ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चीनी सिने परंपरा
01-May-2017 07:11 PM 3381     

सिनेमा उन्नीसवीं सदी का एक महत्वपूर्ण चमत्कार है जिसने पूरे विश्व में एक नयी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रांति लायी। सिनेमा समाज का एक ऐसा दर्पण है जो हमें भूत और वर्तमान का सजीव चित्र तो दिखाता ही है, साथ ही साथ भविष्य का भी दर्शन कराता है। सिनेमा के माध्यम से हम अपने इतिहास को जीवंत रूप में देख सकते हैं। आज विश्व के हर देश में सिनेमा सामाजिक-सांस्कृतिक चित्रण का सशक्त माध्यम बन चुका है। चीनी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं है। मूक फिल्मों से शुरू होकर ब्लैक-व्हाईट फिल्मों से होते हुए आज चीनी सिनेमा रंगीन, थ्रीडी और आई-मैक्स सिनेमा तक पहुँच चुका है।
चीनी सिनेमा का प्रारम्भिक इतिहास "पेइचिंग ओपेरा" से जुड़ा हुआ है। वैसे तो चीन में बहुत सारे ओपेरा हैं, लेकिन पेइचिंग ओपेरा उन सबमें सबसे बड़ा और ज्यादा प्रसिद्ध है। इसका लगभग 200 वर्ष का सुनहरा इतिहास है। पेइचिंग ओपेरा अभिनय, नृत्य, गायन, बोल से सुसज्जित एक समग्र कला है जिसमें चार मुख्य पात्र होते हैं, चिन (पुरुष), तान (महिला), सन (पुरुष) और छओ (पुरुष एवं महिला दोनों) जो विभिन्न रंगों के मुखड़े लगा कर मंचन करते हैं। दर्शक चीनी चाय का आनन्द लेते हुए पेइचिंग ओपेरा का रसास्वाद लेते हैं। अगस्त 1896 में शंघाई शहर में मोशन पिक्चर्स की स्थापना हुई, और 1905 में चीन की पहली फिल्म तिंग चुन शान का युद्ध का प्रदर्शन हुआ जो एक पेइचिंग ओपेरा की ही रिकॉर्डिंग थी।
वर्तमान में चीनी सिनेमा के दो मुख्य केंद्र हैं शंघाई और हांगकांग, लेकिन चीन का प्रारम्भिक सिनेमा शंघाई शहर में ही पुष्पित पल्लवित हुआ। कालांतर में शंघाई पूर्व का हॉलीवुड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बीस के दशक तक चीन में फिल्म कम्पनियां मुख्यतः विदेशी ही ज्यादा थीं। 1920 में अमेरिका से फिल्म तकनीशियन ने शंघाई आकर चीनी तकनीशियनों को फिल्म निर्माण कला का प्रशिक्षण दिया जिसका प्रभाव अगले दो दशक तक चीनी सिनेमा पर प्रमुखता से रहा। 1924 से 1926 तक चीन में लगभग 175 फिल्म निर्माण कंपनियों की स्थापना हुई जिसमें से 141 फिल्म निर्माण कम्पनियां अकेले शंघाई में स्थापित हुई।
पूर्ण रूप से स्वदेशी चीनी फ़िल्में 1930 से बननी शुरू हुई। "प्रगतिशील" और "वामपंथ" दोनों विचारधारा की फ़िल्में बनीं। 1930 के बाद का दशक चीनी सिनेमा के इतिहास का पहला स्वर्ण युग (1933-1937) माना जाता है। इस समय में कई महत्वपूर्ण फ़िल्में बनीं, जैसे 1933 में छेंग पु काओ द्वारा निर्देशित वसंत के रेशम के कीड़े 1935 में सुन यु द्वारा निर्देशित बड़ा रास्ता, 1934 में वु योंग कांग द्वारा निर्देशित देवी आदि।
यथार्थवादी सिनेमा इस काल की विशेषता थी, इस काल में फिल्मों के मुख्य विषय महिलाएं, सामाजिक समस्याएं आदि थीं, सामान्य जनता का संभ्रांत, जमींदारी और राजशाही व्यवस्था के प्रति असंतोष भी फिल्मों की मुख्य विषय-वस्तु बनी। 1937 में चीन पर जापानी आक्रमण के कारण चीन सिनेमा के पहले स्वर्णयुग का अंत हो गया। नव चीन प्रोडक्शन कम्पनी को छोड़कर अधिकतर फिल्म निर्माण कम्पनियों में ताला लग गया। बहुत से फिल्मकार शंघाई से पलायन कर हांगकांग चले गये। जापानी आक्रमण ने चीनी सिनेमा को बहुत नुकसान पहुँचाया। चीनी सिनेमा एक तरह से मृतप्राय हो गया।
1945 में चीनी सिनेमा का दूसरा दौर शुरू हुआ, पुनः शंघाई फिल्म निर्माण का केंद्र बना और बहुत सारी फिल्म निर्माण कम्पनियां पुनः शुरू हुई जिसमें लिएन ह्वा फिल्म सोसाइटी खुन्लून स्टूडियो आदि प्रमुख थी। 1945 में जापान पर विजय के उपलक्ष्य में फेई मु द्वारा निर्देशित फिल्म छोटे शहर का वसंत, 1947 में छाय छु शेंग द्वारा निर्देशित फिल्म वसंत नदी का पूर्व की तरफ बहाव का प्रदर्शन हुआ। इन फिल्मों की गिनती उस दौर की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में होती है। 1947-1949 को चीनी सिनेमा का दूसरा स्वर्ण युग माना जाता है। इस काल में देशभक्ति और राजनैतिक फ़िल्में प्रमुखता से बनीं, चूँकि यह काल बहुत हीं छोटा था, इसलिए कम हीं फ़िल्में बन सकीं।
1949 में माओ त्से तोंग की नेतृत्व वाली चीनी साम्यवादी दल के द्वारा चीन में सत्ता परिवर्तन हुआ और नये चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना हुई। इसके बाद चीनी सिनेमा में भी बहुत परिवर्तन हुए। फिल्मों के मुख्य विषय के रूप किसान, सैनिक और मजदूर आदि पर ज्यादा ध्यान दिया गया। परिणामस्वरूप 1949 में पूल, 1950 में सफ़ेद बालों वाली लड़की, मेरे इस जीवन में फ़िल्में बनीं जिनके मुख्य नायक किसान और मजदूर वर्ग से थे। गांवों को भी फिल्मों के मुख्य विषय में लाया गया। इसी काल में हांगकांग सिनेमा भी अस्तित्व में आया, जहां से विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर फ़िल्में बननी शुरू हुईं। 1949-1966 के काल में हांगकांग सिनेमा में काफ़ी विकास हुआ। शंघाई से पलायन कर हांगकांग पहुंचे फिल्म निर्माता निर्देशकों ने पुनः फिल्म निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाना शुरू किया। जिसके परिणाम स्वरूप 50 के दशक में बहुत सारी महिला प्रधान फ़िल्में बनीं। 60 के दशक में फिल्मों का विषय महिलाओं से उठकर पुरुषों पर आ गया। कॉमेडी और प्रेम प्रधान फ़िल्में बनने लगीं। पूर्व में हांगकांग में चीनी ओपेरा प्रधान फ़िल्में हीं बनती थी। अब विभिन्न विषयों पर अच्छी फ़िल्में बननी लगीं।
चीनी सिनेमा को "मार्शल आर्ट" के लिए भी जाना जाता है। जैसे हिंदी सिनेमा की पहचान गीत-संगीत और नृत्य है, वैसे ही चीनी सिनेमा की पहचान मार्शल है, पहले भारतीय फिल्मों मे नाच-गाने के चलते आलोचना का शिकार होना पड़ता था, लेकिन आज नाच-गाना भारतीय सिनेमा की विशेषता बन चुका है और विदेशों में भी स्वीकार किया जाने लगा है। ऐसा ही कुछ चीनी सिनेमा में मार्शल आर्ट की उपस्थिति को लेकर भी आलोचना किया जाता था कि चीनी सिनेमा में केवल उछल-कूद, मारकाट होता है, लेकिन आज वही मार्शल आर्ट चीनी सिनेमा की पहचान और विशेषता बन चुकी है और विश्व समुदाय द्वारा स्वीकार्य भी हो गई है।
चीन में मार्शल आर्ट पर आधारित बहुत सारी फ़िल्में बनीं। 1928 में प्रदर्शित नरक में जलता स्वर्ग को प्रथम मार्शल आर्ट फिल्म माना जाता है। कालांतर में कुछ दशक तक मार्शल फ़िल्में बननी रुक सी गयी, लेकिन 1950-1970 के समय को मार्शल आर्ट पर आधारित फिल्मों का नया दौर शुरू हुआ और इस समय में बहुत सारे प्रसिद्ध एक्शन हीरो चीनी सिनेमा में आये जिनमें जैकी चैन, ब्रूस ली, सामो हुंग आदि अधिक प्रसिद्ध हुए। इस काल को मार्शल आर्ट और एक्शन फिल्मों का स्वर्णयुग माना जाता है। कोंडोर के नायकों की वीरगाथा, खूनी तलवार आदि मार्शल आर्ट प्रधान फ़िल्में बनीं, प्रसिद्ध चीनी अभिनेता ब्रूस ली ने 1973 में प्रदर्शित ड्रैगन का रास्ता फिल्म में अभिनय के साथ-साथ फिल्म का लेखन, संपादन और निर्देशन भी किया था। यह फिल्म मार्शल आर्ट पर आधारित फिल्म के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है। उसी वर्ष ब्रूस ली अभिनीत-निर्देशित फिल्म ड्रैगन युद्ध को हॉलीवुड के साथ बनाई गयी जिसे चीन के मार्शल आर्ट पर आधारित प्रथम फिल्म माना जाता है जिसे किसी विदेशी फिल्म उद्योग के साथ बनाया गया था। 80 के दशक में मार्शल आर्ट फिल्मों का तीसरा नया दौर शुरू हुआ और अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। 1980 में लिऊ च्याओ छिंग द्वारा निर्देशित रहस्मय बुद्ध, 1982 में प्रसिद्ध अभिनेता जेट ली द्वारा अभिनीत शाओलिन मंदिर फ़िल्में बनीं जो मार्शल आर्ट पर आधारित फिल्मों के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई।
चीनी फिल्मों ने चीनी साहित्य को अमर करने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। प्राचीन चीनी साहित्य, आधुनिक चीनी साहित्य से लेकर समकालीन साहित्य के प्रमुख उपन्यासों, कहानियों का फ़िल्मी रूपांतरण हो चुका है। इस प्रकार चीनी सिनेमा चीनी साहित्य को जन-जन तक पहुंचा रहा है।
चीनी सिनेमा भारत-चीन सम्बन्ध को आगे बढ़ाने में भी अपनी महती भूमिका निभा रही है। चीनी सिनेमा भारतीय सिनेमा के सहयोग से तीन फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें 2016 में हुआंग स्याओ मिंग द्वारा अभिनीत थांग काल के महान संत ह्वेन सांग का प्रदर्शन हुआ, जिसमें सातवीं सदी के चीनी संत ह्वेनसांग के भारत यात्रा को दिखाया गया है। 2017 के जनवरी में जैकी चैन अभिनीत कुंग फु योग और अद्भुत भारत फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। इन सभी फिल्म में भारतीय अभिनेता-अभिनेत्रियों ने भी अभिनय किया है और भारतीय-चीनी सिनेमा के सम्बन्ध को मजबूत तो किया ही है, दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी प्रगाढ़ किया है।

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