ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बस यह शादी किसी तरह से गुज़र जाए
01-Jun-2018 01:03 AM 2613     

तो यह बेटी की शादी करने वाली माँ का हाल है। शादी जल्द ही होने वाली है। लेकिन क्या भारतीय माँ का भी यह हाल है? मैंने अधिकांश जीवन भारत में गुज़ारा, फिर भी चेक माँ हूँ, क्या करूँ।
वह किसका ख़याल था, लड़की को पढ़ाई के लिए प्राग भेजना? उसका अपना? मेरा? पति का? न जाने क्यों हम सब सहमत हुए। माया को बड़ी खुशी हुई। पहले भी दोनों बच्चे अक्सर छुट्टियाँ चेकीया में गुज़ारते थे। मेरी इच्छा थी कि दोनों बेटा-बेटी अपने को कम से कम कुछ चेक महसूस करें।
अब नहीं जानती क्या मुझसे गलती हो गई थी या नहीं। लड़के पर प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन माया को सब छुट्टियों का बड़ा इंतिज़ार होता था। वहाँ पढ़ने भी ख़ुशी से गई। और नतीजा यह निकला।
यह अच्छा हुआ कि उसे पूरी पढ़ाई के लिए वहाँ नहीं भेजा। या वहीं इससे अच्छा होता? पता नहीं। एक साल बाद उसके पिता की उसके छुट्टियों में घर आने की तीव्र इच्छा थी। उसके पत्रों और टेलीफ़ोन से ऐसा लगा कि आने का उसका मन नहीं है। कुछ दिन बाद ऐसा लगा कि वहाँ कोई गड़बड़ है। वह देर से आई और हमेशा के लिए आई। मुझे तुरंत पता चला कि वहाँ कुछ हो गया था। वह वहाँ वापस जाने की बात करना बिलकुल नहीं चाहती थी। गुमसुम, अन्यमनस्क रहती थी। एकांत में उसने उल्लेख किया कि वहाँ उसकी शादी भी हो सकती थी लेकिन अब, अब तो वापस आई है।
मैं सिर्फ़ सिर हिलाती रही।
"तो तुमने यह चिट्ठी में क्यों नहीं लिखा, फ़ोन पर क्यों नहीं बताया?"
लंबी ख़ामोशी।
"हिम्मत नहीं थी। मुझे मालूम था कि पापा नहीं मानेंगे।"
मैंने कहा- "माया, अगर मुझे तब हिम्मत न होती तो तुम्हारे पापा से शादी कभी न होती।"
उसने कंधे हिलाये। फिर लंबी ख़ामोशी। फिर- "तो क्या होता, किसी और से शादी होती।"
यहाँ तो ऐसा सोच तक नहीं सकी थी। आज तक याद है माता-पिता को अपनी जीवन योजना से कैसे परिचित किया था। भयानक था। मुझे मालूम था कि उनको चोट लग जाएगी। उनको मालूम था कि किसी भारतीय से मेरी दोस्ती है लेकिन आशा थी कि दोनों वहाँ रहेंगे। फिर होस्टल में हर दिन बड़े तनाव में गुज़ारती थी। दिल धड़कता रहता था। जब उनका पत्र नहीं आया था तो एक दिन को मिली थी। लेकिन तनाव का भी एक दिन और। जब पत्र आख़िर आया था तो हाथ इतने काँप रहे थे कि पत्र अपनी कमरा-साथिन से खुलवाया था। मुझे इसकी पहली पंक्तियाँ ठीक-ठीक याद हैं - "प्रियतमा बिटिया, तुम्हारा निश्चय मालूम हुआ। दिल बहुत-बहुत भारी है, क्योंकि तुम इतनी दूर चली जाओगी---" मैं कितना रोयी थी। लेकिन निश्चय मेरा अपना था। माया को मानो इंतिज़ार हो कि उसका निश्चय कोई और करेगा।
माया ने इसे बारे में बहुत कम बताया। ऐसा लगा कि वह चेक लड़का माया की अनिश्चितता, बाप पर निर्भरता से बुरा मान गया था। फिर कुरेद-कुरेदकर मुझे पता चला कि लड़के के घरवालों को भी यह रिश्ता अच्छा नहीं लगा था। नतीजा बुरा निकला।
अच्छा अगर ऐसा हुआ था तो खेद की कोई बात नहीं। लेकिन न जाने कैसे हुआ था। माया आगे कुछ नहीं बताती। उसकी नानी यानी मेरी माँ को कुछ नहीं मालूम है। वह तो प्राग में नहीं रहती। माया कभी-कभी सप्ताहांत को उनके पास जाया करती थी।
अगर उसकी शादी वहाँ होती तो क्या मुझे ख़ुशी होती? ऐसा नहीं हुआ, सोचने से क्या फ़ायदा। अगर हो जाती तो वह मुझसे इतनी दूर चली जाती जितनी दूर मैं अपनी माँ से चली गयी थी। इसकी सज़ा मिलती। लेकिन न बुढ़ापे में वहाँ जाने का अवसर मिलता।
मैंने जीवन भारत में गुज़ारा। कोई ख़ास ख़ुश नहीं रही, फिर भी दुखी भी नहीं रही। शादी अच्छे घर में हुई। हमें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं थी। इससे मेरे माता-पिता को भी तसल्ली मिलता थी। मैंने पैसे वाले माता-पिता के बेटे से शादी कर ली थी। पति ख़ूब पढ़े लिखे और योग्य हैं। मेरी कुछ देश साथिनें कुछ और बता सकतीं---
इधर मैंने कुरेद-कुरेदकर माया के दुखभरे किस्से का पता लगा लिया, उधर माया के पिता ने बातचीत चलाई, माया की शादी तय हुई। वास्तव में माया के आने से पहले ही बातचीत शुरू हुई थी। माया को मालूम था। अपनी प्रागवाली दोस्ती की ख़बर देने की हिम्मत नहीं थी।
माया के पिता को लड़की से बेहद प्यार है। लेकिन उन्हें केवल सुंदर, प्रतिभावान, मेहनती लड़की नज़र आती है, इसके दिल से कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है। जब मैंने उल्लेख किया कि प्राग में कुछ हुआ था और उसे शादी इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए तो उन्होंने बस हाथ हिलाया- "बचपना, इसीलिए भी शादी होनी चाहिए ताकि यह सब कुछ भूल जाये। ऐसे किस्सों की क्या कमी है।"
पता नहीं शादी से पहले के दिनों में असली भारतीय लड़कियों को कैसा लगता है। मेरी लड़की तो आधी-आधी है।
उसकी शादी अच्छी होगी। लड़के के परिवार से बहुत पुरानी जान पहचान है। माया अपने मँगेतर को जानती है, दो एक बार साथ कहीं काफ़ी पीने गये। जब पूछती हूँ तो भारतीय लड़कियों की तरह से आँख नहीं झुकाती, बस सिर हिलाकर अधखुले मुँह से जवाब देती है- "म्म्म्।" उदासीन, मानो उसे दिलचस्पी नहीं।
लड़के के घरवाले चाहते हैं कि नवदम्पति उनके बँगले में रहें। जगह वहाँ बहुत है और माया उनकी बड़ी बहू बनेगी। हमारे घर में भी जगह है क्योंकि बेटे को मुम्बई में अच्छी नौकरी मिली लेकिन न लड़की का ससुराल जाना बहुत ज़रूरी है, रिवाज है। रही बेटी तो मेरा नसीब भारतीय माओं के जैसे हैं - लड़की घर से चली जाएगी। रहा बेटा, तो मेरे नसीब चेक माँ के जैसे हैं, लड़का घर से चला गया। इस अपने बने बनाये घर में हम पति-पत्नी अकेले रह जाएँगे। हाँ माया इतनी दूर नहीं चली जाएगी जितनी दूर मैं घर से चली गयी थी, यह तो ठीक है --- फिर भी --- फिर भी ---
माया के ससुराल वाले शरीफ़ लोग हैं। दूसरों से सुनती हूँ कि बेटी के दहेज में दूल्हे के घरवालों को क्या-क्या देना पड़ा। यह चाहिए, वह चाहिए, पेट नहीं भरता। हमारे आगे ऐसा कुछ नहीं है। हाँ दहेज होगा और क्या। शादी बढ़िया होटल में होगी। हमारे बगीचे में भी हो सकती है, लेकिन इतनी भीड़ में मेरा दिमाग शायद ख़राब हो जाता। पति मान गये। दुल्हन का मेक-अप आदि शायद मेरी ननद संभालने शादी से कुछ दिन पहले आएँगी। ननद अक्सर ऐसे काम संभालती है जो उसकी राय में मेरे बस के नहीं हैं। कभी-कभी यह मुझे अच्छा लगता है, कभी-कभी अच्छा नहीं भी लगता। इस बार मुझे उसकी सहायता से दिल से ख़ुशी होगी।
वैसे भी हमेशा जीन्स पहनने वाली यह मेरी लड़की भारतीय दुल्हन कैसे बनेगी? भारतीय नव-वधू कैसे बनेगी? शायद उसे ज़्यादा समय देना चाहिए था।
मेरी एक चेक सहेली ने ज़िद करके शादी कर ली थी। विवाह जल्द ही टूट गया था। हाँ चेकीया में। यहाँ तो टूटना नहीं चाहिए। माया की यहाँ की एक सहेली की भी किसी लड़के से दोस्ती थी, फिर भी उसकी शादी किसी और से कर दी गयी। तो क्या हुआ? कुछ नहीं हुआ। लड़की ख़ुश है। लेकिन मेरी बेटी आधी आधी है।
बस यह शादी किसी तरह से गुज़र जाये। होनी है तो हो जाये। फिर भी, यह केवल आरंभ होगा। भारतीय माँ के लिए बेटी की शादी का दिन लंबी सफल कोशिश का फल है, पूरा किया हुआ कर्तव्य है।
मेरे लिए यह दिन क्या होगा?
माया के लिए क्या होगा?

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^