ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अयोध्या नगरी
01-Mar-2016 12:00 AM 1588     

रमायण ग्रन्थ की शुरुआत में ऋषि वाल्मीकि उस "आदर्श' मनुष्य की खोज के बारे में बताते हैं जो मनके चिंतन में है। उनको नारद ऋषि राम और रामायण कथा की रूपरेखा के बारे में बतलाते हैं। कहानी के नाटकीय विवरण के पश्चात, नारद ऋषि ने बताया कि राम "अयोध्या' नगरी वापिस शासन करने आयेंगे। इस सन्दर्भ में वाल्मीकि ने अयोध्या नगरी का विस्तृत विवरण किया है। साहित्य में रामायण के बारे में इतिहासकारों और विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। एक वर्ग इसे काल्पनिक पौराणिक कथा बताता है, तो दूसरा इसे ऐतिहासिक घटना मानता है। पर इन सब चर्चाओं के बीच अयोध्या नगरी एक प्रमुख ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में खड़ी है। वाल्मीकि के द्वारा अयोध्या नगरी के बारे में दिये गये वर्णन से वहाँ के उच्च स्तरीय शहरी समाज, उत्तम नगर प्रणाली, चौड़ी सड़कें, उन्नत व्यापार और सक्षम सुरक्षा व्यवस्था का चित्र उभर कर सामने आता है।
भारत पुरातन समय से ही सुव्यवस्थित शहरी प्रणाली के लिए जाना जाता है। ग्रन्थ में किये गये वर्णन से अनुमान लगाया जा सकता है कि देश के विभिन्न भागों में कई उपनिवेश मौजूद थे जिन पर राजवंशीय प्रथा के द्वारा शासन किया जाता था। राजा के ज्येष्ठ पुत्र को युवराज घोषित किया जाता था। प्रत्येक राजा अपनी सुरक्षा के लिये सेना रखता था और सेना राजवंश के प्रति वफादार होती थी। राजा, प्रजा के लिये उचित न्याय व्यवस्था करता था और यह उसकी ही जिम्मेदारी होती थी कि राज्य में खुशहाली और सम्पन्नता का वातावरण हो। राजा को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय धर्म का अवश्य ही पालन करना चाहिये। राजा का असफल होना राज्य का पतन समझा जाता था। एक नगर अपने आप में उपनिवेश माना जाता था और उसका एक स्वतंत्र राज्य की तरह प्रशासन चलता था।
राजा दशरथ ने अयोध्या का राज्य अपने पिता अज से उत्तराधिकार में प्राप्त किया था। वह इक्ष्वाकु कुल के वंशज थे, जिसमें बहुत पहले से राजशाही प्रथा का प्रचलन था। यह ज्ञात नहीं है कि यह राजवंश मूल रूप से अयोध्या का निवासी था या फिर किसी अन्य जगह से यहाँ विस्थापित हुआ था। वंशावली और कहानियों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह कुल परम्परागत राजवंशी था और उसका एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि नगर धीरे-धीरे विकसित हुआ था। वाल्मीकि के वर्णन के अनुसार नगर सुव्यवस्थित, आबाद, समृद्ध और सांस्कृतिक था। नगर एक आत्मनिर्भर इकाई थी जिसके चारों तरफ कृषि भूमि और कई गाँव थे। वाल्मीकि के विवरण से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आसपास के गाँव व्यवसाय और सुरक्षा के लिए नगर पर निर्भर थे।
वाल्मीकि के काव्य विवरण से अयोध्या नगर यथार्थ लगता है। यह ज्ञात नहीं है कि वाल्मीकि के समय नगर उस रूप में मौजूद था या साहित्यिक रूप से महत्वपूर्ण एक ऐतिहासिक नगर था। वाल्मीकि के अनुसार अयोध्या समतल धरातल पर आठ योजन (छ्यानवे मील) लम्बी और तीन योजन (चौबीस मील) चौड़ी थी। नगर में एक राजमार्ग और अन्य कई चौड़े-चौड़े मार्ग थे। मार्ग पर पानी का छिड़काव करना आम बात थी, जिससे गाड़ियों और आवागमन के कारण होने वाली धूल को दबाया जाता था। सड़कें चौड़ी थीं, जिससे रथ, घुड़सवार और सेना आसानी से कूच कर सके। कुछ खास अवसरों पर मार्ग को फूलों की पंखुड़ियाँ बिखेर कर सजाया जाता था।
नगर को चारों तरफ से सुरक्षित रखने के लिए चारों ओर गहरी खाई और परिकोटा (दीवाल) बनाया गया था। रास्तों पर दरबाजे, गुम्बद और मेहराब बने हुये थे। मार्गों के दोनों तरफ दुकानें थीं। नगर हथियारों से लैस था और उनके रखरखाव के लिए अनेक कुशल कारिगर थे। नगर में ऊँची-ऊँची इमारतें थी, जिन पर राजकीय ध्वज लगे हुये थे और तोपें स्थापित थीं। नगर की सुरक्षा के लिए सेना के ह्मष्ट-पुष्ट पुरुष और पहलवान दिखाई दे रहे थे। अनेक कुशल सारथी सुन्दर भवनों में निवास करते थे। सैनिक जंगली जानवरों से द्वंद युद्ध करने में प्रशिक्षित थे, वे हथियारों से या बाहुबल प्रहार से भी उन्हें मार सकते थे। उस समय घोड़ा, हाथी, गाय, ऊँट और गधा पालतू जानवरों में शामिल थे। व्यवसाय और राजकीय कार्यों के लिए अन्य राज्यों के राजकीय सदस्य नगर में देखे जा सकते थे। आम रास्तों पर दुकानें किराना और अन्य सामान से सजी हुई थी। नगर में पीने के लिए मीठा पानी और खाद्यान्न में चावल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था। अयोध्या में भवन बहुमंजलीय थे और उनमें छज्जे और खिड़कियाँ भी लगी हुयीं थी। कुछ घर बड़े और रत्न जड़ित थे। उन घरों में आकर्षक वस्त्रों में सुसज्जित सुन्दर स्त्रियाँ रहती थीं। नगर में भाट, सारिका और गायकों की उपस्थिति कला के प्रोत्साहन को दर्शाती थी। नृत्यांगनाएं नगर के बगीचों और आमों के बागों में नाच करती हुयी देखी जा सकती थीं। नगर में कई धार्मिक स्थल थे, जहाँ नगरवासी पूजा-अर्चना और धार्मिक कर्मकांड करने आते थे। राजा, प्रजा के हित के लिये उच्च कोटि के पंडित और विद्वानों को आमंत्रित करते थे। नगर में जगह-जगह वैदिक पाठ और बौद्धिक शास्त्रार्थ होते हुये दिखाई पड़ते थे। नगर में रंग और गतिविधियाँ, सजी हुई शतरंज के चौखानों जैसी प्रतीत होती थी।
कर्तव्यनिष्ठ और धर्मपरायण होने के कारण राजा दशरथ ने "राजर्षि' की पदवी प्राप्त थी। कथा को रोचक बनाने के लिये वाल्मीकि ने अयोध्या के नगर वासियों को मानवों में सर्वोत्तम बतलाया है। वह सत्यवादी, धार्मिक, विद्वान और खुशहाल थे। सभी पारिवारिक और धनी थे। खाद्यान्न प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था और देखभाल करने के लिये पालतू पशु थे। कोई भी निर्दय, असहाय, अशिक्षित या अधर्मी नहीं था। नागरिक सद्गुणी और जीवन में संयमी थे। सभी स्त्रियाँ चूड़ियों, बालियों और फूलों के गजरों से सजी हुई थीं। कोई भी क्षुद्र, अनाथ, दुराचारी या अनैतिक व्यवहार वाला नहीं था। सभी लोग रूपवान, सत्कारशील, उदार, शक्तिशाली और साहसी थे। वो सभी नित धार्मिक ग्रंथों का पठन पाठन करने वाले व राजा के प्रति वफादार थे। सभी नगरवासी दीर्घजीवी थे। सभी लोगों ने अपने कौशल और रुचि के अनुसार जीवन को प्रतियोगी और उल्लासपूर्ण बनाया हुआ था।       
राजा जीवन की भोग विलासिता के लिये जाना जाता था। वह आसपास के जंगलों में शिकार के लिये जाता था। राजा ने अयोध्या में दूसरे राज्यों से हाथी और घोड़े मंगवाये थे। वह पशुओं की नई-नई नस्लें पैदा करने के लिये प्रोत्साहित करते थे। लोग सार्वजनिक बगीचों में आमोद-प्रमोद और मनोरंजन के लिये रात गुजारते थे। भव्य राजकीय उत्सवों को मनाने के लिये सभी प्रजाजन राजकीय दरबार में शामिल होते थे। नगर में राजकीय ठाट-बाट और तड़क-भड़क देखी जा सकती थी। कुछ विशेष अवसरों, जैसे राज्याभिषेक, राजकीय विवाह, विशेष अतिथि आगमन आदि के समय नगर को पुष्पों और अन्य साज-सज्जा की वस्तुओं से खास अंदाज़ में सजाया संवारा जाता था। राजकीय समारोहों में आम जनता को आमंत्रित किया जाता था, और बड़े राजकीय निर्णयों में उससे राय मशविरा भी लिया जाता था। जब प्रजा को राम के वनवास जाने की खबर मिली तो उन्होंने अपनी बैचैनी व्यक्त की। जनता ने राजा दशरथ के प्रति अपने गुस्से को जाहिर किया। जनता का असंतोष नगर का वातावरण ख़राब कर सकता था। स्त्रियों का नगर में एक अपना विशेष महत्व था। वह अपने घर के कामकाज में ध्यान न देकर राम के वापिस आने का बेसब्राी से प्रतिदिन इन्तजार करती थी।     
वाल्मीकि के व्याख्यान से, कुछ शहरी क्षेत्रों का पता चलता है और उसके आसपास के क्षेत्र में रहने वाले लोगों का सामाजिक जीवन शहर की अपेक्षा भिन्न था। राम की मुलाकात सरदार गुहा से उस समय हुई, जब सारथी सुमंत्र दल के साथ गंगा के किनारे प्रवास के समय गये थे, तो सरदार और लोगों ने बताया कि उन्हें शहरी वातावरण की तुलना में प्राकृतिक वातावरण में रहना ज्यादा पसंद है। यद्यपि सरदार की स्वतन्त्र जागीर थी, पर वह राजा के प्रति वफादार था और उसने राम के प्रति अपनत्व को प्रकट किया। उसने राम के दल को नदी पार करने में मदद की। उसने दल के प्रयासों का जायजा लेने की लिये नदी के दूसरे किनारे "गुप्तचर' भी भेजे। राम ने भी भरत को शासन कला सिखलाते समय "गुप्तचर' के बारे में जिक्र किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि शहर में लोगों ने सुरक्षा और समृद्धि के लिये अपना उत्तरदायित्व पूर्ण करने की जिम्मेदारी ले रखी थी। वाल्मीकि के अनुसार राजा दशरथ के महल की वास्तुकला का प्रारूप बहुत ही वृहद था। मजबूत दरवाजों की कई कतारें थीं, जिसमें हर द्वार पर योग्य द्वारपाल मौजूद होते थे। महल में राजा का कक्ष, राजदरबार और कई रनवास थे। रनवासों की सुरक्षा के लिये महिला पहरेदारों को रखा जाता था। राजा का कक्ष, मखमली कालीन और उत्तम दर्जे के साज-सज्जा के सामान से सुसज्जित था। कैकेयी का महल सबसे भव्य था। उसके महल के अन्दर बगीचा था और उसमें झरने थे और मूर्तियाँ भी लगी हुई थीं। यह स्पष्ट नहीं है कि वाल्मीकि ने इसके बारे में सुनी हुयी कहानियों से या अपने समकालीन समाज में अवलोकन के आधार पर यह वर्णन किया है।
अयोध्या नगरी की वास्तुकला संरचना, नगर प्रारूप, बहुमंजिला भवनों से कोई भी यह निष्कर्ष निकल सकता है कि उस समय वास्तुकला अभियांत्रिकी की जानकारी थी और लोग उसमें निपुण थे। भरत की देखरेख में कारिगरों ने जंगल में सड़क निर्माण का कार्य केवल दो सप्ताह में पूरा कर दिया था। ऐसा भी हो सकता है कि राजा के कुशल प्रशासन और मंत्रियों की बुद्धिमानी ने निर्माण कार्य को सरल और कारगार बना दिया हो।

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