ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
01-Aug-2016 12:00 AM 5464     

ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम है
ये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देते
गज़ब के तेवर लिए छोटी-सी, प्यारी-सी शायरी की किताब "जन गण मन" के लेखक हैं ब्लॉग जगत के शायर जनाब द्विजेन्द्र द्विज। ब्लॉग पर उनकी सक्रियता अधिक नहीं रहती लेकिन वो जब भी अपनी ग़ज़लों से रूबरू होने का मौका देते हैं अपने पाठकों को चौंका देते हैं।
अँधेरे चंद लोगों का अगर मकसद नहीं होते
यहां के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते
फरेबों की कहानी है तुम्हारे मापदंडों में
वरना हर जगह "बौने" कभी "अंगद" नहीं होते
चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुन्दर घने बरगद नहीं होते
बौनों के अंगद होने की बात कहने वाला शायर किस कोटि का होगा ये पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं। ऐसी सोच और ऐसे अशआर यक़ीनन शायर के अन्दर धड़कते गुस्से के लावे को बाहर लाते हैं। उनकी बेहतरीन ग़ज़लें रिवायती ग़ज़लों की श्रेणी में नहीं आतीं, उनकी ग़ज़लों में महबूबा के हुस्न और उसकी अदाओं में घिरे इंसान का चित्रण नहीं है, उनकी ग़ज़लों में आम इंसान की हताशा, दुखी जन के प्रति संवेदनाएं और समाज के सड़े गले नियमों के खिलाफ गुस्सा झलकता है। वे  अपनी ग़ज़लों से आपको झकझोर कर जगाते हैं।
अगर इस देश में ही देश के दुश्मन नहीं होते
लुटेरा ले के बाहर से कभी लश्कर नहीं आता
जो खुद को बेचने की फितरतें हावी नहीं होतीं
हमें नीलाम करने कोई भी तस्कर नहीं आता
अगर जुल्मों से लड़ने की कोई कोशिश रही होती
हमारे दर पे जुल्मों का कोई मंज़र नहीं आता
10 अक्तूबर,1962 को जन्में द्विज जी, बेहतरीन ग़ज़ल कहने की उस पारिवारिक परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं जिसकी नींव उनके स्वर्गीय पिता श्री सागर पालनपुरी ने डाली थी। उनका नाम आज भी हिमाचल के साहित्यिक हलकों में बहुत आदर के साथ लिया जाता है।
कॉलेज के दिनों से ही वो अपने पिता के सानिध्य में ऐसी ग़ज़लें कहने लगे जिसे सुन कर उस्ताद शायर भी दंग हो जाया करते थे।
कटे थे कल जो यहाँ जंगलों की भाषा में
उगे हैं फिर वही तो चम्बलों की भाषा में
सवाल ज़िन्दगी के टालना नहीं अच्छा
दो टूक बात करो, फ़ैसलों की भाषा में
हज़ार दर्द सहो, लाख सख्तियां झेलो
भरो न आह मगर, घायलों की भाषा में
द्विज जी चूँकि हिमाचल से हैं इसलिए उनकी ग़ज़लों में पहाड़ नदियाँ बादल झरने रूमानी अंदाज़ में नहीं बल्कि ज़िन्दगी की हकीकत बन कर कर उभरे हैं। यह संग्रह गागर में सागर को चरितार्थ करती हुई छोटी सी किताब है जिसमें द्विज जी की लगभग साठ ग़ज़लें संगृहीत हैं। इसे आप श्री सतपाल ख्याल जी के ब्लॉग- आज की ग़ज़ल या फिर स्वयं द्विज जी के ब्लॉग- द्विजेन्द्र द्विज पर आन लाइन भी पढ़ सकते हैं। इसे दुष्यंत-देवांश-प्रकाशन, अशोक लॉज, मारण्डा, हिमाचल प्रदेश द्वारा प्रकाशित किया गया है।

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