ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अरण्यरोदन बहुत हुआ, अब हिंदी का उत्सव मनाएँ
01-Sep-2019 06:26 PM 735     

हिंदी को लेकर अरण्यरोदन की परंपरा नेहरू युग से आज तक जारी है। आजादी के 73 साल बाद भी स्थितियां बदलने का नाम नहीं ले रही। आखिर कब तक हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा बनने से वंचित रहेगी। आजादी के बाद आई क्रमागत सरकारों और जन प्रतिनिधियों ने हिन्दी के साथ जो वादाखिलाफी की, यह दोष सरकारों का है, जो हिन्दी के मामले में इतनी उपेक्षा और अपमान झेलना पड़ा। यह अरण्यरोदन का संक्रामक रोग केंद्र से लेकर रा़ज्य सरकारों तक फैला है, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों और निजी व्यवसायिक संस्थानों को भी यह रोग चपेट में ले चुका है। सारी़ नौकरशाही, प्रशासन तंत्र, व्यवसाय जगत, मनोरंजन उद्योग और न्यायपालिका हिंदी को एक बाधा के रूप में देखते हैं जबकि यह केवल ग़लत नज़रिया है। अंग्रेजी उपनिवेशवाद की काई और जाले तोड़कर नए भारत के स्वाभिमान और गौरव की भाषा बनने के लिए हिंदी आज पूरी तरह तैयार है।
स्वतंत्रता के पहले समर में 1857 में हिन्दी समूचे देश के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए क्रांति, स्वदेश और स्वदेशी की संपर्क भाषा बनी। रोटी और कमल के गुप्त संकेत के साथ हिंदी ने आजादी की पहली लडाई में बहुत बडी भूमिका निभाई थी। हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा बनाने की मांग भारतेंदु हरिश्चंद्र, महामना मदनमोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, रविन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, विनोबा भावे, काका कालेलकर, गुजराती कवि नर्मद, पुरुषोत्तम दास टंडन, डॉ. राममनोहर लोहिया जैसी महान हस्तियों ने की थी।
मद्रास प्रैज़िडन्सी के तत्कालीन मुख्यमंत्री चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने हिन्दुस्तानी को माध्यमिक स्तर की शिक्षा में अनिवार्य भाषा के रूप में जोड़ना प्रस्तावित किया था, मगर बाद में उन्होंने 1965 में मद्रास गैर-हिन्दी आंदोलन के समय हिन्दी के प्रस्ताव का विरोध किया। बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रवादी आंदोलन के आवश्यक अंक के रूप में देवनागरी लिपि का समर्थन किया था। कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलनकारियों ने भी अपनी भाषा सम्बंधी नितियों में वैकल्पिक भाषा का विकल्प रखा। स्वतंत्रता आंदोलन में स्थिति सुधारने के लिए धार्मिक और राजनेताओं, समाज सुधारकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने हिन्दी का समर्थन किया। हिन्दी को 1950 में भारतीय संविधान ने अंग्रेज़ी के साथ आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया।
भारत की आजादी के बाद हिन्दी राष्ट्रभाषा तो नहीं बनी पर उसे केवल राजभाषा का सीमित दर्जा मिला। यह बडी शर्म की बात है कि हिंदी को अपने ही देश में समुचित सम्मान से वंचित ऱखा गया है और उसे राष्ट्रभाषा बनाने का महती कार्य अब तक लंबित पडा है। आज हिंदी के हिमायती राष्ट्रीय नेताओं और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के लिए हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करना उतना ही जरूरी है जितना देश के लोकतंत्र और संप्रभुता को आतंकवाद व विघटनवाद से बचाना। यह करना सरकार के लिए बहुत सहज तरीके से संभव है लेकिन जिस भाषा ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की जीत में सबसे बडी भूमिका निभाई, उस भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सरकार को पहल करना चाहिए। उन्हें देश की जनता की भाषा और भाषा के लोकतंत्र का सम्मान करना चाहिए। वे भाषा विवाद में हिंदी की निर्बैर भूमिका होने के बाद भी उसे प्राथमिकता देने से आनाकानी कर रहे हैं और लोक प्रतिनिधि हिंदी के साथ लुकाछिपी खेलकर जनता की आशाओं पर पानी फेरने का काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार को सात दशक से लंबित राष्ट्रभाषा के मसले का सर्वमान्य हल निकालना चाहिए, जब हिंदी देश में किसी राज्य पर थोपी नहीं जा रही है और अंग्रेजी और स्थानीय भाषा का विकल्प सबके लिए खुला है तब हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने का सही अवसर अब है।
नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा सूत्र को लेकर उठे विवाद के बीच मसौदा नीति का संशोधित प्रारूप जारी किया गया, जिसमें गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी अनिवार्य किए जाने का उल्लेख नहीं है। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्य दलों ने नई शिक्षा नीति के मसौदे में त्रिभाषा फार्मूले का विरोध किया था और आरोप लगाया था कि यह हिन्दी भाषा थोपने जैसा है। बहरहाल, नई शिक्षा नीति के संशोधित मसौदे में कहा गया है कि जो छात्र पढ़ाई जाने वाली तीन भाषाओं में से एक या अधिक भाषा बदलना चाहते हैं, वे कक्षा 6 या कक्षा 7 में ऐसा कर सकते हैं, जब वे तीन भाषाओं (एक भाषा साहित्य के स्तर पर) में माध्यमिक स्कूल के दौरान बोर्ड परीक्षा में अपनी दक्षता प्रदर्शित कर पाते हैं।
नई शिक्षा नीति बनाने के लिए सरकार ने वैज्ञानिक डॉ. कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। हिन्दी को लेकर मसौदे में हुए बदलाव का समिति के दो सदस्यों ने विरोध किया। नई शिक्षा नीति के पहले के मसौदे में समिति ने गैर हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी की शिक्षा को अनिवार्य बनाने का सुझाव दिया। इस मुद्दे पर तमिलनाडु में द्रमुक सहित कई अन्य दलों ने भारी विरोध शुरू कर दिया। त्रिभाषा सूत्र संबंधी नई शिक्षा नीति के मसौदे पर उठे विवाद के बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल "निशंक" ने स्पष्ट किया कि सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास के लिए प्रतिबद्ध है और किसी प्रदेश पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित विशेषज्ञ समिति के प्रमुख डॉ. कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन प्रसिद्ध भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक एवं राज्यसभा के सांसद हैं। इन्हें भारत सरकार ने 1992 में विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया था। वे सन 1994 से 2003 तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष रहे, उनका मानना है कि दक्षिण भारत में लोग बहुत अच्छी तरह हिंदी सीख रहे हैं। वे कहते हैं, "मैं बहुत अच्छी हिंदी बोलता हूं। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने हिंदी सिखाने में अच्छा काम किया है। मुझे नहीं लगता कि एक दक्षिण भारतीय हिंदी को बाहरी भाषा की तरह देखता है लेकिन आप उससे कल कहें कि आपको इसे (हिंदी को) सीखना ही होगा (तब समस्या होती है)... ज़रूरत के मुताबिक लोग हिंदी सीखते हैं।" (संदर्भ सौजन्य : बीबीसी हिंदी सेवा)
हिंदी के विरोध में तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और बंगाल से राजनीतिक स्वर उभरे हैं, इन राजनीतिक नेताओं (स्टालिन, कमल हासन, ममता बऩर्जी और राज ठाकरे) को हिंदी की भूमिका समझने की जरूरत है। इस संदर्भ में हिंदी के लिए व्यापक जन-जागरण और सामाजिक माध्यमों में जारी हिंदी के दुष्प्रचार का विरोध आवश्यक है। क्षत्रपों और क्षेत्रीयतावाद की राजनीति से हिंदी को बचाने की जरूरत है, जो पेरियार के समय हुआ और जो एमजीआर, जयललिता और करुणानिधि के काल तक हुआ, वह हिंदी विरोध अब ठंडा पड चुका है। लोग अब भाषा की राजनीति का नुकसान समझने लगे हैं।
हिंदी के प्रयोग के क्षेत्र में प्रगति हुई है, किंतु अब भी लक्ष्य प्राप्त नहीं किए जा सके हैं। निजी और सरकारी कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग बढ़ा है किंतु अभी भी बहुत-सा काम अंग्रेजी में हो रहा है। लक्ष्य होना चाहिए कि मौलिक लेखन, मूल टिप्पण और प्रारूपण के लिए हिंदी का ही प्रयोग हो। यही संविधान की मूल भावना के अनुरूप भी होगा। आज भी निजी और सरकारी कार्यालयों में राजभाषा हिंदी का कार्य अनुवाद के सहारे चल रहा है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी, पारिस्थितिकी, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न विषयों में होने वाले विकास व अनुसंधान के फलस्वरूप रोज़ नई संकल्पनाएँ जन्म ले रही हैं, नए शब्द गढ़े जा रहे हैं। चूँकि इन विषयों में रोज़ नए अनुसंधान विश्व के कोने-कोने में विभिन्न भाषाओं में हो रहे हैं अत: इनका साहित्य और उपलब्ध जानकारी मूल रूप से हिंदी में मौजूद नहीं है। इसके फलस्वरूप, बदलते वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की भूमिका और नजरिए में बदलाव की जरूरत काफी बढ़ गई है।
हिंदी भाषा सम्बन्धी जो चुनौतियां आजादी के पहले हमारे सामने थी, वे कमोबेश आज भी नए रूपों और आयामों के साथ हैं। मसलन अंग्रेजी का बढता प्रचलन, जिसने व्यवहार में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को दूसरे-तीसरे दर्जे पर पहुँचा दिया है। इसके अलावा वैज्ञानिक और पारिभाषिक शब्दावली की समस्या है, जिस पर अभी भी काफी काम किए जाने की जरूरत है। अगर हिन्दी को इस देश की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित होना है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में स्वीकृत होना है तो इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से संपन्न रचनात्मक साहित्य का होना हिन्दी के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अब किसी भाषा को एक समर्थ भाषा बनने के लिए उसे आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक, यातायात, राजनय, सैनिक, वैज्ञानिक, प्रायोगिक प्रौद्योगिकी और औद्योगिकी आदि के क्षेत्रों में शब्दावली को प्रचारित व प्रसारित करना होगा।
अंग्रेज़ी की वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा केवल शेक्सपीयर, मिल्टन, बर्नार्ड शॉ, टी.एस. इलियट आदि सर्जनात्मक लेखकों के कारण ही नहीं है, बल्कि उसके अन्य अनेक कारण भी हैं। फ़्रेंच भाषा के महत्त्व के घटने और अंग्रेज़ी भाषा के महत्त्व के बढ़ने के कारणों का आकलन तथा विश्लेषण करने के लिए फ़्रेंच सरकार ने "फ़्रेंच लेंग्वेज हाई कमेटी" के नाम से एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। उस उच्च स्तरीय समिति के प्रतिवेदन से यह स्पष्ट पता चलता है कि 1914 ई. तक यूरोपीय भाषाओं के बीच फ़्रेंच भाषा का निर्विवाद सर्वोत्तम स्थान रहा। किंतु, उसके बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेज़ी भाषा फ़्रेंच भाषा को निरंतर पीछे छोड़ती गई।
अंग्रेज़ी भाषा की इस निरंतर प्रगति और महत्त्व का प्रमुख कारण यह हुआ कि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही अंग्रेज़ी भाषा विश्व में अंग्रेज़ी की औद्योगिक, व्यापारिक एवं सामूहिक सर्वोपरिता का सहारा लेकर निरंतर प्रमुखता और प्रसार पाती गयी तथा ब्रिटिश साम्राज्य के देशांतर विस्तार की वजह से अपने प्रचार-प्रसार के लिए भी सह-विस्तार पाती गयी। इसका फल यह हुआ कि अंग्रेज़ी भाषा इन औद्योगिक, सामुद्रिक और राजकीय सुविधाओं को पाकर लगभग संपूर्ण विश्व के व्यापार और सामुद्रिक यातायात की भाषा बन गई। इसके बाद जब संयुक्त राज्य अमेरिका का अभ्युदय एक शक्तिशाली देश के रूप में हुआ, तब उसने लगभग सन 1945 के बाद अंग्रेज़ी को राजनयिक संबंधों, उच्चतर प्रौद्यागिकी के क्षेत्रों और जन सम्प्रेषण के प्राविधिक माध्यमों की विशिष्ट भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
हिंदी को राष्ट्रभाषा, विश्वभाषा और संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए बहुत दूरदृष्टी और महान संकल्प की जरूरत है। इसके लिए हिंदी के समर्थकों को सामाजिक माध्यमों और प्रसार माध्यमों पर बहुत सक्रियता और निरंतरता से जनजागरण करना होगा। वर्तमान भाषा-संदर्भ में हिन्दी को भी उच्चतर प्रौद्योगिकी राजनयिक संबंध, वाणिज्य-व्यापार, सामुद्रिक यातायात एवं आधुनिक मानव-जीवन के अन्य अनेक प्रभागों में एक बहुउपयोगी भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है। प्रत्येक राष्ट्र को अपनी पहचान के लिए और अंतर्राष्ट्रीय मंडली में अपने स्वतंत्र भाषिक अभिज्ञान के लिए तथा एक मौलिक राष्ट्र के रूप में अपनी अस्मिता को अभिव्यक्ति के लिए एक राष्ट्रभाषा की आवश्कता पड़ती ही है। इसी दृष्टि से हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने और हिन्दी के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को अपनी पहचान बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम हिन्दी को उसके संपूर्ण बहुउपयोगी भाषा के रूप में स्वीकार करें और उसकी संभावनाओं का निरंतर विकास करें।
भारत देश में 367 से भी ज्यादा मातृ भाषाएँ हैं और लगभग 58 भाषाएँ विद्यालय स्तर पर शिक्षा के माध्यम की भाषा के रूप में स्वीकृत हैं, देश को एक राष्ट्रभाषा की प्राप्ति के लिए कई प्रकार की संकीर्णताओं, आंचलिक पूर्वाग्रहों तथा भावुकता के आवेगों से ऊपर उठना होगा। इतना ही नहीं, देश के लिए यह भी आवश्यक है कि वह राष्ट्र की एकता को सर्वोपरि महत्त्व देते हुए अपनी भाषा समस्या के समाधान हेतु स्वदेश हित सर्वोपरि रखें।

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