ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अनुवाद की चुनौतियां
01-Jun-2018 03:55 PM 2449     

भाषा हमारे जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। यह मनुष्यों के बीच आपसी संवाद का मूलभूत माध्यम है। भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन भाषा-विज्ञान कहलाता है। भाषा के उद्देश्य आंतरिक विचारों व भावनाओं को व्यक्त करना, जटिल व गूढ़ विषयों को समझना, दूसरों के साथ संवाद स्थापित करना, अपनी इच्छाओं व आवश्यकताओं की पूर्ति करना आदि हैं। भाषा के मौखिक, शारीरिक, सांकेतिक आदि कई रूप हैं।
एक अनुमान के अनुसार विश्व में लगभग 5 से 7 हज़ार भाषाएं हैं। स्वाभाविक है कि ये सभी भाषाएं सीखना और समझना किसी भी व्यक्ति के लिए असंभव है। लेकिन एक-दूसरे से संपर्क व संवाद करना तो सभी मनुष्यों की बुनियादी आवश्यकता है। अतः कोई ऐसा तरीका होना चाहिए, जिसके द्वारा एक-दूसरे की भाषाएं न समझने वाले लोग भी आपस में संवाद कर सकें और अन्य भाषाओं में लिखे पत्रों, साहित्य आदि को भी पढ़ सकें। यही अनुवाद की भूमिका है।
अनुवाद दो भाषाओं को जोड़ने वाले पुल जैसा है और इसकी सहायता से लोग अन्य भाषाओं की सामग्री को अपनी भाषा में प्राप्त कर पाते हैं। अनुवाद किसी एक भाषा में लिखी या बोली गई बातों को दूसरी भाषा में बदलने की प्रक्रिया है। अनुवाद का मानव-जीवन के लगभग प्रत्येक कार्यक्षेत्र में अत्यधिक महत्व है और भाषा-विज्ञान, व्यापार, शिक्षा, क़ानून, धर्म, साहित्य, शासन-प्रशासन आदि अनेक क्षेत्रों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। लेकिन अनुवाद केवल एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा में बदलने का सीमित कार्य नहीं है। वास्तव में, यह तो अनुवाद का केवल एक अंग है। अनुवाद में उपयुक्त शब्दों का चयन करना, व्याकरण के नियमों का पालन करना और सांस्कृतिक संदर्भों का ध्यान रखना भी आवश्यक होता है। अनुवाद अचूक और स्पष्ट होना चाहिए, ताकि पाठक को इसे समझने में कठिनाई न हो और वांछित संदेश स्पष्ट रूप से व्यक्त हो सके।
अनुवाद के बारे में कई भ्रामक धारणाएं प्रचलित हैं। कई लोग सोचते हैं कि एक से दूसरी भाषा में किसी भी सामग्री का अनुवाद करने के लिए इतना पर्याप्त है कि व्यक्ति वे दोनों भाषाएं जानता हो। दूसरी भ्रामक धारणा यह है कि अनुवाद में केवल एक भाषा में लिखे शब्दों को दूसरी भाषा के उसी अर्थ वाले शब्दों से बदलने भर की आवश्यकता होती है, अतः कोई भी व्यक्ति केवल एक शब्दकोश (डिक्शनरी) की मदद से किसी भी भाषा में अनुवाद कर सकता है। ऐसी ही एक अन्य भ्रामक धारणा पिछले कुछ समय से प्रचलित है कि इंटरनेट पर उपलब्ध किसी भी मशीन टूल की सहायता से तुरंत एक से दूसरी भाषा में अनुवाद किया जा सकता है, इसलिए अब अनुवाद करने के लिए मनुष्यों की आवश्यकता नहीं रही। वास्तव में जो लोग ऐसी भ्रामक धारणाओं को मानते हैं, उन्हें अनुवाद के महत्व और अनुवाद-प्रक्रिया की जटिलताओं और चुनौतियों का अहसास नहीं है। आइये इन चुनौतियों के बारे में विस्तार से चर्चा करें। अपनी सुविधा के लिए हम इन चुनौतियों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांट सकते हैं: भाषाई चुनौतियां व तकनीकी चुनौतियां।
भाषा का उद्देश्य संवाद स्थापित करना है। यदि वही विफल हो जाए, तो भाषा अनुपयोगी हो जाएगी। एक अच्छे अनुवादक के लिए यह आवश्यक है कि वह जिन दो भाषाओं में अनुवाद करता है, उन दोनों भाषाओं को बोलने वाले लोगों की संस्कृति, इतिहास और मान्यताओं आदि से भी वह परिचित हो। यदि अनुवादक उन दोनों भाषाओं में निपुण नहीं है, तो इस बात की अत्यधिक संभावना है कि वह अभीष्ट संदेश को अपने अनुवाद के माध्यम से व्यक्त कर पाने में सफल नहीं हो सकेगा। प्रत्येक भाषा की अपनी अनूठी संरचना होती है। भाषा की संरचना का अनुवाद की अचूकता और सरलता पर भी प्रभाव पड़ता है। भाषा जितनी सरल होगी, अनुवाद कर पाना भी उतना ही सरल हो जाएगा।
उदाहरण के लिए अंग्रेजी का एक सरल वाक्य देखें : "च्र्ण्ड्ढन्र् ड्ढठ्ठद्य ढद्धद्वत्द्यद्म." यदि हिन्दी में इसका अनुवाद करना हो, तो शब्दों का क्रम बदल जाएगा और हमें इस प्रकार लिखना पड़ेगा : "वे फल खाते हैं।" लेकिन यदि कोई व्यक्ति केवल शब्दकोश अथवा मशीन टूल की सहायता से अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी शब्दों से बदल दे, तो इसका अनुवाद "वे खाना फल" हो जाएगा, जो व्याकरण की दृष्टि से भी गलत है और पढ़ने में अस्पष्ट भी है। कल्पना कीजिए कि यदि आप कोई उपन्यास खरीदते हैं और उसमें इसी प्रकार अनुवाद किए गए वाक्य भरे पड़े हों, तो आपको कैसा लगेगा? ऐसे अनुवाद में न तो भाषा का सौंदर्य रहेगा और न आप उसका अर्थ समझ पाएंगे।
इसी प्रकार संयुक्त शब्दों का सही अर्थ समझना भी अनुवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू है और यह अनुवाद में एक चुनौती भी है। ये दो या अधिक शब्दों से मिलकर बने शब्द होते हैं, किन्तु उनका अर्थ सामान्यतः उनमें से किसी भी शब्द के अर्थ से भिन्न होता है। उदाहरण के लिये अंग्रेजी में एक शब्द है "डदृदृत्त्ध्र्दृद्धथ्र्" या हिंदी में "किताबी कीड़ा"। लेकिन इसका आशय किसी पुस्तक या कीड़े से नहीं है, बल्कि यह ऐसे व्यक्ति के लिए उपयोग किया जाता है, जिसे पुस्तकें पढ़ने का शौक हो। इसी प्रकार अंग्रेजी शब्द "ड्डड्ढठ्ठड्डथ्त्दड्ढ" मृत व्यक्तियों की पंक्ति या रेखा नहीं, बल्कि किसी कार्य के लिए अंतिम स्वीकार्य तिथि होती है। एक अन्य उदाहरण "डद्वद्यद्यड्ढद्धढथ्न्र्" है, जो तितली के लिए उपयोग किया जाता है, न कि मक्खन (डद्वद्यद्यड्ढद्ध) या मक्खी (ढथ्न्र्) के लिए। इसी तरह जब हम "गुलाब जामुन" कहते हैं, तो यह एक मिठाई के संदर्भ में है, न कि इसमें गुलाब के फूल या जामुन के फल की बात हो रही है।
मुहावरों और कहावतों का अनुवाद करना संभवतः सबसे कठिन कार्य है। इनका अनुवाद करने के लिए उस भाषा से संबंधित संस्कृति से परिचित होना सहायक होता है। यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि इनका शब्दशः अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि अनुवादक को दूसरी भाषा में उसी अर्थ वाला कोई मुहावरा या कहावत ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। उदाहरण के लिये अंग्रेजी कहावत "ॠ डठ्ठड्ड ध्र्दृद्धत्त्थ्र्ठ्ठद डथ्ठ्ठथ्र्ड्ढद्म ण्त्द्म द्यदृदृथ्द्म" का यदि शब्दशः अनुवाद करके इसे "एक बुरा कारीगर अपने औजारों को दोष देता है" लिख दिया जाए, तो इसमें मूल भावना ही व्यक्त नहीं हो सकेगी और अनुवाद विफल हो जाएगा। अतः हिन्दी में इसका अनुवाद करते समय "नाच न जाने आँगन टेढ़ा" मुहावरे का उपयोग किया जाना चाहिए। इसी प्रकार व्यंग्य का अनुवाद करना भी ऐसी ही एक चुनौती है। व्यंग्य ऐसी टिप्पणी या भावना व्यक्त करने का तीक्ष्ण तरीका है, जिसमें सामान्यतः जो कहा जा रहा हो, अभीष्ट अर्थ उसके विपरीत होता है। यदि व्यंग्य का भी शब्दशः अनुवाद कर दिया जाए, तो इसका अर्थ खो जाता है क्योंकि अनुवाद से वह संदेश अभिव्यक्त होगा, जो वास्तव में वांछित संदेश का विपरीत है। ऐसी ही चुनौती पद्य के अनुवाद में भी होती है क्योंकि काव्य में अक्सर शब्दों का क्रम गद्य से भिन्न होता है और कई बार सांकेतिक अर्थ भी छिपे होते हैं। स्वाभाविक है कि कोई भी मशीन टूल वास्तविक अनुवादक की सहायता के बिना अचूक अनुवाद नहीं कर सकेगा। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि अनुवाद में केवल शब्दार्थ पर नहीं, बल्कि भावार्थ पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक होता है।
अनुवाद करते समय इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि विभिन्न संदर्भों में एक ही शब्द के एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। अतः संदर्भ को समझना और उसके अनुसार सबसे उपयुक्त अर्थ का चयन करना महत्वपूर्ण है, अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो सकता है। उदाहरण के लिये अंग्रेजी शब्द "थ्ड्ढठ्ठध्ड्ढ" का अर्थ "छोड़ना" या "छुट्टी" दोनों हो सकता है, "थ्ड्ढढद्य" शब्द के लिए "बायांं", "बचा हुआ", "वामपंथ" आदि विभिन्न अर्थ हैं और "द्दद्वठ्ठद्धद्यड्ढद्ध" शब्द भी "चौथाई", "आवास", "तिमाही" आदि अनेक अर्थों में उपयोग किया जा सकता है। यदि अनुवादक संदर्भ का ध्यान रखे बिना इन शब्दों के किसी भी अर्थ का उपयोग कर ले, तो अनूदित वाक्य पूरी तरह गलत संदेश दे सकता है या निरर्थक भी बन सकता है।
अनुवाद करते समय इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि अनुवाद किस आयु-वर्ग, व्यावसायिक-श्रेणी आदि के पाठकों के लिए किया जा रहा है। इसके आधार पर उपयुक्त शब्दों का चयन और शैली का चयन करना महत्वपूर्ण होता है। बच्चों की किसी पुस्तक का अनुवाद करते समय उपयोग की जाने वाली शैली किसी कानूनी दस्तावेज़ के अनुवाद की शैली से भिन्न होगी और किसी उपन्यास या कविता के अनुवाद के समय उपयोग की जाने वाली शैली व किसी उत्पाद के उपयोग-संबंधी निर्देशों का अनुवाद करने की शैली भिन्न रहेगी।
इन बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि ऊपर हमने अनुवाद के संबंध में प्रचलित जिन धारणाओं की चर्चा की थी, वे कितनी भ्रामक हैं और उन पर विश्वास करना वास्तव में कितना हानिकारक हो सकता है। आइये अब तकनीकी चुनौतियों पर चर्चा करें।
अनुवाद के क्षेत्र की चुनौतियों में एक महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी चुनौतियों से संबंधित है। कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, इंटरनेट और इससे संबंधित प्रौद्योगिकी के विकास और विस्तार के कारण अब अनुवाद की पारंपरिक पद्धति में कई बड़े परिवर्तन हुए हैं। अब अनुवाद का कार्य मुख्यतः कागज और कलम से नहीं, बल्कि कंप्यूटर की सहायता से किया जाने लगा है। पारंपरिक शब्दकोशों का स्थान अब ऑनलाइन शब्दकोश ले रहे हैं, कंप्यूटर एसिस्टेड ट्रांसलेशन (क्ॠच्र्) साधनों या सॉफ्टवेयरों का उपयोग भी होने लगा है। निश्चित रूप से, पारंपरिक साधनों व पद्धतियों की तुलना में इनके अपने लाभ हैं, किन्तु साथ ही इनसे जुड़ी कुछ तकनीकी चुनौतियां भी हैं, जो पारंपरिक अनुवाद पद्धति में नहीं थीं।
कंप्यूटर एसिस्टेड ट्रांसलेशन (क्ॠच्र्) टूल्स की बात आती है, तो कई लोग इसे "मशीन ट्रांसलेशन" भी समझ लेते हैं। उनकी धारणा होती है कि क्ॠच्र् टूल्स अर्थात ऐसे साधन हैं, जिनसे कंप्यूटर या किसी वेबसाइट पर अपनी पाठ्य-सामग्री डालते ही दूसरी भाषा में तुरंत अनुवाद उपलब्ध हो जाएगा और इसमें मानवीय बुद्धि या वास्तविक अनुवाद की आवश्यकता ही नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि क्ॠच्र् टूल्स और मशीन ट्रांसलेशन दो अलग बातें हैं।
कंप्यूटर एसिस्टेड ट्रांसलेशन (क्ॠच्र्) अनुवाद का वह तरीका है, जिसमें वास्तविक अनुवादक (मनुष्य) एक कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की सहायता से अनुवाद करता है, अर्थात मशीन स्वयं अनुवाद नहीं करती, बल्कि वह अनुवाद-कार्य में मनुष्य की सहायता करती है। कंप्यूटर एसिस्टेड ट्रांसलेशन (क्ॠच्र्) में मानक शब्दकोश और व्याकरण-संबंधी सॉफ्टवेयर हो सकते हैं। साथ ही, इनमें ट्रांसलेशन मेमोरी भी होती है, जहां स्रोत भाषा का प्रत्येक वाक्य और अनुवादक द्वारा किया जाने वाला उसका अनुवाद संग्रहित कर लिया जाता है, ताकि आगे जब भी कभी वही स्रोत वाक्य सामने आए, तो अनुवादक को पुनः उसका अनुवाद न करना पड़े, बल्कि ट्रांसलेशन मेमोरी स्वयं ही वह अनुवाद कर दे। इससे अनुवाद की गति बढ़ती है, किन्तु इसके कारण तब समस्या आ सकती है, जब एक ही शब्द या वाक्य विभिन्न अर्थों में आ रहा हो। अतः अनुवादकों को इससे सहायता तो लेनी चाहिए, किन्तु इस पर पूरी तरह निर्भर नहीं हो जाना चाहिए।
स्पष्ट है कि कंप्यूटर एसिस्टेड ट्रांसलेशन (क्ॠच्र्) टूल तेजी से और अच्छी गुणवत्ता वाला अनुवाद करने में मनुष्य की सहायता करते हैं, किन्तु वास्तव में ये उपकरण स्वयं अनुवाद नहीं करते। किसी सॉफ्टवेयर द्वारा किया जाने वाला अनुवाद मशीन ट्रांसलेशन कहलाता है। इस प्रक्रिया में एक कंप्यूटर प्रोग्राम स्रोत भाषा की सामग्री का विश्लेषण करता है और सैद्धांतिक रूप से, मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता के बिना लक्ष्य भाषा में सामग्री का अनुवाद कर देता है। हालांकि, ऊपर हमने जिन भाषाई चुनौतियों (वाक्य संरचना, मुहावरे, संयुक्त शब्द, अनेकार्थी शब्द आदि) की चर्चा की है, उनके कारण कोई भी सॉफ्टवेयर या मशीन अभी अचूक अनुवाद कर पाने में सक्षम नहीं है। अतः ऐसे सभी मशीनी अनुवादों को मनुष्यों द्वारा जांचने और संपादित करने की आवश्यकता पड़ती है।
इसके अलावा क्ॠच्र् टूल्स से संबंधित कुछ अन्य तकनीकी चुनौतियां भी हैं। विभिन्न कंपनियों द्वारा ऐसे अनेक सॉफ्टवेयर विकसित किए गए हैं। अक्सर ये एक-दूसरे के साथ संगत नहीं होते हैं। अर्थात एक क्ॠच्र् टूल में उपयोग की जा रही ट्रांसलेशन मेमोरी, टर्मबेस (शब्दकोश) और अनुवाद के लिए तैयार की गई स्रोत फाइल सामान्यतः केवल उसी क्ॠच्र् टूल के साथ खोली जा सकती है, किसी अन्य क्ॠच्र् टूल में नहीं। इसी प्रकार इनकी संगतता ऑपरेटिंग सिस्टम (विंडोज, मैक, लिनक्स आदि) के अनुसार भी अलग-अलग हो सकती है। विभिन्न कंपनियां व अनुवाद एजेंसियां अपनी प्राथमिकता व आवश्यकता के अनुसार क्ॠच्र् टूल्स का चयन करती हैं। इन सभी टूल्स को खरीदना और उनका उपयोग सीखना भी अनुवादकों के लिए एक चुनौती होती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के फॉण्ट (यूनिकोड व गैर-यूनिकोड), कीबोर्ड लेआउट आदि सीखना भी आवश्यक होता है। आशा है कि तकनीकी क्षेत्र में लगातार हो रही प्रगति के कारण निकट भविष्य में शायद ये चुनौतियां पूरी तरह समाप्त हो जाएं, किन्तु शायद अभी तो सर्वाधिक उपयुक्त समाधान यही है कि अनुवादक इस क्षेत्र में सर्वाधिक लोकप्रिय व प्रचलित ऑपरेटिंग सिस्टम, क्ॠच्र् टूल, फॉण्ट, कीबोर्ड लेआउट आदि के बारे में जानकारी प्राप्त करें और इनका उपयोग सीख लें। भले ही यह एक आदर्श समाधान न हो, किन्तु फिलहाल यही इन तकनीकी चुनौतियों से निपटने का सबसे व्यवहारिक समाधान है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि अनुवाद की चुनौतियों से निपटने के लिए अनुवादक में कम से कम निम्नलिखित गुण होना आवश्यक है :
जिस भाषा से अनुवाद किया जा रहा है (स्रोत भाषा) और जिस भाषा में अनुवाद किया जा रहा है (लक्ष्य भाषा), उन दोनों भाषाओं में निपुणता।
दोनों भाषाओं की संरचना, व्याकरण, सामाजिक-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक संदर्भों की जानकारी व समझ।
इस बात को समझ पाने की क्षमता कि कब शब्दशः अनुवाद किया जाए और कब शब्दार्थ से ज्यादा ध्यान भावार्थ पर दिया जाए। विभिन्न क्ॠच्र् टूल्स और इनसे संबंधित तकनीकी पहलुओं, जैसे फॉण्ट व कीबोर्ड लेआउट आदि की जानकारी व इनमें कार्य करने का अनुभव।
इन आवश्यकताओं की पूर्ति यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि अनूदित सामग्री न केवल वांछित संदेश को पूरी तरह अभिव्यक्त कर सकेगी, बल्कि भाषा के सौंदर्य को भी बनाए रखेगी। ये चुनौतियां भले ही कठिन प्रतीत होती हों, किन्तु इनसे निपटना असंभव नहीं है। सकारात्मक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण व सतत प्रयास के द्वारा हर चुनौती का निवारण संभव है।

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