ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतवंशियों, पीछे नहीं आगे देखो
01-Jan-2016 12:00 AM 987     

भारतीय मीडिया में परोसी जा रही सूचनाओं को देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होगा मानो दुनिया भर में बसे भारतवंशी और प्रवासी भारतीय अभूतपूर्व आत्मवि?ाास, उत्साह और देशप्रेम से सराबोर हैं। टीवी के परदे पर लहराती, जुनूनी तस्वीरें यही ज़ाहिर करती हैं मानो पहली बार उन्हें अपने देश पर नाज़ हो रहा है और वे उसके लिए कुछ कर गुज़रने को तैयार हैं। भव्य आयोजनों में शिरकत कर रहे दमकते चेहरों को देखकर कोई भी ये सोच सकता है कि उनके हिसाब से अब भारत का समय आ गया है और वह वि?ा पटल पर एक शक्तिशाली देश के रूप में अपने आगमन की दस्तक दे रहा है। इन मेगा इवेंट से ये संदेश भी निकल रहा है कि अचानक वे भारत के साथ अपनी नई पहचान गढ़ने लगे हैं या उसे पुख़्ता करने लगे हैं। उनमें अब कोई हीनताबोध नहीं है, वे अपने को तीसरी दुनिया के एक ग़रीब मुल्क से नहीं जोड़ते बल्कि विकसित देश के नागरिक के बराबर मानते हैं। अगर ये सब सच हो, दीर्घजीवी हो और इसका उपयोग भारत के नवनिर्माण में किया जा सके तो भला इससे बेहतर कोई बात क्या हो सकती है। ऐसे कई देश हैं जो दूसरे देशों में जाकर बसे अपने लोगों के सहयोग से आगे बढ़े हैं और भारत अगर इस शक्ति का इस्तेमाल कर सके ये एक बेहद सकारात्मक कदम होगा। लेकिन कई वजहों से इन तमाम नतीजों पर संदेह होता है। सबसे बड़ी वजह तो मीडिया का संदिग्ध चरित्र है। वर्तमान मीडिया बेहद सतही, भावुक, सनसनी से भरा हुआ और बिकाऊ है। उसकी न तो कोई साख बची है और न ही सम्मान। ऐसे में उस पर यक़ीन करके कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लिहाज़ा ये बेहद ज़रूरी है कि मीडिया रिपोर्टों पर कम भरोसा किया जाए और सतह के नीचे झाँककर देखा जाए कि वास्तविकता क्या है। दूसरे, जिन भव्य आयोजनों और उनमें उमड़ी अपार भीड़ के आधार पर बड़े-बड़े निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं उनकी भी जाँच-पड़ताल ज़रूरी है। ये तो सर्वविदित है कि ये कार्यक्रम स्वत:स्फूर्त न होकर प्रायोजित थे। इनके आयोजन में सरकारी एवं ग़ैर सरकारी संगठनों की बड़ी भूमिका थी और खुले हाथों धन भी खर्च किया गया था। ऐसे तड़क-भड़क वाले मनोरंजन से भरपूर विराट कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री की उपस्थिति बहुतों को खींचकर ले आती है, लेकिन देशभक्ति के सामूहिक प्रदर्शनों के बाद फिर सब कुछ झाग की तरह नीचे बैठने लगता है, क्योंकि धरातल की सचाईयाँ कुछ और होती हैं। मसलन, भारतीय प्रवासी दिवस पर भव्य आयोजनों का सिलसिला बरसों से चल रहा है, मगर भारतवंशियों की शिकायतें कम नहीं हुई हैं, न ही उनकी अपेक्षाएं। भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके योगदान में कोई उल्लेखनीय इज़ाफ़ा हुआ हो ऐसे प्रमाण नहीं मिलते। ये मानना ठीक नहीं होगा कि पिछली सरकारें भारतवंशियों में रुचि नहीं ले रही थीं या उनके प्रति उदासीन थीं। हो सकता है कि उन्होंने उसका उस तरह प्रदर्शन न किया हो, जैसा कि आज किया जा रहा है, लेकिन सच तो ये है कि उन्होंने भी भारतवंशियों से बहुत सी उम्मीदें लगा रखी थीं और उन्हें भारत से जोड़ने के लिए प्रयासरत भी थीं। कई तरह की रियायतों का ऐलान भी किया गया था। मगर यदि कुछ ठोस प्रगति नहीं हुई तो इसकी वजह अगर सरकार की सुस्त रफ़्तार थी तो भारतवंशियों की ढेर सारी हवा-हवाई उम्मीदें भी थीं। वे अपने देश की मदद के लिए नहीं, अपनी पूँजी का बेहतर निवेश और मोटा लाभ कमाने के इरादे से भारत की ओर देख रहे थे। ऐसा तो अभारतीय निवेशक भी चाहते हैं, तो फिर दोनों में फर्क क्या रह गया? वास्तव में इन आयोजनों पर विचार करते समय इस तथ्य को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि इनका उद्देश्य छवि निर्माण भी हो सकता है। यानी इन मेगा इवेंट में भारतवंशियों का इस्तेमाल देश के लिए कम और अपने लिए ज़्यादा किया जा रहा है। वे जो सोच रहे हैं वह नहीं हो रहा है, बल्कि वे किसी की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के साधन बन रहे हैं। इसके अलावा घरेलू राजनीति को प्रभावित करने का लक्ष्य भी हो सकता है। ज़ाहिर है इनके आधार पर कुछ कहना खुद को भुलावे में रखना होगा। फिर इस तथ्य को भी भला कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है कि आयोजनों में जुटने वाली भीड़ कोई समरूपी इकाई नहीं है, उनमें भी विविधता एवं बहुलता की कई परतें हैं, कई स्तर हैं। वे भी जाति, धर्म एवं आर्थिक स्थितियों जैसे विभिन्न आधारों पर बँटे हुए हैं। उनकी भी अपनी-अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद हैं। ये स्पष्ट देखा गया है कि हाल में सक्रिय भारतवंशियों में ज़्यादातर उस हिंदुत्ववाद से प्रभावित हैं जो मुस्लिम द्वेष और अंध राष्ट्रवाद पर आधारित है। हिंदुत्ववादी शक्तियों के केंद्रीय सत्ता पर काबिज़ होने से उनमें उत्साह तथा ऊर्जा का संचार हुआ है। वे ही इस तथाकथित भारतवंशी उभार के केंद्र में हैं। उनका ये प्रेम वास्तव में एक पार्टी और विचारधारा विशेष के लिए ज़्यादा है और अपनी मातृभूमि के लिए कम। भारतवंशियों की भूमिका पर गौर करने से पहले उनकी आर्थिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि पर नज़र डालना ज़रूरी है। विदेश जाने वाले ज़्यादातर भारतीय ऊँची जातियों के और उच्च आय वर्ग के लोग हैं। वे भारत की सेवा करने के उद्देश्य से नहीं, अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने गए हैं। इनमें से अधिकांश वहीं बस गए हैं और कतई नहीं चाहते कि वापस लौटें। जो नहीं बसे हैं उनमें अमेरिका, यूरोपीय देशों और ऑस्ट्रेलिया वगैरा की नागरिकता प्राप्त करने की होड़ लगी हुई है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। वास्तविक दुनिया यही है। युगों-युगों से लोग यही करते आ रहे हैं। अपने गाँव-शहर से बड़े शहरों की ओर पलायन करना भी इन्हीं उद्देश्यों से प्रेरित होता है। लेकिन आंतरिक पलायन और विदेश जाने में फर्क ये होता है कि पराएपन का बोध बढ़ जाता है। वे खुद को अकेला महसूस करते हैं और कहीं कोई भावनात्मक संबल तलाशते हैं। इसलिए हक़ीक़त यही है कि भारत भारतवंशियों की भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक ज़रूरत भर है, इससे इतर कुछ भी नहीं। उन्हें भारत की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है। हाँ, अगर भारत तरक्की करता है तो उन समाजों में जहाँ वे रह रहे हैं, वे शान से सिर उठाकर जी सकते हैं। अधिकतर भारतवंशी प्रचार तंत्र के इस झूठ के भी शिकार हैं कि भारत तरक्की की नई ऊँचाईयाँ छू रहा है। उन्हें देश की समस्याओं के बारे में बहुत कम और झूठी जानकारी है। उन्हें पता नहीं है कि लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। लघु उद्योग चौपट हो चुके हैं, जिससे चौतरफा बेरोज़गारी फैल रही है। वे नहीं जानते कि ग़रीब-अमीर के बीच की खाई किस कदर बढ़ती जा रही है। उनका इससे भी कोई सरोकार नहीं है कि उनके देश में असहिष्णुता का बैरोमीटर किसी ऊँचाई को छू रहा है। मुज़फ्फरनगर, दादरी उनके लिए छिटपुट घटनाएं हैं। दलितों पर होने वाले अत्याचारों पर उनकी आँखों में आँसू नहीं आते। वे अपनी दुनिया में मगन हैं, बस इतना चाहते हैं कि भारत चमकने लगे ताकि पराए लोगों के बीच में शान से रह सकें। इसीलिए जब उनके देश के प्रधानमंत्री को थोड़ा महत्व मिलता है तो वे राहत महसूस करते हैं। लेकिन वे ये नहीं समझते कि ये देश की तरक्की की वजह से नहीं, उसके बाज़ार के कारण हो रहा है। पिछले तीन दशकों में भारत एक बड़े बाज़ार के रूप में सामने आया है। अपने और दूसरे बाज़ारों में गुंज़ाइश घटने के कारण दुनिया भर के संपन्न देशों की नज़रें उस पर लगी हैं। अपनी पूँजी के विस्तार, वि?ा अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण तथा राजनीतिक-सामरिक वजहों से वे भारत को अपने पाले में रखना चाहते हैं। इसीलिए वे उसे पहले की बनिस्बत अधिक महत्व देने लगे हैं। पूर्व और अब वर्तमान प्रधानमंत्री का स्वागत-सत्कार उसी व्यापारिक रणनीति का हिस्सा है। भारतवंशियों की मानसिक संरचना भी उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से ही निर्मित होती है। चूँकि भारतवंशियों में ऊँची जाति के लोग ज़्यादा होते हैं इसलिए उनमें पुरातनपंथी, रूढ़िवादी और यहाँ तक कि कट्टरवादी हिंदुत्व की ओर अधिक रुझान होता है। वे कर्मकांड, अंधवि?ाास में आकंठ डूबे हुए हैं और उसी को भारतीयता मानते हैं। ऐसे भारतवंशी भारत को आगे ले जाने के बजाय पीछे ढकेल रहे हैं। वे उन शक्तियों की हौसला अफज़ाई कर रहे हैं जो अतीतोन्मुखी हैं, जिनके पास भविष्य का कोई दर्शन या रोड मैप नहीं है। उनके पास एक ऐसी भाषा ज़रूर है जो बहुतों को भ्रमित करती है, उकसाती है और सुलाती भी है। मगर वह देश में एक समावेशी तथा सहिष्णु समाज बनाने के लिए प्रेरित नहीं करतीं। इस तरह देखा जाए तो विदेशों में बसे भारतवंशियों का उबाल एक प्रतिगामी ऊर्जा लिए हुए है। ये देश और दुनिया दोनों के लिए घातक है। वैसे भी एक प्रवासी मानसिकता होती है, जो अनजान लोगों के बीच अपनी पहचान निर्धारित करने के लिए धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल करती है। असुरक्षा और अपरिचय उसे और भी ज़्यादा धार्मिक, पारंपरिक एवं कट्टर बना देती है। परदेश में उनकी सामुदायिकता भी इन्हीं तीज-त्यौहारों के इर्द-गिर्द गढ़ी जाती है। विदेशों में बसे अधिकांश हिंदू इसी मानसिकता से ग्रस्त हैं। बहुत कम लोग हैं जिनका सोच वैज्ञानिकता तथा प्रगतिशीलता पर आधारित होता है। यहाँ तक कि वहाँ बसे डॉक्टरों, इंजीनियरों एवं वैज्ञानिकों तक की यही दुर्दशा है। देश प्रेम उनमें एक लिजलिजी भावुकता पैदा करती है, लेकिन जब देश के लिए कुछ त्याग करने की बात आती है तो बहुत कम लोग होते हैं जो इसके लिए तैयार होते हैं। उनकी तुलना में मध्यपूर्व और दूसरी जगहों पर कार्यरत वे लाखों मज़दूर देश के लिए ज्यादा उपयोगी हैं जो करोडों डॉलर देश भेजते हैं। इस श्रम शक्ति को देश की अभिजनवादी सत्ता महत्व नहीं देती और अगर देती भी है तो बहुत कम। शायद इसलिए भी कि उनमें सवर्ण हिंदुओं की तादाद बहुत कम और मुसलमान तथा ईसाईयों ज़्यादा हैं। हिंदुत्ववादी शक्तियों का एजेंडा पूरा करने में वे मददगार साबित नहीं हो सकते। वह खुद को इंदिरा नुयी, पिचई आदि के साथ ज़्यादा जोड़कर देखती है, जबकि वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा करते हैं और देश के लिए एक झूठे गौरव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होते। हिंदुस्तान को इससे क्या फर्क पड़ता है अगर भारतीय मूल के ढेर सारे वैज्ञानिक नासा के लिए काम कर रहे हैं या विदेशी आईटी दैत्यों की सेवा में रत हैं। उनसे देश को कुछ भी हासिल नहीं होता। वक्त पड़ने पर वे बॉबी जिंदल की तरह खुद को भारतवंशी का मानने से भी मुकर जाते हैं। वर्षों से हमारे लिए ब्रोन ड्रेन एक बड़ी चिंता का विषय रहा है। सर्व सुलभ तथा सस्ते शिक्षातंत्र का लाभ उठाकर शिक्षित हुए और फिर विदेश पलायन कर गए लोगों के मन में एक अपराधबोध भी रहता है। उन्हें अपने देश से दगा करने का खयाल कचोटता है। एक झूठी भारतीयता ओढ़कर वे उसे कम करने की कोशिश करते हैं। इसलिए जब ब्रोन ड्रेन की जगह ब्रोन गेन की बात की गई तो उसे अच्छा लगा। लेकिन ब्रोन गेन एक नारे के रूप में मोहित तो करता है, लेकिन उसका कोई सार्थक परिणाम निकलेगा, इसमें पूरा संदेह है। वापस लौटने के लिए हर भारतवंशी की अपनी शर्तें हैं, जिन्हें पूरा कर पाना संभव नहीं है। फिर उन्हें इतनी तवज्जो क्यों दी जाए। आख़िर देश में रह गई तमाम प्रतिभाएं उनके सामने बौनी नहीं हैं और उनके साथ सौतेला व्यवहार करना किसी भी तौर पर उचित नहीं माना जा सकता। दुनिया ग्लोबल हो गई है, ग्लोबल होती जा रही है। अगले चालीस-पचास सालो में जो दुनिया आकार लेगी शायद उसमें भारतीय और भारतवंशी का फर्क ही ख़त्म हो जाए। हर भारतीय अगर ग्लोबल हो गया तो फिर अंतर ही क्या रह गया। लेकिन आज की तारीख़ में जब भारत एक बड़े संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है, बहुसंख्यकवाद विविधता तथा बहुलता को निगल लेना चाहता है और लोकतंत्र पर भी ख़तरे के बादल मँडरा रहे हैं तो ये ज़रूरी है कि भारतवंशी उन्माद ने बहें। उन्हें ज़रा ठहरकर विचार करना चाहिए कि वे क्या कर रहे हैं, किन लोगों का साथ दे रहे हैं, किनके हाथ मज़बूत कर रहे हैं और उसके नतीजे क्या निकल सकते हैं। अगर वे किसी ऐसे अभियान के भागीदार बन गए जैसा कि पिछली सदी में जर्मनी में हुआ था तो वे दुनिया के किसी कोने में मुँह दिखाने लायक भी नहीं रह जाएंगे। इसलिए भारतवंशियों, जागो और पीछे नहीं आगे देखो।

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