ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा की नाक पर रूमाल रखने का समय
01-Jul-2018 04:59 AM 1974     

बेला महका रे महका आधी रात को यह पंक्ति एक फिल्म गीत की है, जो एक मीठी-गंध का स्मरण कराती है। कदाचित लगभग आधी शताब्दी पूर्व, आकाशवाणी की "विविध भारती" सेवा ने, देर रात को प्रसारित होने वाले, मधुर फिल्म गीतों के एक कार्यक्रम का नाम ही दिया था, "बेला के फूल"। लेकिन जब से भारत-सरकार के "पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय" ने शौचालय निर्माण करने का प्रचार का संकल्प लिया है, तब से "विविध भारती" के इस कार्यक्रम में शौच-संबंधी विज्ञापन इतने ठसाठस भर दिए गए हैं कि कार्यक्रम सुनते हुए, वहाँ संगीत की सुगंध बरामद होने के बजाये विष्ठा की दुर्गंध अधिक आती है। वैसे आकाशवाणी के सरकारी कारिंदों को, जब भी ऊपर से किसी भी सरकारी योजना या कार्यक्रम के बारे में कोई "पॉजिटिव ब्रॉडकास्ट" के लिए, दिल्ली से अपने आकाओं का आदेश मिल जाता है तो वे सहसा ऐसे बावले हो जाते हैं कि वे अपनी सामान्य प्रसारण बुद्धि के उपयोग से हाथ झाड़ लेते हैं। यही कारण रहा कि "हुजूर" के आदेश के चलते उन्होंने शौच के विज्ञापनों को सुबह-सुबह "भक्ति संगीत" कार्यक्रम में भी प्रसारित करना शुरू कर दिया, क्योंकि उनकी बाबुई किस्म की मातहती बुद्धि ने कल्पना की दौड़ लगाई और सोच लिया कि "भक्त संगीत" का प्रसारण् सुबह-सुबह होता है और लोग भी शौच सुबह-सुबह करते हैं। कुल मिलाकर "भगवत-स्मरण" और "शौच" को एक साथ ही क्लब्ड कर दिया और खुश हो गए की उन्होंने तो सोने में सुहागा मिला दिया है। दरअसल, कहा जाये तो ये उनकी "सु-हगा" बुद्धि का ही सबूत है। नतीजतन, स्थिति अब यह हो गयी है कि आकाशवाणी के सभी चैनलों पर लगभग सभी सर्वाधिक सुने जाने वाले कार्यक्रमों में गीत का मुखड़ा शुरू हुआ नहीं कि उद्घोषक अपनी व्यावसायिक फुर्ती से गीत के मुखड़े पर ही मार देता है, अपना शौच वाला विज्ञापन। ऐसे क्षण में, श्रोता को कार्यक्रम सुनते हुए सहसा लगता है, जैसे किसी खुशबूदार फूल के खिलते ही कौव्वे ने उस पर बीट कर दी है।
अब आप ज़रा ठीक से ध्यान दीजिए कि विज्ञापन में जो नाटकीय किरदार शौच-संबंधी रसायन बेचता है, वह एकदम लम्पट-सा मसखरी करता हुआ, गीत की गरदन दबोचकर बोलने लगता है- "लेल्ले... लेल्ले, लेल्ले।" उसकी इस गुहार लगाने के अंदाज़ में, एक ऐसी स्पष्ट अश्लील ध्वनि है, जिसे एक साधारण-सा भी श्रोता तुरंत पकड़ लेता है। इसके साथ ही विद्रूप यह है कि उस सेल्समेन का नाम है, शौचा। पता नहीं सरकार का ऐसा कौन-सा भाषाविद् है, जो एक शौच-क्रिया को नामकरण संस्कार में बदल रहा है। क्या पाखाने का सामान या उसकी साफ-सफाई से संबन्धित सामग्री बेचने वाले व्यक्ति का नाम, "जनाब पाखाना" रखा जा सकता है? दरअसल, यह राष्ट्रव्यापी-मौलिक-मूढ़ता के सरकारी संस्करण का सर्वोत्तम उदाहरण है कि इन दिनों भारत-सरकार की तमाम योजनाओं-नीतियों और विचारों को अब केवल विज्ञापनी बुद्धि के जरिए ही लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। ये हमारी सरकार की चिंतन की दरिद्रता है कि एक लंपट के भेष में सरकार का प्रतिनिधि प्रस्तुत हो रहा है। ऐसा इसलिये हो रहा है कि अब विज्ञापन कंपनियों के कारिंदे ही सरकार के ेथिंक-टेंक की जगह ले चुके हैं। विडम्बना यह है कि इन कमअक्ल कारिंदों ने विज्ञापन बनाते समय "सांस्कृतिक-भद्रता" को क्रूरता से कुचलने की सरकार की ओर से निर्लज़्ज प्रतिज्ञा ले ली है। क्या खुले में शौच करने की निम्न वित्तीय वर्ग की विवशता और वृत्ति को केवल अभद्र भाषा रूप के जरिये, उसको अपमानित करते हुए ही रोका जा सकता है? क्या अब तीसरे दर्जे कि मसखरी ही सरकारी सम्प्रेषण का शिल्प बन गया है? अगर, इस "स्वच्छता प्रचार अभियान" के लिए बनाए गए विज्ञापनों को एकाग्र होकर सुना जाए तो उसकी अर्थ-ध्वनि पढ़ते हुए लगने लगता है कि शर्म से धरती फटे और हम उस किराये पर उठाई गई विकृत विज्ञापनी-बुद्धि को, उसमें धक्का देकर, हमेशा के लिए दफन कर दें।
आप देखेंगे कि विज्ञापन, एक शौचालय सेल्समैन की आवाज से शुरू होता है जो एक निहायत ही लम्पटई के स्वर में, सरकारी "रेडियोजेनिक सरकारी भाभी" से संवाद करता है। वो सरकारी भाभी भी इतरा-इतरा के बताती है कि हम तो खुल्ले में ही करते हैं.... हॉऽऽआ... और हमारा काम तो एक ही लोटे में हो जाता है।" बाद इसके विज्ञापन में "खुल्ले में करने के आनन्द" का मौज से बखान भी मिलता है। एक अन्य विज्ञापन में वही आवाज लफ़ंगई के साथ पूछती है- "बताओ, बताओ... बन्द में करने का क्या आनंद और अनुभव है? और असहमत नागरिक को वह, फिर दांत पीसकर, आक्रामकता के साथ अपमानित करता है। उसकी आवाज़ से ऐसा झलकता है कि वो लम्पट उस नागरिक को गरेबान पकड़ के झापड़ रसीद कर देगा।
दरअसल, जब से टेलीविजन और रेडियो पर "एड्स रोग नियंत्रण प्रचार अभियान" शुरू हुआ, तब से वैयक्तिक-गोपनीयता, जो यौनिकता से जुड़ी हो, उससे फूहड़ता की सीमा तक जाकर, उससे खुलकर खेलने का वैध और वैज्ञानिक अधिकार प्राप्त हो गया है। भद्रता और शुचिता को मूल्य के स्तर पर निरस्त करने की उतावली इनके लिए जैसे जरूरी हो गई है। ऐसे विषय, प्रचार अभियान के लिये मिले नहीं कि उससे से जुड़ी भद्रता को सांप के फन की तरह कुचलने के लिए टूट पड़ते हैं। अब हर किस्म की भद्रता संदिग्ध और हास्यास्पद बनाई जा रही है। पहले, विज्ञापनों मे भी भारतीय स्त्री के लिए, "बहिनजी" संबोधन एक सांस्कृतिक भद्रता का ही सम्मानजनक व्यवहार था। लेकिन, अब ये शब्द विज्ञापन जगत के लिए सर्वथा वज्र्य और निषिद्ध है। इंटरनेट पर "सविता भाभी" नाम के चरित्रोदय के बाद से तो भारतीय समाज पर कब्ज़ा जमा चुके, टेलीविजन और विज्ञापन के संसार में "भाभी" शब्द अब लोलुप-सा रसीला आइकन है। "भाभी" चरित्र को सर्वभोग्या संबंध की तरह देखा जा रहा है। इसी के चलते अब टेलेजिनीक संसार में कोई स्त्री "बहन" नहीं रह गई है और भारतीय स्त्री का कोई "भाई" नहीं है। अब इस कथित विकृत बुद्धि ने सारी युवा आबादी को दो भागों में बाँट दिया "भाभी" और "देवर" में। अब साड़ी पहनी तीस वर्ष की स्त्री के बरअक्स देवर है। यह शोहदे-सा देवर, लुच्चे आनंदवाद का शार्टकट है। अब भारतीय समाज में, "भाभी" गोपनीय को संकोचहीन हो कर खुल्लम-खुल्ला उघाड़ने के लिए एक "जॉयस-रिलेशन" है। टेलीविजनीय संहिता में रति-संबंधी अश्लीलताओं को भाभी-संबंध से नाथने में कोई संकोच नहीं है। कहना न होगा कि "भाभी" संबोधन की आड़ में, अश्लीलता और फूहड़ता का ज्वार-भाटा टेलिविजनीय आनन्द-सागर में काफी जबर्दस्त ढंग से ठाठें मार रहा है। जैसे अब "इनसेस्ट" अनैतिक नहीं बल्कि सर्वमान्य हो चुका है और सरकारी विज्ञापनों में, अब एक ऐसी भाभी को सरकारी स्वीकृति मिल चुकी है तो एक सड़क छाप शोहदे किस्म का माल-विक्रेता, भाभी को "लेल्ले...लेल्ले" को लतियल और लम्पट ढंग से कहने में हिचकेगा नहीं। शौचालय के निर्माण के एक महत्वपूर्ण विचार को ऐसी लुच्चई के शिल्प के सहारे बेचने का तरीका महामूढ़ता का एक लज्जास्पद प्रमाण है।
कहना न होगा कि अब बहुत नैसर्गिक क्रोध में भरकर पूछा जाना चाहिए कि क्या भारत-सरकार ने भी बाजारी बुद्धि का अंध-अनुगामी बनकर हमारे भाषा और संस्कृति के सारे सरोकारों और संस्कारों को, वर्जनाओं को झाड़कर फेंकने की क्या संविदा ले ली है? भाभी से खुले में शौच के संबंध में "अहा-अहा" की शैली में विचार मांगे जाते हैं? एक विज्ञापन तो ऐसा भी आता है, जिस तरह पत्रिकाओं मे युवतियों से विवाह-पूर्व और विवाह के पश्चात सेक्स करने संबंधी विषय पर रस ले-लेकर विचार और प्रतिक्रियाएँ मांगी जाती हैं, ठीक उसी तरह यहाँ भी पूछा जाता है कि "बताओ खुल्ले मे शौच करने के अनुभव कैसे हैं?" और विज्ञापनी किरदार जिस नाटकीयता से बताता है कि "कई बार तो निकलती ही नहीं थी।" वह टसकता हुआ ऐसा अभिनय करता है कि जैसे कि अभी भी फंसी हुई है। बाद इसके, विज्ञापन के कुशाग्र मूर्ख द्वारा "टूऊँ" वाला साउंड इफैक्ट डाला गया है। सोचिए किस तरह हद दर्जे की फूहड़ता के कीर्तमान रच दिये गए हैं? अगर इसी विज्ञापन के स्क्रिप्ट को लेकर इसका विजुअल प्रॉडक्शन कर के दूर-दर्शन पर प्रसारित कर दिया जाये तो ये तै जानिए कि जनता ऐसे मूढमतियों को गरेबान पकड़ के सरेआम मारने पर उतर आएगी।
क्या खुले में शौच की समस्या के खिलाफ, मसखरी और ऐसी अक्षम्य किस्म की फूहड़ता से भरे विज्ञापन के द्वारा ही लड़ा जा सकेगा? क्या सरकारी कारिंदों ने खुले में शौच-समस्या की समस्या से निपटने के लिए मस्तिष्क के अपनी बजाय बड़ी आंत से चिंतन शुरू कर दिया है? तभी तो भाषा में दुर्गंध उतार आई है। ये हमारे लोक-प्रसारण के पतन की कौन-सी शर्मसार करने वाली बेला है, जिसमें हमें भाषा की नाक पर रूमाल रखने की जरूरत पड़ने लगी है। लेकिन इस से भी अधिक शर्मसार करने वाली बात तो ये है कि पूरा भारतीय समाज एक नए किस्म के गूंगे और बहरे समाज मे बदल गया है कि वो इस निर्लज़्जता को देख कर उद्विग्न नहीं है। वो अपनी ज़ुबान को काट कर पता नहीं कहां रख आया है।
यह तो अभी गनीमत है कि स्वास्थ्य-चेतना के संदर्भ में शौचालय ही केंद्र में आया है। सरकार किसी बहु-राष्ट्रीय निगम कि सलाह पर, देश में, जब युवतियों के यौनिक स्वास्थ्य की चिंता में सेनेटरी पैड के प्रमोशन का बीड़ा उठाने के लिए आगे आएगी तो ये विज्ञापन बुद्धि अपनी कल्पना का क्या कमाल दिखायेगी, अभी तो ये ही कल्पना से ही बाहर है।
तब, ऐसा ही कोई सेल्समैन "लेल्ले... लेल्लेे" की गुहार लगाता हुआ, रेडियो कार्यक्रमों में आने लगेगा और युवतियों से शोहदे वाले अंदाज़ मे उनके अनुभव पूछेगा। यह अति प्रचार का दुर्गुण है। श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार को आकाशवाणी के ऐसे ही अति-प्रचार ने तो डुबोया था। डूबने की बारी को ये सरकार भी ढूँढने में लगी है।

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