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लंका में बन्दिनी सीता का संताप
01-Apr-2018 02:39 AM 3115     

वाल्मीकि मन के ज्ञाता हैं। ऐसा संभव है कि उनके समय मन की पीड़ा के बारे में सार्वजनिक विचार-विमर्श करने में समाज सक्रिय हो। और ऐसा भी संभव है कि वास्तविकता पर आधारित कहानी का आंतरिक विश्लेषण करना उस समय सराहनीय माना जाता रहा हो। भारतीय सभ्यता का यह वह समय था, जब यह तथ्य स्थापित हो चुका था कि संसार कई उद्भवों से गुजर चुका है। उस समय मूलतः यह मान्यता थी कि हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण होता है और हमें विचार कर उस कारण का पता लगाकर, उसके समाधान के लिये कदम उठाना चाहिये। यह भारतीय दार्शनिक सोच का आधार है कि घटना के पीछे एक वृहद उद्देश्य छिपा रहता है, पर मनुष्य उसे अपने विश्वास से जीत सकता है।
दार्शनिक विचार दुःख की हकीकत को दूर नहीं करता है, अपितु वह तो हमारे अन्दर एक नया सामथ्र्य पैदा करता है जिससे हम दुःख से निपटने और उसके निवारण का रास्ता ढूंढ़ने की कोई युक्ति खोज सकते हैं। छुटकारे का रास्ता ढूंढने की कोशिश इस बात पर निर्भर करती है कि समस्या कितनी बड़ी है? समाधान हमेशा निश्चित नहीं है, पर उसे ढूंढ़ने का दृढ़निश्चय अवश्य मददगार साबित होता है। इस तरह के विश्लेषण में कुछ भी अत्यंत भयावह नहीं होता, अपितु दुर्घटना परीक्षण की एक कसौटी होती है! हम सभी में परीक्षा में सफल होने का सामथ्र्य होता है, पर वह हमारे दिमाग में होता है। वाल्मीकि अपनी कहानी के कूट-प्रबंध में उद्देश्यपूर्ण दृढ़ता की घोषणा करते हैं। और यही उद्देश्यपूर्ण दृढ़ता की खोज "धर्म" कहलाती है।
वाल्मीकि के पात्र राम ने अपने पिता के वचन की आन रखने के लिये स्वेच्छा से वन जाने का निर्णय लिया। और सीता ने राम का साथ देने के लिये एवं राम के साथ रहकर अपने को ज्यादा सुरक्षित समक्षकर वन जाने का निर्णय लिया। एक स्त्री के तौर पर पति की लम्बे समय तक अनुपस्थिति और माता-पिता का साथ न होने की स्थिति के बारे में सोचकर सीता के मन में असुरक्षा की आशंका पैदा हुई। वनवास के दौरान सीता ने अपने आपको वन की परिस्तिथियों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया और वह वनवास की अवधि समाप्ति के लिये एक एक दिन गिनती रही। चौदह वर्ष के वनवास के अंत में वह मानसिक रूप से थक चुकी थी और इसी वजह से वह "सोने के हिरण" के जाल में फँस गई। रावण ने मारीच को "सोने का हिरण" बनाकर भेजा और स्वयं तपस्वी के छद्म वेष में पहुँचकर सीता का बलपूर्वक हरण कर लिया। वह सीता को अपने विमान में बिठाकर हजारों मील दूर लंका द्वीप पर ले गया। उसने सीता को बन्दिनी बनाकर रखा और उसे उससे विवाह के लिये राजी करने के लिये तरह-तरह से बहलाया, फुसलाया व प्रताड़ित किया और जान से मारने की धमकी तक दी। ऐसी परिस्थिति में बेचारी सीता कर भी क्या सकती थी?
सीता की परिस्थितियों में कोई भी बंधक मानसिक अंतद्र्वंद की स्थिति में पड़ जायेगा। शायद ही कभी किसी महिला बन्दिनी को अपने बंधक बनाने वाले के सामने अपनी बात रखने का अवसर मिलता हो, लेकिन इसका विपरीत अक्सर आम बात है। ऐसी स्थिति तो किसी की दृढ़ता और उसका स्वयं पर विश्वास की परीक्षा है। जब परिवार के सदस्य और मित्रों को अपहरण के बारे में पता चलता है तो वह छुड़ाने की योजना बनाने में और बंधक द्वारा माँगे गये धन की व्यवस्था करने में मदद करते हैं। सीता के अपहरण के विषय में न तो कोई धनराशि की माँग थी और न ही किसी को पता था कि किसने उसका अपहरण किया है और वह कहाँ है। रावण को मालूम था कि उसका राज्य मानवों की पहुँच से बहुत दूर है। अन्य अभिमानी, कामी और धनी व्यक्तियों की तरह, रावण भी संसार की सुन्दर स्त्रियों को अपने साथ रखना चाहता था। वाल्मीकि के व्याख्यान के द्वारा हमें उसके केवल सीता हरण की घटना के बारे में पता चलता है, पर उसके आचार विचार से ऐसा प्रतीत होता है कि उसने पहले भी ऐसा कई बार किया होगा।
सीता के पास विकल्प क्या थे? इस तथ्य की व्याख्या करने में वाल्मीकि ने अपनी कल्पना से काव्य निपुणता दिखलाई और सीता की मनःस्थिति का गहरा विश्लेषण किया। कठिन परिस्थिति में अन्य स्त्रियों की तरह उसने अपने आपको ही इस घोर स्थिति के लिये दोषी माना। वह कभी आशा और कभी निराशा के बीच के उलटफेर की स्थिति में थी। उसको अपने पति पर भरोसा था, लेकिन वह उसकी मदद के लिये कैसे वहाँ पहुँचे यह बड़ी मुस्किल थी। पहले भी सीता ने अपने पति का युद्ध कौशल देखा था और उससे वह बहुत अचंभित थी, पर उसको इस बात का भी आभास था कि लंका तक राम का पहुँचना अत्यंत मुश्किल है। क्या जीवित रहने के लिये बंधक बनाने वाले के सामने झुकना भी एक विकल्प था? सीता का ठीक इसके विपरीत लिया गया निर्णय स्त्रियों के इतिहास में एक असाधारण निर्णय था।
वाल्मीकि ने कहानी के माध्यम से स्त्री को कई स्वरूपों में प्रस्तुत किया है। कहानी में हमें माँ के रूप में धार्मिक और ममतामयी कौशल्या, तो साहसी सुमित्रा और रक्षात्मक कैकेयी जैसे पात्र दिखाई देते हैं। राम और सीता ने उन सभी को अपनी माता के रूप में स्वीकार किया है। सभी लोग कठिन परिस्थिति में अपनी माँ के बारे में सोचते हैं, सीता भी ऐसा ही करती है। सीता भी अपनी माँ से बहुत प्यार करती थी और उसने वादा किया था कि वह माता-पिता के सर को कभी झुकने नहीं देगी। उसी निश्चय ने उसे जीने की शक्ति दी। पर बन्दिनी के रूप में जीना अत्यंत दुःख और दुविधाओं भरा था। वह अपनी माँ के द्वारा दिये गये संस्कारों के अनुसार, एक पति के साथ ही जीवन व्यतीत करने के लिए प्रतिबद्ध थी, पर उसे यह मालूम नहीं था कि उसका पति भी पूरी उम्र एक ही स्त्री के साथ रहना चाहता है या नहीं? हमारे विश्वास की परीक्षा कठिन परिस्थिति में ही होती है।
कवि के द्वारा बन्दिनी सीता के मानसिक अंतद्र्वंद्व का किया गया विवरण एक अद्वितीय उदाहरण है। शायद इसी कारण उसने इस खंड को "सुन्दर काण्ड" कहा है? उनको भी शायद यह ज्ञात न हो कि वह सीता के साथ-साथ उन अनगिनत स्त्रियों की मानसिक वेदना का भी विवरण कर रहे हैं, जो कई तरह के सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई हैं, जिसमें उनका कोई भी दोष नहीं है।
वाल्मीकि ने पात्र सीता के द्वारा उन लाखों बन्दिनी महिलाओं के लिये अपने अन्याय के खिलाफ लड़ने का एक आवाहन किया है। महिलाओं का कर्तव्य है कि वह अपनी आवाज उठायें। पर माँ बनने की उनकी लालसा उन्हें कमजोर बनाती है। यह विश्व माँ की ममता पर ही टिका है। महिलायें अपने जीवनयापन की रूपरेखा इस तरह बनती हैं कि जिससे वह इस संसार को स्वस्थ और संस्कारवान संतान दे सकें। वाल्मीकि की पात्र सीता माँ बनने के लिये लालायित थी, पर उसे इसके लिये उचित समय आने की उम्मीद और धैर्य रखना चाहिये। उसके पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
वाल्मीकि ने कहानी में बहुत-सी असभ्य महिलाओं के बारे भी जिक्र किया है जिन्हें उन्होंने "राक्षसी" नाम से संबोधित किया है। यह राक्षसी एक साथ समूह में रहती हैं और वह अपने मालिक के प्रति बहुत वफादार होती हैं, वह अपने मालिक की मर्जी के हिसाब से सब काम करती हैं और आदेशों का पूरी तरह से पालन करती हैं। ऐसे स्वभाव के लोग कुछ नए नहीं हैं, मंथरा भी कुछ इसी तरह की ही थी। बस अंतर इतना है कि ये "राक्षसी" क्रूर होती हैं और किसी को मारकर उसका लहू तक पी जाती हैं। उनमें भी आचार और संवेदना होती है पर वह अपनी आत्मीयता जताने के लिये छलावा और डरावने तरीके अपनाती हैं। वाल्मीकि के विवरण में किसी भी ऐसे राक्षस का जिक्र नहीं है जो राक्षसियों की तरह कुशाग्रबुद्धि वाला और चालक हो। पुरुष अति बलशाली और धूर्त हो सकता है पर वह महिलाओं की तरह एक स्वामीभक्त का कार्य नहीं कर सकता। पुरुष स्वामिभक्ति में अपनी जान दे सकता है पर महिलायें अपनी जान बचाकर कार्य पूर्ण कर सकती हैं। वाल्मीकि के विवरण में पुरुष या तो नायक है या खलनायक। पुरुषों के छलावे की कहानियों की ओर गहराई से और जांच की आवश्यकता है।
सीता पहरेदारिनी के व्यंग्य सुनकर क्रोधित हो उठी और बोली "एक शादीशुदा सदाचारिणी स्त्री राक्षस की पत्नी नहीं बन सकती भले ही यदि चाहो तो तुम मुझे मर डालो या जिन्दा खा लो!" उसके बाद वह विलाप करने लगी "मैंने पिछले जन्म में ऐसा क्या किया है जिसके कारण मुझे यह सब देखना पड़ रहा है?" वह दुखी होकर बोलने लगी "मैं ऐसी ख़ुशनसीब कहाँ कि अपने पति के साथ रहती, दूसरे लोग किस्मतवाले हैं जो साथ-साथ हैं।" वह जोर-जोर से बच्चे की तरह रोने लगी और मानो जैसे अपने पति राम से बात कर रही हो- "देखो, रावण ने मेरा छलपूर्वक हरण कर लिया। यहाँ ये राक्षस मुझे पल-पल मारने की धमकी देते है।" मानो वह आज्ञा ले रही हो, वह अपने आप से बोली- "अब मैं जीना नहीं चाहती! ऐसा जीवन तो नर्क सामान है। अब मैं अवश्य अपने आप को समाप्त कर दूँगी।"
वह श्राप देती है : "मैं राक्षसों को अपने बायें पैर से भी नहीं छुऊँगी! यह दुष्ट मेरे इनकार करने का मतलब भी नहीं समझता! डरा-धमाकर वह अपनी बात मनवाना चाहता है!" वह जोर-जोर से विलाप करने लगी : "यह मुझ पर क्या विपत्ति आ पड़ी है! राम मेरी रक्षा के लिए क्यों नहीं आ रहे? क्या उनको लगता है कि अपहरण के बाद मैं अपवित्र हो गई हूँ?" फिर वह दुखी होती है और बोलती है- "मैं समझती हूँ, यहाँ आना बहुत कठिन है। इस जगह पर हर समय कड़ा पहरा है!" फिर वह आशावादी होकर बोलती है- "मगर मेरे राम तो शूरवीर हैं, उन्होंने अकेले ही चौदह हजार राक्षसों को मौत के घाट उतार दिया था! उनको शायद मालूम नहीं होगा कि मैं यहाँ फँसी हुई हूँ। यदि उनको पता होता तो इस लंका को पलभर में नष्ट कर देते!" जल्द उत्तर की प्रतीक्षा में, वह आशावादी सोचकर एक पल के लिये आनंदित होती है : "यह लंका तो जलेगी और चारों तरफ विधवायें रोयेंगी! रावण का नामोनिशान मिट जायेगा!"
फिर सीता विचार करने लगी "क्या दोनों भाइयों को रावण ने मार तो नहीं दिया? क्या उसने उन्हें छलकर मार दिया? क्या वो अब जीवित नहीं हैं?" वह अपने शोक का आभास करती है और अपनी मृत्यु को निकट समझती है। वाल्मीकि की पात्र सीता विलाप करती है, सिसकियाँ भरती है, चिंतन करती है और जमीन पर लोटपोट होती है। कवि सीता के भय का विवरण कुछ इस तरह से करते हैं "जैसे एक शिशु हथिनी बड़े और खूँखार शेर से मुकाबला करती है।" वह रुदन करती है और बोलती है "क्या यह सच है कि किसी की भी मौत समय से पहले नहीं आ सकती?" क्या यह सिद्धांत मुझ जैसे "अभागे" व्यक्ति पर भी लागू होता है जो इतने अन्याय और कष्ट सहन कर चुका है? इतने बड़े दुःख के बाद भी मेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े क्यों नहीं हो जाते? देखो, मैं यहाँ एक बन्दिनी हूँ, मेरा कोई दोष नहीं यदि मैं मर जाऊँ! मैं अपने पति के अलावा और किसी को नहीं अपना सकती।
सीता ने गहरी साँस ली और अपने आपको धिक्कारने लगी। वह बहुत व्याकुल होकर बोलने लगी : "मेरे पति राम के आने से पहले ही यह दुराचारी रावण मुझे मारकर मेरे टुकड़े-टुकड़े कर देगा। मेरा ऐसा हाल होगा जैसा माँ के गर्भ से गर्भपात के समय भ्रूण का होता है। दो मास का समय तो जल्दी ही गुजर जायेगा और उसके बाद यह दुष्ट मेरी हत्या कर देगा! हे राम, हे लक्ष्मण, हे माँ कौशल्या, हे माँ सुमित्रा, हे मेरी माँ! मैं अभागिन हूँ। मैं बहुत बड़े संकट में पड़ गयी हूँ। मेरी नैया तो तूफानों के बीच समुन्दर में फँस गयी है। स्वर्णिम हिरण के रूप में वह मेरा काल था जिसे मैंने पाने के लिये राम से अनुरोध किया।" अत्यंत दुःख के कारण उसके सब्र का बाँध टूट जाता है और वह बोलती है "ओ मेरे स्वामी राम, तुम्हारे प्रति मेरी श्रद्धा और विश्वास सब व्यर्थ गया, ऐसा लगता है जैसे मैं किसी बेदर्दी के साथ रही! देखो, मैं यहाँ इस दुःख से थक चुकी हूँ। तुमसे पुनः मिलने की मेरी सारी उम्मीदें ख़त्म होती जा रहीं!"
जबरदस्ती बनाये गये बंधक का मन और चित्त आशा और निराशा के बीच झूलता है। पात्र सीता उन सब बन्दियों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्हें बंदी बनाकर उनके विश्वास और मत परिवर्तन का प्रयास किया जाता है। एक शादीशुदा महिला के रूप में उसने अपने मन के ईष्र्या भाव को इस तरह से प्रकट किया "ओ राम, वनवास से वापस आने के बाद तुम्हारे लिये तो कई स्त्रियाँ उपलब्ध हो सकती हैं! और मेरे लिये तो तुम ही पूरे जीवन के सुख-दुःख के साथी हो! काश यहाँ कोई ऐसा होता जो मुझे जहर दे देता तो मैं अपने प्राण त्याग देती! और क्या यहाँ कोई धारदार हथियार है जिससे मैं अपने टुकड़े स्वयं कर लूँ? ओह, शायद मुझे रावण के महल में कोई औजार मिल जाये! मैं पूरी तरह से टूट चुकी हूँ और जल्द से जल्द मैं अपना जीवन समाप्त करना चाहती हूँ।"

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