ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आज़ादी की अभिधारणा
01-Aug-2016 12:00 AM 3132     

भारतीय प्रायद्वीप के लिए अगस्त आज़ादी के उत्सव को मनाने का महीना है। इसी महीने इस भूभाग के दो राष्ट्र - भारत और पाकिस्तान, जो 1947 ई. के पहले ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा थे, अपने सपूतों के अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान के बाद आज़ाद मुल्क या स्वतंत्र राष्ट्र बने।
    प्रश्न है कि आज़ादी के क्या मायने हैं और क्या आज़ादी, मुक्ति, स्वाधीनता और स्वतंत्रता एक ही अर्थ बताते हैं? पड़ताल करने पर यह उत्तर मिलता है कि यद्यपि आज़ादी, मुक्ति, स्वाधीनता और स्वतंत्रता लगभग एकसमान अभि-धारणाएं हैं, तथापि इनके अर्थ और संदर्भ थोड़ी भिन्नताओं को भी प्रदर्शित करते हैं।
सर्वप्रथम "आज़ादी" शब्द के मूल पर गौर करते हैं। मध्यकालीन फ़ारसी का एक शब्द है- आज़ाद, जिसका अर्थ मूलतः आर्य (ददृडथ्ड्ढ) या मुक्त (ढद्धड्ढड्ढ) है। पारसियों के धर्मग्रन्थ ज़ेन्द अवेस्ता में इसके लिए अजात शब्द व्यवहृत हुआ है। ईरान की पुरानी भाषा में "ज़न" का अर्थ संस्कृत के "जन" की तरह ही "जन्म लेना" है। अतएव अजात शब्द का अर्थ अभिजात्य, दास या तत्कालीन अन्य वर्गों से इतर लोगों के लिए ग्रहण किया गया है। माना गया कि जब अग्नि के उपासक आर्य अपनी मूलभूमि ईरान (आर्यन) से घोड़ों पर सवार होकर भारतीय प्रायद्वीप पहुँचे, तो वे समाज के अन्य वर्गों से अलग आज़ाद या अजात कहे गए। शिव का एक नाम अजातारि या अजातशत्रु भी है।
आदिशंकराचार्य ने "निर्वाण षटकम्" में शिव रूप का वर्णन करते हुए लिखा, "न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः/ पिता नैव मे नैव माता न जन्म/ न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः/ चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्।" (न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ।) शिव का यह स्वरूप "आज़ादी" शब्द की अभिधारणा को पूर्णता से व्यक्त करता है। ध्यातव्य है कि फ़ारसी और संस्कृत इंडो-आर्यन समूह की भाषा है।
स्वाधीनता (स्वाधीनत- स्व, अपना अ अधि उपसर्ग अ ईन, मालिक होना) का अर्थ अपना स्वयं अपना मालिक होना है। एक शब्द है - स्वतंत्रता। जिस किसी ने इस शब्द को गढ़ा होगा, वह अद्भुत मनीषी रहा होगा। इस शब्द का अन्य भाषाओं में पर्याय मिलता है, पर यह शब्द नहीं मिलता है। अन्य शब्द वह बात नहीं कर सकते, जितनी व्यापक बात यह कहता है। स्वतंत्रता का अर्थ है - स्व (अपना) तंत्र (तन) होना। तंत्र में दो बातें निहित हैं - 1. तनना या विस्तार पाना, यथा प्राणियों का तन या पादपों का तना विस्तार पाता है; 2. तत्रि अर्थात् पोषण करना, यथा परिवार का मुखिया अपने आश्रितों का भरण-पोषण करता है।
इस प्रकार स्वतंत्रता वह तंत्र (द्मन्र्द्मद्यड्ढथ्र्) का सृजन करना है, जहाँ आप अलग-थलग (त्द्मदृथ्ठ्ठद्यड्ढड्ड) और स्वछंद न होकर तंत्र को निर्मित करनेवाले अन्य अवयवों से प्रभावित होते हुए और उन्हें प्रभावित करते हुए सबके हित में विस्तार की ओर उन्मुख होते हैं। अगर कोई कहे, "मैं किसी का ग़ुलाम नहीं हूँ।" तो यह स्वछंदता है, क्योंकि मानव समाज तंत्र की इकाई है और समाज के लिए प्रतिबद्धता उसका दायित्व है। फिर कोई कहे, "मैं अपना मालिक स्वयं हूँ।" तो यह स्वाधीनता है, क्योंकि हर तंत्र (द्मन्र्द्मद्यड्ढथ्र्) अपने निर्मित करनेवाले अवयवों पर आश्रित होता है। इन दोनों कथनों से इतर जब मैं कहता हूँ, "मैं स्वतंत्र हूँ।" तो इसका मायने यह है कि अपने से बड़े तंत्र के प्रति उत्तरदायी होते हुए भी मेरा तंत्र आत्मनिर्भर है।
भारतीय आज़ादी की लड़ाई के संदर्भ में आज़ादी की इन्हीं अभिधारणाओं का स्वर हम अपने महान नेताओं के वक्तव्यों में अत्यधिक स्पष्ट पाते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम नायक कहे जाने वाले लोकमान्य तिलक ने मराठी में यह नारा दिया था, "स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच।" (स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम इसे हासिल करके रहेंगे।)
गाँधीजी की आज़ादी की अभिधारणा उदात्त और व्यापक थी। अपने साप्ताहिक प्रकाशन "हरिजन" के  27 मई 1939 के अंक में वैयक्तिक स्वतंत्रता के विषय में उन्होंने लिखा, "मैं वैयक्तिक आज़ादी का सम्मान करता हूँ, किन्तु तुम्हें यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने वत्र्तमान स्तर तक सामाजिक विकास की ज़रूरतों से अपने वैयक्तिक स्वरूप का सममंजन करना सीखते हुए आगे बढ़ा है। अनियंत्रित वैयक्तिक आज़ादी जंगल के जानवरों का नियम है। हमें वैयक्तिक आज़ादी और सामाजिक नियंत्रण के बीच मध्यस्थता करना सीखना है। समाज के कल्याण के वास्ते सामाजिक नियंत्रणों के प्रति जान बूझकर समर्पण करने से व्यक्ति और समाज, व्यक्ति जिसका सदस्य है, दोनों ही समृद्ध होते हैं।" गाँधीजी का मत था कि व्यक्ति को स्वेच्छा से समाज सेवा के प्रति समर्पित कर देना चाहिए।
पुनः उन्होंने "हरिजन" के 7 जून 1942 के अंक में लिखा, "मेरी आज़ादी की संकल्पना संकीर्ण संकल्पना नहीं है। यह अपनी पूरी महिमा से युक्त मनुष्य की आज़ादी की व्यापकता है।" आगे इसी साप्ताहिक पत्र के 2 अगस्त 1942 के अंक में उन्होंने लिखा, "प्रत्येक व्यक्ति को अपने पड़ोसी के समान अपनी प्रतिभा को सतत् रूप से इस्तेमाल करने की आज़ादी होनी चाहिए, लेकिन कोई भी अपनी प्रतिभा के स्वैच्छिक इस्तेमाल से लाभ पाने के लिए अधिकृत है। वह अपने इर्द-गिर्द के सामाजिक ढाँचे या देश का हिस्सा है। अतएव वह अपनी प्रतिभा को मात्र अपने लिए नहीं, बल्कि सामाजिक ढाँचा, जिसका वह हिस्सा है और जिसकी अधीनता में वह रहता है, के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
पं. जवाहरलाल नेहरू ने अक्टूबर 1933 में लंदन से प्रकाशित होने वाले अख़बार "डेली हेराल्ड" को "द इंडियन स्ट्रगल फॉर फ्रीडम" शीर्षक से एक आलेख भेजा था, जो बाद में इस दैनिक में प्रकाशित हुआ था। इस आलेख में नेहरू की आज़ादी की अभिधारणा अभिव्यक्त होती है। नेहरु ने लिखा, "आज़ादी" शब्द कोई सुखद शब्द नहीं है, क्योंकि यह अलगाव को चिह्नित करता है और आधुनिक विश्व में ऐसा अलगाव या अनिर्भरता सम्भव नहीं है। लेकिन इस शब्द का प्रयोग बेहतर स्थिति की चाहत के लिए किया जाना चाहिए। इसे कभी भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि हम अपने आप को बाकी विश्व से अलग-थलग करना चाहते हैं। हम संकीर्ण और आक्रमक राष्ट्रीयता में विश्वास नहीं रखते हैं। हम परस्पर निर्भरता और अंतराष्ट्रीय सहयोग में यकीन करते हैं, किन्तु इसके साथ-साथ हम इस बात को लेकर भी आश्वस्त हैं कि साम्राज्यवाद पर कोई निर्भरता या इसके प्रति कोई सहयोग नहीं हो सकता है। इसलिए हम सभी प्रकार के साम्राज्यवाद से पूर्ण आज़ादी चाहते हैं। लेकिन यह ब्रिटेन के लोगों या दूसरे वैसे लोगों से पूर्ण सहयोग से इनकार नहीं करता है, जो हमारा शोषण करने की इच्छा नहीं रखते हैं। साम्राज्यवाद से, चाहे यह किसी रूप में क्यों न आए, कोई समझौता नहीं हो सकता है या होगा। अतएव, हमारी आज़ादी की लड़ाई, आवश्यक रूप से सामाजिक ढाँचे में मौलिक परिवत्र्तन और आमजनों के शोषण को खत्म करने की लड़ाई है।"
"जय हिन्द" का नारा देने वाले स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।" कहकर उत्साहित किया। बोस के 1939 के पहले के पत्रों में नाज़ी जर्मनी के नस्लवाद और लोकतंत्र के दमन के प्रति गहरी असहमति का भाव दिखता है। यद्यपि वे सोचते थे कि सत्तावादी या अधिकारपूर्ण विधियों से ही स्वतंत्र भारत का निर्माण हो सकता है, तथापि उन्होंने यह विश्वास जताया कि लोकतंत्र ही भारत के लिए सर्वोत्तम विकल्प है। सुभाष बाबू के समर्थक विचारकों का यह मानना है कि आज़ाद हिन्द पर उनका आधिकारिक नियंत्रण मात्र राजनैतिक व्यावहारिकता थी और उसे वे साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध अपनाये हुए थे, न कि यह उनका लोकतंत्र के प्रति अविश्वास था।
आज़ादी की अभिधारणा पर स्वतंत्रता सेनानियों का मत जानना एकपक्षीय हो सकता है, यदि हम पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली ज़िन्ना का मत नहीं जान लें। 11 अगस्त 1947 को यानि पाकिस्तान की स्वतंत्रता के तीन दिन पहले जिन्ना साहब द्वारा दिया गया भाषण महत्वपूर्ण है। यद्यपि इस भाषण के टेप को पाकिस्तान के कट्टर पंथियों ने नष्ट कर दिया, किन्तु 14 अगस्त 1999 संस्करण के पाकिस्तानी अंग्रेजी दैनिक "डौन" के स्वतंत्रता दिवस परिशिष्ट में इसका ट्रांसक्रिप्शन छापा गया था। उनका स्वतंत्र पाकिस्तान का सपना कैसा था, यह भाषण के इस अंश से परिलक्षित होता है, "आप आज़ाद हैं। आप अपने मंदिर जाने के लिए आज़ाद हैं, आप मस्जिद जाने के लिए आज़ाद हैं या इस मुल्क पाकिस्तान में किसी भी इबादत की जगह जाने के लिए आज़ाद हैं।" जिन्ना ने घोषणा की थी, "आप किसी मज़हब, जाति या नस्ल के हों, मुल्क को इससे कोई वास्ता न्हीं है।"
सारांशतः यही कहा जा सकता है कि वैयक्तिक आज़ादी की भी सामाजिक और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में एक मर्यादा होती है जो व्यक्ति और समाज दोनों के हित के लिए आवश्यक है।

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