ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बारिश में मुंबई
01-Jul-2016 12:00 AM 5706     

समुंदर की लहरें उफान पर हैं। किनारे से टकराकर, किनारे को भिगोकर, कोलतार की स्याह सड़कों पर उछलकर फिर से लौट रही है, समुंदर में। किनारे से दूर खड़ी उस चाय की टपरी से "बरखा रानी, जरा जमके बरसो, मेरा दिलबर जा न पाये...' मुकेशा की आवाज कुछ इस तरह झरते हुए दिल में उतर रही है कि कुछ पुरानी बातें याद आ रही है, कुछ याद किया जा रहा है। ऐसे में समुंदर का वह किनारा वे लहरें बड़ी अपनी-सी लगने लगती हैं और अचानक दिल के उस भीगे माहौल को और भिगोते हुए और उन सुरों का साथ देते हुए झमाझम बरखा बरसने लगती है। भीगा हुआ मन अब तन को भी भिगोने लगता है। किनारों से टकराकर लौटने वाली समुंदर की लहरों पर नाचती बारिशा की बूंदें! बारिशा की ये बूंदें उन लहरों के साथ मिलना चाहती हैं, उन लहरों में समाना चाहती हैं। पानी का पानी के साथ यह मिलन बड़ा ही अद्वितीय और अभूतपूर्व होता है। बूंदों की चाह से अवगत लहरें भी उन्हें स्वयं में शाामिल कर लेने में उतावली होती हैं और उन बूंदों के साथ बरसात समुंदर में खो जाती है या समुंदर बरसात का हो जाता है। आप कुछ भी नाम दीजिये लेकिन किनारे पर बैठकर इस अद्भुत मिलन के गवाह बने आप सिर्फ उस "पानी' के हो जाते हैं, जिसमें बेपनाह प्यार है, बेतहाशाा ऊर्जा, उल्लास और उत्साह है।
मुंबई का समुंदर, मुंबई की बारिशा और समुंदर के सात टापुओं, जज़ीरों से बना यह मुंबई शाहर! यह रिशता बड़ा करीबी और अजीज है और उतना ही ईमानदार भी! कोई भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ना चाहता।
वैसे तो मुंबई कि बारिशा सिर्फ तीन-चार महीनों की है, लेकिन वह इतने रूप लेकर आती है कि देखते ही बनती है। कभी वह "टापूर टिपूर' बरसती है, तो कभी वह "बहार' की तरह आती है। कभी वह "जमके' बरसती है तो कभी जम के तरसाती है। वह धूप के साथ आती है, हवाओं के साथ चलती है और बादलों के साथ बरसकर फिर से समुंदर में खो जाती है। मुंबई की बारिशा अनेक रूपों में मुंबई के साथ हो लेती है।
मुंबई की बारिशा जब पहली बार आती है तो मिट्टी की सोंधी महक सीमेंट कांक्रीट के इस जंगल को महका देती है। चार महिनों की गर्मी और पसीने से परेशाान मुंबई जैसे किसी चातक पंछी की तरह इस बरसात का इंतजार करता है। जैसे ही पहली बारिशा की बूंदे मुंबई के बदन पर गिरती हैं, एक अजीब-सी सिहरन लेकर मुंबई का बदन रोमांचित हो उठता है। कितना इंतजार किया है, उसने इन बूंदों का। कितनी प्यास शोष रखी थी, मुंबई की धरती ने।
सूरज उगता है, धूप छनती है। माहौल में उमस है, तंज़ है लेकिन कड़ी धूप भी है और अचानक तेज हवाएँ बहने लगती हैं, स्याह बादल घिर आते हैं और आपकी आँखों को चकाचौंध करते हुए स्याह बादलों को चीरकर बिजली कड़कती है। आप भौचक्के हैं, इतने में मोटी-मोटी बूंदें बरसने लगती हैं। धीरे-धीरे उनका ज़ोर बढ़ता जाता है और फिर धुआंधार पानी बरसने लगता है।
धीरे-धीरे बारिशा का जोर भी बढ़ने लगता है। मिट्टी अब गीली होकर जमीन के साथ मिलकर कीचड़ बन जाती है। धीरे-धीरे यह कीचड़ भी पानी के साथ साफ हो जाता है। कोलतार की सड़कों, रास्तों, धूल, इमारतों, झोपड़ों को साफ सुथरा करते हुए कहीं-कहीं दिखायी देने वाले पेड़ों, नारियल के लहराते पत्तों को स्नान करवाकर बारिशा बरसती रहती है। यह बारिशा जब समुंदर पर बरसती है। तब समुंदर किनारे बैठे जोड़ों को भिगोते हुए उन्हें और रोमांटिक बनाती है। सिंग, चनों की छोटी-छोटी पुडियां या फिर मकई के भुट्टों या फिर ठेले के चायवाले के पास आधी-आधी चाय के साथ उनका प्यार और रोमांस पानी के साथ उड़ान भर लेता है। भविष्य की योजनाएं उस बरसात को साक्ष्यी मानकर बनायी जाती हैं। समुंदर के साथ ये योजनाएं पूरी होती हैं। अन्यथा बरसात के बाद खत्म भी हो जाती हैं। लेकिन समुंदर और बारिशा को हाजिर नाजिर मानकर योजनाएं अवशय बनती हैं, सपनों की उड़ान जरूर भरी जाती हैं। मुंबई की बारिशा कुछेक लोगों को रोमांटिक बनाती है तो कुछेक को परेशाानी देकर त्राहि- त्राहि करने पर मजबूर करती है। यह बारिशा इमारतों को खुशानुमा माहौल देती है लेकिन झोपड़ों, गरीबों को बेहाल, परेशाान करती है। यह बारिशा जहां छोटे बच्चों को रास्तों पर जमा हुए पानी में कागज की कशितयां बहाने का अवसर देती है, तो कहीं नालों को बेकाबू और बदबूदार करती है। कभी वह मुंबई को भिगोकर पस्त कर देती है।
विगत बरसों हुई लगातार बारिशा को मुंबई भूल नहीं सकती। इन तीन दिनों में पूरी मुंबई पानी से त्रस्त थी, पानी में डुबी हुई थी, रास्ते, इमारतें पानी में डूब गयी थीं। चीजें, वस्तुएं यहां तक गाड़ियां पानी में तैर रही थीं। रास्ता, नाला, घर और लोगों का कुछ अता-पता नहीं था। सिर्फ बारिशा हो रही थी। इसने लोगों की जिंदगियां दांव पर लगायी थीं। दूरदराज से अपनी नौकरी हेतु आनेवाले मुंबईकर उन तीन दिनों में सिर्फ मुंबई की सड़कों पर चल रहे थे। प्रकृति के प्रकोप को देख रहे थे और झेल भी रहे थे। इन तीन दिनों ने दौरान मुंबई ने बारिशा के भयावह रूप को तो देखा ही लेकिन उसके साथ ही मुंबईवासियों के जुनून तथा जिजीविषा को भी देखा, महसूस किया। रास्ते, नुक्कड़, घरों, मंदिरों में लोगों को पानी, खाना दिया जा रहा था। कपड़े, निवास की व्यवस्था की जा रही थी। किसी ने किसी को कुछ भी करने के लिए नहीं कहा था। लेकिन मुंबई झेल रही थी, पेल रही थी और उबर भी रही थी। जाति, धर्म, खानपान से ऊपर उठकर मुंबई अपने बच्चों को सहला रही थी। बारीशा के उन तीन दिनों ने पूरी दुनिया को मुंबई का एक अलग रूप दिखाया, जोकि गरिमामयी और जुझारु था और मुंबई की वि·ा प्रसिद्ध मानसिकता के साथ जुड़ा था।
बड़ी रंगीनियां होती है, मुंबई की बारीशा में! कभी वह झरती रहती है, झरने की तरह। कभी वह निथरती रहती है, पसीने की तरह, कभी वह बूंदों के साथ यूं ही गिरती है, धीरे-धीरे कि न तो भिगोती है न भीगती है। कभी वह झमाझम गिरती रहती है, निरंतर रूप से। तो कभी धूप और बादलों के साथ लुका छिपी खेलते हुए आती जाती रहती है।
मुंबई की नरीमन पॉइंट या मरीन लाइंस के किनारों पर बैठकर आप बारिशा देखते रहिए। बारिशा किसी छोटे, नटखट बच्चे की तरह समुंदर की लहरों के साथ खेलती हुई दिखायी देती है।
आप मुंबई की सड़कों पर चलते जाईए। बारिशा स्याह कोलतार सड़कों पर इतना मनोहारी नृत्य रचाती है कि आपकी नजरें भी उन बूंदों के साथ नृत्य करने लगती है।
आप लोकल ट्रेन, बस, कार से यात्रा करते हुए देखिए, मुंबई की बारिशा लोकल ट्रेन, बसों, कारों की छतों पर इस तरह गिरती रहती है कि एक अद्भूत-सा संगीतमय, सुरीला समां बांध देती है।
जब वह धूप और साजोसामान के साथ आती है तब उसकी टपकती बूंदों का एक अजीब-सा लुत्फ उठाता मुंबईवासी छाता बंद कर चलना शाुरू कर देता है और उसका साथ लेकर भावविभेर से उठता है।
भारी बारिशा से जब लोकल ट्रेन्स ठप्प होती है, मुंबईवासी जैसे-तैसे ऑफिस पहुंचने की जद्दोजहाद को छोड़कर उस छुट्टी का आनंद अपने परिवार, दोस्तों के साथ बरसात के गानों के साथ चाय, पकौडियों का लुत्फ उठाकर मनाता है। कोई फिल्म देखता है, कोई कोहरो में चलने हेतु किसी हिल स्टेशान पहुंचता है।
बारिशा अपनी हरियाली, अपना गीलापन अपनी सिक्तता देकर जब जाने की कगार पर होती है। तब कभी न सोनेवाला यह मुंबई शाहर उसके बिछोह में समुंदर के उसी किनारे पर आकर ठहर जाता है, जहां उसने बारिशा का स्वागत किया होता है। मुंबई के लिए इंतजार की घड़ियां मिलन के तुरंत बाद शाुरू हो जाती हैं। यह इंतजार अगले साल आनेवाली, बरसनेवाली बारिशा का होता है।

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