र ने जिस जगह तपस्या की थी वह यमुना नदी के दूसरी ओर था। स्पष्टतया यमुना घाटी ऋषियों मुनियों के आश्रम बनाने, तपस्या करने और शांति से जीवन यापन करने के लिए अत्यंत उपयुक्त जगह रही होगी। शायद हो सकता है कि गंगा घाटी उस समय गाँवों, खेतों और शहरीकरण के कारण सघन हो? ग्रन्थ पढ़ने से पता चलता है कि उस समय दक्षिण में वानरों का वास था, जो कि बन्दर प्रजाति के जीव माने जा सकते हैं। शायद राक्षस इस क्षेत्र में घुसपैठिये और क्रूर थे। राक्षस और वानरों में वन के संसाधनों और खाद्यानों के लिए संघर्ष होता था। चित्रकूट पर्वत राक्षसों के प्रभाव वाले दक्षिण क्षेत्र की उत्तरी परिधि का कार्य करता था

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