ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतीय बुज़ुर्ग जाएँ तो जाएँ कहाँ?
01-Jan-2016 12:00 AM 2393     

आस्ट्रेलिया में प्रवासी भारतीयों का इतिहास दशकों पुराना है। भारतीय मूल के जो बुज़ुर्ग चार-पाँच दशक पहले आए वे सुस्थापित होकर सम्पन्न हो चुके हैं। हालांकि स्थानीय जीवन-शैली अपनाते हुए वे अपने बहू-बेटियों और नाते-पोतियों से अलग होकर एकाकी जीवन बिताते रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर उन्हें ज़िंदगी से कोई शिकवा-शिकायत नहीं है। उनके पास इतनी संपदा है कि वे बड़े आराम से अपनी हैसियत के हिसाब से अपने निजी बंगले/रिटायरमेंट विलेज में रहकर सामाजिक जीवन बिता सकते हैं। पिछले तीन-चार दशक तक यहाँ रहने के कारण उन्होंने यहाँ की जीवन-शैली ही नहीं, भाषा और खानपान को भी अपना लिया है।
लेकिन जो बुज़ुर्ग वर्ष 2000 के बाद यहाँ आए (यों कहें लाये गए) उनकी स्थिति ऐसी है कि न तो वे अपनी व्यथा-कथा किसी से कह सकते हैं और न ही सह सकते हैं। अपनी ज़िंदगी भर की सारी कमाई या बचत "होम' कर अथवा अपनी ज़मीन-जायदाद और जवाहरात बेचकर उन्होंने अपने बच्चों को उनका भविष्य सँवारने के लिए यहाँ भेजा तो ज़रूर, लेकिन अपने लाडलों से दूर रहना जब उन्हें अखरने लगा तो उनके मन में ऑस्ट्रेलिया आने की तमन्ना जाग उठी। इधर माँ-बाप से बिछुड़े बच्चों को उनकी याद तब आयी जब उनकी पत्नियाँ गर्भवती होने लगीं। प्रसूति से लेकर अपनी संतान के लालन-पालन में अपने माँ-बाप से अच्छा विकल्प भला और क्या हो सकता था? अच्छी-खासी देख-रेख, अच्छे संस्कार और इन सबसे बढ़कर "चाइल्ड केयर' जैसे महंगे खर्च से मुक्ति। सामान्यतया, माता-पिता को ऑस्ट्रेलिया में स्थायी रूप से निवास के लिए बुलाने के लिए पंद्रह वर्ष या उससे भी अधिक समय लगता है परन्तु, ड़दृदद्यद्धत्डद्वद्यदृद्धन्र् द्रठ्ठद्धड्ढदद्य ध्त्द्मठ्ठ द्मड़ण्ड्ढथ्र्ड्ढ के तहत ऑस्ट्रेलियाई सरकार को "अच्छी खासी' रकम (लगभग पचास हज़ार डॉलर प्रति व्यक्ति) देने पर केवल दो वर्षों में माता-पिता को यहाँ निवास करने की सरकारी अनुमति मिल जाती है। अत: जो लोग यह रकम चुकाने में समर्थ हैं, वे अपने माँ-बाप को जल्दी ही ऑस्ट्रेलिया बुला लेते हैं। इससे माँ-बाप भी खुश और बच्चे भी और रिश्तेदारी में वाह-वाही, सो अलग कि बच्चे "श्रवण कुमार' निकले। इस योजना के अंतर्गत अपने माता-पिता को ऑस्ट्रेलिया बुलाने वाले व्यक्ति को दस हज़ार डॉलर की गारंटी भी देनी होती है कि वह उनकी पूरी तरह देखभाल करेगा और अगले दस वर्षों तक किसी प्रकार की सरकारी सहायता की मांग नहीं करेगा। स्मरणीय है कि कुछ अकेलेे बुज़ुर्ग ऐसे भी हैं जिन्हें ंस्तरीय जीवन-शैली का सब्ज-बाग़ दिखा कर यहाँ लाया गया। जबकि आलम यह है कि उनके बेटे-बहुएँ और बेटी-दामादों में से अधिकतर नौकरी करते हैं और अपने जीवन में इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास अपने माँ-बाप की आवश्यकताओं पर ध्यान देने का समय नहीं रह जाता।
युवा-व्यक्तियों को ऑस्ट्रेलिया आते ही कार और मकान की आवश्यकता पड़ती है। बहुधा उनके पास बैंक से क़र्ज़ लेने के सिवाय कोई चारा नहीं होता है। जब तक ये क़र्ज़ उतरते हैं तब तक उनके बच्चे बड़े हो जाते हैं, उनकी पढ़ाई और दवा-दारू पर होने वाला बेतहाशा खर्च, दुनियादारी एवं महंगे जीवन स्तर पर होने वाला खर्च उन्हें चैन की सांस लेने नहीं देता और बुज़ुर्ग माता-पिता अपनी संतान के मुखापेक्षी होकर मायूसी भरी ज़िंदगी गुजारने को विवश हो जाते हैं। जब तक उनके नाते-पोतियाँ आत्म-निर्भर हो चुके होते हैं, तब तक वे अपने परिवार-जनों पर बोझ बन चुके होते हैं और वे अपने को ठगा-ठगा सा महसूस करने लगते हैं। उनकी मन:स्थिति स्वर्गीय पार्?ा गायक तलत महमूद के गाये गीत में गूंजती है : जाएँ तो जाएँ कहाँ, समझेगा कौन यहाँ? दर्द भरे, दिल की जुबाँ...
उन्हें हमेशा इस बात का तनाव रहता है कि कहीं वे बीमार न हो जाएँ, नहीं तो उनको ऑस्ट्रेलिया-निवास के लिए गारंटी (ॠद्मद्मद्वद्धठ्ठदड़ड्ढ दृढ च्द्वद्रद्रदृद्धद्य) देने वाले बेटे/दामाद पर "आ बनेगी'। खुदा न खास्ता, कहीं मर गए तो उनकी अंत्येष्टि तक में उनके बच्चे रास्ते पर आ जायेंगे। ऐसी स्थिति में, पढ़े-लिखे बुज़ुर्ग तो किसी तरह से अपना जेब-खर्च निकाल लेते हैं और जो कुछ भी सरकारी सुविधाएँ मिलतीं हैं उनका लाभ उठाते हुए आत्मसम्मान बनाये रखते हुए "जी' लेते हैं, परन्तु जो अँग्रेज़ी नहीं जानते और अपना जेब-खर्च नहीं निकाल पाते हैं, वे अपनी संतान के मुखापेक्षी होने से अत्यंत दयनीय स्थिति में जीते हैं।
अँग्रेज़ी न जानने वाले बुज़ुर्ग भारतीयों को यहाँ और भी अधिक कठिनाई होती है क्योंकि वे यहाँ आस-पास के पड़ोसियों से बात तक नहीं कर सकते हैं। एक बुज़ुर्ग भारतीय महिला, जो अँग्रेज़ी नहीं जानती हैं, उन पर जब किसी पालतू कुत्ते ने अचानक हमला कर दिया तब वे जोर-ज़ोर से चीखने लगीं "बचाओ-बचाओ' पर उनकी बात कोई नहीं समझा। उनके ही पोते-पोती उन पर हँसने लगे, बेचारी बुज़ुर्ग महिला झेंप गर्इं। ऐसी स्थिति में, बहुधा भारतीय बुज़ुर्ग सोचते है कि ऑस्ट्रेलिया आने के लिए वे अपना सब-कुछ लुटा चुके हैं, क्या अब उन्हें विदेश में घुट-घुट कर जीना होगा। दान-दक्षिणा के लिए भी उन्हें बच्चों से पैसे मांगने पड़ते हैं। पब्लिक हाउसिंग (सस्ते आवास) प्राप्त करने तक का उन्हें अधिकार नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया में एक तरफ़ हज़ारों की संख्या में (अवैध रूप से) नाव में आने वाले शरणार्थियों को मुफ्त में खाने, रहने, व तन ढँकने की सुविधा मुहैया कराई जाती है और भारतीय बुजुर्गों को इतनी बड़ी रक़म चुका कर ऑस्ट्रेलिया आने पर भी कोई सुविधा नहीं मिलती। इस बात से भी कुछ बुज़ुर्गों में काफ़ी रोष है। वे सोचते हैं कि अवैध रूप से आए हुए शरणार्थियों के कारण ऑस्ट्रेलिया में क़ानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी है जबकि भारतीय बुज़ुर्ग तो शांतिप्रिय और सभ्य लोग हैं जिन्होंने ऑस्ट्रेलियाई समाज को अपने हुनर और संस्कारों से लाभान्वित ही किया हैै। कुछ लोग सुझाव देते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में सरकार को मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारों एवं विभिन्न भाषाई संघों पर यह बंदिश लगा देनी चाहिए कि उनको सरकारी अनुदान तभी मिलेगा जब वे अपने समुदाय के बे-सहारा बुजुर्गों को सस्ती दर पर आवास उपलब्ध करायेंगे। इसके अतिरिक्त, वे यह भी कहते हैं कि भारतीय वृद्ध माता-पिताओं को सावधान किये जाने की आवश्यकता है कि वे भावुकता में आकर अपने बच्चों के भरोसे विदेश न जाएँ; बल्कि अपनी आर्थिक क्षमता का सही आकलन करके ही जाएँ। इस दिशा में, सरकारी प्रचार तंत्र, भारतीय मीडिया ऑस्ट्रेलिया स्थित भारतीय काउंसिल, ऑस्ट्रेलिया-भारत मैत्री संघ और भारतीय संघों का महासंघ मिलकर गंभीर प्रयास कर सकते हैं।
कोई भी स्वाभिमानी भारतीय बुज़ुर्ग मुफ्त में रहना नहीं चाहता और न ही उसे अपनी न्यूनतम आवश्यकता से अधिक बड़े आवास चाहिए। ऐशो-आराम के साधनों की तो वह सोचता भी नहीं, लेकिन सर के ऊपर छप्पर तो उनकी मूलभूत आवश्यकता है। मेलबर्न के स्वैच्छिक संस्थानों-एथनिक कौंसिल ऑफ़ विक्टोरिया (कक्क्ज्) और "हाउसिंग फॉर एजेड एक्शन ग्रुप' (क्तॠॠक्र) के संयुक्त प्रयासों से इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास अवश्य किये गए हैं लेकिन इनके लिए सबसे बड़ी कानूनी रुकावट, उनके बच्चों द्वारा ऑस्ट्रलियाई सरकार को दी जाने वाली गारंटी ॠग्र्च् (ॠद्मद्मद्वद्धठ्ठदड़ड्ढ दृढ द्मद्वद्रद्रदृद्धद्य) है जिसका समाधान सरकार की राजनीतिक इच्छा-शक्ति पर निर्भर है।
एक और सुझाव यह है कि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले अन्य भारतीय मूल के समृद्ध लोग एक कम्पनी निगमित करें जो व्यवसायिक तौर पर किराया कमाने के लिए न्यूनतम लागत पर "स्टूडियो अपार्टमेन्ट' बनाए और सस्ते किराये पर इन बुजुर्गों को आवास सुलभ कराए। बुजुर्गों को यथा-संभव न्यूनतम किराए पर आवास उपलब्ध कराने के एवज में समाज उनके दीर्घकालीन अनुभवों से लाभान्वित भी हो सकता है क्योंकि ऐसे बुजुर्गों में कोई रिटायर्ड बैंक कर्मी है, कोई शिक्षक है, कोई सरकारी अधिकारी, तो कोई सफल प्रशासक रहा है। ये बुज़ुर्ग ऑस्ट्रेलियाई भारतीय समाज को बहुत कुछ दे सकते हैं, इनके परिवारों में व्याप्त कलह और घरेलू हिंसा रुकवा सकते हैं, नि:शुल्क मैरिज व्यूरो चला सकते हैं, बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकते हैं, हिन्दी पढ़ा सकते हैं, योग और संगीत सिखा सकते हैं तथा मंदिरों आदि धार्मिक ट्रस्टों का प्रबंध कर सकते हैं।
आज के इस अर्थ प्रधान युग में हर व्यक्ति या वस्तु की कीमत पैसों से आँकना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन कुछ सेवाएँ ऐसी भी हैं जिनकी कीमत पैसों से नहीं आँकी जा सकती है। आज भी ऐसे कई परिवार हैं जहाँ गृहिणियाँ ऑफ़िस नहीं जातीं; घर-गृहस्थी की सारी ज़िम्मेदारी उनके कन्धों पर होती है। तो क्या घर चलाने में उनका योगदान कम करके आँका जा सकता है? एक दिन के लिए भी यदि वे अस्वस्थ हो जातीं हैं या किसी ज़रूरी काम से बाहर जाती हैं तब घर का भगवान ही मालिक होता है। बुजुर्गों का भी समाज में अपना स्थान होता है और उन्हें भी अपने कर्तव्यों का भान होता है, बस उन्हें थोड़ा-सा प्यार, आदर, संज्ञान और लगाव की भूख होती है।
मनुस्मृति में वर्णित "आश्रम' व्यवस्था के अनुसार 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोग वानप्रस्थी हो जाते थे। वन तो रहे नहीं, अब तो घरवालों के ही साथ तब तक रहना होगा जब तक कि कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती। अत: बुजुर्गों को घर-परिवार के मामलों में अनावश्यक दखलंदाज़ी न करके यथापेक्षित सहयोग करते हुए सहनशक्ति के साथ रहना सीखना होगा।
वैसे, भारत में भी कमोबेश यही स्थिति है, वहाँ हर पुत्र "श्रवण कुमार' नहीं है। यदि ऐसा होता तो वहाँ हज़ारों की संख्या में वृद्धाश्रम नहीं होते। आर्थिक समृद्धि, आधुनिकता और नारी स्वातंत्र्य की अंधी दौड़ में गृहलक्ष्मी अब कामकाजी महिला बन चुकी है और सास-बहू के कहानी-किस्से अब सिर्फ टीवी सीरियलों की ही शोभा बढ़ाते हैं। कमरतोड़ महँगाई और दिखावे के जीवन-स्तर ने संयुक्त पारिवारिक जीवन की सारी खुशियाँ चुरा ली हैं।
ऐसा भी नहीं कि ऑस्ट्रेलिया में बुजुर्गों की समुचित देखभाल नहीं होती। यहाँ बुजुर्गों को कम से कम शुद्ध हवा-पानी और बहुत ही कम क़ीमत पर वि?ा-स्तरीय स्वास्थ्य और सार्वजनिक परिवहन सुविधाएं तो सुलभ हैं। स्थानीय जनता में भी बुजुर्गों को समुचित सम्मान दिया जाता है। भारत के सामान्य बुज़ुर्ग इन सुविधाओं से वंचित हैं। सुख-दुःख सबके साथ अलग-अलग रूप में लगे हुए हैं और इन्हें सहजता से स्वीकार करना ही एकमात्र विकल्प है

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