ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ब्रादर शैनॉन मूल बांग्ला से अनुवाद गंगानन्द झा
01-Jan-2016 12:00 AM 1623     

आज के हायर सेकण्डरी को हमारे समय में प्रि-    युनिवर्सिटी कहा जाता था। प्रि-युनिवर्सिटी के दो साल मैं शिलांग शहर के प्रसिद्ध शिक्षण प्रतिष्ठान सेंट एडमण्ड्स कॉलेज का छात्र था। तब एडमण्ड्स कॉलेज के पिं्रसिपल थे ब्रादर शैनॉन। विशालकाय और गंजे, बलिष्ठ और तने हुए। पादरी की सफेद कैसक और चश्मा पहने हुए ब्रादर शैनॉन टहलने और दौड़ने के बीच के कदमों से इस तरह पूरे कॉलेज का चक्कर लगाया करते कि छात्रों के लिए उन्हें भय नहीं पाने की कोई गुञ्जाइश नहीं रह जाती थी। उनके पाँवों की आहट के पहले ही उनके कैसक से निकली एक खास किस्म की आवाज सुनाई पड़ती। वही आवाज छात्रों को आने वाले खतरे से आगाह कर देती थी। शिलांग शहर की जीवन्त किंबदन्ती ब्रादर शैनॉन जाति से आइरिश थे।
आइरिश जाति के प्रति मेरी थोड़ी कमजोरी और लगाव है। इसकी वजह पूरी तरह व्यक्तिगत है।
इसी शिलांग शहर के नैजरथ अस्पताल में 1969 ई. में अपनी तृतीय सन्तान यानी दूसरी बेटी को जन्म देते वक्त मेरी माँ का देहान्त हुआ था। उनका ऑपरेशन जिस महिला सर्जन ने किया था, वे जाति से आइरिश थीं। मेरी माँ की मृत्यु उनके जीवन की पहली और अन्तिम असफलता थी। माँ की आकस्मिक मृत्यु से वे इतनी परेशान हो गर्इं कि इसके कुछ दिनों बाद ही हमेशा के लिए डॉक्टरी छोड़कर अपने देश आयरलैंड वापस चली गर्इं। जाते वक्त अपनी इस आकस्मिक असफलता के फलस्वरूप पैदा हुए पागलपन के जीवाणुओं को भी साथ ले गर्इं। पौराणिक कथाओं की तरह अवि?ासनीय होते हुए भी यह घटना पूरी तरह सच्ची थी।
जब एडमण्ड्स कॉलेज में भर्ती हुआ था, उस समय मैं सभी गोरे साहबों को अंगरेज या अमेरिकी समझता था। अंगरेजी साम्राज्यवाद अपने घर के भीतर के पड़ोसी आइरिश लोगों पर भी समान रूप से सक्रिय था। आइरिश लोगों ने भी हम लोगों की ही तरह स्वतन्त्रता आन्दोलन किया था। ये सारी बातें उस वक्त नहीं जानता था। पार्नेल की जानकारी नहीं थी, उनकी तथाकथित अवैध प्रेयसी (बाद में पत्नी) कैथरिन ओसिया की कहानी नहीं जानता था। ये सारी बातें जेम्स जॉयस की कई एक रचनाएँ पढ़ने पर बहुत बात में मालूम हुई हैं।
 प्रथम वि?ायुद्ध के योद्धा मेजर राबर्ट ग्रेगरी के सम्बन्ध में इट्स की लिखी कविता में आयरलैंड के दु:ख की कहानी इस तरह वर्णित है----
Those I fight I do not hate,
Those that I guard I do not love;
My country is Kiltartan Cross,
My countrymen Kilartan’s poor,
No likely end could bring them loss
Or leave them happier than before.
इन बातों की चर्चा करने का कारण मेरे मन के अन्दर घर कर गए एक सवाल का जवाब तलाश करना है। सन् 1947 में हमारे देश के स्वतन्त्र होने पर अंगरेज अपना बोरिया-बधना समेट कर हमेशा के लिए यहाँ से चले गए। ब्रादर शैनॉन हमारी आजादी के बाद भी इतने सालों तक शिलांग में रह गए, तो क्या इसकी वजह यही थी कि वे जन्म से अंगरेज नहीं थे- वे आइरिश थे। अपने देश के साथ कोई समानता नहीं महसूस करने पर, अन्तर से अच्छा नहीं लगने पर क्या इतनी बड़ी अवधि तक परदेश में रहा जा सकता है? प्रासंगिक है कि सेंट एडमण्ड्स जिस ईसाई वर्ग के अधीन था, उसे  Congregation of Irish Christian Brothers कहा जाता था, यह संस्था आइरिश जातीयतावादियों को विभिन्न तरीकों से समर्थन देती थी। इसके साथ-साथ वह आइरिश भाषा और वहाँ के देशी खेलों को भी समर्थन दिया करती थी। लिखने के क्रम में ही मुझे याद आया है, भगिनी निवेदिता भी आइरिश थीं। उनके नाना आयरलैंड के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नेताओं में एक थे। और रवीन्द्रनाथ का गोरा? गोरा के पिता भी तो आयरिशमैन ही थे। वही गोरा जिसने अपने जीवन के जरिए दिखला दिया था कि भारतीयता रक्त-सूत्र से पाया हुआ कोई अधिकार नहीं होती। भारतीयता अर्जन की जाती है,-- विदेशी भी प्यार और शिक्षा के बदौलत इसे अर्जित कर ले सकता है।
हमारे समय में एडमण्स कॉलेज ने आज के आरसीसी बिÏल्डग की शक्ल नहीं अख्तियार की थी। शिलांग शहर की खासियत, काठ से बने घरों की मर्यादा, के साथ ही यह कॉलेज बना हुआ था। केवल फिजिक्स डिपार्टमेंट की पक्की इमारत थी। कॉलेज तब सिर्फ लड़कों का ही था, लड़के-लड़कियों के कम्बाइण्ड कॉलेज का मौजूदा चरित्र तब नहीं उभड़ा था। मैं हमेशा डॉन वास्को पॉयंट होते हुए कॉलेज नहीं जाता था, लायमोखरा होते हुए, जो रास्ता सीधे ऊपर की ओर उठता जाता है उसी ओर होकर जाता था। दाहिनी ओर लेडी वेरोनिका पाथ पार कर थोड़ी चढ़ाई के बाद, दोनों ओर के पाइन पेड़ों के समूहों के बीच हवा की कथावार्ता सुनते-सुनते रिवाÏल्वग गेट से होते हुए कॉलेज के पतले से पक्के रास्ते पर प्रवेश करता था। दाहिनी ओर टेनिस कोर्ट, उसके बाद बास्केटबॉल कोर्ट, उसके बाद ज्योग्रफी डिपार्टमेंट, विद्यार्थियों का यूरिनल (अंगरेज लोग जिसे अपने देश में लू कहते हैं) और उसके पीछे नासपाती के पेड़। ज्योग्रफी डिपार्टमेंट जाने के पहले ही बाँई ओर अनेकों सीढ़ियाँ अपने होने की घोषणा करती थीं। उन पर उठते ही लाइब्रोरी छोटा-सी सुन्दर। चारों ओर झाड़ी की तरह पौधों का घेरा, फूलों के पौधे। हमें पता था कि इस झाड़ी और फूल के पौधों की देखभाल ब्रादर शैनॉन स्वयं अपने हाथों से करते हैं। इधर बाँई ओर केमिस्ट्री डिपार्टमेंट। उसके बाद एक-एक कर क्लास रूम। उल्टी ओर कैंटीन। दाहिनी ओर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक अलग गोलाकार कमरा- कॉलेज की ऐडमिनिस्ट्रेटिव बिÏल्डग। वहाँ कॉलेज के पिं्रसिपल शैनॉन बैठते हैं। हाथ के दाहिनी ओर उनका ऑफिस है। वहां दो छोटे-छोटे काउण्टर हैं। हमारी फीस वहीं पर जमा करनी होती है। थोड़ा और आगे बढ़ने पर टीले की तरह ऊपर चढ़ने पर छोटा-सा गिर्जा यानी चैपेल, पीछे की ओर एडमण्ड्स स्कूल। एक रास्ता जैसे हड़बड़ाकर तेजी से नीचे की ओर उतर गया है। उधर उतरने पर डॉन बॉस्को पायंट से मुलाकात होती है।
ब्रादर शैनॉन हर समय हर जगह दिखा करते थे। उनकी क्लान्तिहीन चौकसी के फलस्वरूप उनके भूतपूर्व छात्र एवम् बाद में सहकर्मी कवि अनन्य गुह ने उन्हें The College Principal, Postman, Gardener, Examination Superintendent all parcelled into one कहा था। उनसे दिन मे जहाँ-तहाँ कई बार मुलाकात हुआ करती। उन्हें देखते ही हम समय के चलन के अनुसार उन्हें गुड, मॉर्निंग, गुड नून, या गुड आफ्टरनून कहकर अभिवादन करते और वे भी मुस्कुराकर वैसा ही कहते। तब पड़ोस के एक कॉलेज के पिं्रसिपल एक भारतीय पादरी थे, जो भाई नहीं, थे बाकायदा पिता अर्थात् फादर। वे हमेशा शराब के नशे में धुत्त रहा करते थे उनको जब कोई गुड मॉर्निंग कहता तो वे उत्तर देते थे-  I do not know whether it is good morning or a bad morning. ये सारी सुनी सुनाई बातें हैं। हम कभी पड़ताल करने नहीं गए। हमें अपने पिं्रसिपल पर गर्व था कि वे हमारे मामूली अभिवादन को भी पूरा सम्मान देते।
उस समय छात्रों के बीच ब्रादर शैनॉन के बारे में अनेक सच्ची घटनाएँ कहानियों की तरह चर्चा में रहा करती थी। एक बार क्लास छोड़कर भागे हुए एक छात्र का पीछा करते हुए पुलिस बाजार के इ.सी. रेस्टुरेंट (प्रो. अबु दास) में घुस कर वे उसे पकड़कर कॉलेज ले आए थे। एक दूसरी घटना में एक छात्र को उन्होंने सिगरेट पीते हुए देख लिया। लड़के ने उन्हें देखकर घबड़ाकर सिगरेट फेंक दिया और अपने हाथ से धुँआ हटाने की कोशिश करने लगा। इस पर उन्होंने कहा था,  This is the first time I have seen smoke coming out of a person's ears.
मेरी उनसे सीधी मुलाकात तीन बार हुई थी। पहली बार, कॉलेज की किसी परीक्षा की मेरी माक्र्सशीट में गलती से गणित के अंक इतिहास के कॉलम में अंकित कर दिए गए थे। जिसने माक्र्सशीट लिखा था, उन्हें शायद आट्र्स के छात्र का गणित-प्रेम का औचित्य रास नहीं आया था। उस समय परीक्षा सम्बन्धी सारे अधिकार शैनॉन साहब के अपने हाथों में थे। इसीलिए अपने प्राप्तांकों को यथास्थान पर वापस लाने के लिए धुकधुकाते कलेजे से मुझे शैनॉन साहब के आमने सामने होना पड़ा था। एक तो पिं्रसिपल, उस पर गोरे साहब, दूसरी ओर मैं देहाती भुच्च--- डर से हालत खराब। इसी हालत में मैंने अपनी लजीली और विडम्बित अंगरेजी में नम्रतापूर्वक अपनी समस्या निवेदित की। मुझे चकित करते हुए उन्होंने मेरी बातें समझ ली और अपना बड़ा-सा रजिस्टर खोलकर मेरे रोल नम्बर के साथ मिलाकर देख लिया कि मैं ठीक कह रहा हूँ कि नहीं। मेरा प्राप्तांक सही स्थान पर लिखकर मेरी पीठ थपथपाई उन्होंने और मुझसे कहा कि साइन्स नहीं लेकर तुमने भूल किया है। शैनॉन विज्ञान के आदमी थे। वे फिज़िक्स पढ़ाते थे। एक दिन अर्थशास्त्र के शिक्षक आगा अहमद की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर हम कॉलेज के बाग में चक्कर लगा रहे थे, राउण्ड में निकले शैनॉन साहब हमें देखकर हमारी ओर लपके आए। हमें डाँटकर क्लास रूम में भेजा। उन्होंने रोलकॉल किया और हमारे लिए परम दुर्बोध्य फिज़िक्स का क्लास लिया। दूसरे दिन आगा सर आए और उन्हें जब उन्हें मालूम हुआ कि शैनॉन साहब उनके क्लास में आए थे, तो परेशान हुए पर जब मालूम हुआ कि उन्होंने फिज़िक्स पढ़ाया तो हँसी नहीं रोक सके थे।
मेरी उनसे दूसरी मुलाकात भी मजबूरी की ही वजह से थी। मेरे पिता की वार्षिक आय मेरे लिए नेशनल स्कॉलरशिप पाने की सीमा से थोड़ी अधिक थी, इसलिए मुझे बाध्य होकर नेशनल का सेवा-प्रदत्त विकल्प मेरिट स्कॉलरशिप चुनना पड़ा था। इसमें अपने कॉलेज के पिं्रसिपल की अनुशंसा संलग्न करना आवश्यक था। इसलिए मेरे लिए फिर शेर का सामना करने की मजबूरी। फिर से पिं्रसिपल का चैम्बर। चैम्बर में कदाचित कोई मीटिंग चल रही थी। मैं बाहर चहलकदमी करता रहा। उन्होंने छोटे दरवाजे के नीचे से मेरे पाँव देख लिए होंगे। एकाएक निकल आए। मुझसे पूछा कि क्या चाहिए। मैंने भरसक संक्षेप में अपनी जरूरत बताई। मुझे वहीं प्रतीक्षा करने को कहकर वे अन्दर घुस गए। मैं चहलकदमी करता रहा। मीटिंग खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। अन्त में थकावट से चूर-चूर होकर मैंने, "चुल्हे में जाए', बड़बड़ाता हुआ वापसी का रास्ता पकड़ा। अभी जिस रास्ते का वर्णन किया था, उसे उल्टा कर लीजिए। लाइब्रोरी टेरी पारकर सीढ़ियाँ उतकर ज्योग्राफी डिपार्टमेंट को बाँई ओर रखते हुए, बास्केटबॉल कोर्ट, टेनिस कोर्ट पारकर जब बाहर जाने का वह छोटा-सा रिवाÏल्वग गेट पार करने ही वाला था, पीछे से हठात् शैनॉन साहब के गले की जोरदार आवाज सुनकर पत्थर की तरह स्थिर हो गया। Hey! you उसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, उसे विशुद्ध हिन्दी, बांग्ला में भत्र्सना के अलावे कुछ भी नहीं कहा जा सकता। क्  I told you
to wait outside my room and you have bunked off! Don't you understand English?  असल में क्लास छोड़ना या bunking नामक कर्म शैनॉन साहब बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकते थे और हमेशा ही वे इस शब्द का प्रयोग करते थे। हमारे शिक्षकों की भी क्लास नहीं लेने की रुझान में वे इसी bunking की छाया देखते थे। मेरा आकांक्षित अनुशंसा-पत्र शैनॉन साहब के हाथों में था। मीटिंग के बाद ही कब मानो अपने हाथों ही उन्होंने उसे टाइप कर लिया था। मैं उस समय बिलकुल अनाड़ी था। भारतीय लालफीता का बिन्दु विसर्ग नहीं समझता था। अगर समझता तो पला तक पैरवी-प्रार्थी का पीछा करते हुए दौड़कर आने वाले उदार पैरवीकार के हाथ से अनुशंसा-पत्र लेते समय भावावेग से मेरी आँखों में आँसू आते ही।
इसके बाद बस एक बार ही मैं शैनॉन साहब के आमने सामने हुआ था, प्री-यूनिवर्सिटी परीक्षा के समय, चार दिनों तक लगातार। हुआ यह था कि उस परीक्षा के समय मुझे ब्लड डिसेण्ट्री हो गई थी। तय किया था कि परीक्षा नहीं दूँगा। लेकिन मेरे मामा ने बाँध दिया। वही पकड़कर मुझे ले गए परीक्षा दिलाने। कॉलेज के केमिस्ट्री लैब के सिक रूम में परीक्षा देनी पड़ी मुझे। ब्रादर उस परीक्षा के समय हर रोज प्रायः नियम से मुझे देख जाया करते थे। हर रोज उनके दो सवाल तो हुआ ही करते थे, वे थे — मेरी शारीरिक अवस्था और मेरी परीक्षा की स्थिति। क्त2च् गैस के गन्ध से भरे केमिस्ट्री लैब में मेरा बीमार और दुर्बल उत्तर सुनकर हर रोज वे मेरी पीठ थपथपाकर "जॉली बॉय' कहकर उत्साहित करते औऱ उसके बाद अपनी चिरपरिचित व्यस्तता की गुफा में घुस जाते। उल्लेखनीय है कि इसी ब्रादर शैनॉन की उपस्थितबुद्धि तथा सदिच्छा के कारण ही उस साल मेरा परीक्षा देना सम्भव हुआ था। जहाँ तक याद आता है, उस साल असम में किसी भी परीक्षा का आयोजन नहीं हुआ था।
बात यह थी कि उस समय उत्तर पूर्वांचल में जगह-जगह छात्र आन्दोलन आयोजित हो रहे थे। सभी आन्दोलनों की मूल माँगें दो बातें थीं- पहला, अपनी अपनी जातिगत सत्ता की सुरक्षा तथा दो, विदेशी यानी शरणार्थी बंगालियों का निष्कासन। सुनने में आया था कि उस समय एडमण्ड्स कॉलेज के होस्टल में भी एक असमिया और एक बंगाली छात्र के बीच तकरार को लेकर माहौल काफी गर्म हो गया था। ब्रादर शैनॉन ने कुशलतापूर्वक उसे काबू में किया था। लेकिन इससे भी बड़ा उनका कारनामा सुना गया था। एक स्थानीय छात्र संगठन की उस साल की सारी परीक्षाओं को बन्द करने की माँग को अंकुर में ही नष्ट करने में वे सफल हुए थे। उनका कहना था कि कम से कम उनके कॉलेज के छात्रों के एक साल का कीमती समय वे किसी भी हालत में नष्ट नहीं होने देंगे।
परीक्षा समाप्त होने के साथ ही मेरा शिलांग वास समाप्त हो गया और मैं अपनी जन्मभूमि शिलांग छोड़कर बहुत दूर चला आया। पर मेरे पिताजी उसके बाद भी लाइमोखरा पोस्ट ऑफिस में ही पोस्टमास्टरी करते रहे। उनसे ही बीच बीच में ब्रादर शैनॉन की बातें सुना करता था। शैनॉन कब क्या पोस्ट करने पोस्ट-ऑफिस आते, ऐसी ही बातें, और क्या। उनके डाक का ज्यादातर हिस्सा कॉलेज के जरूरी कागजात या समाचार हुआ करते थे। वे सब भी वे अपने ही हाथों पोस्ट करते थे। कल्पना के भी भी परे लगती है यह बात। मेरे पिता के साथ उनका व्यक्तिगत परिचय था।
इसके बाद की सारी घटनाएँ मेरी सुनी हुई हैं। शैनॉन सन 1988 ई. में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद वे कार्सियांग चले गए। वहाँ से माउण्ट आबू। माउण्ट आबू में, सुना है,Christian Brothers का  Old Age Home है। वहीं रहते थे वे। सुना गया कि हमेशा शिलांग-शिलांग करते रहते थे, और शिलंाग आना चाहते थे। ये बातें लिखते हुए शिलांग और शैनॉन इन दो शब्दों के बीच मात्राओं की समानता पर आँखों का ध्यान जाता है। एक साथ उच्चारण करने पर श का अनुस्वार और न का अनुप्रास एक नीरव हाहाकार की तरह कहीं बज उठते हैं।
 इसके बाद ब्रादर शैनॉन विस्मृति के शिकार हुए। उन्हें डब्लिन शहर भेज दिया गया। वहाँ के किसी एक Christian Brothers के Old Age Home में। बस सिर्फ छ-सात साल पहले की बात है यह सब। वहीं पर 2012 ई. में 24 सितम्बर को उनकी मृत्यु हुई। अभी कुछ दिन पहले ही मुझे जानकारी मिली 2013 ई. के सितम्बर में। मालूम होने के बाद से ही ब्रादर के देश के ही एक विख्यात लेखक की वि?ाविख्यात पुस्तक में पढ़ी एक कविता मन में ताजा हो उठी थी, उसके सुरों की गूँज आज भी मुझको छोड़कर नहीं गई है।
Dingdong! The Castle bell!
Farewell, my mother!
Bury me in the old churchyard
Beside my eldest brother
My coffin shall be black
Six angels at my back
Two to sing and two to pray
And two to carry my soul away.
 जानता हूँ अगर शिलांग में ब्रादर की मृत्यु होती तो उनकी कब्रा को सब लोग फूलों-फूलों से ढंक देते। अपने देश के डब्लिन शहर के किसी अनाम और अजाने कब्रिास्तान में सोए हुए हैं वे।
हे भगवान! वहाँ उनकी कब्रा पर फूल देने वाले लोगों का अभाव न हो

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