ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ब्राहृर्षि वशिष्ठ
01-Jan-2016 12:00 AM 1276     

ब्रहृर्षि, वैदिक महाकाव्यों के अनुसार ऋषियों की श्रेणी में सबसे ऊँचा पद है, और इस पद पर साथी ऋषि उसको शोभित करते थे, जिसने जीवन में सबसे ज्यादा ज्ञान प्राप्त कर लिया हो। इस पद के लिये कोई विधिवत प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी, यह तो किसी के ज्ञान और सृजनात्मक कार्य के आधार पर ही निश्चित किया जाता था। तर्क यह है कि सभी तरह की सृजनात्मकता जगत का पालन करने वाले भगवान् ब्राहृा के कारण ही है इसलिये वह ही इस पद को किसी के रचनात्मक कार्य से खुश होकर पुरुस्कार के रूप में दे सकते हैं। हम इससे यह आशय निकाल सकते हैं कि भगवान् ब्राहृा ही किसी की सृजनशीलता की प्रतिभा को बढ़ावा देते हैं और उत्पादकता बढ़ाने के लिये उसे निखारने में मदद भी करते हैं। किसी के ज्ञान और बुद्धिमत्ता को समय के साथ सभी लोग जानने लगते हैं और सम्मान करने लगते हैं। जब यह सम्मान सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हो जाता है तब उसे ब्राहृर्षि का पद हासिल होता हैं। अनन्य ज्ञान के कारण ब्राहृर्षि अमरत्व को भी प्राप्त कर सकते हैं।
ब्राहृर्षि पृथ्वी पर मानव की तरह रहते हैं पर उन्हें सारे ब्राहृाण्ड और उसके आगे की सभी प्रक्रियाओं की जानकारी रहती है। अंतर्दृष्टि से सुदूर की किसी वस्तु को देखे बिना जानना और ध्यानमग्न होकर त्रिलोक की घटनाओं को समझने की कला को भारतीय साहित्य में "ब्राहृज्ञान' के नाम से जाना जाता है। ब्राहृर्षि त्रिकालदर्शी होते हैं। वह भगवान् ब्राहृ का इस ब्राहृाण्ड में प्रतिनिधि होते हैं। अनन्य ज्ञान और अपार योग्यता होने के वाबजूद वह अत्यंत विनम्र और व्यवहार में एक साधारण मनुष्य की तरह वर्ताव करते हैं। वह पारिवारिक जीवन यापन भी कर सकते हैं। उनके बच्चों को उत्तराधिकार में ब्राहृर्षि के ज्ञान और प्रतिभा को पाने के लिए कठिन साधना से गुजरना होता है। पुराणों के अनुसार अब तक सात ऐसे ऋषि हुये हैं और वो सभी पुरुष थे। वैदिक ऋचाओं और स्तुतियों की रचना का श्रेय उनको ही जाता है।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार वशिष्ठ राजा दशरथ के दरबार में मुख्य धर्माचार्य थे। वह आठ सदस्यीय परामर्श परिषद् के मुखिया भी थे, जो राजा को व्यक्तिगत और प्रशासनिक कार्यों में सलाह देती थी। सलाह मांगने पर ही दी जाती थी, जब राजा उपयुक्त समय पर इसके लिये आग्रह करें। इतिहास से ऐसा देखा जा सकता है कि राजा अधिकांश निर्णय स्वयं ही लेते थे और सलाह के लिये तब जाते थे, जब किसी विषम परिस्थिति में फँस गये हो। शुरुआत में सलाहकार राजा के निर्णयों को क्रियान्वित करने में मदद करते थे और बाद में वह निर्णय लेने में भी परामर्श देने लगे। राजा दशरथ के सभी निर्णय स्वयं के थे, वशिष्ठ तो अनुष्ठानों के संचालन का कार्यभार संभालते थे। वशिष्ठ ने कभी राजा के निर्णय लेने को प्रभावित नहीं किया। धर्माचार्य का कत्र्तव्य तो राज्यहित के लिये श्रद्धापूर्ण ढंग से धार्मिक संस्कार संपन्न कराना था।
वशिष्ठ ने राजा दशरथ के वृद्धा अवस्था में पुत्र प्राप्ति  प्रयास के निर्णय का अनुमोदन किया था। सारथी सुमंत्र ने राजा दशरथ को इस बात से अवगत करा दिया था कि पुत्रेष्ठियज्ञ के धार्मिक अनुष्ठान के लिये श्रंगी ऋषि उपयुक्त हैं, जो राजा दशरथ के दामाद भी थे। राजा ने श्रंगी ऋषि को इस कार्य के लिये आमंत्रित करने से पहले वशिष्ठ से परामर्श किया था। राजा दशरथ ने अ?ामेध यज्ञ का आदेश दिया और वशिष्ठ से उसके सकुशल आयोजन का अनुरोध किया। वशिष्ठ ने आमंत्रित अतिथियों के आदर सत्कार की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी और निर्देश सभी कर्मचारियों को दिये। उनको उसके नियमों की जानकारी थी और उसके अनुसार शिष्टाचार निभाया। उनके आदेशानुसार घोड़ा छोड़ दिया गया और अपनी देखरेख में सब धार्मिक कार्यक्रम करवाये जब एक वर्ष के बाद घोड़ा वापस आया। सभी एकत्रित विद्वान् और श्रंगी ऋषि ने उनके निर्देशों को सुना। सभी पुरोहितों ने अपनी दक्षिणा एकत्र कर वशिष्ठ को इस भाव से दे दी कि वह सभी में दक्षिणा बराबर बाँट देंगे। वह केवल प्रशिक्षक ही नहीं बल्कि निर्णायक भी थे।
उन्होंने उस समय वि?ाामित्र के लिए हस्तक्षेप किया था जब वह राजा दशरथ से राम को अपनी यज्ञ शाला की रक्षा करने के लिये, माँगने आये थे। राजा के अनुसार यह असंगत अनुरोध था, क्योंकि उस समय राम की आयु सोलह वर्ष भी नहीं थी। हालाँकि वाल्मीकि ने वि?ाामित्र के आशय को उजागर नहीं किया, परन्तु वशिष्ठ को इस प्रयोजन में कुछ अच्छाई दिख रही थी। वि?ाामित्र ने राम को कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों शिक्षा दी और कई कठिन परिस्तिथियों में उनका मार्गदर्शन कर उन्हें उनसे निपटाना सिखाया। इस यात्रा के दौरान राम का विवाह भी हो गया, हो सकता है वशिष्ठ को इसके बारे में पूर्वानुमान हो। राजा दशरथ की ओर से वशिष्ठ ने सीता के स्वयंवर के समय राजा जनक की राजधानी मिथिला में कार्यक्रम का सभापतित्व किया।
ब्राहृर्षि होने के कारण उनको शायद घटनाओं के अंतिम परिणाम के बारे में अनुमान हो, लेकिन पूरे घटनाक्रम का आभास न हो। उनको यह ज्ञात था कि परशुराम का विघ्न विवाह के कार्यक्रम में बहुत बड़ा रोड़ा बन सकता है और इसलिये उन्होंने उन्हें शांत करने के प्रयास किये। हालाँकि वह सफल नहीं हुये और परशुराम तब जाकर माने जब उन्होंने राम को पहचान लिया। वशिष्ठ को हो सकता है, राम के वनवास के अंतिम परिणाम का ज्ञान हो, इसलिये इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया, परन्तु उस वक्त उन्होंने विरोध किया जब कैकेयी सीता को वनवासी के वस्त्र पहनने के लिये जिद कर रही थी। वह यह आभास नहीं कर सके कि राजा दशरथ राम के वनवास को सहन नहीं कर पायेंगे। राजा की मृत्यु के बाद की स्थिति काफी अस्त व्यस्त थी। परिस्थिति को संभालने की पूरी जिम्मेदारी वशिष्ठ की थी और उन्होंने उसे शांतचित्त और विवेकपूर्ण तरीके से निपटाया। हो सकता है कि उन्होंने ऐसी परिस्थिति पहले कभी अपने इस सैकड़ों वर्षो के लम्बे कार्यकाल में और दूसरे राजाओं के साथ अनुभव में की हो। वह बहुत की कुशल प्रबंधक थे।
राजा दशरथ की मृत्यु के बाद बुलाई गई बुद्धिजीवियों की सभा का सभापतित्व करते समय वशिष्ठ ने अति विनम्रता दिखाई। राज दरबार की प्रथा के अनुसार भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किये जाते थे। वशिष्ठ की बुद्धिमत्ता इस बात में थी कि विचार विमर्श का अस्थिरता पैदा किये बिना व्यावहारिक दिशा में ले जाया जाये। उन्होंने सभी को इस विचार के लिये सहमत कर लिया कि भरत को ननिहाल से तुरन्त बुलाया जाये। अपने राज्य की जानकारी और दूसरे राजाओं की लोलुपता को ध्यान में रखकर उन्होंने संदेहवाहक को यह निर्देश दिये कि कैकेय राज्य में भरत को राम के वनवास के वारे में न बताया जाये। यह एक राजनैतिक कदम था जो उन्होंने बड़ी सूझबूझ से चला। दूसरा कोई सशक्त राज्य अस्थिरता के समय का लाभ उठा सकता है। वशिष्ठ इक्ष्वाकु कुल सामाज्य की रक्षा करना चाहते थे। वह अयोध्या राजघराने के प्रमुख संरक्षक थे।
वशिष्ठ ने भरत के सिंहासन पर न बैठने के उनके निर्णय के बारे में समझाने का प्रयास नहीं किया। वशिष्ठ ने भरत के उस निर्णय में भी सहयोग किया जिसके अनुसार जंगल में रास्ता बनाकर सभी लोग जाकर राजकीय ठाट-वाट के साथ राम को वापस ले आयें। उन्होंने भरत की राम को वापस लाने की मुहिम में मदद की और शायद राज्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये राम से वापस अयोध्या आने का अनुरोध भी किया। पिता को दिये गये वचनों का उल्लंघन न करने का राम का निश्चय शायद वशिष्ठ की सलाह पर भारी पड़ा। जब भरत राम को मनाने में असफल रहे तो उन्होंने राम की चरण पादुका को राज्य सिंहासन पर स्थापित करने की इच्छा जाहिर की, वशिष्ठ ने इस असाधारण मांग को स्वीकृति दे दी। ब्राहृर्षि केवल बुद्धिमान नहीं होते, बल्कि उन्हें व्यावहारिक भी होना चाहिये।
वशिष्ठ का असली स्वरूप उस समय सामने आया जब उनका मुकाबला वि?ा विजय के लिये निकले ऋषि वि?ाामित्र से हुआ। वि?ाामित्र ज्ञानी और विद्वान थे और साथ ही साथ वह प्रतिस्पर्धात्मक और अति महत्वाकांक्षी भी थे। वह किसी को भी अपनी विवेक की कला और युद्ध कौशल से जीत सकते थे, लेकिन वह अपनी इन्द्रियों के वशीभूत और अनादर के शिकार थे। वह भगवान् ब्राहृा को खुश कर ब्राहृर्षि पद हासिल करने में नाकाम रहे। यात्रा के दौरान वह एक दिन वशिष्ठ ऋषि की छोटी सी कुटिया पर वरिष्ठ ऋषि का सम्मान करने पहुँच गये। वशिष्ठ ने उन्हें और उनके सभी साथियों को भोजन के लिये आमंत्रित किया। व्यवस्था उत्तम और भोजन अति स्वादिष्ट था। विश्वामित्र ने इसका राज जानना चाहा। वशिष्ठ ने उन्हें एक गाय की ओर इशारा कर आश्चर्यचकित कर दिया।
विश्वामित्र ने उस गाय को अपने साथ ले जाने की कोशिश की, जिसके कारण उन दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया। वि?ाामित्र अपने साथ असाधारण कला और अभेद युद्ध कौशल प्रतिभा लाये थे, जिसे वशिष्ठ ने केवल एक छड़ी से नाकाम कर दिया। कहानी में वाल्मीकि ने अलंकार के रूप में विवरण किया है, पर यह सर्वविदित है कि उसकी हमेशा विजय निश्चित है जिसके पास ब्राहृा का आशीर्वाद होता है।

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